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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः १०७

द्वितीयोऽध्यायः १०७

निध्यादिकं च मार्गादौ प्राप्तमज्ञातस्वामिकम् ॥ ३२८ ॥
अज्ञातस्वामिक के लक्षण— और जो मार्ग आदि में किसी का भूल से छूट गया, गिरा हुआ किंवा कहीं पर गड़ा हुआ निध्यादि धन मिल जाता है वह 'अज्ञातस्वामिक' अर्थात् 'अनिश्चितस्वामिक' कहलाता है ।

साहजिकं चाधिकं च द्विधा स्वत्वविनिश्चितम् ।
स्वत्वविनिश्चित के भेद— और स्वत्वविनिश्चितअर्थात् स्वस्वत्वनिश्चित किंवा निश्चितस्वस्वत्व धन दो प्रकार का होता है प्रथम साहजिक, द्वितीय अधिक कहलाता है ।

उत्पद्यते यो नियतो दिने मासि च वत्सरे ॥ ३२९ ॥
आयः साहजिकः सैव दायाद्यश्च स्ववृत्तितः ।
साहजिक के लक्षण— इनमें जो धन का आय दाय ( पैत्रिक संपत्ति में से अपने हिस्से ) या वृत्ति ( व्यवसाय आदि ) के द्वारा निश्चित रूप से दिन, मास अथवा वर्ष भर में होता है वह 'साहजिक' कहलाता है ।

दायः परिग्रहो यस्तु प्रकृष्टं तत्स्वभावजम् ॥ ३३० ॥
और दाय ( पैत्रिक धन ) एवं परिग्रह ( दान लेने ) से जो आय होता है वह बिना क्लेश के मिलने से उत्तम स्वभावज ( साहजिक ) कहलाता है ।

मौल्याधिक्यं कुसीदं च गृहीतं याजनादिभिः ।
पारितोष्यं भृतिप्राप्तं विजिताद्यं धनं च यत् ॥ ३३१ ॥
स्वस्वत्वेऽधिकसंज्ञं तदन्यत्साहजिकं स्मृतम् ।
अधिक के लक्षण— जो उचित मूल्य से अधिक रूप में या सूद रूप में किंवा यज्ञ आदि कराने से प्राप्त हुआ एवं पारितोषिक ( इनाम ) या वेतन किंवा युद्ध आदि के द्वारा जीत रूप में प्राप्त हुआ धन है वह अपने स्वत्व से अधिक होने से 'अधिक' संज्ञक कहलाता है । इससे अन्य रीति से जो धन प्राप्त होता है वह 'साहजिक' कहलाता है ।

पूर्ववत्सरशेषं च वर्तमानोब्दसम्भवम् ॥ ३३२ ॥
स्वाधीनं सञ्चितं द्वेधा धनं सर्वं प्रकीर्तितम् ।
संचित धन के लक्षण— स्वाधीन संचित सम्पूर्ण धन दो प्रकार का होता है प्रथम-पूर्व वर्ष का शेष, और वर्त्तमान वर्ष का संचित धन है ।

द्वेधाधिकं साहजिकं पार्थिवेतरभेदतः ॥ ३३३ ॥
भूमिभागसमुद्भूत आयः पार्थिव उच्यते ।
संचित धन के भेद— अधिक और साहजिक भेद से पूर्वोक्त दो प्रकार के जो आय हैं वे प्रत्येक पार्थिव ( स्थावर ) तथा इतर ( जङ्गम = चल ) भेद

१०८शुक्रनीतिः

से दो प्रकार के हैं। इनमें से पार्थिव आय वह कहलाता है जो भूमि के भागों से उत्पन्न हो ।

स देवकृत्रिमजलैर्देशग्रामपुरैः पृथक् ॥ ३३४ ॥
बहुमध्याल्पफलतो भिद्यते भूविभागतः ।

**पार्थिव संज्ञक आय के भेद—**उस पार्थिवसंज्ञक आय के देवालयों, कृत्रिम ( कल्पित ) वस्तुओं, जल, देश, ग्राम तथा पुरों से पृथक्-पृथक् विभिन्न हुये भूमि-संबन्धी विभागों से एवं बहुत ( अधिक ), मध्यम तथा अल्प फलों से अनेक भेद होते हैं ।

