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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८३

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८३

वृद्धि करके उन्हें खुश करता हुआ युद्ध में ढाल तथा कवच से अपने शरीर की रक्षा करता रहे।

पाययित्वा मदं सम्यक् सैनिकाञ्छौर्यवर्धनम् ।
उत्तेजितांश्च निर्द्वैधान् मन्त्रान् युद्धे नियोजयेत् ॥ ३५५ ॥

और अपने सैनिकों को शूरता बढ़ानेवाले मद (शराब) को अच्छी तरह से पिलाकर उत्तेजित करने के बाद मरने का सन्देह नहीं करनेवाले उन वीरों को युद्ध में नियुक्त करे।

नालिकास्त्रेण खड्गाद्यैः सैनिकैः पातयेदरीन् ।
कुन्तेन सादी बाणेन रथगो गजगोऽपि च ॥ ३५६ ॥

युद्ध में नालास्त्र (बन्दूक-तोप) आदियों की योजना—पैदल सैनिक बन्दूक या खङ्ग आदि से, घुड़सवार भाले से, रथ और हाथी पर सवार हुये सैनिक बाण से शत्रुओं पर प्रहार करें।

गजो गजेन यातव्यस्तुरगेण तुरङ्गमः ।
रथेन च रथो योज्यः पत््तिना पत््तिरेव च ॥ ३५७ ॥
एकेनैकश्च शस्त्रेण शस्त्रमस्त्रेण वाऽस्त्रकम् ।

हाथी पर सवार सैनिक-हाथीवालों से, घुड़सवार-घुड़सवारों से, रथ पर चढ़े हुये रथवालों से एवं पैदल सैनिक-पैदल सैनिकों से युद्ध करें और अकेला-अकेले से, शस्त्रवाला-शस्त्रवालों से एवं अस्त्रवाला सैनिक अस्त्रवालों से लड़े।

न च हन्यात् स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ॥ ३५८ ॥
न मुक्तकेशमासीनं न तवास्मीतिवादिनम् ।
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् ॥ ३५६ ॥
न युध्यमानं पश्यन्तं युध्यमानं परेण च ।
पिबन्तं न च भुञ्जानमन्यकार्याकुलं न च ॥ ३६० ॥
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ।

युद्ध में प्रहार करने के अयोग्य सैनिकों के लक्षण—सज्जन पुरुषों के युद्धधर्म का ध्यान रखनेवाला सैनिक अपने से नीचे किसी जगह खड़े हुये को, एवं नपुंसक, हाथ जोड़े हुये, शिर के बाल बिखरे हुये, बैठे हुये 'मैं तुम्हारे अधीन हूँ' ऐसा कहते हुये, सोये हुये, लड़ाई के योग्य वेष नहीं धारण किये हुये, नग्न, शस्त्ररहित, नहीं लड़ते हुये, दूसरे के साथ होते हुये युद्ध को देखते हुये, जलपानादि करते हुये, भोजन करते हुये, युद्ध के अतिरिक्त अन्य कार्यों में व्यस्त हुये, डरे हुये एवं युद्ध से विमुख हुये, ऐसे सैनिकों के ऊपर प्रहार नहीं करे।

३८४शुक्रनीतिः

वृद्धो बालो न हन्तव्यो नैव स्त्री केवलो नृपः ॥ ३६१ ॥
यथायोग्यं हि संयोज्य निघ्नन् धर्मो न हीयते ।
**वृद्ध-बालकादि राजा को मारने का निषेध—**जो वृद्ध, बालक, स्त्री या केवल अकेला बचा हुआ राजा हो इन सबों को नहीं मारना चाहिये बल्कि उनके साथ यथायोग्य व्यवहार करके उन्हें केवल अपने अधीन करता हुआ राजा धर्म से च्युत नहीं कहा जाता है ।

धर्मयुद्धे तु कूटे वै न सन्ति नियमा अमी ॥ ३६२ ॥
न युद्धं कूटसदृशं नाशनं बलवद्रिपोः ।
**बलवान् शत्रु के नाशार्थ कूटयुद्ध की महत्ता—**ये सब नियम केवल धर्म-युद्ध के लिये कहे हुये हैं, कूटयुद्ध के लिये नहीं । बलवान् शत्रु को नष्ट करने के लिये कूटयुद्ध के समान कोई दूसरा युद्ध नहीं है ।

