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सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०५

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०५

वह 'मध्यम' एवं जो १० वर्ष तक परिवार की रक्षा करने योग्य होता है वह 'उत्तम' संज्ञक धन होता है ।

क्रमादर्धं रक्षेद्येद्वा स्वापत्तौ नृप एषु वै ।

अपने ऊपर आपत्ति आने पर राजा नीचादि क्रम से अपने धन को इन सबों के पास रक्षार्थ रख दे ।

मूलैरर्थ्यं वहन्त्यन्यैर्धनं बुद्ध्या वणिजः क्वचित् ॥ २३ ॥
विक्रीणन्ति महार्घे तु हीनार्घे सञ्चयन्ति हि ।

व्यवसायी ( व्यापारी ) लोग मुख्यभूत मूल धन से व्यापार करते हैं अर्थात् वस्तुओं का खरीदना-बेचना रूप व्यापार करते हैं केवल सूद पर अपना सारा मूलधन नहीं लगाते हैं और वे महंगी होने पर खरीदी वस्तु को बेचते हैं तथा सस्ती होने पर वस्तु खरीद कर संचय करते हैं ।

व्यवहारे धृतं वैश्यैस्तद्धनेन विना सदा ॥ २४ ॥
अन्यथा स्वप्रजातापो नृपं दहति सान्वयम् ।

प्रजा के सन्ताप से सवंश राजा के नाश का निर्देश— और व्यवहार ( क्रय-विक्रय ) के लिये रखी हुई वस्तुओं को धन ( मूल्य ) बिना दिये वैश्यों से सदा राजा को जबर्दस्ती नहीं लेना चाहिये । यदि राजा बिना मूल्य दिये ले लेता है तो उससे उत्पन्न हुई प्रजा की सन्तापरूपी अग्नि वंश के सहित उस राजा को जला देती है ।

धान्यानां संग्रहः कार्यो वत्सरत्रयपूर्तिदः ॥ २५ ॥
तत्तत्काले स्वराष्ट्रार्थं नृपेणात्महिताय च ।
चिरस्थायी समृद्धानामधिको वाऽपि चेष्यते ॥ २६ ॥

धान्य-संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश— राजा को अपने कल्याण के लिये और राज्य की रक्षा के लिये समय-समय पर तीन वर्ष तक खाने के लिये पर्याप्त धान्यों का संग्रह कर लेना चाहिये । और ऐश्वर्यशाली लोगों के लिये उससे भी अधिक कालतक कार्य चलने लायक अधिक धान्य का संग्रह करना उचित होता है ।

सुपुष्टं कान्तिमज्जातिश्रेष्ठं शुष्कं नवीनकम् ।
ससुगन्धवर्णरसं धान्यं संवीक्ष्य रक्षयेत् ॥ २७ ॥
सुसमृद्धं चिरस्थायी महार्घमपि नान्यथा ।

संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश— अच्छी तरह से पका हुआ, उज्ज्वल, अच्छी जाति का, सूखा हुआ, नवीन, सुगन्ध, वर्ण तथा रस ( स्वाद ) से युक्त, सुन्दर एवं बहुत कालतक ठहरनेवाला, ऐसे धान्य को अच्छी तरह से देखकर यदि अधिक मूल्य का भी हो तो लेकर रखना उचित है । यदि इससे अन्यथा हो तो उस धान्य का संग्रह नहीं करना चाहिये ।

२०६ | शुक्रनीतिः

विषवह्निहिमव्याप्तं कीटजुष्टं न धारयेत् ॥ २८ ॥
निःसारतां न हि प्राप्तं व्यये तावन्नियोजयेत् ।

जो विष, अग्नि तथा पाला से खराब हो गया हो एवं जिसमें कीड़ा पड़ा हो ऐसे धान्यों का संग्रह नहीं करना चाहिये और जब तक निःसार नहीं हो तभी तक धान्यों का व्यय करना चाहिये अर्थात् निःसार होने पर उसे फेंक देना चाहिये ।

व्ययीभूतं तु यद् दृष्ट्वा तत्तुल्यं तु नवीनकम् ॥ २९ ॥
गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन वत्सरे वत्सरे नृपः ।

राजा प्रति वर्ष जो धान्य व्यय करने से चुक जाय उनके स्थान पर उसी जाति के दूसरे नये धान्य यत्नपूर्वक लाकर रख दे ।