शुल्कदण्डाकरकरभाटकोपायनादिभिः ॥ ३३५ ॥
इतरः कीर्त्तितस्तज्ज्ञैरायो लेखविशारदैः ।

**चल संज्ञक आय के लक्षण—**और व्यवसायी आदि लोगों से प्राप्त होने वाले शुल्क ( चुंगी-टैक्स ), दण्ड ( जुर्माना ), खान, कर ( मालगुजारी ), भाटक ( भाड़ा ), उपायन ( नजर-भेंट ), इत्यादि से होनेवाले आय को आय का ज्ञान रखनेवाले एवं लिखने में ( हिसाब लिखने में ) चतुर लोगों ने इतर अर्थात् चल-संज्ञक कहा है ।

यन्निमित्तो भवेदायो व्ययस्तन्नामपूर्वकः ॥ ३३६ ॥
व्ययश्चैव समुद्दिष्टो व्याप्यव्यापकसंयुतः ।

**विभागानुसार आय-व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश—**जिस निमित्त ( विभाग ) से जो आय होता है व्यय भी उसी निमित्त ( विभाग ) के नाम में होता है । अर्थात् जिस विभाग में आय होता है उस विभाग में व्यय भी होता है। और आय की भांति व्यय भी व्याप्य-व्यापक से युक्त है अर्थात् स्वल्प तथा बहुविषयक कहा हुआ है ।

पुनरावर्तकः स्वत्वनिवर्त्तक इति द्विधा ॥ ३३७ ॥
व्ययो यन्निध्युपनिधीकृतो विनिमयीकृतः ।
सकुसीदाकुसीदाधमर्णिकश्चावृत्तः स्मृतः ॥ ३३८ ॥

**व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण—**वह व्यय दो प्रकार का होता है, एक-पुनरावर्त्तक ( फिर लौटकर आनेवाला ), दूसरा स्वत्वनिवर्त्तक ( देने वाले के स्वत्व को निवृत्त करनेवाला ) कहलाता है । जो व्यय निधि, उपनिधि या विनिमय रूप में हुआ है एवं सूद-सहित या बिना सूद का इस भांति से दो प्रकार का आधमर्णिक ये सब आवृत्त ( पुनरावर्त्तक ) संज्ञक कहलाते हैं ।

निधिर्भूमौ विनिहितोऽन्यस्मिन्तुपनिधिः स्थितः ।
दत्तमूल्यादिसंप्राप्तः स वै विनिमयीकृतः ॥ ३३६ ॥
वृद्ध्याऽवृद्ध्या च यो दत्तः स वै स्यादाधमर्णिकः ।

द्वितीयोऽध्यायः [१०६]

सवृद्धिकमृणं दत्तमकुसीदं तु याचितम् ॥ ३४० ॥

निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण— निधि (निधीकृत) व्यय उसे कहते हैं जो पृथ्वी में गाड़ दिया जाता है, इसको अत्यन्त कष्ट पड़ने पर भी ग्रहण नहीं किया जाता है—अतः यह भी एक प्रकार का व्यय ही है। उप-निधि (उपनिधीकृत) व्यय वह है जो दूसरे के पास रखा हुआ है। विनिमयीकृत व्यय उसे कहते हैं जो दिये हुये मूल्यादि से बदले में मिला हुआ है। सूद पर या बिना सूद के जो दिया गया है उसे आधमर्णिक व्यय कहते हैं। इसमें सूद पर जो दिया जाता है उसे ऋण और बिना सूद के जो दिया जाता है उसे याचित (हथ-उधार) कहते हैं।

स्वत्वनिवर्त्तको द्वेधा त्वैहिकः पारलौकिकः ।

स्वत्वनिवर्त्तक के भेद— स्वत्वनिवर्त्तक व्यय दो प्रकार का होता है प्रथम—ऐहिक, द्वितीय—पारलौकिक।

प्रतिदानं परितोष्यं वेतनं भोग्यमैहिकः ॥ ३४१ ॥
चतुर्विधस्तथा पारलौकिकोऽनन्तभेदभाक् ।
शेषं संयोजयेन्नित्यं पुनरावर्तको व्ययः ॥ ३४२ ॥

ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद— उसमें प्रतिदान, परितोष्य वेतन और भोग्य रूप से ऐहिक के ४ भेद होते हैं। और पारलौकिक के अनन्त भेद होते हैं। जो नित्य शेष को रोकड़ में मिलाया जाता है वह भी पुनरावर्त्तक व्यय कहलाता है।

मूल्यत्वेन च यद्दत्तं प्रतिदानं स्मृतं हि तत् ।
सेवाशौर्यादिसंतुष्टैर्दत्तं तत्पारितोषिकम् ॥ ३४३ ॥
भृतिरूपेण संदत्तं वेतनं तत् प्रकीर्तितम् ।

प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन व्यय के लक्षण— मूल्य रूप में जो दिया जाता है उसे 'प्रतिदान' कहते हैं। सेवा तथा शूरता आदि से प्रसन्न होकर जो दिया जाता है, उसे 'पारितोषिक' (परितोष्य) कहते हैं। भरण-पोषणार्थ जो भृत्यों को दिया जाता है उसे 'वेतन' कहते हैं।

धान्यवस्त्रगृहाराम-गोगजादिरथार्थकम् ॥ ३४४ ॥
विद्याराज्याद्यर्जनार्थं धनाप्त्यर्थं तथैव च ।
व्ययीकृतं रक्षणार्थमुपभोग्यं तदुच्यते ॥ ३४५ ॥

उपभोग्य के लक्षण— धान्य, वस्त्र, गृह, बगीचा, गो, गज आदि तथा रथ के लिये एवं विद्या तथा राज्य आदि के उपार्जन के लिये और धन आदि की प्राप्ति के लिये एवं इन सबों की रक्षा के लिये जो व्यय किया जाता है उसे 'उपभोग्य' कहते हैं।

११०शुक्रनीतिः

सुवर्णरत्नरजतनिष्क्शालास्तथैव च ।
रथाश्वगोगजोष्ट्राजावीनशालाः पृथक् पृथक् ॥ ३४६ ॥
वाद्यशास्त्रास्त्रवस्त्राणां धान्यसम्भारयोस्तथा ।
मन्त्रिशिल्पनाट्यवैद्यमृगाणां पाकपक्षिणाम् ॥ ३४७ ॥
शाला भोग्ये निविष्टास्तु तद्व्ययो भोग्य उच्यते ।

**भोग्य व्यय के लक्षण—**सोना, रत्न, चांदी, निष्क (मोहर-स्वर्ण मुद्रा) रखने के जो स्थान हैं एवं रथ, घोड़े, गौ, गज, ऊंट, बकरे, मेडे आदि के तथा इनके अध्यक्षों के लिये पृथक्-पृथक् बने हुये जो स्थान (गृह) हैं। और वाद्य (बाजे), शस्त्र, अस्त्र, धान्य, संभार (नाना प्रकार की सामग्री) रखने के लिये जो स्थान हैं तथा मन्त्री, शिल्प, नाट्य (नाटक-संबन्धी), वैद्य, मृग, पाक, पक्षी इनके लिये जो स्थान हैं, उन सबों की गणना भोग्य के अन्दर है अतः इन सबों के संबन्ध में होनेवाले व्यय को भी 'भोग्य' कहते हैं।

जपहोमार्चनैर्दानैश्चतुर्धा पारलौकिकः ॥ ३४८ ॥
पुनर्यातो निवृत्तश्च विशेषायायव्ययौ च तौ।
आवर्तको निवर्ती च व्ययायौ तु पृथग्विधा ॥ ३४९ ॥

**पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण—**जप, होम, पूजन तथा दान भेद से पारलौकिक व्यय के मुख्य चार भेद होते हैं। और जो आय आकर पुनः जानेवाला हो उसे विशेष आय एवं जो व्यय जाकर पुनः आनेवाला हो उसे विशेष व्यय कहते हैं। अतः व्यय तथा आय ये दोनों पृथक् २ आवर्त्तक (वापस आनेवाले) निवर्ती (नहीं वापस आनेवाले) भेदों से दो २ प्रकार के होते हैं ।।

