शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
प्रथमोऽध्यायः १७.
प्रथमोऽध्यायः १७.
गिरीन्द्रशिखराकारो लीलयोन्मूलितद्रुमः ।
करिणीस्पर्शसम्मोहाद्बन्धनं याति वारणः ॥ १०३ ॥
**स्पर्श विषय के द्वारा—**पर्वत के शिखर की भांति ऊंचे आकार वाला, खेलवाड़ से पेड़ों को उखाड़ देने वाला हाथी भी हथिनी के स्पर्श से मोहित होकर बन्धन को प्राप्त होता है ।
स्निग्धदीपशिखालोकविलोलितविलोचनः ।
मृत्युमृच्छति सम्मोहात् पतंगः सहसा पतन् ॥ १०४ ॥
**रूप विषय द्वारा—**स्निग्ध (स्नेह = तैलयुक्त) दीप की शिखा के प्रकाश से चञ्चल नेत्र वाला पतङ्ग (फततिङ्गा) मोहित होकर सहसा दीपशिखा पर गिरता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है ।
अगाधसलिले मग्नो दूरेऽपि बसतौ बसन् ।
मीनस्तु सामिषं लोहमास्वादयति मृत्यवे ॥ १०५ ॥
**रस विषय द्वारा—**अगाध जल में डूबा हुआ, दूर से दूर रहता हुआ भी मीन (मछली) मोह से मांसयुक्त लौहकण्टक का आस्वाद लेता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है ।
उत्कर्तितुं समर्थोपि गंतुं चैव सपक्षकः ।
द्विरेफो गन्धलोभेन कमले याति बन्धनम् ॥ १०६ ॥
**गन्ध विषय द्वारा—**कमल को काट डालने में एवं पङ्ख होने से उड़ने में भी समर्थ भौंरा गन्ध के लोभ से कमल के अन्दर संकुचित होने पर बँध जाता है अर्थात् उसी में बँधकर मर जाता है ।
एकैकशो विनिघ्नन्ति विषया विषसन्निभाः ।
किंपुनः पंच मिलिता न कथं नाशयंति हि ॥ १०७ ॥
विष के तुल्य उक्त शब्दादि विषय पृथक् २ रहकर भी प्राणनाशक होते हैं यदि वे पांचों मिलित हों तो क्यों नहीं नाश कर सकते हैं अर्थात् निःसन्देह प्राण ले सकते हैं ।
द्यूतं स्त्री मद्यमेवैतत्त्रितयं बहनर्थकृत् ।
अयुक्तं युक्तियुक्तं हि धनपुत्रमतिप्रदम् ॥ १०८ ॥
**द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश—**द्यूत (जूआ) खेलना, स्त्री-सेवन, मद्यपान ये तीनों अधिक मात्रा में होने से बहुत अनर्थ करने वाले होते हैं किन्तु यदि इनका उचित उपयोग किया जाय तो द्यूत से धन, स्त्री से पुत्र और मद्य से बुद्धि की प्राप्ति होती है ।
नलधर्मप्रभृतयः सुद्यूतेन विनाशिताः ।
सकापट्यं धनायालं द्यूतं भवति तद्विदाम् ॥ १०९ ॥
२ शु०
३८ शुक्रनीतिः
द्यूत कर्म में अनभिज्ञ नल और युधिष्ठिर आदि राजाओं का द्यूत के द्वारा विशेष धन-नाश हुआ किन्तु द्यूत कर्म में निपुण लोगों को चालाकी से खेला हुआ द्यूत धन दिलाने में अत्यन्त समर्थ होता है।
स्त्रीणां नामापि संह्लादि विकरोत्येव मानसम् ।
किंपुनर्दर्शनं तासां विलासोल्लासितभ्रुवाम् ॥ ११० ॥
स्त्रियों का नाम लेना भी आह्लाद पैदा करके चित्त को काम-विकार से युक्त कर देता है। फिर विलासपूर्वक भौहों को नचाने वाली उन स्त्रियों का दर्शन करना क्यों नहीं मन को काम-विकार युक्त कर सकता है अर्थात् अवश्य कर सकता है।
रहःप्रचारकुशला मृदुगद्गदभाषिणी ।
कं न नारी वशीकुर्यान्नरं रक्तान्तलोचना ॥ १११ ॥