ओषधीनां च धातूनां तृणकाष्ठादिकस्य च ॥ ३० ॥
यन्त्रशस्त्राग्नचूर्णभाण्डादेर्वाससां तथा ।
यद्यच्च साधकं द्रव्यं यद्यत्कार्ये भवेत् सदा ॥ ३१ ॥
संग्रहस्तस्य तस्यापि कर्तव्यः कार्यसिद्धयेः ।

ओषधि आदि सब वस्तुओं को संचय करने का निर्देश—ओषधि ( धान्यादि ), धातु ( खान से उत्पन्न पदार्थ ), तृणकाष्ठ आदि, यन्त्र ( मशीन ), अस्त्र, शस्त्र, बारूद, बर्तन, वस्त्र इन सबों के मध्य में जिन २ कार्यों के लिये जो २ द्रव्य उपयोगी हों उनका संग्रह करना राजा के लिये उचित है क्योंकि उनसे समय पर कार्य की सिद्धि होती है ।

संरक्षयेत् प्रयत्नेन संगृहीतं धनादिकम् ॥ ३२ ॥
अर्जने तु महद् दुःखं रक्षणे तच्चतुर्गुणम् ।

संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश—संग्रह किये हुये धान्यादि की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि इनके संग्रह करने में बहुत दुःख उठाना पड़ता है और उससे चौगुना दुःख उनकी रक्षा करने में उठाना पड़ता है ।

क्षणं चोपेक्षितं यत्तद्विनाशं द्राक् समाप्नुयात् ॥ ३३ ॥

क्षणभर भी रक्षा करने में जिसकी उपेक्षा की जाती है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है ।

आर्जकस्यैव दुःखं स्यात्तथाऽर्जितविनाशने ।
स्त्रीपुत्राणामपि तथा नान्येषां तु कथं भवेत् ॥ ३४ ॥

और अर्जित ( संगृहीत ) वस्तु के नष्ट हो जाने पर उपार्जन ( संग्रह ) करनेवाले को ही दुःख होता है स्त्री-पुत्रादिकों को वैसा नहीं होता है फिर अन्य लोगों को क्यों दुःख होगा ?

चतुर्थोऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०७

स्वकार्ये शिथिलो यः स्यात् किमन्ये न भवन्ति हि ।
जागरूकः स्वकार्ये यस्तत्सहायाश्च तत्समाः ॥ ३५ ॥

स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश— जो अपने ही कार्य में स्वयं शिथिल (पूर्ण रूप से नहीं तत्पर) रहता है तो उसके सहायक अन्य लोग उस कार्य में क्यों नहीं शिथिल होंगे ? अर्थात् अवश्य होंगे। क्योंकि अपने कार्य में जो जागरूक (दृढ़ तत्पर) रहता है तो उसके सहायक भी उसी के समान उस कार्य में जागरूक रहते हैं।

यो जानात्यर्जितुं सम्यगर्जितं न हि रक्षितुम् ।
नातः परतरो मूर्खो वृथा तस्यार्जनश्रमः ॥ ३६ ॥

संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश— जो उपार्जन करना तो अच्छी तरह से जानता है किन्तु उसकी अच्छी तरह रक्षा करना नहीं जानता है। उससे बढ़कर मूर्ख कोई दूसरा नहीं है क्योंकि उसका उपार्जन करने का श्रम वृथा हो जाता है।

एकस्मिन्नधिकारे तु यो द्वावधिकरोति सः ।
मूर्खो जीवद्-द्विभार्यश्च ह्यतिविश्रम्भवांस्तथा ॥ ३७ ॥
महाधनाशो रचलसः स्त्रीभिनिर्जित एव हि ।
तथा यः साक्षितां पृच्छेच्चौरजाराततायिषु ॥ ३८ ॥

मूर्ख के लक्षण— जो एक अधिकार (कार्यभार) रहने हुये भी दो अधिकारों पर अधिकार रखता है, जो स्त्री के जीते रहते दूसरी शादी करता है, जो अत्यन्त दूसरे पर विश्वास रखता है, जो महान् धन की आशा रखते हुये आलसी रहता है, जो स्त्री के अधीन रहता है, तथा जो चोर, परस्त्रीगामी, आततायी के विषय में साक्षी (गवाही) मानता है अथवा उनसे गवाह मांगता है वह मूर्ख है।