आवर्तकविहीनौ तु व्ययायौ लेखको लिखेत् ।

**आय-व्यय-लेखक के कर्तव्य—**लेखक वापस आनेवाले और वापस न आनेवाले व्यय तथा आयको लिखे।

क्रयाधमर्णघटनान्यस्थलाप्तो विवर्तकः ॥ ३५० ॥
द्रव्यं लिखित्वा दद्यात्तु गृहीत्वा विलिखेत्स्वयम् ।

क्रय (खरीदना), अधमर्ण की घटनाओं (ऋणादि व्यवहारों) एवं अन्य विषयों में विश्वासपात्र लेखक स्वयं द्रव्य लिखकर तब देवे या लेवे।

हीयते वर्धते नैवमायव्ययविलेखकः ॥ ३५१ ॥

इस प्रकार से आय-व्यय के लिखनेवाले का लिखा आय तथा व्यय न कम होता है और न बढ़ता है।

हेतुप्रमाणसम्बन्धकार्याङ्गव्याप्यव्यापकैः ।
आयाश्च बहुधा भिन्ना व्ययाः शेषं पृथक् पृथक् ॥ ३५२ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । १११

मानेन संख्यया चैवोन्मानेन परिमाणकैः ।
अवशिष्ट आय के विविध भेद— अवशिष्ट आय और पृथक् २ कारण, प्रमाण, संबन्ध (संयोग), कार्याङ्ग (कार्यों के अवान्तर व्यापार), व्याप्य (थोड़े विषय), व्यापक (बहुत विषय), मान, संख्या, उन्मान और परिमाण इन सबों के द्वारा बहुत प्रकार से भिन्न २ होते हैं।

क्वचित्संख्या क्वचिन्मानमुन्मानं परिमाणकम् ॥ ३५३ ॥
समाहारः क्वचिच्चेष्टो व्यवहारार्य तद्विदाम् ।
किसी प्रदेश में मानादि का ज्ञान रखनेवाले लोगों को व्यवहार के लिये संख्या, कहीं पर मान, कहीं पर उन्मान, कहीं पर परिमाण और कहीं पर समाहार (संख्यादियों का समुदाय) अभीष्ट होता है।

अङ्गुलाद्यं स्मृतं मानमुन्मानं तु तुला स्मृता ॥ ३५४ ॥
परिमाणं पात्रमानं संख्यैकद्व्यादिसंज्ञिका ।
मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण— अंगुलि या हाथ आदि से जो नापा जाता है उसे 'उन्मान' और काठ आदि के बने पात्रों से जो नापा जाता है उसे 'परिमाण' एवं एक, दो, तीन आदि गिनती को 'संख्या' कहते हैं।

यत्र यादृग् व्यवहारस्तत्र तादृक्प्रकल्पयेत् ॥ ३५५ ॥
जहाँ पर जैसा व्यवहार हो वहाँ पर वैसा व्यवहार राजा को कराना चाहिये।

रजतस्वर्णताम्रादि व्यवहारार्थमुद्रितम् ।
व्यवहार्य वराटाद्यं रत्नान्तं द्रव्यमीरितम् ॥ ३५६ ॥
सपशुधान्यवस्त्रादि-तृणान्तं धनसंज्ञकम् ।
लोकव्यवहारार्थं द्रव्य तथा धन के लक्षण— लोकव्यवहार के लिये ढाले गये चांदी, सोना एवं तांबे के सिक्कों का व्यवहार प्रजाओं को करना चाहिये। कौड़ी से लेकर रत्न-पर्यन्त की संज्ञा 'द्रव्य' है। पशु, धान्य, वस्त्र से लेकर तृण पर्यन्त की संज्ञा 'धन' है।

व्यवहारे चाधिकृतं स्वर्णाद्यं मूल्य तामियात् ॥ ३५७ ॥
व्यवहार के लिये राजा द्वारा निश्चित स्वर्णादि मुद्रायें प्रत्येक वस्तु की मूल्य समझी जाती हैं।

