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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

प्रथमोऽध्यायः २५

प्रथमोऽध्यायः २५

दमको 'दण्ड' कहते हैं। इससे (दण्ड देने से) राजा दण्ड रूप है। उसकी नीति को दण्डनीति कहते हैं। नयन अर्थात् ले जाने से नीति कहते हैं। भावार्थ यह है कि—दण्ड नीति से राजनीति का ग्रहण किया है क्योंकि इसी से वह प्रजाओं को अपने २ धर्म की ओर ले जाता है।

आन्वीक्षिक्यात्मविज्ञानाद्धर्षशोकौ व्युदस्यति ।
उभौ लोकाववाप्नोति त्रय्यां तिष्ठन्यथाविधि ॥ १५८ ॥

आन्वीक्षिकी विद्या आत्मज्ञान कराने से हर्ष तथा शोक को दूर करती है। त्रयी विद्या के अनुसार यथाविधि-कार्य करता हुआ राजा इहलोक तथा परलोक दोनों में सुख प्राप्त करता है।

आनृशंस्यं परो धर्मः सर्वप्राणभृतां यतः ।
तस्माद्राजाऽऽनृशंस्येन पालयेत्कृपणं जनम् ॥ १५९ ॥

सब प्राणियों के संबन्ध में क्रूरता न करना ही परम धर्म है। अतः राजा अक्रूरता से दीन-निःसहाय जन का पालन करे।

नहि स्वसुखमन्विच्छन्पीडयेत्कृपणं जनम् ।
कृपणः पीड्यमानः स्वमृत्युना हंति पार्थिवम् ॥ १६० ॥

और केवल, अपने सुख की इच्छा से दीनजन को पीडा न पहुँचाये, क्योंकि पीडित किया जाता हुआ दीन अपनी मृत्यु से (पीडा पहुँचाने से) राजा को नष्ट कर देता है।

सुजनैः संगमं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च ।
सेव्यमानस्तु सुजनैर्महानतिविराजते ॥ १६१ ॥

सुजनों के साथ संगति करने का निर्देश—धर्म और सुख पाने के लिये सुजनों के साथ संगति रखनी चाहिये, क्योंकि सुजनों से सेवित राजा अत्यन्त महत्त्व को प्राप्त कर सुशोभित होता है।

हिमांशुमालीव तथा नवोत्फुल्लोत्पलं सरः ।
आनंदयति चेतांसि यथा सुजनचेष्टितम् ॥ १६२ ॥

जैसे चन्द्रमा तथा नवीन खिले कमलोंवाला तालाब लोगों के चित्त को आनन्दित करता है उसी भांति सुजनों का व्यवहार भी आनन्दित करता है॥

ग्रीष्मसूर्यांशुसंतप्तमुद्वेजनमनाश्रयम् ।
मरुस्थलमिवोद्दण्डं त्यजेद् दुर्जनसंगतम् ॥ १६३ ॥

ग्रीष्मऋतु के सूर्य की किरणों से अत्यन्त संतप्त, उद्वेग पैदा करनेवाला, छाया के लिये वृक्षादि के आश्रय से हीन मरुभूमि की भांति उद्दण्ड दुर्जन की संगति का परित्याग करना चाहिये।

निःश्वासोद्गीर्णहुतभुग्-धूमधूम्रीकृताननैः ।

२६ | शुक्रनीतिः

वरमाशीविषैः संगं कुर्यान्न त्वेव दुर्जनैः ॥ १६४ ॥
निःश्वास से निकले हुये विषाग्नि के धूम से धूमिल मुखवाले सर्पों का साथ रखना अच्छा है किन्तु दुर्जनों का साथ अच्छा नहीं है।

क्रियतेऽभ्यर्हणीयाय सुजनाय यथांऽजलिः ।
ततः साधुतरः कार्यो दुर्जनाय हितार्थिना ॥ १६५ ॥
हित चाहनेवाले व्यक्ति के लिये उचित है कि वह जिस प्रकार आदरणीय सज्जनों के लिये हाथ जोड़ता है उससे अधिक दुर्जन के लिये हाथ जोड़े अर्थात् सुजन से अधिक दुर्जन का संमान उसके प्रसन्नतार्थ करे ।