एकान्त में भेट करने में कुशल, कोमल तथा गद्गद वचन बोलने वाली एवं अनुराग युक्त कटाक्ष करने वाली स्त्री किस मनुष्य को वशीभूत नहीं कर सकती है अर्थात् सभी को वशीभूत कर सकती है।
मुनेरपि मनो वश्यं सरागं कुरुतेऽङ्गना ।
जितेंद्रियस्य का वार्ता किपुनश्चाजितात्मनाम् ॥ ११२ ॥
मन को सदा अपने अधीन रखने वाले मुनियों के भी मन को स्त्रियां काम-वासना से युक्त कर देती हैं, जब जितेन्द्रिय की यह दशा है तब इन्द्रियों को नहीं जीतने वाले कामियों के विषय में क्या बात की जाय। अर्थात् उनको तो अवश्य ही वशीभूत कर सकती हैं।
ध्यायच्छलन्तश्च बहवः स्त्रीषु नाशं गता अमी ।
इन्द्रदण्डक्यनहुषरावणाद्या नृपा अतः ॥ ११३ ॥
बहुत से लोग सदा परस्त्रियों में प्रेम करके नाश को प्राप्त हुये हैं जैसे—इन्द्र, दण्डक्य, नहुष और रावण आदि का उदाहरण प्रसिद्ध है।
अतत्परनरस्यैव स्त्री सुखाय भवेत्सदा ।
साहाय्यिनी गृह्यकृत्ये तां विनाऽन्या न विद्यते ॥ ११४ ॥
स्त्रियों में आसक्ति न रखने वालों के लिये ही स्त्री सदा सुख देने वाली होती है, क्योंकि गृह-कार्यों में उसके अलावा अन्य कोई दूसरी सहायता पहुँचाने वाली नहीं हो सकती है।
अतिमद्यं हि पिबतो बुद्धिलोपो भवेत्किल ।
प्रतिभां बुद्धिवैशद्यं धैर्य्यं चित्तविनिश्चयम् ॥ ११५ ॥
तनोति मात्रया पीतं मद्यमन्यद्विनाशकृत् ।
कामक्रोधौ मद्यतमौ नियोक्तव्यौ यथोचितम् ॥ ११६ ॥
प्रथमोऽध्यायः १९
अत्यन्त मद्य पीने वाले की बुद्धि का निश्चय लोप हो जाता है। और मात्रा के साथ थोड़ा मद्य पीने वाले की प्रतिभा, बुद्धि में उज्ज्वलता, धीरता, चित्त की स्थिरता बढ़ती है। और इससे भिन्न मात्रा से अधिक पीने से मद्य शरीर को नष्ट कर देता है। और मद्य के समान काम तथा क्रोध भी चित्त को अत्यन्त मतवाला बना देने वाला होता है अतः इन दोनों को भी यथोचित रीति से प्रयोग करना उचित होता है।
कामः प्रजापालने च क्रोधः शत्रुनिबर्हणे।
सेनासंधारणे लोभो योज्यो राज्ञा जयार्थिना ॥ ११७ ॥
कामादि पर जय-प्राप्ति की इच्छा रखने वाले राजा के लिये उचित है कि वह—प्रजा-पालन के लिये काम (कामना) का, शत्रु-नाश के लिये क्रोध का, सैन्य रखने में लोभ का प्रयोग करे।
परस्त्री-संगमे कामो लोभो नान्यधनेषु च ।
स्वप्रजादण्डने क्रोधो नैव धार्यो नृपैः कदा ॥ ११८ ॥
राजा कभी भी पर-स्त्री के साथ सङ्ग करने के लिये काम को, अन्य के धन की प्राप्ति में लोभ को, अपनी प्रजा को दण्ड देने में क्रोध को न करे।
किमुच्येत कुटुम्बीति परस्त्रीसंगमान्नरः ।
स्वप्रजादण्डनाच्छूरो धनिकोऽन्यधनैश्च किम् ॥ ११९ ॥
पर-स्त्री के साथ संग करने वाला मनुष्य क्या कुटुम्बी ? अपनी प्रजा को दण्ड देने से क्या शूर-वीर और दूसरे के धन को लेने से मनुष्य क्या धनी कहला सकता है ? अर्थात् कभी नहीं कहला सकता है।
अरक्षितारं नृपतिं ब्राह्मणं चातपस्विनम् ।
धनिकं चाप्रदातारं देवा घ्नन्ति त्यजन्त्यधः ॥ १२० ॥