संरक्षयेत् कृपणवत् काले दद्याद्विरक्तवत् ।
मूर्खत्वमन्यथा याति स्वधनव्ययतोऽपि च ॥ ३९ ॥

कृपण की भांति धन की रक्षा करे और समय आने पर विरक्त की भांति उसे दे देवे, अन्यथा (इससे विपरीत होने पर) अपने धन के व्यय करने पर मूर्खता को प्राप्त होता है।

वस्तुयाथात्म्यविज्ञाने स्वयमेव यतेत् सदा ।
परीक्षकैः स्वयं राजा रत्नादीन् वीक्ष्य रक्षयेत् ॥ ४० ॥

राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश— प्रत्येक वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप जानने के लिये स्वयं सदा यत्न करना चाहिये।

२०८ | शुक्रनीतिः

अतः राजा स्वयं परीक्षकों (रत्नपारखियों) के द्वारा परीक्षा करके रत्नों का संग्रह करे।

वज्रं मुक्ता प्रबालं च गोमेदश्चेन्द्रनीलकः ।
वैदूर्यः पुष्परागश्च पाचिर्माणिक्यमेव च ॥ ४१ ॥
महारत्नानि चैतानि नव प्रोक्तानि सूरिभिः ।

हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश— हीरा, मोती, मूंगा, गोमेद (लहसुनिया), नीलम, वैदूर्य, पुखराज, पन्ना, लाल (मानिक), ये ९ महारत्न विद्वानों द्वारा कहे गये हैं।

रवेः प्रियं रक्तवर्णं माणिक्यं त्विन्द्रगोपरुक् ॥ ४२ ॥
रक्तपीतसितश्यामच्छविर्मुक्ता प्रिया विधोः ।
सपीतरक्तरुग्भौमप्रियं विद्रुममुत्तमम् ॥ ४३ ॥
मयूरचाषपत्राभा पाचिर्बुधहिता हरित् ।

नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश— बीरबहूटी कीड़े की भांति लाल रंग का माणिक (लाल) होता है जो सूर्य को प्रिय है। लाल, पीली, श्वेत तथा श्याम वर्ण की कान्तिवाली मोती होती है जो चन्द्रमा को प्रिय है। पीली तथा लालकान्ति से युक्त उत्तम मूंगा होता है जो मंगलग्रह को प्रिय है। मयूर तथा चास पक्षी के पंख के समान कान्तिवाला पन्ना हरा रङ्ग का होता है जो बुधग्रह को प्रिय होता है।

स्वर्णच्छविः पुष्परागः पीतवर्णो गुरुप्रियः ॥ ४४ ॥
अत्यन्तविशदं वज्रं तारकाभं कवेः प्रियम् ।
हितः शनेरिन्द्रनीलो ह्यसितो घनमेघरुक् ॥ ४५ ॥
गोमेदः प्रियकृद्राहोरीषत्पीतारुणप्रभः ।
ओतवद्याभश्चलत्तन्तुर्वैदूर्यः केतुप्रीतिकृत् ॥ ४६ ॥

सोना के समान कान्तिवाला पीले वर्ण का पुखराज होता है जो गुरुग्रह को प्रिय होता है। अत्यन्त स्वच्छ तारा की भांति चमकनेवाला हीरा होता है जो शुक्रग्रह को प्रिय है। घने बादल के समान कान्तिवाला नीले रङ्ग का नीलम होता है जो शनिग्रह को प्रिय है। कुछ पीली तथा लाल कान्ति से युक्त लहसुनिया होता है जो राहु को प्रिय है। बिलाव की आंखों के समान जिसकी कान्ति हो तथा जो किरणों से युक्त हो उसे वैदूर्य कहते हैं। यह केतु को प्रिय है।

रत्नश्रेष्ठतरं वज्रं नीचे गोमेदविद्रुमम् ।
गारुत्मतं च माणिक्यं मौक्तिकं श्रेष्ठमेव हि ॥ ४७ ॥
इन्द्रनीलं पुष्परागो वैदूर्यं मध्यमं स्मृतम् ।

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०६.

सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश—रत्नों में अत्यन्त श्रेष्ठ हीरा होता है, और लहसुनिया तथा मूंगा रत्नों में नीच (निकृष्ट) होते हैं। पन्ना, माणिक तथा मोती रत्नों में श्रेष्ठ हैं। नीलम, पुखराज और वैदूर्य रत्नों में मध्यम हैं।

रत्नश्रेष्ठो दुर्लभश्च महाद्युतिरहेर्मणिः ॥ ४८ ॥

सर्पमणि—रत्नों में श्रेष्ठ, दुर्लभ एवं अत्यन्त उज्ज्वल कान्तिवाला होता है।

अजालगर्भं सद्रूपं रेखाबिन्दुविवर्जितम् ।
सत्कोणं सुप्रभं रत्नं श्रेष्ठं रत्नविदो विदुः ॥ ४९ ॥

श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण—'जिसके भीतर जाली न हो और वर्ण अच्छा हो एवं रेखा तथा बिन्दु से रहित, अच्छे कोणों से युक्त तथा अच्छी कान्तिवाला रत्न श्रेष्ठ होता है'—ऐसा रत्नपारखी लोग कहते हैं।

शर्कराभं दलाभं च चिपिटं वर्तुलं हि तत् ।
वर्णाः प्रभाः सिता रक्ताः पीतकृष्णास्तु रत्नजाः ॥ ५० ॥

और वह रत्न कोई बालू और कोई पत्तों के समान कान्ति का तथा कोई चिपटा या कोई गोल आकार का होता है। और रत्नों के वर्ण की कान्ति श्वेत, रक्त, पीत या कृष्ण होती है।

यथावर्णं यथाच्छायं रत्नं यद्दोषवर्जितम् ।
श्रीपुष्टिकीर्तिशौर्यायुःकरमन्यदसत् स्मृतम् ॥ ५१ ॥

असत् रत्न के लक्षण—अपने २ वर्ण तथा कान्ति से युक्त और दोषों से रहित जो रत्न होता है वह लक्ष्मी, पुष्टि, कीर्ति, शूरता तथा आयु को करनेवाला होता है इससे अन्य प्रकार का रत्न बुरा फल देनेवाला होने से बुरा कहलाता है।

वर्णमाक्रमते छाया प्रभा वर्णप्रकाशिनी ।
कान्ति वर्ण को उज्ज्वल करती है, और प्रभा उसे प्रकाशित करती है।

पद्मरागस्तु माणिक्यभेदः कोकनदच्छविः ॥ ५२ ॥
न धारयेत् पुत्रकामा नारी वज्रं कदाचन ।
कालेन हीनं भवति मौक्तिकं विद्रुमं घृतम् ॥ ५३ ॥

पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश—पद्मरागमणि माणिक्य (माणिक) का ही भेद है। यह रक्तकमल के समान कान्तियुक्त होता है। और पुत्रार्थिनी स्त्री को कभी भी हीरा धारण नहीं करना चाहिये। मूंगा और मोती बहुत दिन तक धारण करने पर (खराब) हो जाता है।

गुरुत्वात् प्रभया वर्णाद्विस्तारादाश्रयादपि ।

१४ शु०

२१० : शुक्रनीतिः

आकृत्या चाधिमूल्यं स्याद्रत्नं यद्दोषवर्जितम् ॥ ५४ ॥
दोष वर्जित रत्न के लक्षण— जो रत्न दोषरहित होता है उसका वजन, कान्ति, रङ्ग, आकार का विस्तार, उत्पत्तिस्थान तथा आकार के आधार पर मूल्य अधिक हो जाता है ।

नायसोल्लिख्यते रत्नं विना मौक्तिकविद्रुमात् ।
पाषाणेनापि च प्राय इति रत्नविदो विदुः ॥ ५५ ॥
'मूंगा और मोती को छोड़कर अन्य रत्नों पर लोहे और पत्थर से घिसने पर प्रायः लकीर नहीं पड़ती है' ऐसा रत्न के पारखी लोग कहते हैं ।

मूल्याधिक्याय भवति यद्रत्नं लघु विस्तृतम् ।
गुर्वल्पं हीनमौल्याय स्याद्रत्नं त्वपि सद्गुणम् ॥ ५६ ॥
मूल्य अधिक और कम होने के कारण— जो रत्न दोष से रहित उत्तम होते हुये भी तौल में हल्के किन्तु आकार में बड़े हों तो वे अधिक मूल्य के होते हैं । और जो तौल में भारी किन्तु आकार में छोटे होते हैं वे मूल्य में हीन होते हैं ।