रामकृष्णेन्द्रत्रिदिवैः कूटमेवाहृतं पुरा ॥ ३६३ ॥
कूटेन निहतो बालिर्यवनो नमुचिस्तथा ।
क्योंकि प्राचीनकाल में राम, कृष्ण तथा इन्द्रादि देवताओं ने भी बलवान् असुरों के साथ लड़ने में कूटयुद्ध का ही आश्रय लिया था, और कूटयुद्ध के द्वारा ही उन सबों ने क्रम से बालि, कालयवन तथा नमुचि दैत्य का संहार किया था ।

प्रफुल्लवदनेनैव तथा कोमलया गिरा ॥ ३६४ ॥
अङ्गीकृतापराधेन सेवादाननतिस्तवैः ।
उपकारैः स्वाशयेन दिव्यैर्विश्वासयेत् परम् ॥ ३६५ ॥
क्षुरधारेण मनसा रिपोरिश्छिद्रं सुलक्षयेत् ।
**शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश—**प्रफुल्ल वदन होकर, कोमल वाणी से, अपराध को स्वीकार करने से, सेवा से, दान से, नमस्कार करने से, गुणों की प्रशंसा करने से, उपकार करने से, अच्छा भाव-प्रदर्शन करने से एवं दिव्य शपथ खाकर ऊपर से शत्रु का विश्वास अपने ऊपर जमावे किन्तु मन में छुरे के समान धार रखकर (नाश का उपाय करता हुआ) शत्रु के छिद्र (नाश करने का अवसर) को ढूंढता रहे । अर्थात् जब अवसर मिले तब मार गिरावे ।

अवमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः ॥ ३६६ ॥
स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः कार्यध्वंसो हि मूर्खता ।
कार्य को नष्ट न करने का निर्देश— बुद्धिमान मनुष्य अपमान को आगे रखकर और सम्मान को पीछे रखकर (मानापमान का ख्याल न करके जिस भांति से हो सके) अपने कार्य को सिद्ध करे। क्योंकि कार्य को नष्ट करना ही मूर्खता है ।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८५

मञ्चासीनः शतानीकः सेनाकार्यं विचिन्तयन् ॥ ३६७ ॥
सदैव व्यूहसङ्केतवाद्यशब्दान्तवर्तिनः ।
सञ्चरेयुः सैनिकाश्च राजराष्ट्रहितैषिणः ॥ ३६८ ॥
भेदितां शत्रुना दृष्ट्वा स्वसेनां घातयेच्च ताम् ।

सेनापति के नित्य-कृत्यों का निर्देश— जो सैकड़ों सेना का स्वामी हो वह राजा किसी उच्च आसन पर बैठ कर अपनी सेना के कार्यों को सोचता रहे। और सदैव व्यूह के संकेतानुसार बाजों के बजने के अन्दर रहकर कार्य करते हुये, राजा तथा राष्ट्र के हित चाहनेवाले सैनिक युद्ध में इधर-उधर संचार करते रहें । तथा राजा शत्रु के द्वारा यदि अपनी सेना को फूटी हुई (खिलाफ) समझे तो उसे नष्ट कर दे ।

प्रत्यग्रे कर्मणि कृते योधैर्दद्याद्धनं च तान् ॥ ३६९ ॥
पारितोष्यं चाधिकारं क्रमतोऽर्हं नृपः सदा ।

भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश— और राजा सैनिकों द्वारा कोई नवीन उत्तम पराक्रम कार्य किये जाने पर उनको योग्य पारितोषिक रूप में धन-प्रदान तथा अधिकार की वृद्धि सदा कर देवे ।

जलान्नतृणसंरोधे शत्रून् संपीड्य यत्नतः ॥ ३७० ॥
पुरस्ताद्विषमे देशे पश्चाद्धन्यात्तु वेगवान् ।