कारणादिसमायोगात्पदार्थस्तु भवेद् भुवि ।
येन व्ययेन संसिद्धस्तद्व्ययस्तस्य मूल्यकम् ॥ ३५८ ॥
मूल्य की परिभाषा— संसार में कारण आदि के संयोग होने से जो पदार्थ जितने व्यय में सिद्ध होता है उतना व्यय उसका मूल्य होता है।

सुलभासुलभत्वाच्चागुणत्वगुणसंश्रयैः ।

११२ | शुक्रनीतिः

यथाकामात्पदार्थानामर्घं हीनाधिकं भवेत् ॥ ३५९ ॥

मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश— पदार्थों की सुलभता या दुर्लभता से किंवा अच्छा या बुरा होने से (तारतम्यानुसार) उनका मूल्य विक्रेता के इच्छानुसार अधिक या कम होता है।

न हीनं मणिधातूनां क्वचिन्मूल्यं प्रकल्पयेत् ।
मूल्यहानिस्तु चैतेषां राजदौष्ट्येन जायते ॥ ३६० ॥

किसी प्रदेश में भी राजा मणियों तथा सोना, चांदी आदि धातुओं का मूल्य थोड़ा न रखे । इन सबों के मूल्य में कमी जब होती है तब राजा की दुष्टता से न कि प्रजा की ।

दीर्घे चतुर्भागभूतपत्रे तिर्यग्गतावलिः ।
त्र्यंशगाभ्यन्तरगता चार्धगा पादगापि वा ॥ ३६१ ॥
कार्या व्यापकव्याप्यानां लेखने पदसंज्ञिका ।

पत्रलेखन प्रकार— थोड़ा या ज्यादा विषयों के अनुसार लेख लिखने के लिये प्रशस्त पत्र (कागज) के ऊपर चार भाग करने पर उसमें से ३ भाग के अन्दर या आधे भाग किंवा चौथाई भाग के अन्दर आड़ी लकीरों की पंक्ति बनाकर पदों (अक्षरों) को लिखना चाहिये ।

श्रेष्ठाभ्यन्तरगा तासु वामतस्त्र्यंशगाऽप्यनु ॥ ३६२ ॥
दक्षत्र्यंशगता चानु ह्यर्धगा पादगा ततः ।

उक्त ३ प्रकार की पदावलियों में जो पत्र के अन्दर वामभाग से शुरू होकर तीन भाग में लिखी होती है वह श्रेष्ठ है। और दक्षिण से वामभाग की ओर तीन भाग तक लिखी होती है वह उसकी अपेक्षा हीन है। अर्द्धांश में लिखी हुई उससे भी हीन, इसके बाद चतुर्थांश में लिखी हुई सबसे हीन है ।

स्वभ्यन्तरे स्वभेदाः स्युः सदृशाः सदृशे पदे ॥ ३६३ ॥
स्वारम्भपूर्तिसदृशे पत्रे स्तः सदैव हि ।

लाइनों की दूरी परस्पर समान भाव से होने से सब एक सी हों और उनमें अक्षर भी समान हों । अर्थात् जो समान पद हों उनमें सर्वत्र अक्षर समान लिखे जांय । और आरम्भ किये गये विषयों की पूर्ति के अनुरूप पत्र हों एवं उनमें अक्षर और लाइनें उसी के अनुसार अंकित हों ।

राजा स्वलेख्यचिह्नं तु यथाभिलषितं तथा ॥ ३६४ ॥
लेखानुपूर्वं कुर्याद्धि दृष्ट्वा लेख्यं विचार्य च ।

राजा लेख को देखकर उसके बाद विचार कर लेखानुसार जो उचित प्रतीत हो उसे इच्छानुकूल अपने लेख से अङ्कित कर देवे अर्थात् लिख देवे ।

द्वितीयोऽध्यायः [११९]

मंत्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसंज्ञकः ॥ ३६५ ॥
स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ।
मन्त्री, विचारपति, पण्डित और दूत आदि ये सब प्रथम राजा को दिखाने के लिये 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखें ।

अमात्यः साधु लिखनमस्त्येतत्प्राग् लिखेदयम् ॥ ३६६ ॥
सम्यग्विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ।
इनमें से जो अमात्य है वह 'यह लेख अच्छा है' ऐसा पत्र में प्रथम लिखे । उसके बाद सुमन्त्र 'मैंने इस पर भली-भांति विचार किया है' ऐसा लिखे ।

सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत्स्वयम् ॥ ३६७ ॥
अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ।
और 'प्रधान' 'यह वस्तुतः यथार्थ है' यह स्वयं लिखे उसके बाद प्रतिनिधि 'यह अङ्गीकार करने योग्य है' ऐसा लिखे ।

अङ्गीकर्तव्यमिति च युवराजो लिखेत्स्वयम् ॥ ३६८ ॥
लेख्यं स्वाभिमतं चैतद्विलिखेच्च पुरोहितः ।
उसके बाद युवराज 'इसे अङ्गीकार करना चाहिये' ऐसा स्वयं लिखे । और 'पुरोहित' 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखे ।

स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ३६९ ॥
अङ्गीकृतमिति लिखेन्मुद्रयेच्च ततो नृपः ।
**सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश—**और मन्त्री आदियों को लेख के अन्त में अपनी २ मुहर लगा देनी चाहिये । और अन्त में राजा भी 'यह अङ्गीकृत है' ऐसा लिखे और उस पर अपनी मुहर कर दे ।

कार्यान्तरस्याकुलत्वात्सम्यग्द्रष्टुं न शक्यते ॥ ३७० ॥
युवराजादिभिर्लेख्यं तदनेन च दर्शितम् ।
युवराज आदि को कार्यान्तर में (दूसरे २ कार्यों में) व्यस्तचित्त होने से अच्छी तरह से लेख के संपूर्ण विषयों को न देख सकने से 'इस आदमी ने जो दिखाया उस पर मैंने अच्छी तरह से विचार किया' यह भी मन्त्री आदि को लिखना चाहिये ।

समुद्द्रं विलिखेयुर्वै सर्वे मन्त्रिगणास्ततः ॥ ३७१ ॥
राजा दृष्टमिति लिखेद् द्राक् सम्यग्दर्शनाक्षमः ।
सभी मन्त्री लोगों को सभी लेखों पर मुहर से अङ्कित करके अपना २ हस्ताक्षर करना चाहिये और भली-भांति से देखने में असमर्थ राजा शीघ्र उन सब लेखों पर 'मैंने देखा' यह लिख दे क्योंकि उसका मन्त्री आदि के लेखों पर पूर्ण विश्वास रहता है ।

८ शु०

११४ | शुक्रनीतिः

आयमादौ लिखेत्सम्यग् व्ययं पश्चात्तथागतम् ॥ ३७२ ॥
वामे चायं व्ययं दक्षे पत्रभागे च लेखयेत् ।

पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार— बही खाते पर पहले सम्पूर्ण आय ( आमदनी ) लिखे पीछे जो व्यय हुआ हो उसे लिखे । और बही के बाईं ही ओर आय और दाहिनी ओर व्यय लिखे ।

यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ वामोर्ध्वभागगौ क्रमात् ॥ ३७३ ॥
आधाराधेयरूपौ वा कालार्थं गणितं हि तत् ।

जहां पर आय तथा व्यय ये दोनों अधिक या अल्प अथवा आश्रय तथा आश्रयी रूप से हों वहां पर उन दोनों को बही के वाम भाग में यथाक्रम ऊपर की ओर रखना चाहिये । ऐसी व्यवस्था नियम के लिये है ।

अधोधश्च क्रमात्तत्र व्यापकं वामतो लिखेत् ॥ ३७४ ॥
व्याप्यानां मूल्यमानादि तत्पंक्त्यां विनिवेशयेत् ।

उसमें व्यापक को वामभाग में क्रम से नीचे-नीचे लिखे । और व्याप्यों का मूल्य और मानादि उन्हीं की पंक्ति में लिखे ।

ऊर्ध्वगानां तु गणितमधः पंक्त्यां प्रजायते ॥ ३७५ ॥
यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ व्यापकत्वेन संस्थितौ ।

जहां पर वे दोनों व्यापक और व्याप्य बहुसंख्यक हों वहाँ पर ऊपरवालों की गणना नीचे की पंक्ति में होती है ।