नित्यं मनोपहारिण्या वाचा प्रह्लादयेज्जगत् ।
उद्वेजयति भूतानि क्रूरवाग्धनदोऽपि सन् ॥ १६६ ॥
**मनोहर वचन बोलने का निर्देश—**नित्य मनोहर वचनों से जगत् को आनन्दित करना चाहिये । क्योंकि यदि धन देनेवाला कुबेर के समान भी हो किन्तु क्रूर वाणी बोलने से वह मनुष्यों को उद्विग्न ही करता है ।

हृदि विद्ध इवात्यर्थं यथा संतप्यते जनः ।
पीडितोऽपि हि मेधावी न तां वाचमुदीरयेत् ॥ १६७ ॥
पीडित होने पर भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी वाणी न बोले जिससे सुनने वाला व्यक्ति हृदय में बाण से विद्ध हुये की भांति अत्यन्त छटपटाने लगे ।

प्रियमेवाभिधातव्यं नित्यं सत्सु द्विषत्सु वा ।
शिखीव केकां मधुरां वाचं ब्रूते जनप्रियः ॥ १६८ ॥
सज्जन अथवा दुर्जन सभी के साथ सदा मधुर वचन बोलना चाहिये, क्योंकि जो मनुष्य मयूर की भांति प्रिय वचन बोलता है वह जनप्रिय होता है ।

मदरक्तस्य हंसस्य कोकिलस्य शिखंडिनः ।
हरंति न तथा वाचो यथा वाचो विपश्चिताम् ॥ १६९ ॥
मद से युक्त हंस, कोकिल या मयूर की वाणी वैसा मनको नहीं हरण करती है जैसा अच्छे विद्वानों की वाणी ।

ये प्रियाणि प्रभाषंते प्रियमिच्छंति सत्कृतम् ।
श्रीमन्तो वंद्यचरिता देवास्ते नरविग्रहाः ॥ १७० ॥
जो लोग प्रिय वचन बोलते हैं और अपने प्रिय का सत्कार करना चाहते हैं, ऐसे प्रशंसनीय चरितवाले श्रीमान लोग मनुष्य रूप में देवता ही हैं ॥

नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥ १७१ ॥
तीनों लोकों में ऐसा दूसरा कोई वशीकरण नहीं है जैसा कि—प्राणियों

प्रथमोऽध्यायः २७

पर दया तथा मैत्री का भाव रखना एवं उन्हें अभीष्ट दान देना तथा प्रिय वचन बोलना है, इनसे मनुष्य वशीभूत हो जाता है।

श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवतां सदा।
देवतावद् गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम् ॥ १७२ ॥
आस्तिकता से पवित्र चित्त होकर सदा देवता की पूजा करै और देवता की भांति गुरुजनों की एवं अपने समान सुहृज्जनों का संमान करै ॥

प्रणिपातेन हि गुरून् सतोऽनूचानचेष्टितैः।
कुर्वीताभिमुखान्देवान् भृत्यै सुकृतकर्मणाम् ॥ १७३ ॥
साङ्ग-वेदज्ञ ब्राह्मणों से युक्त होकर राजा प्रणाम के द्वारा गुरुजनों तथा सज्जनों एवं देवताओं को अपने अनुकूल करै। इससे पुण्य की वृद्धि होती है और उससे वह सुखी होता है।

सद्भावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन च बांधवान्।
स्त्रीभृत्यो प्रेममानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम् ॥ १७४ ॥
सद्भाव से मित्र तथा बान्धवों के, प्रेम तथा मान (सत्कार) से स्त्री और भृत्य के एवं मनके अनुकूल कार्य करने से मूर्ख के चित्त को अपने वशीभूत करे।

बलवान्बुद्धिमाञ्शूरो यो हि युक्तपराक्रमो।
वित्तपूर्णां महीं भुंक्ते स भूयो भूपतिर्भवेत् ॥ १७५ ॥
जो राजा बलवान, बुद्धिमान, शूर तथा उचित समय पर पराक्रम करने-वाला होता है, वह धन से पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करता है और वही राजा वस्तुतः राजा है।

