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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

षष्ठांशेनाधिका ग्रीवा द्विगुणा सुप्रसारिता ।
मुखतश्चोच्छ्रिता सार्धपादहीना तु पूर्वतः ॥ ५२ ॥
स्कन्धादि मुष्कमूलान्तं ग्रीवातुल्यं तु तत्र हि ।
द्व्यंशषष्ठं त्रिकं यावत् शेषमंसं प्रकल्पयेत् ॥ ५३ ॥
मुखार्धं पुच्छदण्डं च शिश्न आण्डौ तदर्धकौ ।
कर्णः षडङ्गुलो दीर्घश्चतुःपञ्चाङ्गुलः क्वचित् ॥ ५४ ॥

सुविस्तृत ग्रीवा लम्बाई में मुख की अपेक्षा षष्ठांश अधिक दुगुनी होती है तथा मुख से साढ़े चौथाई हीन उन्नत होती है । उसमें घोड़ों में स्कन्ध से लेकर अण्डकोष के मूल पर्यन्त लम्बाई ग्रीवा के तुल्य होती है । पृष्ठवंश (रीढ़) के (अधोभाग तक शेष भाग स्कन्ध की लम्बाई ग्रीवा के ) दो अंश और षष्ठ भाग तुल्य होती है । पुच्छदण्ड और शिश्न की लम्बाई मुख की आधी होती है, दोनों अण्डकोषों की लम्बाई शिश्न की आधी होती है । कर्ण की लम्बाई ६ अंगुल की होती है और कहीं २ चार या पांच अंगुल की भी होती है ।

परिणाहः शफस्योक्तो मुखार्धेनाङ्गुलाधिकः ।
तदर्धो मणिबन्धस्य जङ्घायाः परिधिः स्मृतः ॥ ५५ ॥
दशैकाङ्गुलपरिधी रम्योरूः कीर्त्तिता बुधैः ।
पृष्ठोरुपरिधिर्मूले त्रिः षष्ठांशो मुखेषु च ॥ ५६ ॥
बहिरन्तर्धनुःखण्डसदृशा शरभोन्मजा ।
मणिबन्धमणेर्ज्ञेयः परिधिश्च नवाङ्गुलः ॥ ५७ ॥
अन्त्यजङ्घादिपरिधिर्विज्ञेयः पूर्ववद् बुधैः ।

खुर का विस्तार एक अंगुल अधिक मुख के परिमाण का आधे भाग का होता है । और मणिबन्ध और जंघा की परिधि उसकी आधी होती है । रमणीय ऊरु की परिधि ११ अंगुल परिमित पण्डितों ने कही है । पीछे की ऊरु की परिधि मूल भाग में ३ अंगुल परिमित और अग्रभाग में षष्ठ अंश परिमित होती है । मणिबन्ध की चिह्न विशेष मणि की परिधि नव अंगुल की होती है और अन्तिम जंघा आदि की परिधि पूर्ववत् पण्डितों को जानना चाहिये ।

अक्ष्णोरन्तरे चिह्नमङ्गुलं पक्ष्ममूलयोः ॥ ५८ ॥
सार्धाङ्गुलं सटास्थानं ग्रीवोपरि सुविस्तृतम् ।
शिरोमणिं समारभ्य दीर्घं स्कन्धान्तमुत्तमम् ॥ ५९ ॥
अधोगमा सटा कार्या हस्तमात्रायता शुभा ।
सार्धहस्ता द्विहस्ता वा पुच्छबालाः सुशोभनाः ॥ ६० ॥

३३६ शुक्रनीतिः

और दोनों ऊरुओं के मध्य में पार्श्वमूलों का चिह्न अंगुल परिमित होता है। ग्रीवा के ऊपर सुविस्तृत शिरोमणि से लेकर स्कन्ध पर्यन्त प्रधान सटा (अयाल) का स्थान डेढ़ अंगुल लम्बा है। और (मूर्ति में) नीचे की ओर लटकती हुई हाथभर की लम्बी शुभ सटा (अयाल) करनी चाहिये। और पूंछ के बाल डेढ़ हाथ या दो हाथ लम्बे शोभन करने चाहिये।

सप्ताष्टनवदशभिरङ्गुलैः कर्णदीर्घता।
तथा तद्विस्तृतिर्ज्ञेया त्र्यङ्गुला चतुरङ्गुला ॥ ६१ ॥
न स्थूला नापि चिपिटा ग्रीवा मयूरसन्निभा।
ग्रीवाप्रपरिधिस्तुल्यो मुखेनाधिकमुष्टिकः ॥ ६२ ॥
ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्विगुणो विदशाङ्गुलः।
तृतीयांशविहीनं तु सत्क्रोडं वक्ष ईरितम् ॥ ६३ ॥

