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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

तृतीयोग्ध्यायः १५७

तृतीयोग्ध्यायः १५७

वे देवे किन्तु घर में न रखे, क्योंकि पुत्रादि को ज्ञात होने पर उस धन की रक्षा असंभव हो जाती है।

नैवास्तिल्लिखितादन्यत् स्मारकं व्यवहारिणाम् ॥ १८९ ॥
न लेख्येन विना कुर्याद् व्यवहारं सदा बुधः ।

**व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश—**व्यवहार (व्यवसाय) करनेवालों के लिये लेख से बढ़ कर दूसरा कोई स्मरणसूचक चिह्न नहीं है, इसलिये बुद्धिमान को सदा बिना लेख के व्यवहार (रुपया देना) नहीं करना चाहिये।

निर्लोभे धनिके राज्ञि विश्वस्ते क्षमिणां वरे ॥ १९० ॥
सुसञ्चितं धनं धार्यं गृहीतलेखितं तु वा।

लोभ से रहित धनी पुरुष या विश्वासपात्र या क्षमाशील किंवा श्रेष्ठ पुरुष अथवा राजा इनमें किसी एक के पास में अच्छी तरह से संचित धन को रखना चाहिये अथवा रखने के लिये लिये हुये धन को लिख लेने के बाद चाहे जिसके पास रखना चाहिये ।

मैत्र्यर्थे याचितं दद्यादकुसीदं धनं सदा ॥ १९१ ॥
तस्मिन् स्थितं चेन्न बहु हानिकृच्च तथाविधम् ।

**मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश—**मित्रता के नाते मांगने पर मित्र के लिये बिना सूद पर धन सदा देना चाहिये और यदि उस मित्र के ऊपर वैसा बिना सूद पर लिया हुआ धन बहुत सा बाकी भी पड़ा हो तो भी पुनः देना हानिकर नहीं है। अर्थात् मित्र के लिये सभी सत्य है।

दृष्ट्वाऽधमर्णं वृद्ध्यापि व्यवहारक्षमं सदा ॥ १९२ ॥
सबन्धं सप्रतिभुवं धनं दद्याच्च साक्षिमत् ।
गृहीतलेखितं योग्यमानं प्रत्यागमे सुखम् ॥ १९३ ॥
न दद्याद् वृद्धिलोभेन नष्टं मूलधनं भवेत् ।

**लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश—**ऋण लेनेवाले को सूद देने में समर्थ देख कर सदा बन्धक या किसी के जमानत पर और किसी के गवाही के साथ लिखा-पढ़ी करके उचित मात्रा में, सुखपूर्वक लौटाने लायक धन देना चाहिये। और ब्याज के लोभ से उपर्युक्त रीति से भिन्न अवस्था में धन नहीं देना चाहिये नहीं तो मूल धन नष्ट हो जाने की संभावना रहती है।

आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ॥ १९४ ॥
धनं मैत्रीकरं दाने चादाने शत्रुकारकम् ।

**आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश—**इस प्रकार से आहार-व्यवहार में

१५८शुक्रनीतिः

जो लज्जा का त्याग करनेवाला होता है वह सुखी होता है। देने के समय धन मैत्री कराता है और लेने के समय वही धन शत्रुता करा देता है।

कृत्वा स्वान्ते तथौदार्यं कार्पण्यं बहिरैव च ॥ १९५ ॥
उचितं तु व्ययं काले नरः कुर्यान्न चान्यथा ।

**उचित व्यय करने का निर्देश—**हृदय के अन्दर उदारता रखकर और ऊपर से कृपणता (कंजूसी) रख कर समय आने पर उचित व्यय मनुष्य को करना चाहिये । इससे अन्यथा नहीं करना चाहिये ।

सुभार्यापुत्रमित्राणि शक्त्या संरक्षयेद्धनैः ॥ १९६ ॥
नात्मा पुनरतो त्मानं सर्वैः सर्वं पुनर्भवैत् ।
पश्यति स्म स जीवश्चेन्नरो भद्रशतानि च ॥ १९७ ॥

**भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश—**भार्या, पुत्र और मित्र ये सब यदि उत्तम हों तो इनकी रक्षा धन से करनी चाहिये । और इन सबों से आत्मा (शरीर) की रक्षा करनी चाहिये क्योंकि शरीर दुबारा नहीं मिल सकता है और भार्या-पुत्रादि तो दुबारा भी मिल सकते हैं। और यदि मनुष्य जीवित रहता है तो सैकड़ों कल्याण देखता है।

सदारप्रौढपुत्रान् द्राक् श्रेयोऽर्थी विभजेत् पिता ।
सदारभ्रातरः प्रौढा विभजेयुः परस्परम् ॥ १९८ ॥

**सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश—**अपना कल्याण का चाहनेवाला पिता स्त्री-युक्त एवं कार्य करने में समर्थ हुये पुत्रों को शीघ्र आपस में विभक्त कर दे (जिसमें आपस में भविष्य में कलह न कर सकें) और इसी प्रकार से सहोदर भाई लोग भी विवाह हो जाने एवं प्रौढ (कार्य करने में समर्थ) हो जाने पर आपस में विभाग कर लें अन्यथा परस्पर लड़कर निश्चय मिट जाते हैं।

एकोदरा अपि प्रायो विनाशायान्यथा खलु ।
नैकत्र संवसेच्चापि स्त्रीद्वयं मनुजस्य तु ॥ १९९ ॥

**२ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध—**यदि किसी पुरुष के पास अथवा स्वतन्त्र दो स्त्रियां हों तो उन दोनों को एवं किसी स्त्री जाति पशु के पास अथवा स्वतन्त्र दो पुरुष जाति के पशुओं को एकत्र नहीं रखना चाहिये । क्योंकि मनुष्य जाति में और पशु जाति में पुरुष एक से अधिक एक जगह कैसे रह सकते हैं ? अर्थात् कभी नहीं रह सकते हैं।

कथं वसेत्तद्बहुत्वं पशूनां तु नरद्वयम् ।
विभजेयुर्न तत्पुत्रा यद्धनं वृद्धिकारणम् ॥ २०० ॥

तृतीयोऽध्यायः
१५६

अधमर्णस्थितं चापि यद् देयं चौत्तमर्णिकम्।

**ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध—**गृहपति के पुत्र लोग पिता के उस धन का परस्पर विभाग न करें जो कि सूद पर दिया हुआ अधमर्ण ( ऋण लेनेवाले ) के पास हो अथवा उत्तमर्ण ( सूद पर द्रव्य देनेवाला महाजन ) को देने के लिये जो धन हो।

यस्येच्छेदुत्तमां मैत्रीं कुर्यान्नाभिलाषकम् ॥ २०१ ॥
परोक्षे तद्गृहद्वारं तत्स्त्रीसम्भाषणं तथा ।
तन्न्यूनदर्शनं नैव तत्प्रतीपविवादनम् ॥ २०२ ॥
असाहाय्यं च तत्कार्ये ह्यनिष्टोपेक्षणं न च ।

**शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश—**जिसके साथ उत्तम मैत्री रखना चाहे उससे धन का अभिलाषा न रखे अर्थात् ऋणादि न ले। और परोक्ष में उसके अन्तःपुर में न जाय और न उसकी स्त्री से बातचीत करे। एवं उसकी त्रुटि को न देखे अर्थात् दोष के तरफ ध्यान न दे। और उसके प्रतिकूल विवाद न करे। तथा उसके कार्य में असहायता और अनिष्ट देखकर उसकी उपेक्षा न करे।

सकुसीदमकुसीदं धनं यच्चौत्तमर्णिकम् ॥ २०३ ॥
दद्यादगृहीतमिव नोभयोः क्लेशकृद्यथा ।
नासाक्षिकमचालित्खितमृणपत्रस्य पृष्ठतः ॥ २०४ ॥

**बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश—**और सूद पर या बिना सूद का जो महाजनी ( ऋण देनेवाला ) का धन हो वह जिस प्रकार से दोनों मित्रों को परस्पर क्लेश न पहुंचे तथा बिना साक्षी बिना ऋणपत्र पर लिखाये न दे।