शर्कराभं हीनमौल्यं चिपिटं मध्यमं स्मृतम् ।
दलाभं श्रेष्ठमूल्यं स्याद्यथाकामात्तु वर्तुलम् ॥ ५७ ॥
बालू के समान आकारवाला रत्न हीन मूल्य का होता है । चिपटा रत्न मध्यम मूल्य का और टुकड़ेवाला श्रेष्ठ मूल्य का होता है, और गोल रत्न लेने और बेचनेवाले की आवश्यकता के अनुसार कम या अधिक मूल्यवाले हो जाते हैं ।

न जरां यान्ति रत्नानि विद्रुमं मौक्तिकं विना ।
राजद्रौष्ट्याश्च रत्नानां मूल्यं हीनाधिकं भवेत् ॥ ५८ ॥
मूंगा और मोती को छोड़कर शेष रत्नों के ऊपर पुराना होने का दोष नहीं होता है । राजा की दुष्टता से रत्नों के मूल्य कम या अधिक हो जाते हैं ।

मत्स्या-ऽहि-शङ्ख-वाराह-वेणु-जीमूत-शुक्तितः ।
जायते मौक्तिकं तेषु भूरि शुक्त्युद्भवं स्मृतम् ॥ ५६ ॥
मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश— मछली, सर्प, शङ्ख, सूअर, बांस, मेघ तथा सीप से मोती उत्पन्न होती है, किन्तु अधिकतर सीप से ही मोती निकलती है ।

कृष्णं सितं पीतरक्तं द्विचतुःसप्तकञ्चुकम् ।
त्रि-पञ्च-सप्तावरण-मुत्तरोत्तरमुत्तमम् ॥ ६० ॥
मोती के रंग और भेद का निर्देश— मोती कृष्ण, श्वेत, पीतयुक्त रक्तवर्ण तथा क्रम से २ कञ्चुक ( परत ), ४ कञ्चुक, ७ कञ्चुकवाली उत्तरोत्तर उत्तम समझी जाती है ।

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २११

कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं पीतन्तु जरठं विदुः।
कनिष्ठं मध्यमं श्रेष्ठं क्रमाच्छुक्त्युद्भवं विदुः ॥ ६१ ॥

'कृष्ण वर्ण की मोती कनिष्ठ, श्वेतवर्ण की मध्यम, रक्तवर्ण की श्रेष्ठ तथा पीतवर्ण की पुरानी होती है' ऐसा सीप की मोती के विषय में समझना चाहिये।

तदेव हि भवेद् वेध्यमवेध्यानीतराणि तु।
कुर्वन्ति कृत्रिमं तद्वत्सिंहलद्वीपवासिनः ॥ ६२ ॥

**कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान—**सीप की मोती ही वेधी जा सकती है अन्य मोती नहीं वेधी जा सकती। सिंहल (सीलोन) देशवासी असली मोती के समान नकली मोती बनाते हैं।

तत्सन्देहविनाशार्थं मौक्तिकं सुपरीक्षयेत्।
उष्णे सलवणस्नेहे जले निश्युषितं हि तत् ॥ ६३ ॥
व्रीहिभिर्मर्दितं नेयाद्वैवर्ण्यं तदकृत्रिमम्।
श्रेष्ठाभं शुक्तिजं विद्यान्मध्यभां त्वितरद्विदुः ॥ ६४ ॥

**मोती की परीक्षाविधि-निर्देश—**अतः सन्देह दूर करने के लिये मोती की भलीभांति परीक्षा करनी चाहिये। परीक्षा विधि यह है कि—गर्म जल में नमक तथा तेल मिलाकर उसी में मोती को डालकर रातभर पड़ा रहने दे पश्चात् प्रातः मोती को निकाल कर धानों के बीच रख कर खूब रगड़े, इसके बाद यदि उसका रंग बदल जाय तो मोती को नकली यदि न बदले तो असली समझना चाहिये। उत्तम आभा (कान्ति) की मोती असली और मध्यम आभा की नकली समझी जाती है।

तुलाकल्पितमूल्यं स्याद्रत्नं गोमेदकं बिना।
क्षुर्माविंशतिभी रक्ती रत्नानां मौक्तिकं बिना ॥ ६५ ॥

गोमेदक रत्न को छोड़ कर शेष रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार होता है। मोती को छोड़कर शेष रत्नों के लिये एक रत्ती २० अलसियों की मानी गई है।

