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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३९३

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३९३

होते हैं, और अच्छे विषयों के ग्रहण करने में आदर तथा असद्विषयों के ग्रहण करने में अनादर रखना नियत रूप से होता है, वही राजा बहुत दिनों तक राजपद का भोग करता है ।

यस्यानियमितं कर्म साधुत्वं वचनं त्वपि ॥ ४१४ ॥
सदैव कुटिलः सख्युः स्वपदाद् द्राग् विनश्यति ।

शीघ्र ही पदभ्रष्ट होनेवाले राजा के लक्षण— जिसके सभी कार्य, साधुता तथा वचन अनियमित रहते हैं और जो कुटिल होता है वह अपने मित्रों तथा बन्धुओं एवं राजपद से शीघ्र भ्रष्ट हो जाता है अर्थात् बन्धुओं से विच्छेद एवं राज्यनाश प्राप्त करता है ।

नापि व्याघ्राग्गजाः शक्ता मृगेन्द्रं शासितुं यथा ॥ ४१५ ॥
न तथा मन्त्रिणः सर्वे नृपं स्वच्छन्दगामिनम् ।

जैसे व्याघ्र तथा गज आदि सिंह के ऊपर शासन करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं, वैसे ही सभी मन्त्री आदि अधिकारी वर्ग स्वच्छन्द (मनमानी) व्यवहार करनेवाले राजा के ऊपर शासन करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं ।

निभृताधिकृतास्तेन निःसारत्वं हि तेष्वतः ॥ ४१६ ॥
गजो निबध्यते नैव तूलभारसहस्रकैः ।

क्योंकि वे मन्त्री आदि उस राजा से सभी तरह से पालित तथा अधिकार-पद पर आरूढ़ किये गये होते हैं अतः राजा के समक्ष वे शासन करने में निःसार (शक्ति रहित) रहते हैं । लोक में भी रुई के भारी से भारी वजन की पुड्ढियों से हाथी बाँधी जाती नहीं देखी जाती है ।

उद्धर्तुं द्राग् गजः शक्तः पङ्कलग्नं गजं बली ॥ ४१७ ॥
नीतिभ्रष्टनृपं त्वन्यनृप उद्धरणक्षमः ।

नीतिभ्रष्ट राजा को भी अन्य राजा का उद्धार करने में समर्थ होने का निर्देश— जैसे किसी दलदल में फंसी हुई हाथी को बलवान हाथी ही शीघ्र निकालने में समर्थ होती है, वैसे ही नीतिमार्ग से विचलित हुये राजा का उद्धार करने (नीति पर लाने) में उसी के समान कोई दूसरा राजा ही समर्थ हो सकता है ।

बलवन्नृपभृत्येऽल्पेऽपि श्रीस्तेजो यथा भवेत् ॥ ४१८ ॥
न तथा हीननृपतौ तन्मन्त्रिष्वपि नो तथा ।

तेजोहीन राजा से बलवान् राजा के साधारण भृत्य का भी तेजस्वी होने का निर्देश— बलवान राजा के साधारण भृत्य में भी जैसी श्री (शोभा) तथा तेज होता है वैसी श्री तथा तेज न तो हीन (साधारण) राजा में और न उसके मन्त्री आदि में भी होती है ।

३६४ | शुक्रनीतिः

बहूनामैकमत्यं हि नृपतेर्बलवत्तरम् ॥ ४१९ ॥
बहुसूत्रकृतो रज्जुः सिंहाद्याकर्षणक्षमः।
**राजा से बढ़कर बहुमत की महत्ता का निर्देश—**बहुतों का ऐकमत्य निश्चय ही राजा से भी अधिक बलवान होता है अर्थात् उसके आगे राजा झुक जाता है क्योंकि बहुत लरों की बनी रस्सी सिंहादि को भी खींच लाने में समर्थ होती है।