शत्रु को नष्ट करने का उपाय— प्रथम जल, अन्न तथा तृण आदि को शत्रु-सेना के पास जाने से रोक कर यत्नपूर्वक पीड़ा पहुँचावे तत्पश्चात् विषम (संकटपूर्ण) स्थान में प्राप्त हुये शत्रु के ऊपर बड़े वेग से हमला करके उसे मार डाले ।

कूटस्वर्णमहादानैर्भेदयित्वा द्विषद्वलम् ॥ ३७१ ॥
नित्यविस्त्रम्भसंसुप्तं प्रजागरकृतश्रमम् ।
विलोभ्यापि परानीकमप्रमत्तो विनाशयेत् ॥ ३७२ ॥

शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार— शत्रु की सेना को बनावटी सोने की राशि देकर फोड़ लेने (मिला लेने) के बाद अथवा शत्रु की सेना को नित्य शत्रु के द्वारा भय की शङ्का न मानकर बेखबर सोई हुई अथवा ज्यादा जागते रहने से क्लान्त हुई देखकर स्वयं बड़ी सावधानी के साथ उसका विनाश कर देवे ।

तत्सहायबलं नैव व्यसनाप्तमपि क्वचित् ।
विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र-सेना की रक्षा करने का निर्देश— और शत्रु की सहायता करने के लिये आई हुई किसी मित्र-सेना को कहीं

२५ शु०

३८६शुक्रनीतिः

व्यसन में पड़ी हुई देखकर भी नष्ट न करे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला ले ।

स्वसमीपतरं राज्यं नान्यस्माद् ग्राहयेत् क्वचित् ॥ ३७३ ॥

**राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश—**और अपने अत्यन्त समीपवर्ती राज्य को किसी दूसरे के द्वारा हड़प न करने दे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला रहने दे ।

क्षणं युद्धाय सज्जेत क्षणं चापसरेत् पुनः ।
अकस्मान्निपतेद् दूराद्दस्युवत् परितः सदा ॥ ३७४ ॥

क्षणभर में अचानक युद्ध के लिये उद्यत हो जाय फिर क्षणभर में युद्ध से विरत हो जाय और पुनः दूर से एकाएक डाकुओं की भांति आकर चारो तरफ से धावा बोल दे !

रूप्यं हेम च कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ।
दद्यात् कार्यानुरूपं च हृष्टो योधान् प्रहर्षयन् ॥ ३७५ ॥

और यदि कोई सैनिक कभी चाँदी, सोना और इनके अतिरिक्त तांबा आदि जो भी जीत कर लावे तो अन्य सैनिकों को प्रसन्न करता हुआ प्रसन्न चित्त से कार्यानुरूप उसी (सैनिक) को उक्त धन को देवे ।

विजित्य च रिपूनेवं समादद्यात् करं तथा ।
राज्यांशं वा सर्वराज्यं नन्दयीत ततः प्रजाः ॥ ३७६ ॥

**शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश—**इस प्रकार से राजा शत्रु को जीत कर योग्यतानुसार उससे कर (मालगुजारी) ग्रहण करे । और कभी २ योग्यतानुसार शत्रु के राज्य का आधा अंश या संपूर्ण राज्य का ही अपहरण कर ले फिर शत्रु की प्रजा को हर प्रकार से प्रसन्न रक्खे ।

तूर्यमङ्गलघोषेण स्वकीयं पुरमाविशेत् ।
तत्प्रजाः पुत्रवत् सर्वाः पालयीतात्मसात्कृताः ॥ ३७७ ॥
नियोजयेन्मन्त्रिगणमपरे मन्त्रचिन्तने ।

**विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश—**उसके बाद तुरही आदि बाजों के मङ्गलमय घोष (शब्द) के साथ अपनी राजधानी में विजय से लौट कर पुनः प्रवेश करे । और अपने अधीन बना ली गई शत्रु की सारी प्रजा को पुत्र की भांति पालन करे । और वहां पर (जीते हुये राज्य में) मन्त्रचिन्तन (सलाह देने) के लिये प्राचीन मन्त्रिमण्डल को हटाकर नया मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति कर देवे ।