व्यापकं बहुवृत्तित्वं व्याप्यं स्यान्न्यूनवृत्तिकम् ॥ ३७६ ॥
व्याप्याश्चावयवाः प्रोक्ता व्यापकोऽवयवी स्मृतः ।

व्यापक-व्याप्य के लक्षण— बहुत स्थलों पर रहनेवालों को 'व्यापक' कम स्थलों पर रहनेवालों को 'व्याप्य' कहते हैं । और व्याप्य अवयव ( अङ्ग ) एवं व्यापक ( अवयवी ) कहलाते हैं ।

सजातीनां च लिखनं कुर्याच्च समुदायतः ॥ ३७७ ॥
यथाप्राप्तं तु लिखनमाद्यन्तसमुदायतः ।

समान जातिवाले विषयों का समुदाय रूप से एक स्थान पर ही लिखना उचित होता है । और नाना प्रकार के विषयों का जहां जैसा मौका हो वहीं उसके अनुसार आदि, अन्त और सर्वत्र लिखना उचित है ।

व्यापकाश्च पदार्था वा यत्र संति स्थलानि हि ॥ ३७८ ॥
व्याप्यमायव्ययं तत्र कुर्यात्कालेन सर्वदा ।

जहां पर पदार्थ व्यापक ( बहुत) हों एवं स्थल भी बहुत हों वहां सर्वदा आय-व्यय को काल से व्याप्य कर लेना चाहिये ।

स्थानटिप्पनिका चैषा ततोऽन्यत् संघटिप्पनम् ॥ ३७९ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ११५

विशिष्टसंज्ञितं तत्र व्यापकं लेख्यभाषितम् ।
स्थान-टिप्पणादि के भेद— यह स्थान-संबन्धी विवरण अन्य है और वस्तु-समूहसंबन्धी विवरण इससे अन्य है, उसमें लेखोक्त व्यापक की संज्ञा विशिष्ट है ।

आयाः कति व्ययाः कस्य शेषं द्रव्यस्य चास्ति वै ॥ ३८० ॥
विशिष्टसंज्ञकैरेषां संविज्ञानं प्रजायते ।
आय कितने हैं और व्यय कितने हैं और किस द्रव्य का कितना शेष है ? इन सबों का भली-भांति ज्ञान विशिष्टसंज्ञक पूर्वोक्त व्यापक लेख विशेष से होता है ।

आदौ लेख्यं यथा प्राप्तं पश्चात्तद्गणितं लिखेत् ॥ ३८१ ॥
यथा द्रव्यं च स्थानं चाधिकसंज्ञं च टिप्पणैः ।
पहले जो वस्तु जिस तरह से प्राप्त हो उसे लिखे उसके पश्चात् उसकी संख्या लिखनी चाहिये । उसके बाद विवरण के साथ जैसा द्रव्य, स्थान तथा अधिकसंज्ञक हो उसे लिखे ।

शेषायाव्ययविज्ञानं क्रमाल्लेख्यैः प्रजायते ॥ ३८२ ॥
स्थलायव्ययविज्ञानं व्यापकं स्थलतो भवेत् ।
शेषायाव्यय-स्थलायव्ययज्ञान— अवशिष्ट आय तथा व्यय का पूर्ण ज्ञान बहियों से होता है । और बहुत स्थानों के आय-व्यय का पूर्ण ज्ञान स्थानों के ज्ञान से ही हो जाता है ।

पदार्थस्य स्थलानि स्युः पदार्थाश्च स्थलस्य तु ॥ ३८३ ॥
व्याप्यास्तिष्ठन्त्यथैतेषां यथेष्टं लेखने नृणाम् ।
टिप्प्यादि लिखने का निर्देश— स्थल पदार्थके एवं पदार्थ स्थल के व्याप्य होते हैं। मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार लिखने में टिप्प्यादि रखनी चाहिये ।