और कर्ण की लम्बाई ७, ८, ९ या १० अंगुल परिमित की होनी चाहिये और उसकी चौड़ाई ३ या ४ अंगुल की होनी चाहिये। और न मोटी, न चिपटी, मयूर के समान ग्रीवा होनी चाहिये। ग्रीवा के अग्रभाग की परिधि मुख के परिमाण से एक मुष्टि अधिक होनी चाहिये। ग्रीवामूल की परिधि मुख के परिमाण से १० अंगुल कम दुगुना होना चाहिये। और उत्तम उत्संगवाला वक्षःस्थल का मान मुख के मान से तृतीयांश कम कहा हुआ है।

नेत्रोपरि परीणाहो मुखेनाष्टाङ्गुलाधिकः।
नासिकोपरि नेत्राधो मुखस्य परिधिस्तु यः ॥ ६४ ॥
तृतीयांशविहीनेन मुखेन सदृशो भवेत्।
द्व्यङ्गुलं नेत्रविस्तृतिस्त्र्यङ्गुला तस्य दीर्घता ॥ ६५ ॥
अर्धाङ्गुलाधिका वापि विस्तृतिर्दीर्घताङ्गुला।
मुखतृतीयांशमेतदूर्वोर्मध्येऽन्तरं स्मृतम् ॥ ६६ ॥
नेत्राग्रयोरन्तरं तु पञ्चमांशं मुखस्य हि।
कर्णयोरन्तरं तद्वत् कर्णनेत्रान्तरं तथा ॥ ६७ ॥

नेत्र के ऊपर का विस्तार मुख के मान के तुल्य होता है किन्तु ८ अंगुल अधिक होता है। नासिका के ऊपर और नेत्र के नीचे जो मुख की परिधि है वह तृतीयांशहीन मुख के मान के तुल्य होती है। नेत्र के विस्तार का मान २ अंगुल एवं नेत्र की लम्बाई का मान ३ अंगुल का होता है अथवा नेत्र का विस्तार आधा अंगुल अधिक अर्थात् ढाई अंगुल मान का और लम्बाई एक अंगुल अधिक अर्थात् तीन अंगुल की होनी चाहिये। ऊरुओं के मध्य में यह अन्तर मुख का तृतीयांश तुल्य होना चाहिये तथा नेत्र के दोनों अग्रभागों का

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३७

अन्तर मुख के पञ्चमांशतुल्य होना चाहिये । दोनों कर्णों का अन्तर भी सदृश तथा कर्ण और नेत्र का अन्तर भी उसी प्रकार से होता है ।

भूस्थयोः शफयोः प्रोक्तं तदेतत् कर्णसंमितम् ।
मणिनेत्रप्रान्तरं च भ्रुवोरन्तरमेव हि ॥ ६८ ॥
सक्थ्यङ्गुलं तृतीयांशं नासानेत्रान्तरं तथा ।
त्रिभागपूरणं प्रोथः सोष्ठश्च परिकीर्तितः ॥ ६९ ॥
नासारन्ध्रान्तरं चैव तद्-दैर्घ्येनवमांशकम् ।
कायो नरार्धविस्तारस्त्रिके हृदयसंमितः ॥ ७० ॥
चतुर्थांशं तु हृदयं बाहुमूलादधः स्मृतम् ।
षष्ठांशमन्तरं बाह्वोर्हृत्समीपे प्रकीत्तितम् ॥ ७१ ॥

और भूमिस्थित दोनों खुरों का जो यह अन्तर है वह कर्ण के मान के तुल्य कहा हुआ है । मणि और नेत्र का अन्तर, दोनों भौंहों का अन्तर तथा नासिका और नेत्र का अन्तर सक्थि (ऊरु) के अंगुलों का तृतीयांश तुल्य मान समझना चाहिये । और ओष्ठ के सहित मुख का अग्रभाग मुख के मान के तृतीयांशतुल्य कहा हुआ है । तथा दोनों नासिकाओं के छिद्रों का अन्तर उन दोनों की लम्बाई के मान के तृतीयांश तुल्य मानवाला होता है । शरीर मनुष्य के विस्तार से आधा विस्तारवाला, पृष्ठवंश (रीढ़) के नीचे भाग में हृदय (वक्षस्थल) के समान विस्तार होता है तथा हृदय बाहुमूल के नीचे चतुर्थांश तुल्य कहा हुआ है । हृदय के समीप में दोनों बाहुओं का अन्तर षष्ठांश तुल्य होता है ।

अधरोष्ठोऽनुचिबुकं सार्धाङ्गुलमथोन्नतम् ।
शोभते चोन्नतग्रीवो नतपृष्ठः सदा हयः ॥ ७२ ॥
यद्रूपं कर्तुमुद्युक्तस्तद्विम्बं वीक्ष्य सर्वतः ।
अदृष्ट्वा कस्य यद्रूपं न कर्तुं क्षमते हि तत् ॥ ७३ ॥
शिल्प्यग्रे वाजिनं ध्यात्वा कुर्यादवयवानतः ।
दिशाऽनया च विभूतेः सर्वमानानि वाजिनाम् ॥ ७४ ॥