हीनराज्यो रिपुभृत्यो न सैन्यं धारयेद् बहु ॥ ४२० ॥
कोशवृद्धिं सदा कुर्यात् स्वपुत्राद्यभिवृद्धये ।
**हीन-राज्य राजा के आचरणों का निर्देश—**साधारण राज्यवाला एवं दुष्ट भृत्यवाला क्षुद्र राजा अपने पास बहुत सेना न रक्खे, बल्कि वह सदा अपने पुत्रादि का अभ्युदय होने के निमित्त कोशवृद्धि ( खजाने में द्रव्य जमा ) करता रहे ।

क्षुधया निद्रया सर्वमशनं शयनं शुभम् ॥ ४२१ ॥
भवेद्यथा तथा कुर्यादन्यथाऽऽशु दरिद्रकृत् ।
दिशाऽनया व्ययं कुर्यान्नृपो नित्यं न चान्यथा ॥ ४२२ ॥
धर्मनीतिविहीना ये दुर्बला अपि वै नृपाः ।
सुधर्मबलयुग् राज्ञा दण्ड्यास्ते चौरवत् सदा ॥ ४२३ ॥
**राजा के दरिद्र हो जाने के कारणों का निर्देश—**जब भूख लगे तब भोजन और जब नींद लगे तब शयन करना ये सब राजा के लिये शुभ फलप्रद होते हैं। अन्यथा भोजन-शयन से शीघ्र दरिद्रता आ जाती है। इस रीति से राजा को व्यय करना चाहिये कि वह शीघ्र दरिद्र न हो जाय, अतः इससे अन्य रीति का आश्रय करना अनुचित है। जो धर्म तथा नीति से विहीन और दुर्बल राजा हैं, उनको धर्म तथा बल से युक्त राजा सदा चोर की भांति दण्ड दे ।

सर्वधर्मावनान्नीचन्नृपोऽपि श्रेष्ठतामियात् ।
उत्तमोऽपि नृपो धर्मनाशनान्नीचतामियात् ॥ ४२४ ॥
**धार्मिक नीच राजा को भी श्रेष्ठ होने का निर्देश—**सम्पूर्ण राज-धर्मों की रक्षा ( पालन ) करते रहने से नीच ( क्षुद्र ) भी राजा श्रेष्ठता को प्राप्त हो जाता है और उत्तम भी राजा राजधर्मों की रक्षा न करने से नीचता को प्राप्त हो जाता है ।

धर्माधर्मप्रवृत्तौ तु नृप एव हि कारणम् ।
स हि श्रेष्ठतमो लोके नृपत्वं यः समाप्नुयात् ॥ ४२५ ॥
**धर्म तथा अधर्म की प्रवृत्ति में राजा की ही कारणता का निर्देश—**लोगों की धर्म तथा अधर्म में प्रवृत्ति में होने में कारण राजा ही होता है अर्थात् राजा के

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६५

धार्मिक होने या न होने से प्रजा भी धार्मिक या अधार्मिक होती है। अतः वही सर्वश्रेष्ठ होता है जो राज-पद को प्राप्त करता है।

मन्वाद्यैरादृतो योऽर्थस्तदर्थो भार्गवेण वै ।
द्वाविंशतिशतं श्लोका नीतिसारे प्रकीर्तिताः ॥ ४२६ ॥

**मनु आदि के मतानुसारी शुक्र की नीति होने का तथा ग्रन्थ-संख्या का निर्देश—**राजनीति के जिन विषयों का मन्वादि स्मृतियों ने आदर किया (माना), उन्हीं विषयों को भार्गव (शुक्राचार्यं) ने नीतिसार में २२०० श्लोकों में कहा है।

शुक्रोक्तनीतिसारं यश्चिन्तयेदनिशं सदा ।
व्यवहारधुरं वोढुं स शक्तो नृपतिर्भवेत् ॥ ४२७ ॥

**शुक्रनीति-सार-चिन्तन का फल—**जो शुक्राचार्य के द्वारा कहे हुये नीति-सार का निरन्तर चिन्तन करता है, वह राजाके योग्य व्यवहार के भार को वहन करने के लिये सदा समर्थ होता है।

न कवेः सदृशो नीतिस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
काव्यैषा नीतिरन्या तु कुनीतिर्व्यवहारिणाम् ॥ ४२८ ॥
नाश्रयन्ति च ये नीतिं मन्दभाग्यास्तु ते नृपाः ।