पराक्रमो बलं बुद्धिः शौर्यमेते वरा गुणाः।
एभिर्हीनोऽन्यगुणयुग्महीभुक् सधनोऽपि च ॥ १७६ ॥
महीं स्वल्पां नैव भुंक्ते द्रुतं राज्याद्विनश्यति।
महाधनाच्च नृपतेर्विमात्यल्पोऽपि पार्थिवः ॥ १७७ ॥
अव्याहताज्ञस्तेजस्वी एभिरेव गुणैर्भवेत्।
राज्ञः साधारणास्त्वन्ये न शक्ता भूप्रसाधने ॥ १७८ ॥
पराक्रम, बल, बुद्धि, शूरता ये श्रेष्ठ गुण कहलाते हैं। इन गुणों से हीन होकर यदि इनसे भिन्न गुणों से युक्त भी हो और धनवान भी हो तो वह राजा थोड़ी भी भूमि का स्वामी नहीं होता है और यदि हो तो उसका राज्य शीघ्र नष्ट हो जाता है। महाधनवान् राजा की अपेक्षा छोटा राजा भी सुशोभित होता है क्योंकि पराक्रमादि इन्हीं गुणों से उसकी आज्ञा नहीं टाली जाती है और वह तेजस्वी होता है। राजा के इससे भिन्न सभी गुण साधारण माने जाते हैं उनसे पृथ्वी-पालन या राज्य का विस्तार नहीं हो सकता है।

२८ | शुक्रनीतिः

खनिः सर्वधनस्येयं देवदैत्यविमर्दिनी ।
भूम्यर्थे भूमिपतयः स्वात्मानं नाशयन्त्यपि ॥ १७९ ॥

यह पृथ्वी सब धनों की खान तथा देवता और दैत्यों का नाश कराने वाली है क्योंकि राजा लोग पृथ्वी के लिये अपने को भी नष्ट कर देते हैं ।

उपभोगाय च धनं जीवितं येन रक्षितम् ।
न रक्षिता तु भूर्येन किं तस्य धनजीवितैः ॥ १८० ॥

जिसने उपभोग करने के लिये अपने धन तथा जीवन की रक्षा की, किन्तु पृथ्वी की रक्षा नहीं की, उसके धन तथा जीवन से क्या है अर्थात् कुछ लाभ नहीं है।

न यथेष्टव्ययायालं संचिते नु धनं भवेत् ।
सदागमाद्विना कस्य कुबेरस्यापि नाञ्जसा ॥ १८१ ॥

चाहे वह कुबेर ही क्यों न हो किसी का भी संचित धन नित्य धनागम के बिना इच्छानुसार व्यय करने के लिये योग्य नहीं होता है अर्थात् एक दिन समाप्त हो जाता है । इसलिये पृथ्वी धन से बढ़कर अन्य कोई धन नहीं है ।

पूज्यस्त्वेभिर्गुणैर्भूषो न भूपः कुलसंभवः ।
न कुले पूज्यते यादृग्बलशौर्यपराक्रमैः ॥ १८२ ॥

इन पूर्वोक्त गुणों से ही राजा वस्तुतः पूज्य होता है, राजकुल में केवल उत्पन्न होने से नहीं, क्योंकि जैसी प्रतिष्ठा बल, शूरता और पराक्रम से होती है वैसी केवल कुल से राजा की प्रतिष्ठा नहीं होती ।

लक्षकर्षमितो भागो राजतो यस्य जायते ।
वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः ॥ १८३ ॥
सामंतः स नृपः प्रोक्तो यावल्लक्षत्रयावधि ।
तदूर्ध्वं दशलक्षांतो नृपो मांडलिकः स्मृतः ॥ १८४ ॥
तदूर्ध्वं तु भवेद्राजा यावद्विंशतिलक्ष्षकः ।
पंचाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः ॥ १८५ ॥

**राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश—**जिसके राज्य से प्रतिवर्ष बिना प्रजा को पीडित किये ही एक लक्ष (१०००००) रजत (चांदी का) कर्ष (रूपया) से लेकर ३ लक्ष तक वार्षिक कर (मालगुजारी) मिलता है वह राजा 'सामन्त' कहलाता है । उसके बाद १० लक्ष पर्यन्त वार्षिक कर मिलने से 'माण्डलिक' राजा और उसके बाद २० लक्षतक वार्षिक कर मिलने से 'राजा' कहलाता है एवं ५० लक्ष तक वार्षिक कर मिलने से 'महाराज' कहलाता है ।

ततस्तु कोटिपर्यतः स्वराट् सम्राट् ततः परम् ।