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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् १६६

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् १६६

विष्णुब्राह्मौरपि नो दत्ता स्वपुत्रे स्वाधिकारता ।
स्वभाव से सद्गुणयुक्त पुत्र में भी पूर्ण अधिकार दे देना महान अनर्थ तथा मद पैदा कर देनेवाला हो जाता है, इसीसे विष्णु आदि ने भी अपने पुत्रों को अपना पूर्ण अधिकार नहीं दिया था।
स्वायुषः स्वल्पशेषे तु सत्पुत्रे स्वाम्यमादिशेत् ॥ १९ ॥
नाराजकं क्षणमपि राष्ट्रं धर्तुं क्षमाः किल ।
युवराजादयः स्वाम्यलोभचापलगौरवात् ॥ २० ॥

पुत्र को राज्य देने के समय का निर्देश—यदि अपनी आयु का अन्त अत्यन्त समीप आ गया हो तो उस समय यदि सत्पुत्र हो तो उसे पूर्ण अधिकार प्रदान कर दे, क्योंकि अधिकार-लोभ से होनेवाली चञ्चलता की अधिकता से युवराजादि बिना राजा के राज्य को क्षण भर भी संभालने के लिये नहीं समर्थ हो सकते हैं।

प्राप्योत्तमं पदं पुत्रः सुनीत्या पालयन् प्रजाः ।
पूर्वामात्येषु पितृवद् गौरवं सम्प्रधारयेत् ॥ २१ ॥
राज्य पाने पर राजपुत्र के आचरणों का निर्देश—पुत्र उत्तम राजपद को प्राप्त कर सुन्दर नीतिपूर्वक प्रजा का पालन करता हुआ, पिता के समय के मन्त्रियों में पिता के तुल्य गौरव रखे।

तस्यापि शासनं तैस्तु प्रधार्यं पूर्वतोऽधिकम् ।
युक्तं चेदन्यथा कार्ये निषेध्यं काललम्बनैः ॥ २२ ॥
मन्त्रियों का राजपुत्र के साथ करने योग्य व्यवहार का निर्देश—और वे मन्त्री गण भी यदि राजकुमार की आज्ञा उचित हो तो उसे राजा के समय से भी अधिक रूप से माने, यदि अनुचित हो तो 'दूसरे समय में इसका पालन होगा' ऐसा कहकर उस समय टाल देवें।

तदनीत्या न वर्तेयुस्तेन साकं धनाशाया ।
वर्तन्ति यदनीत्या ते तेन साकं पतन्त्यरात् ॥ २३ ॥
नवीन राजा के साथ मन्त्रियों को भी अनीतिपूर्ण व्यवहार करने का निषेध—और धन की आशा से उस नवीन राजा के साथ स्वयं भी उसकी अनीति के अनुसार व्यवहार न करे। क्योंकि यदि वे (मन्त्रीगण) भी अनीति-पूर्ण व्यवहार करने लगेगें तो उस (नवीन राजा) के साथ स्वयं भी नष्ट हो जावेगें।

कुलभक्तांश्च यो द्वेष्टि नवीनं भजते जनम् ।
स गच्छेच्छत्रुसाम्राज्ञा धनप्राणैर्वियुज्यते ॥ २४ ॥
नवीन राजा को राजभक्त मन्त्री आदि के मतानुसार न रहने का

४०० | शुक्रनीतिः

दुष्परिणाम—जो नवीन राजा राजकुल के भक्त मन्त्री आदियों के साथ द्वेष करता है और नवीन लोगों के कथनानुसार कार्य करता है वह शत्रु के अधीन हो जाता है और अपने धन तथा प्राणों को भी खो बैठता है।

गुणी सुनीतिर्नवोऽपि परिपाल्यस्तु पूर्ववत्।
प्राचीनैः सह तं कार्ये ह्यनुभूय नियोजयेत् ॥ २५ ॥

नवीन मन्त्री आदि की नियुक्ति की व्यवस्था—और यदि कोई नवीन होता हुआ भी गुणवान तथा सुन्दर नीतिकुशल अधिकारी हो तो उसका पालन प्राचीनों की तरह करना चाहिये। और भली भांति से अनुभव करने के बाद उसे प्राचीनों के साथ राजकार्य में नियुक्त करना चाहिये।

अतिमृदुस्तुतिनतिसेवादानप्रियोक्तिभिः ।
मायिकैः सेव्यते यावत् कार्यं नित्यं तु साधुभिः ॥ २६ ॥
प्रत्यक्षं वा परोक्षं वा सत्यवाग्भिर्नृपोऽपि च ।
याथार्थ्यतस्तयोरिहगन्तरं खभुवोर्यथा ॥ २७ ॥

धूर्त्त तथा साधु जन के अन्तर ज्ञात करने का निर्देश—जो धूर्त्त होते हैं वे जब तक अपना कार्य सिद्ध करना रहता है तभी तक अत्यन्त मृदु व्यवहार, स्तुति (प्रशंसा), नमन, सेवा, दान तथा प्रियवचन आदि से राजा की सेवा करते हैं और जो सज्जन हैं वे सत्यवचनों से प्रत्यक्ष या परोक्ष में सदा राजा की सेवा करते हैं यथार्थ में उन दोनों (धूर्त्त तथा सज्जन) में इतना अधिक अन्तर है जितना कि आकाश तथा पृथ्वी में है।

मायाया जनका धूर्त्ता जारचोरबहुश्रुताः ।
प्रतिष्ठितो यथा धूर्त्तो न तथा तु बहुश्रुताः ॥ २८ ॥

धूर्त्त, जार (व्यभिचारी) और चोर में धूर्त्त की माया करने में श्रेष्ठता का निर्देश—माया के उत्पन्न करनेवाले धूर्त्त, जार और चोर होते हैं, यह बात अत्यन्त प्रसिद्ध है। किन्तु जिस प्रकार से धूर्त्त इसमें श्रेष्ठ माना जाता है। उस प्रकार से जार और चोर नहीं माने जाते हैं।

परस्वहरणं लोके जारचोरौ तु निन्दितौ ।
तावप्रत्यक्षं हरतः प्रत्यक्षं धूर्त एव हि ॥ २९ ॥

धूर्त्तो की धूर्त्तता का वर्णन—दूसरे की वस्तु या धन हरण करने में प्रवृत्त होने से जार और चोर ये दोनों लोक में निन्दित माने जाते हैं। किन्तु वे दोनों तो सामने नहीं धनादि हरते हैं, पर धूर्त तो सामने ही हर लेता है।

हितं स्वहितवच्चान्ते अहितं हितवत् सदा ।
धूर्त्ताः सन्दर्शयित्वाऽज्ञं स्वकार्यं साधयन्ति ते ॥ ३० ॥

वे धूर्त्त लोग मूर्ख लोगों के समक्ष हितकर को अहितकर की भांति पूर्व