अधरोष्ठ चिबुक तक डेढ़ अंगुल उन्नत होता है । और घोड़ा सदा उन्नत ग्रीवा तथा नत पृष्ठवाला शोभायमान होता है । जिसकी आकृति बनाने के लिये जो उद्यत हो वह सब तरफ से देखकर उसके बिम्ब (प्रतिकृति) को करे । किसी का जो रूप हो उसको बिना देखकर उसकी प्रतिकृति बनाने के लिये कोई समर्थ नहीं हो सकता है । अतः शिल्पी (मूर्तिकार) प्रथम घोड़े का ध्यान कर पश्चात् उसके अङ्गों को बनावे । इसी रीति से घोड़ों के अवयवों के सभी मानों की कल्पना करे ।

२२ शु०

३३८शुक्रनीतिः

श्मश्रुहीनमुखः कान्तः प्रगल्भोत्तुङ्गनासिकः ।
दीर्घोद्धतग्रीवमुखो ह्रस्वकुक्षिखुरश्रुतिः ॥ ७५ ॥
तुरप्रचण्डवेगश्च हंसमेघसमस्वनः ।
नातिक्रूरो नातिमृदुर्देवसत्त्वो मनोरमः ॥ ७६ ॥

उत्तम अश्व के अन्य लक्षण— जिस घोड़े के मुख पर बाल न हों एवं सुन्दर मुख तथा शब्द हो और नासिका ऊंची हो, तथा गर्दन और मुख लम्बे एवं कुछ उठे हुये हों, पेट, खुर एवं कान छोटे हों, अत्यन्त शीघ्र और प्रचण्ड वेग हो, हंस तथा मेघ के समान शब्द हो और स्वभाव न अत्यन्त क्रूर तथा न अत्यन्त मृदु ही हो, देवताओं के घोड़ों के समान उत्तम पराक्रम हो—ऐसा घोड़ा मन को मोहित करनेवाला अतएव उत्तम होता है ।

सुकान्तिगन्धवर्णश्च सद्गुणभ्रमरान्वितः ।
घोड़ों की कान्ति, गन्ध और वर्ण सुन्दर एवं अच्छे गुणवाले भौंरी ( भ्रमर ) होनी चाहिये ।

भ्रमरस्तु द्विधावर्त्तो वाम-दक्षिणभेदतः ॥ ७७ ॥
पूर्णोऽपूर्णः पुनर्द्वेधा दीर्घो ह्रस्वस्तथैव च ।

अश्व के भौंरी के दो भेद— और भौंरी का घुमाव वाम तथा दक्षिण भेद से दो प्रकार का होता है पुनः प्रत्येक के पूर्ण तथा अपूर्ण एवं दीर्घ और ह्रस्व भेद से दो २ प्रकार होते हैं ।

स्त्रीपुंदेहे वामदक्षौ यथोक्तफलदौ क्रमात् ॥ ७८ ॥

घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल— उक्त भौंरियां तभी यथोक्त उत्तम फल देनेवाली होती हैं जब कि वे क्रम से घोड़ी के बाएँ तथा घोड़े के दाहिनी ओर हों ।

न तथा विपरीतो तु शुभाशुभफलप्रदौ ।

अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश— यदि उक्त प्रकार से विपरीत हों अर्थात् उक्त स्थान ( दायें-बायें ) से अन्यत्र कहीं पर हों तो शुभ या अशुभ कोई फल नहीं देनेवाली होती है ।

नीचोर्ध्वतिर्यङ्मुखतः फलभेदो भवेत्तयोः ॥ ७९ ॥

भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद— यदि भौंरियों का मुख नीचा, ऊंचा या तिरछा हो तो तदनुसार फल में भी भेद हो जाता है ।

शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-वेदि-स्वस्तिकसन्निभः ।
प्रासादतोरणधनुःसुपूर्णकलशाकृतिः ॥ ८० ॥
स्वस्तिकस्रङ्मीनखड्गश्रीवत्साभः शुभ्रो भ्रमः ।

शुभ भौंरी के लक्षण— भौंरी शंख, चक्र, गदा, पद्म, वेदी या स्वस्तिक

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३९

(卐), के चिह्न की किंवा प्रासाद, तोरण, धनुष या पूर्ण कलश के आकार की होती है और स्वस्तिक, माला, मत्स्य, खङ्ग तथा श्रीवत्स के समान आकारवाली भौंरी शुभ मानी जाती है।

नासिकाग्रे ललाटे च शङ्खे कण्ठे च मस्तके ॥ ८१ ॥
आवर्त्तॊ जायते येषां ते धन्यास्तुरगोत्तमाः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता—**जिन घोड़ों की नासिका के अग्रभाग, ललाट, शङ्ख (कनपटी), कण्ठ या मस्तक में भौंरो हो वे धन्य तथा घोड़ों में 'उत्तम' माने जाते हैं।