प्रजा की रक्षा नहीं करने वाले राजा को, तपस्या नहीं करने वाले ब्राह्मण को और दान नहीं देने वाले धनी को देवता लोग नष्ट कर देते हैं और अन्त में उन्हें नरक में गिरा देते हैं।
स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपः-फलम् ।
एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥ १२१ ॥
राजा होना, दानी होना एवं धनी होना ये सब तप के फल हैं। और याचक होना, दास होना एवं दरिद्र होना ये सब पाप के फल हैं।
दृष्ट्वा शास्त्राण्यथात्मानं सन्नियम्य यथोचितम् ।
कुर्यान्नृपः स्ववृत्तं तु परत्रेह सुखाय च ॥ १२२ ॥
इससे राजा शास्त्रों को देखकर तदनुसार अपने मन को विषयों से यथो-
२० | शुक्रनीतिः
चित रोककर पर-लोक और इस लोक में सुख पाने के लिये अपने आचरण को उचित रीति से करे।
दुष्टनिग्रहणं दानं प्रजायाः परिपालनम् ।
यजनं राजसूयादेः कोशानां न्यायतोऽर्जनम् ॥ १२३ ॥
करदीकरणं राज्ञां रिपूणां परिमर्द्दनम् ।
भूमेरुपार्जनं भूयो राजवृत्तं तु चाष्टधा ॥ १२४ ॥
आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश— १ दुष्टों का निग्रह करना, २ दान देना, ३ प्रजा का परिपालन, ४ राजसूयादि यज्ञ करना, ५ न्यायपूर्वक कोश ( खजाना ) बढ़ाना, ६ राजाओं से कर वसूल करना, ७ शत्रुओं का मान मर्द्दन करना, ८ बार बार राज्य को बढ़ाना, ये ८ प्रकार के राजाओं के वृत्त ( आचरण ) हैं।
न वर्धितं बलं यैस्तु न भूपाः करदीकृताः ।
न प्रजाः पालिताः सम्यक्ते वै षण्ढतिला नृपाः ॥ १२५ ॥
राजा के दोष-गुण का निर्देश— जिन राजाओं ने सेना नहीं बढ़ाई, राजाओं को कर देने वाला ( अधीन ) नहीं बनाया, प्रजाओं का भली भांति पालन नहीं किया, वे बांझतिल ( तेल-रहित तिल ) के समान तुच्छ कहलाते हैं।
प्रजा सूद्विजते यस्माद्यत्कर्म परिनिंदति ।
त्यज्यते धनिकैर्यस्तु गुणिभिस्तु नृपाधमः ॥ १२६ ॥
प्रजा जिससे उद्विग्न हो उठती है और जिसके कर्मों की निन्दा करती है और जिसे धनिक तथा गुणी लोग त्याग देते हैं वह राजा नृपाधम कहलाता है।
नटगायकगणिकामल्लषण्ढालपजातिषु ।
योऽतिसक्तो नृपो निन्द्यः स हि शत्रुमुखे स्थितः ॥ १२७ ॥
नट, गवैया, वेश्या, पहलवान, जनखा तथा नीच जाति वालों में अत्यन्त आसक्ति रखने वाला राजा निन्द्य कहलाता है। और वह शत्रु के मुख में पड़ जाता है।
बुद्धिमंतं सदा द्वेष्टि मोदते वंचकैः सह ।
स्वदुर्गुणं न वै वेत्ति स्वात्मनाशाय सो नृपः ॥ १२८ ॥
जो राजा सदा बुद्धिमानों से द्वेष रखता है और वंचकों से खुश रहता है एवं अपने दुर्गुणों को नहीं समझता है वह अपना नाश करने के लिये कारण बन जाता है।
नापराधं हि क्षमते प्रदंडो धनहारकः ।
प्रथमोऽध्यायः
२१
स्वदुर्गुणश्रवणतो लोकानां परिपीडकः ॥ १२९ ॥
नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते भिद्यते यतः ।
गूढचारैः श्रावयित्वा स्ववृत्तं दूषयंति के ॥ १३० ॥
भूषयंति च कैर्भावैरमात्याद्याश्च तद्विदः ।