देशे काले च पात्रे च ह्यादिमध्यावसानतः ॥ ३७८ ॥

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८७

भवेन्मन्त्रफलं कीदृगुपायेन कथं त्विति ।
मन्त्र्याद्यधिकृतः कार्यं युवराजाय बोधयेत् ॥ ३७९ ॥

**मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश—**देश, काल तथा पात्र में एवं आदि, मध्य तथा अन्त में, किस उपाय से मन्त्र का कैसा फल होगा, इन सबों के विचार करने के लिये नियुक्त मन्त्री आदि अधिकारी पुरुष किसी कार्य को प्रथम युवराज के समक्ष ले जाकर उपस्थित करें ।

पश्चाद्राज्ञे तु तैः सार्कं युवराजो निवेदयेत् ।
राजा संशासयेदादौ युवराजं तवस्तु सः ॥ ३८० ॥
युवराजो मन्त्रिगणान् राजाग्रे तेऽधिकारिणः ।
सदसत् कर्म राजानं बोधयेद्धि पुरोहितः ॥ ३८१ ॥

तत्पश्चात् उन सबों को साथ में लेकर युवराज उसी कार्य के विषय में राजा से निवेदन करे । और राजा उस पर प्रथम युवराज के पास अपना आदेश लिखकर भेजे, उसके बाद युवराज मन्त्रिगणों को उक्त राजा का आदेश बतावें । और उक्त सभी अधिकारी वर्ग जो कुछ भला या बुरा कार्य हो उसको राजा के आगे उपस्थित होकर समझावें एवं पुरोहित भी इसी भांति राजा को समझावे ।

ग्रामाद्बहिः समीपे तु सैनिकान् धारयेत् सदा ।
ग्राम्यसैनिकयोर्न स्यादुत्तमर्णाधमर्णता ॥ ३८२ ॥

**ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के ठिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश—**ग्राम (बस्ती) के बाहर किन्तु समीप में ही राजा सदा सैनिकों को रक्खे । किन्तु ग्रामीण तथा सैनिकों का परस्पर लेन-देन का व्यवहार नहीं होना चाहिये ।

सैनिकार्थं तु पण्यानि सैन्ये सन्धारयेत् पृथक् ।
नैकत्र वासयेत् सैन्यं वत्सरं तु कदाचन ॥ ३८३ ॥

सैनिकों के लिये सेना की छावनी के अन्दर सामान खरीदने के लिये पृथक् दूकान लगवानी चाहिये । और एक ही स्थान पर सालभर तक कभी भी किसी सेना को नहीं रहने देना चाहिये ।

सेनासहस्रं सज्जं स्यात् क्षणात् संशासयेत्तथा ।
संशासयेत् स्वनियमान् सैनिकानष्टमे दिने ॥ ३८४ ॥

**१००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश—**१०३० एक हजार सैनिकों वाली भी सेना को इस भांति से शिक्षा देनी चाहिये कि जिससे आदेश पाने पर वह एक क्षण में ही युद्ध के लिये अपने को सुसज्जित कर लें । अर्थात् इतनी सेना हर वक्त तैयार खड़ी रहें । और हर आठवें दिन (सप्ताह) आने

३८८ शुक्रनीतिः

पर अथवा दिन के आठवें भाग में (शाम को ४ बजे के लगभग) सैनिकों को उनके लिये नियत नियमों की शिक्षा देनी चाहिये।

चण्डत्वमाततायित्वं राजकार्ये विलम्बनम्।
अनिष्टोपेक्षणं राज्ञः स्वधर्मपरिवर्जनम् ॥ ३८५ ॥
त्यजन्तु सैनिका नित्यं संल्लापमपि वाऽपरैः।
नृपाज्ञया बिना ग्रामं न विशेयुः कदाचन ॥ ३८६ ॥

**सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म—**जैसे अत्यन्त कोप करना, आततायीपन का कार्य करना, राज-कार्य करने में देरी करना, राजा के अनिष्ट होने की उपेक्षा करना, अपने धर्म का त्याग करना, और दूसरों के साथ बातचीत करना, इन सबों को सैनिक नित्य ही छोड़ दिया करें। और बिना राजा की आज्ञा के कभी भी किसी ग्राम के अन्दर प्रवेश न करें।