हृदि स्कन्धे गले चैव कटिदेशे तथैव च ॥ ८२ ॥
नाभौ कुक्षौ च पार्श्वाग्रे मध्यमाः संप्रकीर्तिताः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमत्ता—**जिनके हृदय, स्कन्ध (कन्धा), गळा, कमर, नाभि, कुक्षि (उदर) तथा पार्श्व के अग्रभाग में भौंरी होती है वे घोड़े 'मध्यम' माने जाते हैं।

ललाटे यस्य चावर्त्तद्वितयस्य समुद्भवः ॥ ८३ ॥
मस्तके च तृतीयस्य पूर्णहर्षोऽश्व उत्तमः ।

**'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिसके ललाट में दो भौरियां हों और तीसरी मस्तक में हों वह 'पूर्णहर्ष' (पूर्ण हर्ष देनेवाला) उत्तम अश्व माना जाता है।

पृष्ठवंशे यदावर्त्तो यस्यैकः संप्रजायते ॥ ८४ ॥
स करोत्यश्वसंघातान् स्वामिनः सूर्यसंज्ञकः ।

**'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिस अश्व के पृष्ठवंश (रीढ़) के ऊपर एक भौंरी हो वह 'सूर्यसंज्ञक' कहा जाता है एवं वह अपने स्वामी के यहां आने पर बहुत से घोड़ों को एकत्र कर देता है।

त्रयो यस्य ललाटस्था आवर्त्तास्तिर्यगुत्तराः ॥ ८५ ॥
त्रिकूटः स परिज्ञेयो वाजिवृद्धिकरः सदा ।

**अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के ललाट में तीन भौरियां हों और तिरछे मुखवाली हों तो उसे 'त्रिकूट' संज्ञक कहते हैं, जो सदा स्वामी के यहां घोड़ों की वृद्धि करनेवाला होता है।

एवमेव प्रकारेण त्रयो ग्रीवां समाश्रिताः ॥ ८६ ॥
समावर्त्ताः स बाजीशो जायते नृपमन्दिरे ।

**अन्य भौरियों से युक्त अश्वों के लक्षण—**इसी तरह से यदि अश्व की ग्रीवा में ३ भौरियां हों तो वह अश्व श्रेष्ठ राजमन्दिर में ही रहता है अर्थात् ऐसा यदि किसी के पास रह जाय तो स्वामी को राजा बना दे।

३४० शुक्रनीतिः

कपोलस्थौ यदावर्त्तौ दृश्येते यस्य वाजिनः ॥ ८७ ॥
यशोवृद्धिकरौ प्रोक्तौ राज्यवृद्धिकरौ मतौ ।
एको वाऽथ कपोलस्थो यस्यावर्त्तः प्रदृश्यते ॥ ८८ ॥
सर्वनामा स विख्यातः स इच्छेत् स्वामिनाशनम् ।

यशोवर्द्धक तथा 'सर्व' संज्ञक अश्व के लक्षण— यदि किसी अश्व के दोनों कपोलों पर दो भौरियां हों तो स्वामी के लिये वे दोनों यश तथा राज्य की वृद्धि करनेवाली मानी गई हैं । जिस अश्व के एक ही कपोल पर एक ही भौरी हो वह 'सर्व' संज्ञक होता है तथा स्वामी का नाश चाहता है ।

गण्डसंस्थो यद्यावर्त्तो वाजिनो दक्षिणाश्रितः ॥ ८९ ॥
स करोति महासौख्यं स्वामिनः शिवसंज्ञकः ।
तद्वामाश्रितः क्रूरः प्रकरोति धनक्षयम् ॥ ९० ॥

शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण— जिसके दक्षिण गण्डस्थल पर एक भौंरी हो वह 'शिव' संज्ञक अश्व स्वामी के लिये महा सुखकारी होता है । इसी प्रकार से बायें गण्डस्थल पर यदि भौंरी हो तो वह अश्व 'क्रूर' संज्ञक होता है तथा धनक्षयकारक होता है ।

इन्द्राख्यौ तावुभौ शस्तौ नृपराज्यविवृद्धिदौ ।

इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— यदि गण्डस्थल के दोनों ओर भौरियां पड़ी हों तो वे 'इन्द्र' संज्ञक होती हैं और उत्तम एवं राजा के राज्य की वृद्धि करनेवाली होती हैं ।

कर्णमूले यदावर्त्तौ स्तनमध्ये तथाऽपरौ ॥ ९१ ॥
विजयाख्यावुभौ तौ तु युद्धकाले यशःप्रदौ ।

विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— अश्व के कर्ण के मूल भाग में दो तथा स्तन के मध्य में दो भौरियां हों तो ये दोनों 'विजय' संज्ञक होती हैं और युद्ध काल में विजय दिलाने से यशप्रद होती हैं ।

स्कन्धपार्श्वे यदावर्त्तौ स भवेत् पद्मैलक्षणः ॥ ९२ ॥
करोति विविधान् पद्मान् स्वामिनः सततं सुखम् ।

पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— दोनों स्कन्ध के पार्श्व भाग में यदि भौंरी हों तो उसे 'पद्म' संज्ञक कहते हैं । ऐसा अश्व स्वामी के सुख की सदा वृद्धि करता है एवं विविध प्रकार से पद्मसंख्यक धन का आगमन कराता है ।

नासामध्ये यदावर्त्त एको वा यदि वा त्रयम् ॥ ९३ ॥
चक्रवर्ती स विज्ञेयो वाजी भूपालसंज्ञकः ।

भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसकी नासिका के मध्य में

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४१

यदि १ या ३ भौरियां हों तो वह 'भूपाल' संज्ञक अश्व होता है जो स्वामी को चक्रवर्ती राजा बना देता है ।

कण्ठे यस्य महावर्त्त एकः श्रेष्ठः प्रजायते ॥ ६४ ॥
चिन्तामणिः स विज्ञेयश्चिन्तितार्थसुखप्रदः ।

चिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसके कण्ठ में श्रेष्ठ एक बड़ी-सी भौंरी हो वह अश्व 'चिन्तामणि' संज्ञक होता है जो अभिलषित अर्थ तथा सुख को देनेवाला होता है ।

शुक्लाख्यौ भालकण्ठस्थौ आवर्तौ वृद्धिकीर्तिदौ ॥ ६५ ॥

शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिस अश्व के ललाट तथा शंख देश में जो भौरियां होती हैं वे दोनों 'शुक्ल' संज्ञक होती हैं और राज्य-धनादि की वृद्धि तथा कीर्ति को देनेवाली होती हैं ।

यस्यावर्त्तौ वक्त्रगतौ कुद्यन्ते वाजिनो यदि ।
स नूनं मृत्युमाप्नोति कुर्याद् वा स्वामिनाशनम् ॥ ६६ ॥

अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण— जिस अश्व के कुक्षि के अन्त भाग में यदि टेढ़ी दो भौरियां हों तो वह निश्चय स्वयं मर जाय या अपने स्वामी का नाश करे ।

जानुसंस्था यदावर्त्तः प्रवासक्लेशकारकाः ।
वाजिमेढ़े यदावर्त्तो विजयश्रोविनाशनः ॥ ६७ ॥

जिस अश्व के जानुओं ( घुट्टों ) पर ३ भौरियां हों, उनसे स्वामी को परदेश में विशेष क्लेश होता है । घोड़े के यदि लिङ्ग में भौंरी हो तो वह विजय और श्री ( लक्ष्मी ) का नाशक होता है ।

त्रिकसंस्थो यदावर्त्तस्त्रिवर्गस्य प्रणाशनः ।
पुच्छमूले यदावर्त्तो धूमकेतुरनर्थकृत् ॥ ६८ ॥

धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण फल— जिसकी पीठ के त्रिकस्थान में भौंरी हो तो वह त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम ) का नाशक होता है । घोड़े के पूंछ के मूल में जो भौंरी हो, वह 'धूमकेतु' संज्ञक है तथा अनर्थकारक होता है ।

गुह्यपुच्छत्रिकावर्ती स कृतान्तो भयप्रदः ।

कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल— जिस घोड़े की गुदा, पूंछ तथा त्रिकस्थान में भौंरी हो वह 'कृतान्त' संज्ञक होता है जो कि भयदायक होता है ।

मध्यदण्डा पार्श्वगमा सैव शतपदी कचे ॥ ६९ ॥
अतिदुष्टाङ्गुष्ठमिता दीर्घा दुष्टा यथा यथा ।

घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल— जिसकी पूंछ दोनों पाश्र्वों की ओर जावे और मध्य में दण्ड के आकार का चिह्न हो एवं यह एक अंगुष्ठ बराबर लम्बा

३४२शुक्रनीतिः

हो तो उसे 'मध्यदण्डा' या 'शतपदी' कहते हैं यह अत्यन्त दुष्ट मानी जाती है। उसके बाद जैसे २ वह लम्बी होती जाती है वैसे २ उसकी दुष्टता नष्ट होकर शुभ फल देनेवाली होती जाती है ।

अश्रुपातो हनुगण्डहृद्गलप्रोथवस्तिषु ॥ १०० ॥
कटिशङ्खजानुमुष्क-ककुन्नाभिगुदेषु च ।
दक्षकुकौ दक्षपादे त्वशुभो भ्रमरः सदा ॥ १०१ ॥

**भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के हनु ( ठोढ़ी ), गण्डस्थल, हृदय, गला, प्रोथ ( मुखाग्रभाग ), बस्तिस्थान, कमर, शंख ( कनपटी ), जानु ( घोटू ), मुष्क ( अण्डकोश ), ककुद् ( पीठ पर उभरा हुआ स्थान ), नाभि, गुदा, में भौंरी हो तो अश्रुपातकारक होती है और दक्षिण कुक्षि या दक्षिण पेट में हो तो वह सदा अशुभ फल देनेवाली मानी जाती है।