जब जो राजा अपराध को नहीं सहन करता है तथा उग्र दण्ड देता है। धन को हरण कर लेता है, अपने दुर्गुणों के सुनने पर कहनेवाले को पीड़ा पहुँचाने लगता है तब उससे प्रजा क्षुभित हो उठती है और भेदभाव रखने लगती है अर्थात् राजा से प्रेम हटा लेती है। अतः इनसे बचने के लिये राजा को उचित है कि वह अपने गुप्तचरों (खुफिया पुलिस) को भेजकर उनसे अपने आचरणों को प्रजा पर प्रकट करावे और यह जाने कि—कौन व्यक्ति मेरे आचरण को दोषयुक्त बताते हैं। और उस वृत्त के जानकार मन्त्री आदि किन आचरणों से मेरी प्रशंसा करते हैं।
मयि कीदृक् च संप्रोतिः केषामप्रीतिरेव वा ॥ १३१ ॥
ममागुणैर्गुणैर्वापि गूढं संश्रुत्य चाखिलम् ।
चारैः स्वदुर्गुणं ज्ञात्वा लोकतः सर्वदा नृपः ॥ १३२ ॥
सुकीर्त्यै संत्यजेन्नित्यं नावमन्येत वै प्रजाः ।
मेरे गुणों से किन लोगों की मेरे में कैसी प्रीति है ? और मेरे अवगुणों से किन लोगों की कैसी अप्रीति है ? इसे गूढ पुरुषों ( खुफिया पुलिस ) द्वारा लोगों से कहे हुये अपने दुर्गुणों को सर्वदा जानकर राजा अपनी कीर्ति के लिये उन दुर्गुणों को भली भांति छोड़ देवे और निन्दा करनेवाली प्रजा का कभी तिरस्कार न करै ।
लोको निंदति राजंस्त्वां चारैः संभावितो यदि ॥ १३३ ॥
कोपं करोति दौरात्म्यादात्मदुर्गुणलोपकः ।
सीता साध्व्यपि रामेण त्यक्ता लोकापवादतः ॥ १३४ ॥
यदि जासूस आकर यह सुनावें कि—'हे महाराज ! प्रजा आप की निन्दा करती है' इस पर जो अपने दुर्गुण को छिपानेवाला होता है वही राजा दुष्ट स्वभाववश कोप करता है—अन्य नहीं करता है । जैसे कि समर्थ होते हुये भी रामचन्द्र ने लोकापवाद के भय से पतिव्रता सीता का भी परित्याग किया, और अपवाद लगाने वाले धोबी के लिये कभी थोड़ा भी दण्ड नहीं दिया ।
शक्तेनापि हि न धृतो दण्डोऽल्पो रजके क्वचित् ।
ज्ञानविज्ञानसंपन्न-राजदत्ताभयोऽपि च ॥ १३५ ॥
समक्षं वक्ति न भयाद्राज्ञो गुर्वपि दूषणम् ।
स्तुतिप्रिया हि वै देवा विष्णुमुख्या इति श्रुतिः ॥ १३६ ॥
२२
शुक्रनीतिः
किं पुनर्मनुजां नित्यं निंदाजः क्रोध इत्यतः ।
राजा सुभागदंडी स्यात्सुक्षमी रंजकः सदा ॥ १३७ ॥
ज्ञान-विज्ञान से संपन्न राजा के द्वारा अभय-दान पाने पर भी कोई भी व्यक्ति राजा के भय से उसके भारी दोष को उसके सामने नहीं कहता है। क्योंकि—ऐसा सुना जाता है कि विष्णु आदि देवताओं को भी स्तुति प्रिय लगती है तब फिर मनुष्यों की क्या बात है। और यह नित्य नियम है कि—क्रोध निन्दा से उत्पन्न होता है, इस कारण से राजा को उचित रीति से दण्ड देनेवाला, भली भांति सहन करनेवाला, सदा प्रजा का मनोरंजन करनेवाला होना चाहिये ।
यौवनं जीवितं वित्तं छाया लक्ष्मीश्च स्वामिता ।
चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥ १३८ ॥
१. यौवन (जवानी), २. जीवन, ३. धन, ४. छाया, ५. लक्ष्मी, ६. प्रभुत्व, ये ६ चञ्चल होते हैं, अतः यह जानकर राजा को धर्म में रत होना चाहिये ।