आत्मपितृमातृगुणैः प्रख्यातश्चोत्तमोत्तमः ।
गुणैरात्मभवैः ख्यातः पैतृकैर्मातृकैः पृथक् ॥ २०५ ॥
उत्तमो मध्यमो नीचोऽधमो भ्रातृगुणैर्नरः ।
कन्यास्त्रीभगिनीभाग्यो नरोऽधमतमो मतः ॥ २०६ ॥

**उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण—**जो मनुष्य अपने, पिता तथा माता इन तीनों के गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तमोत्तम कहलाता है, जो केवल अपने ही गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तम, पिता के गुणों से मध्यम एवं माता के गुणों से प्रख्यात नीच कहलाता है। और भाई के गुणों से प्रख्यात पुरुष अधम कहलाता है। तथा जो कन्या, स्त्री या बहन के भाग्य से उन्हीं के सहारे गलग्रह होकर जीवन व्यतीत करता है वह अधमतम कहलाता है।

भूत्वा महाधनः सम्यक् पोष्यवर्गं तु पोषयेत् ।

१६० | शुक्रनीतिः

अदत्त्वा यत्किञ्चिदपि न नयेद्दिवसं बुधः ॥ २०७ ॥

बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश— विपुल धन से सम्पन्न होते हुए भी जो पालन करने के योग्य हैं उन्हीं का पालन करना चाहिये। बुद्धिमान को बिना कुछ दिये हुये कोई भी दिन व्यतीत नहीं करना चाहिये।

स्थितो मृत्युमुखे चाहं क्षणमायुर्ममास्ति न ।
इति मत्वा दानधर्मौ यथेष्टौ तु समाचरेत् ॥ २०८ ॥
न तौ बिना मे परत्र सहायाः सन्ति चेतरे ।
दानशीलाश्रयाल्लोको वर्तते न शठाश्रयात् ॥ २०९ ॥

यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश— 'मैं मृत्यु के मुख में स्थित हूँ, मेरी क्षणभर की भी आयु नहीं है। और दान और धर्म इन दोनों को छोड़कर परलोक में अन्य कोई मेरा सहायक नहीं है। तथा दानशील व्यक्तियों के आश्रय से यह जगत् ठहरा हुआ है। शठों के आश्रय से नहीं।' ऐसा समझकर यथेष्ट दान तथा धर्म करना चाहिये।

भवन्ति मित्रा दानेन द्विषन्तोपि च किं पुनः।

दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश— जब शत्रु लोग भी दान से मित्र बन जाते हैं तब औरों के लिये क्या कहना है अर्थात् अन्य तो मित्र बन ही जाते हैं।

देवतार्थं च यज्ञार्थं ब्राह्मणार्थं गवार्थकम् ॥ २१० ॥
यद्दत्तं तत्पारलौक्यं संविदत्तं तदुच्यते ।

परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण— देवता, यज्ञ, ब्राह्मण, गौ, इनके लिये जो दिया जाता है वह परलोक-सुख-साधन के लिये होता है और उसी को 'संविद्' दान अर्थात् 'अवश्य देना चाहिये' इस बुद्धि से दिया हुआ कहते हैं।

बन्दिमागधमल्लादिनटनार्थं च दीयते ॥ २११ ॥
पारितोष्यं यशोर्थं तु श्रिया दत्तं तदुच्यते ।

पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण— बन्दी, मागध तथा मल्ल आदि लोगों को अपना २ कार्य दिखाने के लिये जो पुरस्कार रूप में दिया जाता है उसे 'पारितोष्य' कहते हैं। और जो यश के लिये दिया जाता है उसे 'श्रियादत्त' (लक्ष्मी से दिया हुआ) कहते हैं अथवा उसे यशोऽर्थक और श्रियादत्त कहते हैं।

उपायनीकृतं यत्तु सुहृत्संबन्धिबन्धुषु ॥ २१२ ॥
विवाहादिषु चाचारदत्तं ह्रीदत्तमेव तत् ।