गलमध्ये पृष्ठमध्ये उत्तरोष्ठेऽधरे तथा ।
कर्णनेत्रान्तरे वामकुक्षौ चैव तु पार्श्वयोः ॥ १०२ ॥
ऊरुषु च शुभावतौ वाजिनामग्रपादयोः ।

**आवत्तं भौरियों के शुभप्रद स्थानों का निर्देश—**अश्व के गले या पीठ के मध्य में, ऊपर या नीचे के ओष्ठ, कर्ण और नेत्र के मध्य में, बाईं कुक्षि, दोनों पार्श्व, दोनों ऊरु, या दोनों अगले पांवों में, भौरियाँ हों तो बड़ी शुभ देने वाली होती हैं।

आवर्तौ सान्तरौ भाले सूर्य्यचन्द्रौ शुभप्रदौ ॥ १०३ ॥
मिलितौ तौ मध्यफलौ ह्यतिलग्नौ तु दुष्फलौ ।

**सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश—**और भाल में यदि कुछ अन्तर पर दो भौरियाँ हो तो वे सूर्य-चन्द्र संज्ञक होती हैं तथा 'उत्तम' शुभ फल देने वाली होती हैं यदि कुछ सटी हुई हों तो 'मध्यम' शुभ फल देनेवाली एवं अत्यधिक सटी हुई हों तो 'दुष्ट' फल देनेवाली होती हैं।

आवर्तत्रितयं भाले शुभं चोर्ध्वं तु सान्तरम् ॥ १०४ ॥
अशुभं चातिसंलग्नमावर्त्तद्वितयं तथा ।
त्रिकोणत्रितयं भाले आवर्तानां तु दुःखदम् ॥ १०५ ॥
गलमध्ये शुभस्त्वेकः सर्वाशुभनिवारणः ।

**शुभाशुभ फलप्रद भौंरी के स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के भाल में ऊपर की ओर ३ भौरियां अलग २ हों तो शुभ फलप्रद होती हैं। यदि भाल में दो भौरियां अत्यन्त सटी हुई हों तो अशुभ फलप्रद होती हैं। और भाल में

चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४३

यदि त्रिकोणाकार ३ भौरियां हों तो दुःखप्रद होती हैं। गले के मध्य में यदि एक भौंरी हो तो वह शुभ फलप्रद और समस्त अशुभ फलों को दूर करने वाली होती है।

अधोमुखः शुभः पादे भाले चोर्ध्वमुखो भ्रमः ॥ १०६ ॥
न चैवात्यशुभा पृष्ठमुखी शतपदी मता।

पैर में अधोमुख एवं भाल में ऊर्ध्वमुख भौंरी शुभ होती है पीठ की ओर मुखवाली जो 'शतपदी' होती है वह अत्यन्त अशुभ फल देनेवाली नहीं होती है।

मेढ्रस्य पश्चाद् भ्रमरी स्तनी बाजी स चाशुभः ॥ १०७ ॥

और जिस अश्व के लिङ्ग के पीछे भौंरी या स्तन हो, वह अशुभ फलप्रद होता है।

भ्रमः कर्णसमीपे तु शृङ्गी चैकः स निन्दितः ।
ग्रीवोर्ध्वेपाश्र्वे भ्रमरी ह्येकरश्मिः स चैकतः ॥ १०८ ॥

**एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल—**जिस के कान के समीप में भौंरी होती है वह अश्व 'एकशृङ्गी' कहलाता है और निन्दित होता है। ग्रीवा के ऊपर पार्श्व में एक तरफ जो भौंरी होती है वह 'एकरश्मि' कहलाती है वह भी निन्दित होती है।

पादोर्ध्वमुखभ्रमरी कीलोत्पाटी स निन्दितः ।
शुभाशुभौ भ्रमौ यस्मिन्स वाजी मध्यमः स्मृतः ५ १०६ ॥

**कीलोत्पाटी व मध्यम आवत्तों के लक्षण व फल—**पैरों में यदि ऊर्ध्व मुख वाली भौंरी हो तो उसे 'कीलोत्पाटी' कहते हैं। वह निन्दित होता है। जिस अश्व में शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की भौरियां होती हैं, वह 'मध्यम' कहलाता है।

मुखे पत्सु सितः पञ्चकल्याणोऽश्वः सदा मतः ।
स एव हृदये स्कन्धे पुच्छे श्वेतोऽष्टमङ्गलः ॥ ११० ॥

**पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल—**जिसके मुख और चारों पैर सफेद हों, वह अश्व 'पञ्चकल्याण' संज्ञक सदा कहलाता है। यही सफेदी हृदय, स्कन्ध तथा पुच्छ में घोड़े को हो तो वह 'अष्टमङ्गल' संज्ञक होता है।

कर्णे श्यामः श्यामकर्णः सर्वतस्त्वेकवर्णभाक् ।
तत्रापि सर्वतः श्वेतो मेध्यः पूज्यः सदैव हि ॥ १११ ॥