अदानेनापमानेन छलाच्च कटुवाक्यतः ।
राज्ञः प्रबलदण्डेन नृपं मुंचति वै प्रजा ॥ १३६ ॥
राजा के दान न करने से, अपमान से, छल से, कटुवचन से, प्रबल दण्ड से प्रजा उसको छोड़ देती है ।
अतिभीरुमतिदीर्घसूत्रं चातिप्रमादिनम् ।
व्यसनाद्विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजाः ॥ १४० ॥
अत्यन्त भीरु ( डरपोक ), अत्यन्त दीर्घसूत्र ( धीरे २ कार्य करनेवाले ), अत्यन्त प्रमादी ( असावधान ) और व्यसन होने से विषयों ( भोगों ) में आसक्त रहनेवाले राजा की प्रजा सेवा नहीं करती है । ( अर्थात् त्याग देती है ) ।
विपरीतगुणैरेभिः सान्वया रज्यते प्रजा ।
इनसे विपरीत गुणवाले राजा से अपने वंश के साथ २ सारी प्रजा प्रसन्न रहती है ।
एकस्तनोति दुष्कीर्त्तिं दुर्गुणः संघशो न किम् ॥ १४१ ॥
मृगयाऽक्षास्तथा पानं गर्हितानि महीभुजाम् ।
दृष्टास्तेभ्यस्तु विपदः पांडुनैषधवृष्णिषु ॥ १४२ ॥
एक भी दुर्गुण दुष्कीर्त्ति को फैला देती है तो क्या समूह रूप से होने पर न फैलावेंगी अर्थात् फैलावेंगी ही । मृगया ( शिकार खेलना ), अक्ष ( जुआ खेलना ) और मद्यपान करना ये तीनों राजाओं के लिये निन्दित हैं, क्योंकि मृगया से पाण्डु की, जूए से नल की और मद्यपान से वृष्णियों (यदुकुलवालों) की विपत्ति देखी गयी है ।
प्रथमोऽध्यायः २३
कामक्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः ॥ १४३ ॥
काम, क्रोध, मोह, लोभ, मान, मद, इनकी 'षड्वर्ग' संज्ञा है। इनका परित्याग करना चाहिये। क्योंकि इनके परित्याग से राजा सुखी होता है।
दण्डक्यो नृपतिः कामात्क्रोधाच्च जनमेजयः ।
लोभाद्वैलस्तु राजर्षिर्मोहाद्वातापिरासुरः ॥ १४४ ॥
पौलस्त्यो राक्षसो मानान्मदाद्दम्भोद्भवो नृपः ।
प्रयाता निधनं ह्येते शत्रुषद्वर्गमाश्रिताः ॥ १४५ ॥
काम से दण्डक्य राजा, क्रोध से जनमेजय, लोभ से राजर्षि ऐल ( इळा के पुत्र ), मोह से वातापि नामक असुर, मान से पुलस्त्यवंशी रावण, मद से दम्भोद्भव नामक राजा का विनाश हुआ, क्योंकि इन सबों ने शत्रु के समान षड्वर्ग का आश्रय लिया था।
शत्रुषड्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
अंबरीषो महाभागो बुभुजाते चिरं महीम् ॥ १४६ ॥
शत्रुतुल्य इस षड्वर्ग को छोड़ देने से जमदग्नि के पुत्र प्रतापी परशुरामजी एवं महाराज अम्बरीष इन दोनों ने बहुत काल तक पृथ्वी का भोग किया ( राज्य किया )।
वर्धयंन्निह धर्मार्थौ सेवितौ सद्भिरादरात् ।
निगृहीतेंद्रियग्रामः कुर्वीत गुरुसेवनम् ॥ १४७ ॥
इस संसार में राजा सज्जनों के द्वारा सादर सेवित धर्म और अर्थ को बढ़ाता हुआ, अपने इन्द्रियों को वश में करता हुआ गुरु ( श्रेष्ठ, उपदेशक, माता-पिता आदि ) जनों का सेवन करै ।
शास्त्राय गुरुसंयोगः शास्त्रं विनयवृद्धये ।
विद्याविनीतो नृपतिः सतां भवति संमतः ॥ १४८ ॥
क्योंकि गुरुओं की सेवा से शास्त्र-ज्ञान होता है और शास्त्र-ज्ञान से विनय की वृद्धि होती है। अतः विद्या से उत्पन्न विनय से युक्त ही राजा सज्जनों द्वारा प्रशंसित होता है।