निश्चितान्यस्वामिकाद्या आया ये इतरान्तगाः ॥ ३८४ ॥
विशिष्टसंज्ञका ये च पुनरावर्तकादयः ।
व्ययाश्च परलेखान्ता अन्तिमव्यापकाश्च ते ॥ ३८५ ॥
पूर्वोक्त निश्चितान्यस्वामिक (निश्चित है अन्य स्वामी जिसका) से लेकर इतर (पार्थिव से भिन्न-जङ्गम-शुल्कादि) तक जितने आय हैं और विशिष्टसंज्ञक जो पुनरावर्तकादि व्यय हैं वे सब दूसरों के लेख हैं अन्त में जिसके ऐसे एवं अन्तिम व्यापकवाले (बहुत शेषवाले) हैं।

इच्छया ताडितं कृत्वादौ प्रमाणफलं ततः ।
प्रमाणभक्तं तल्लब्धं भवेदिच्छाफलं नृणाम् ॥ ३८६ ॥
पहले प्रमाण फल (सिद्धवस्तु) को इच्छा (साध्यवस्तु) से गुणित

११६ | शुक्रनीतिः

करके प्रमाण से भाग करने पर जो लब्धि हो उसे मनुष्यों का इच्छा-फल कहते हैं ।

समासतो लेख्यमुक्तं सर्वेषां स्मृतिसाधनम् ।

इस प्रकार से संक्षेप से सभी विषयों की स्मृति का साधन (कारण) लेख्य (बही या पत्र) का वर्णन किया गया ।

गुञ्जा माषस्तथा कर्षः पदार्धः प्रस्थ एव हि ॥ ३८७ ॥
यथोत्तरा दशगुणाः पञ्च प्रस्थस्य चाढकः ।
ततश्चाष्टाढकः प्रोक्तो ह्यर्मणस्ते तु विंशतिः ॥ ३८८ ॥
खारिका स्याद्विद्यते तद् देशे देशे प्रमाणकम् ।

**गुञ्जादिकों का लक्षण—**गुञ्जा (रत्ती), माष (माशा), कर्ष (एक रुपया भर), पदार्द्ध, प्रस्थ ये सब उत्तरोत्तर क्रम से दशगुने होते हैं अर्थात् १० गुञ्जाओं का १ माष, १० माषों का १ कर्ष, १० कर्षों का १ पदार्द्ध, १० पदार्द्धों का १ प्रस्थ होता है । ५ प्रस्थों का १ आढक, १० आढकों का १ अर्मण, २० अर्मणों का १ खारिका (खारी) होती है । देश-भेद से ये परिमाणों में भिन्नतायें होती हैं ।

पञ्चाङ्गुलाबटं पात्रं चतुरङ्गुलविस्तृतम् ॥ ३८९ ॥
प्रस्थपादं तु तज्ज्ञेयं परिमाणे सदा बुधैः ।

**प्रस्थपाद का लक्षण—**५ अङ्गुल गहरा, ४ अङ्गुल चौड़ा जो पात्र होता है, उसे पण्डित लोग सदा नापने में 'प्रस्थपाद' कहते हैं। इसी को लोक में 'माना' भी कहते हैं ।

ऊर्ध्वांकश्च यथासंज्ञस्त्वधस्थाश्च वामगाः ॥ ३९० ॥
क्रमात्स्वदशगुणिताः परार्द्धान्ताः प्रकीर्त्तिताः ।

**संख्या का प्रमाण—**संज्ञानुसार ऊपर लिखे हुये अङ्क के नीचे बाईं ओर एक २ इकाई क्रम से बढ़ाने पर अपने से दशगुणी अधिक परार्द्ध पर्यन्त अङ्कों की गिनती होती है ।

न कर्तुं शक्यते संख्यासंज्ञा कालस्य दुर्गमात् ॥ ३९१ ॥
ब्रह्मणो द्विपरार्धं तु आयुरुक्तं मनीषिभिः ।

**संख्या की अनन्तता—**काल की समाप्ति होना असंभव है अतः संख्या की संज्ञा परार्द्ध से अधिक नहीं हो सकती है। और विद्वानों ने ब्रह्मा की आयु का प्रमाण दो परार्द्ध तक कहा है क्योंकि परार्द्ध से अतिरिक्त संख्या की संज्ञा नहीं है ।

एको दश शतं चैव सहस्रं चायुतं क्रमात् ॥ ३९२ ॥
नियुतं प्रयुतं कोटिरर्बुदं चाब्जखर्वकौ ।