**श्यामकर्ण अश्व के लक्षण—**यदि केवल कान ही मात्र कृष्ण वर्ण के हों और सर्वत्र कोई एक वर्ण हो तो वह अश्व 'श्यामकर्ण' संज्ञक होता है। और

३४४ | शुक्रनीतिः

जिस श्यामकर्ण घोड़े का सारा शरीर एक वर्ण का हो किन्तु वह श्वेत वर्ण हो तो वह अश्वमेध के योग्य होने से सदैव पूज्य होता है।

वैदूर्यसन्निभे नेत्रे यस्य स्तो जयमङ्गलः।
मिश्रवर्णस्त्वेकवर्णः पूज्यः स्यात् सुन्दरो यदि ॥ ११२॥
**जयमङ्गल अश्व के लक्षण—**जिस घोड़े की आंखें वैदूर्य मणि के समान कालापन युक्त सफेद हों वह 'जयमङ्गल' संज्ञक होता है। कोई भी घोड़ा चाहे अनेक वर्ण का या एक वर्ण का हो किन्तु देखने में सुन्दर हो तो वह पूज्य होता है।

कृष्णपादो हरिर्निन्यस्तथा श्वेतैकपादपि ।
रूक्षो धूसरवर्णश्च गर्दभामोऽपि निन्दितः ॥ ११३॥
जिस अश्व के पैर काले हों अथवा एक ही पैर सफेद हो किंवा जो रूप धूसर वर्ण का गदहे के समान हो वह निन्दित होता है।

कृष्णतालुः कृष्णजिह्वः कृष्णोष्ठश्च विनिन्दितः।
सर्वतः कृष्णवर्णो यः पुच्छे श्वेतः स निन्दितः ॥ ११४॥
जिसका तालु, जिह्वा और ओष्ठ कृष्ण वर्ण का हो अथवा सर्वत्र कृष्ण वर्ण का हो किन्तु पूंछ श्वेत वर्ण की हो तो वह निन्दित होता है।

उच्चैः पदन्यासगतिर्द्विपव्याघ्रगतिश्च यः।
मयूरहंसतित्तिरपारावतगतिश्च यः ॥ ११५॥
मृगोष्ट्रश्वानरगतिः पूज्यो वृषगतिर्हयः ।
**अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण—**जो अश्व ऊंचा पैर उठाकर चलता हो किंवा जिसकी चाल हाथी अथवा सिंह की सी हो और जिसकी मोर, हंस, तीतर, कबूतर, मृग, ऊँट या बैल की सी चाल हो तो वह पूज्य (श्रेष्ठ चालवाला) होता है।

अतिमुक्तोऽतिपीतोऽपि यथा सादी न पीड्यते ॥ ११६॥
श्रेष्ठा गतिस्तु सा ज्ञेया स श्रेष्ठस्तुरगो मतः।
घोड़े की वही चाल श्रेष्ठ कहलाती है कि जिससे अत्यन्त भोजन करके या अत्यन्त जल पीकर के भी सवारी करने पर सवार को कष्ट न मालूम पड़े। और वही घोड़ा श्रेष्ठ भी माना जाता है।

सुश्वेतभालतिलको विद्धो वर्णान्तरेण च ॥ ११७॥
स वाजी दलभञ्जी तु यस्य सैवातिनिन्दितः।
**निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के मस्तक का श्वेत तिलक अन्य वर्ण से मिश्रित भी हो तो वह 'दलभंजी' नामक कहा जाता है और वह तथा उसका स्वामी दोनों निन्दित माने जाते हैं।

चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४५

संहन्याद्वर्णजान् दोषान् स्निग्धवर्णो भवेद् यदि ॥ ११८ ॥

**स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश—**घोड़ा यदि स्निग्ध (चिकनाई लिये हुये) वर्ण का हो तो वर्ण से होनेवाले सारे दोषों को नष्ट कर डालता है ।

बलाधिकश्च सुगतिर्महान् सर्वाङ्गसुन्दरः ।
नातिक्रूरः सदा पूज्यो भ्रमाद्यैरपि दूषितः ॥ ११९ ॥

**आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण—**जो अधिक बलशाली, अच्छी चालवाला, ऊंचा, सर्वाङ्ग-सुन्दर, अत्यन्त बदमाश नहीं होने पर यदि भौंरी आदि दोषों से युक्त हो तो भी वह सदा पूजनीय होता है ।

वाजिनामत्यवहनात् सुदोषाः संभवन्ति हि ।
कृशो व्याधिपरीताङ्गो जायतेऽत्यन्तवाहनात् ॥ १२० ॥
अवाहितो भवेन्मन्दः सर्वकर्मसु निन्दितः ।
अपोषितो भवेत् क्षीणो रोगी चात्यन्तपोषणात् ॥ १२१ ॥