प्रेर्यमाणोप्यसद्वृत्तैर्नाकार्येषु प्रवर्तते ।
श्रुत्या स्मृत्या लोकतश्च मनसा साधु निश्चितम् ॥ १४९ ॥
यत्कर्मधर्मसंज्ञं तद्व्यवस्यति च पंडितः ।
आददानः प्रतिदिनं कलाः सम्यङ् महीपतिः ॥ १५० ॥
बुरे आचरण करनेवाले लोगों के प्रेरणा करने पर भी अच्छे-बुरे का विचार रखनेवाला समझदार राजा बुरे कार्य करने में प्रवृत्त नहीं होता है क्योंकि वह
२४ | शुक्रनीतिः
वेद, स्मृति तथा लोक-व्यवहार से अच्छा समझकर जो धर्मसंज्ञक सत्कर्म है उसका पालन करता है अतः प्रत्येक कार्य के करने न करने की कला में निपुण होने से अच्छा राजा कहलाता है ।
जितेंद्रियस्य नृपतेर्नीतिशास्त्रानुसारिणः ।
भवंत्युच्छलिता लक्ष्म्यः कीर्तयश्च नभःस्पृशः ॥ १५१ ॥
इस प्रकार से जितेन्द्रिय होकर नीति शास्त्र का अनुसरण करनेवाले राजा के घर में लक्ष्मी उछलती रहती है तथा उसकी कीर्त्ति स्वर्ग तक फैल जाती है ।
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दंडनीतिश्च शाश्वती ।
विद्याश्चतस्र एवैता अभ्यसेन्नृपतिः सदा ॥ १५२ ॥
आन्वीक्षिकी आदि के लक्षण— आन्वीक्षिकी (गौतमादि-रचित तर्क-शास्त्रादि), त्रयी (अङ्ग के सहित ऋक्, यजु, साम ये ३ वेद), वार्त्ता (व्यवहार शास्त्र), दण्डनीति (अर्थशास्त्र) ये चारों विद्यायें सनातन हैं । राजा को इनका सदा अभ्यास करना चाहिये ।
आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं वेदांताद्यं प्रतिष्ठितम् ।
त्रय्यां धर्मो ह्यधर्मश्च कामोऽकामः प्रतिष्ठितः ॥ १५३ ॥
अर्थानर्थौ तु वार्तायां दंडनीत्यां नयानयौ ।
वर्णाः सर्वाश्रमाश्चैव विद्यास्वासु प्रतिष्ठिताः ॥ १५४ ॥
यहां पर 'आन्वीक्षिकी' में तर्कशास्त्र-वेदान्तादि की और 'त्रयी' में धर्म, अधर्म, काम, मोक्ष इनकी बातें हैं । 'वार्त्ता' में अर्थ और अनर्थ विषय का एवं 'दण्डनीति' में न्याय, अन्याय, ४ वर्ण, ४ आश्रम के विषयों का ज्ञान है । इस भांति से इन विद्याओं में ये सब बातें भरी हुई हैं ।
अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः ।
धर्मशास्त्रपुराणानि त्रयीदं सर्वमुच्यते ॥ १५५ ॥
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द ये ६ वेद के अङ्ग, ऋग्, यजु, साम, अथर्व ये ४ वेद, मीमांसा, न्याय शास्त्र का विस्तार, धर्मशास्त्र, पुराण इन सबों को 'त्रयी' कहते हैं ।
कुसीदकृषिवाणिज्यं गोरक्षा वार्तयोच्यते ।
संपन्नो वार्तया साधुर्न वृत्तेर्भयमृच्छति ॥ १५६ ॥
कुसीद (सूद लेना), कृषि (खेती), वाणिज्य (व्यापार), गोपालन, इन सबों को वार्त्ता कहते हैं । इस वार्त्ता-शास्त्र का भली-भांति ज्ञान रखने-वाला राजा जीविका-संबन्धी भय को नहीं प्राप्त करता है ।
दम्मो दंड इति ख्यातस्तस्माद्दंडो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्डनीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥ १५७ ॥