**शुक्रनीति के समान दूसरी नीति न होने का निर्देश—**शुक्राचार्य की कही हुई नीति के समान कोई दूसरी नीति तीनो लोकों में नहीं है। वस्तुतः व्यवहार करनेवालों के लिये नीति तो शुक्रनीति ही है। इससे भिन्न नीति कुनीति है।

कातर्याद्धनलोभाद्वा स्युर्वै नरकभाजनाः ॥ ४२६ ॥

इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य सेनानिरूपणं नाम सप्तमं प्रकरणम् ।
इति चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।

जो कायरता तथा धन के लोभ से नीति का आश्रयण नहीं करते हैं वे मन्दभाग्य राजा लोग नरकगामी होते हैं।

इति शुक्रनीतौ भाषाटीकायां चतुर्थाध्यायस्य सेनानिरूपणं
नाम सप्तमं प्रकरणम् ।

पञ्चमोऽध्यायः ।

नीतिशेषं खिले वक्ष्ये ह्यखिलं शास्त्रसंमतम् ।
सप्ताङ्गानां तु राज्यस्य हितं सर्वजनेषु वै ॥ १ ॥
नीति-शेष कहने का निर्देश — इस परिशिष्ट रूप खिल-नीति-निरूपण में राज्य के सात अंगों के एवं सभी लोगों के लिये हितकर शास्त्र-संमत संक्षिप्त रूप से अवशिष्ट नीति का वर्णन करता हूं ।

शतसंवत्सरान्तेऽपि करिष्याम्यात्मसाद्रिपुम् ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा रिपोश्छिद्राणि लक्षयेत् ॥ २ ॥
शत्रु के छिद्रों को ढूंढते रहने का निर्देश — मैं सौ वर्ष के बाद भी कदाचित् शत्रु को अपने अधीन कर लूंगा, ऐसा सोचकर सावधान मनसे शत्रु के छिद्रों को ढूंढता रहे ।

राष्ट्रभृत्यविशङ्की स्याद्धीनमन्त्रबलो रिपुः ।
युक्त्या तथा प्रकुर्वीत सुमन्त्रबलयुक् स्वयम् ॥ ३ ॥
शत्रु राजा को हीन-बल बनाने के लिये यत्न करने का निर्देश — स्वयं सुन्दर मन्त्र ( सन्ध्यादि षड्गुण ) तथा सेना से युक्त रहकर ऐसी युक्ति करे कि शत्रु अपनी सेनापर सन्देह करने लगे एवं हीन मन्त्र तथा सेना या बलवाला हो जाय ।

सेवया वा वणिग्वृत्त्या रिपुराष्ट्रं विमृश्य च ।
दत्ताभयं सावधानो व्यसनासक्तचेतसम् ॥ ४ ॥
मार्जारलुब्धकबवत् सन्तिष्ठन्नाशयेदरिम् ।
मौका देख कर शत्रु को नष्ट करने का निर्देश — सावधान होकर राजा ( मनोऽनुकूल आचरण ) या वाणिज्य के ब्याज से शत्रु के राष्ट्र को भली-भांति से देख कर बिडाल और बहेलियों के समान स्थित रहता हुआ पहले निर्भय रहने का विश्वास दिला कर कामादि ( राग-रङ्ग ) में आसक्त चित्तवाले शत्रु को मौका देख कर नष्ट कर दे ।

सेनां युद्धे नियुञ्जीत प्रत्यनीकविनाशिनीम् ॥ ५ ॥
न युञ्ज्याद्रिपुराष्ट्रस्थां मिथः स्वद्वेषिणीं न च ।
युद्ध में नियुक्त करने योग्य का निर्देश — शत्रु-सेना को नष्ट करनेवाली सेना को युद्ध में नियुक्त करे और जो शत्रु के राज्य में रहनेवाली या एकान्त पाकर अपने साथ द्वेष कर सकनेवाली हो ऐसी को न नियुक्त करे ।

न नाशयेत् स्वसेनां तु सहसा युद्धकामुकः ॥ ६ ॥