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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः | १६१

तृतीयोऽध्यायः | १६१

**आचारदत्त या ह्रीदत्त दान के लक्षण—**विवाहादि कार्यों में मित्र, संबन्धी तथा बन्धुजनों को जो उपहार-स्वरूप में दिया आता है उसे ‘आचारदत्त’ व्यवहार से दिया हुआ कहते हैं और उसी को ‘ह्रीदत्त’ लज्जा से दिया हुआ भी कहते हैं ।

राज्ञे च बलिने दत्तं कार्यार्थं कार्यघातिने ॥ २१३ ॥
पापभीत्याऽथवा यच्च तत्तु भीदत्तमुच्यते ।

**भीदत्त दान के लक्षण—**राजा, बलवान और कार्य को नष्ट करनेवाला इन लोगों को जो कार्य के लिये दिया जाता है अथवा ‘न देने में पाप है’ इस भय से जो दिया जाता है उसे ‘भीदत्त’ भय से दिया हुआ कहते हैं ।

यदत्तं हिंस्रवृद्ध्यर्थं नष्टं द्यूतविनाशितम् ॥ २१४ ॥
चौरैर्हृतं पापदत्तं परस्त्रीसङ्गमायकम् ।

**नष्टदान के लक्षण—**जो धन हिंसकों की वृद्धि के लिये दिया जाता है या जो द्यूत से नष्ट कर दिया गया या जिसे चोरों ने हर लिया, जो पापियों को अथवा परस्त्री-संगमार्थ दिया गया उसे ‘नष्ट’ कहते हैं ।

आराधयति यं देवं तमुत्कृष्टतरं वदेत् ॥ २१५ ॥
तन्न्यूनतां नैव कुर्याज्तोषयेत्तस्य सेवनम् ।

**आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानने का निर्देश—**जिस देवता या प्रभु की आराधना करे उसे सबसे अधिक उत्कृष्ट कहे और उसकी न्यूनता को न करे एवं उसकी सेवा हर्ष से करे ।

विना दानार्जवाभ्यां न भुव्यस्ति च वशीकरम् ॥ २१६ ॥
दानक्षीणो विवर्धिष्णुः शशी वक्रोऽप्यतः शुभः ।

**वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता की महत्ता—**दान तथा सरलता को छोड़ कर संसार में अन्य कोई वशीभूत करने का उपाय नहीं है । अतः एवं अमृत दान करने से क्षीण हुआ किन्तु पुनः बढ़ने की इच्छा रखनेवाला शुक्लपक्ष की द्वितीया का चन्द्र वक्र (सरलता से रहित) होता हुआ भी शुभ होता है, अर्थात् उससे पुनः अमृत-दान मिलने की संभावना रहती है ।

विचार्य स्नेहं द्वेषं वा कुर्यात् कृत्वा न चान्यथा ॥ २१७ ॥
नापकुर्यान्नोपकुर्याद् भवतोऽनर्थकारिणौ ।

**विचार कर स्नेह या द्वेष करने का निर्देश—**विचार करके किसी के साथ स्नेह या द्वेष करना चाहिये और करके पुनः उससे अन्यथा नहीं करना चाहिये । अतः स्नेही के साथ अपकार एवं द्वेषी के साथ उपकार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये दोनों अनर्थ पैदा करते हैं । अर्थात् स्नेही के साथ सदा स्नेह (उपकार) एवं द्वेषी के साथ द्वेष (अपकार) ही करना उचित है ।

११ शु०

१६२ | शुक्रनीतिः


नातिक्रौर्यं नातिशाठ्यं धारयेन्नातिमार्दवम् ॥ २१८ ॥
नातिवादं नातिकार्यासक्तिमत्याग्रहं न च ।

**क्रूरतादि करने में सर्वत्र अति का निषेध—**अत्यन्त क्रूरता (निष्ठुरता), अत्यन्त शठता, अत्यन्त मृदुता, अत्यन्त बातचीत, अत्यन्त कार्यों में लवलीनता, अत्यन्त आग्रह (हठ) इन सबों को नहीं करना चाहिये।

अति सर्वं नाशहेतुरर्थतोऽत्यन्तं विवर्जयेत् ॥ २१९ ॥
उद्वेजते जनः क्रौर्यात् कार्पण्यादतिनिन्दति ।

**अतिक्रूरता आदिकों से अनिष्ट फल का निर्देश—**किसी विषय में अति करना नाश का कारण होता है अतः उसे (अति करना) छोड़ देना चाहिये। और अत्यन्त क्रूरता करने से लोग विरक्त हो जाते हैं, अत्यन्त कृपणता (कंजूसी) से अत्यन्त निन्दा करते हैं।

मार्दवाञ्चैव गणयेदपमानोऽतिवादतः ॥ २२० ॥
अतिदानेन दारिद्र्यं तिरस्कारोऽतिलोभतः ।

अत्यन्त मृदुता से लोग उसे नहीं गिनते हैं (उसे कुछ नहीं समझते हैं), अत्यन्त बोलने से अपमान करते हैं, अत्यन्त दान से दरिद्रता होती है, अत्यन्त लोभ से तिरस्कार होता है।

अत्याग्रहान्नरस्यैव मौर्ख्यं सञ्जायते खलु ॥ २२१ ॥
अनाचाराद्धर्महानिरत्याचारस्तु मूर्खता ।

अत्यन्त आग्रह करने से मनुष्य की मूर्खता प्रकट होती है। आचार-विचार करने से अथवा दुष्ट आचरण करने से धर्म की हानि एवं आचार के विरुद्ध आचरण करने से भी मूर्खता समझी जाती है।

अधिकोऽस्मीति सर्वेभ्यो अधिकज्ञानवानहम् ॥ २२२ ॥
धर्मतत्त्वमिदमिति नैवं मन्येत बुद्धिमान् ।

**अपने को अधिक श्रेष्ठ मानने का निषेध—**मैं सबसे अधिक श्रेष्ठ या अधिक ज्ञान से युक्त हूँ, और 'धर्म का तत्त्व यही है' ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य को नहीं समझना चाहिये।

तिमिङ्गिलगिलोऽप्यस्ति तद्गिलोऽप्यस्ति राघवः ॥ २२३ ॥
कश्चित्तु तद्गिलोऽस्तीति मत्वा मन्येत कर्हिचित् ।

तिमि नाम की एक बड़ी मछली समुद्र में होती है उसको निगलनेवाली उससे बड़ी 'तिमिङ्गिल' नामकी एक दूसरी मछली होती है और उसको निगलनेवाली और एक मछली होती है उसे 'तिमिङ्गिलगिल' कहते हैं, उसको निगलनेवाली 'राघव' मछली होती है। एवं इसको भी निगलनेवाली कोई सबसे बड़ी भी मछली होती है ऐसा समझकर सदा इसकी