स्वाधिकारिगणस्यापि ह्यपराधं दिशन्तु नः।
मित्रभावेन वर्तेध्वं स्वामिकृत्ये सदाऽखिलैः ॥ ३८७ ॥

**सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म—**और अपने २ अधिकारी गणों द्वारा किये गये अपराधों को मुझ (राजा) से कहें। स्वामी (राजा) के किसी कार्य के उपस्थित होने पर उसे सब लोग मित्र भाव से परस्पर मिलकर सदा किया करें।

सूज्ज्वलानि च रक्षन्तु शस्त्रास्त्रवसनानि च।
अन्नं जलं प्रस्थमात्रं पात्रं बह्वन्नसाधकम् ॥ ३८८ ॥

और अपने २ शस्त्र, अस्त्र तथा पात्रों को खूब साफ रक्खें, एवं अपने पास अन्न तथा जल एक-एक प्रस्थ (सेर १) भर और अन्न पकाने का पात्र बड़ा रक्खें, जिसमें प्रस्थ भर से अधिक अन्न पकाया जा सके।

शासनादन्यथाचारान् विनेष्यामि यमालयम्।
भेदायिता रिपुधनं गृहीत्वा दर्शयन्तु माम् ॥ ३८९ ॥

**आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश—**मेरी इन आज्ञाओं के विरुद्ध आचरण करनेवालों को मैं यमपुरी पहुँचा दूंगा (मार डालूंगा)। और जो शत्रु से धन लेकर मुझसे फूट कर उससे मिल गये हों, उन सैनिकों को पकड़ लाकर मुझे दिखायें, मैं उन्हें मृत्यु दण्ड दूंगा।

सैनिकैरभ्यसेन्नित्यं व्यूहाद्यनुकृतिं नृपः।
तथाऽयनेऽयने लक्ष्यमस्त्रापातैर्विभेदयेत् ॥ ३९० ॥

**सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश—**राजा प्रतिदिन सैनिकों द्वारा व्यूह-रचना करने का अभ्यास करावे, तथा प्रत्येक

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८६

अयनपर ( ६-६ महीने पर ) अथवा प्रत्येक मार्ग से बाणादि अस्त्र प्रहार द्वारा लक्ष्य का भेदन ( चाँद मारी ) करावें ।

सायं प्रातः सैनिकानां कुर्यात् सङ्गणनं नृपः।
जात्याकृतिवयोदेशग्राममावासान् विमृश्य च ॥ ३९१ ॥

प्रातःसायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश— राजा प्रतिदिन सायं-प्रातः सैनिकों की गणना भली भाँति करे, जिसमें साथ २ प्रत्येक सैनिकों की जाति, आकार, अवस्था, देश तथा ग्राम में निवास का पूर्ण विचार भी हो ।

कालं भृत्यवधिं देयं दत्तं भृत्यस्य लेखयेत् ।

और नौकरी की सीमा रूप काल ( नौकरी कब प्रारम्भ की ), देय ( मासिक या वार्षिक वेतन पाने का प्रमाण ), दत्त ( दिया हुआ वेतन का प्रमाण ) इन सबों को विचार कर लिख ले ।

कति दत्तं हि भृत्येभ्यो वेतनं पारितोषिकम् ॥ ३९२ ॥
तत्प्राप्तिपत्रं गृह्णीयाद् दद्याद् वेतनपत्रकम् ।

भृत्यों के प्राप्ति-पत्र को ग्रहण कर वेतन-पत्र देने का निर्देश— और नौकरों के लिये कितनी तनखाह या इनाम दिया गया है, इसको पाने के लिये लिखे हुये आप्तपत्र को लेकर उसको वेतन या पारितोषिक चुकताकर देने की रसीद दे देवें ।

सैनिकाः शिक्षिता ये ये तेषु पूर्णा भृतिः स्मृता ॥ ३९३ ॥
व्यूहाभ्यासे नियुक्ता ये तेष्वर्धां भृतिमावहेत् ।

शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश— जो २ सैनिक शिक्षित हो चुके हों उनको पूरा वेतन देना चाहिये । और जो अभी व्यूह ( कवायद ) के अभ्यास करने में लगे हुये ( सीख रहे ) हैं उनको आधा वेतन देना चाहिये ।

असत्कर्त्राश्रितं सैन्यं नाशयेच्छत्रुयोगतः ॥ ३९४ ॥

शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश— शत्रु से मिलकर जो सेना बुराई कर रही है, उसे नष्ट कर दे ।

नृपस्यासद्गुणरताः के गुणद्वेषिणो नराः।
असद्गुणोदासीनाः के हन्यात्तान् विमृशन्नृपः ॥ ३९५ ॥
सुखासक्तांस्त्यजेद् भृत्यान् गुणिनोपि नृपः सदा ।

मार डालने या त्याज्य नौकरों के लक्षण— नौकरों में कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने वाले हैं और कौन उनके सद्गुणों से द्वेष रखनेवाले हैं एवं कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने पर उपेक्षा रखते हैं, इन सबों

३९० | शुक्रनीतिः

का भली प्रकार से विचार करके उन सबों को राजा मार डाले। और राजा सदा सुख भोगने में आसक्त रहनेवाले ऐसे गुणवान नौकरों को भी निकाल देवें ( न रखे )

सुस्वान्तलोकविश्वस्ता योज्यास्त्वन्तःपुरादिषु ॥ ३९६ ॥
धार्याः सुस्वान्तविश्वस्ता धनादिव्ययकर्मणि ।

अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण—अच्छे अन्तःकरणवाले एवं लोक में विश्वास करने योग्य पुरुषों को रनिवास ( महल ) आदि में एवं ऐसे ही लोगों को धनादि के व्यय-कार्य ( खजाञ्ची के कार्य ) में नौकर रक्खें।

तथा हि लोकविश्वस्तो बाह्यकृत्ये नियुज्यते ॥ ३९७ ॥
अन्यथा योजितास्ते तु परिवादाय केवलम् ।

और लोक में विश्वास के पात्र जो हों उन्हें ही राजकार्य में नियुक्त करे। इससे अन्यथा ( अविश्वासी ) पुरुष नियुक्त किये जाने पर वे केवल निन्दा करानेवाले होते हैं। ( उनसे कार्य नहीं हो पाता है )।

शत्रुसम्बन्धिनो ये ये भिन्ना मन्त्रिगणादयः ॥ ३९८ ॥
नृपदुर्गुणतो नित्यं हृतमाना गुणाधिकाः ।
स्वकार्यसाधका ये तु सुभृत्या पोषयेच्च तान् ॥ ३९९ ॥

अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण—शत्रुसम्बन्धी जो जो मन्त्रिगण आदि फोड़ लिये गये हों या शत्रु राजा के दुर्गुणों से अधिक गुणवान होते हुये भी जिनके सम्मान छीन लिये गये हों किन्तु अपने कार्य को सिद्ध करनेवाले हों तो ऐसे लोगों को अच्छी वेतन देकर राजा को पालन-पोषण करना चाहिये।

लोभेनासेवनाद्भिन्नास्तेष्वर्धां भृतिमावहेत् ।
शत्रुत्यक्तान् सुगुणिनः सुभृत्या पालयेन्नृपः ॥ ४०० ॥

शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार—जो लोभ के वशीभूत होकर सेवा-कार्य को उपेक्षा भाव से करते हैं ऐसे शत्रु के फोड़ लिये गये भृत्यों को वेतन आधा दे। और शत्रु से निकाले गये सुन्दर गुणवान पुरुषों को अच्छा वेतन देकर राजा पालन करे।

परराष्ट्रे हृते दद्याद् भृतिं भिन्नावधिं तथा ।
दद्यादर्द्धां तस्य पुत्रे स्त्रियै पादमितां किल ॥ ४०१ ॥

राज्य-च्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश—यदि किसी राजा का राज्य छीन ले तो उसे बिना किसी काल की सीमा निश्चित किये ही जागीर आदि जीविकार्थ दे दें। और उसके पुत्र के लिये आधा तथा स्त्री के लिये राजा का चतुर्थांश वृत्ति निश्चित कर दें।