रक्तित्रयं तु मुक्तायाश्चतुःकृष्णलकंर्भवेत्।
चतुर्विंशतिभिस्ताभी रत्नटङ्कस्तु रक्तिभिः ॥ ६६ ॥
टङ्कैश्चतुर्भिस्तोलः स्यात् स्वर्णविद्रुमयोः सदा।

**रत्नों का तुलामान निर्देश—**मोती के लिये ४ कृष्णलों (तौल विशेष) की ३ रत्ती, २४ रत्तियों का रत्नों के लिये १ टङ्क होता है। स्वर्ण तथा मूंगा तौलने के लिये ४ टङ्कों का १ तोला होता है।

एकस्यैव हि वज्रस्य त्वेकरक्तिमितस्य च ॥ ६७ ॥
सुविस्तृतदलस्यैव मूल्यं पञ्चसुवर्णकम्।

२१२शुक्रनीतिः

वज्र का मूल्य-विचार—यदि एक ही हीरा विस्तृत दलवाला तथा १ रत्ती तौल का हो तो उसका मूल्य ५ सुवर्ण (१० माशे तौल की १ स्वर्ण मुद्रा अशर्फी) होता है।

रक्तिकादलविस्ताराच्छ्रेष्ठं पञ्चगुणं यदि ॥ ६८ ॥
यथा यथा भवेन्न्यूनं हीनमौल्यं तथा तथा ।

जैसे २ रत्ती की संख्या एवं दल का विस्तार अधिक होता जायगा वैसे २ हीरे की श्रेष्ठता बढ़ती है, और प्रति रत्ती के अनुसार पूर्वोक्त मूल्य से पंचगुना अधिक होता जायगा। और जैसे २ रत्ती तथा दल के विस्तार में न्यूनता होगी वैसे २ मूल्य में कमी होगी।

अत्राष्टरक्तिको माषो दशमाषैः सुवर्णकः ॥ ६९ ॥
स्वर्णस्य तत् पञ्चमूल्यं राजताशीतिकर्षकम् ।

रत्न के तौलने में १ माशा ८ रत्ती का होता है। १० माशे का १ सुवर्ण होता है। ५ सुवर्णों का मूल्य ८० चांदी के कर्ष (१ रुपये) भर होते हैं।

यथा गुरुतरं वज्रं तन्मूल्यं रक्तिकवर्गः ॥ ७० ॥
तृतीयांशविहीनं तु चिपिटस्य प्रकीर्तितम् ।

हीरा चाहे जितना भारी हो किन्तु उसका मूल्य उसके रत्ती-समूह के अनुसार ही होगा, चिपटे हीरे का मूल्य तृतीयांश कम होता है।

अर्धं तु शर्कराभस्य चोत्तमं मूल्यमेरितम् ॥ ७१ ॥
रक्तिकायाश्च द्वे वज्रे तदर्धं मूल्यमर्हतः ।

उत्तम हीरे के मूल्य से आधा मूल्य शर्करा (बालू) के आकारवाले हीरे का होता है। २ हीरे यदि १ रत्ती के हों तो दोनों का मूल्य उत्तम हीरे का आधा होता है।

तदर्धं बहवोऽर्हन्ति मध्या हीना यथा गुणैः ॥ ७२ ॥
उत्तमार्धं तदर्धं हीरका गुणहीनतः ।

यदि गुणों के अनुसार मध्यम और हीन बहुत से हीरे १ रत्ती के बराबर हों तो उसके मूल्य उस से भी आधे हो जायेंगे। इसी प्रकार से हीरों के गुण की हीनता के अनुसार उसके मूल्य के आधे या उससे भी आधे होते हैं।

शतादूर्ध्वं रक्तिकवर्गाद्ध्रसेद् विंशतिरक्तिकाः ॥ ७३ ॥
प्रतिशतात्तु वज्रस्य सुविस्तृतदलस्य च ।
तथैव चिपिटस्यापि विस्तृतस्य च ह्रासयेत् ॥ ७४ ॥
शर्कराभस्य पञ्चाशच्चत्वारिंशच्च वैकतः ।

जो हीरा सुविस्तृत दलवाला या चिपटा होते हुये भी विस्तृत दलवाला हो और यदि १०० रत्ती से ऊपर तौलवाला हो तो प्रति सैकड़े २० रत्ती का