**अश्वों के कृशत्वादि दोष उत्पन्न होने के कारण—**यदि घोड़े अच्छे भी हों किन्तु अधिकतर सवारी न की जाय तो उसमें दोष उत्पन्न हो जाते हैं और अत्यन्त अधिक सवारी करने से भी घोड़े दुर्बल तथा रोगी हो जाते हैं अतः योग्यतानुसार उन्हें सवारी में लेना चाहिये । और बिना सवारी के भी घोड़े मन्द गतिवाले एवं किसी काम के नहीं रह जाते हैं । और बिना पौष्टिक खुराक के क्षीण तथा अधिक पौष्टिक भोजन कराने तथा तदनुरूप सवारी न करने से रोगी हो जाते हैं, अतः मात्रानुरूप खिलाना चाहिये ।

सुगतिर्दुर्गतिर्नित्यं शिक्षकस्य गुणागुणैः ।

**घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश—**घोड़े में शिक्षक के गुण तथा दोष के द्वारा ही नित्य अच्छी या बुरी चाल हो जाती है अर्थात् जैसा सिखानेवाला होता है वैसा घोड़ा बन जाता है ।

जान्वधश्चलपादः स्यादृजुकायः स्थिरासनः ॥ १२२ ॥
तुलाधृतखलीनः स्यात् काले देशे सुशिक्षकः ।
मृदुना नातितीक्ष्णेन कशाघातेन ताडयेत् ॥ १२३ ॥

**घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण—**घोड़े को सुन्दर रीति से सिखानेवाला सवार जानु (घुठनों) ओंसे नीचे पैर को हिलाता हुआ, शरीर को सीधा रक्खे हुये, स्थिर आसन से बैठकर तुला की भांति लगाम को पकड़े हुए, काल तथा देश के अनुसार न अत्यन्त कठिन और न अत्यन्त कोमल चाबुक की मार से घोड़े को मार कर सिखावे ।

ताडयेन्मध्यघातेन स्थाने स्वश्वं सुशिक्षकः ।

३४६
शुक्रनीतिः

हेषिते कक्षयोर्हन्यात् स्खलिते पक्षयोस्तथा ॥ १२४ ॥
भीते कर्णान्तरे चैव ग्रीवासून्मार्गगामिनि ।
कुपिते बाहुमध्ये च भ्रान्तचित्ते तथोदरे ॥ १२५ ॥
अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैर्नान्यस्थानेषु च कर्हिचित् ।

**अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश—**सुन्दर सिखानेवाला सवार अपने अच्छे घोड़ों को उचित स्थान पर चाबुक की मध्यम मार से मारे। जैसे यदि ज्यादा हिनहिनाता हो तो दोनों आँखों में, फिसलने पर दोनों बगलों में, डरने (भड़कने) पर दोनों कानों के बीच में, विपरीत मार्ग से चलने पर ग्रीवा में, दोनों अगले पैरों को उठाकर खड़ा होने पर आगे के पैरों के मध्य में, और भ्रान्त चित्त होने पर उदर में बुद्धिमान सवार घोड़े के मारे किन्तु अन्य स्थानों में कभी भी न मारे ।

अथवा हेषिते स्कन्धे स्खलिते जघनान्तरे ॥ १२६ ॥
भीते वक्षःस्थलं हन्याद् वक्त्रमुन्मार्गगामिनि ।
कुपिते पुच्छसंघाते भ्रान्ते जानुद्वयं तथा ॥ १२७ ॥

अथवा अधिक हिनहिनाने पर कन्धे में, फिसलने पर जांघों के बीच में, डरने पर वक्षःस्थल में, कुमार्ग पर चलने पर मुख में, कुपित होने पर पूंछ की सन्धि के अन्त में, चित्त की भ्रान्ति होने पर दोनों जानुओं में मारे।

नासकृत्ताडयेदश्वमकाले च विदेशके ।
अकालस्थानघातेन वाजिदोषान् वितन्वते ॥ १२८ ॥

**अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट—**घोड़े को बार बार या असमय तथा कुठॉव में (जहां नहीं मारना चाहिये, वहां पर) नहीं मारना चाहिये क्योंकि असमय तथा कुठांव में मारने से घोड़े में दोषों की वृद्धि हो जाती है।

तावद् भवन्ति ते दोषा यावज्जीवत्यसौ हयः ।
दुष्टं दण्डेनाभिभवेन्नारोहेद्दण्डवर्जितः ॥ १२९ ॥

और वे दोष घोड़े में तब तक बने रहते हैं, जब तक घोड़ा जीवित रहता है। दुष्ट घोड़े को दण्ड देकर परास्त कर देवे, विना दण्ड दिये उस पर सवारी न करे।

गच्छेत् षोडशमात्राभिरुत्तमोऽश्वो धनुःशतम् ।
यथा यथा न्यूनगतिरश्वो हीनस्तथा तथा ॥ १३० ॥

**उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण—**उत्तम घोड़ा १६ मात्रा का उच्चारण करते-करते १०० धनुष की दूरी तक पहुँच जाता है। जैसे २ जिसकी न्यून गति होती है वैसे २ वह हीन माना जाता है।

सहस्रचापप्रमितं मण्डलं गतिशिक्षणे ।'