रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र ५५
स्त्रियों के ही साथ बीतता है। जैसा माता-पिता के संस्कार पुत्र
पर पड़ते हैं वैसा ही पुत्र बनता है। इस के बाद परिवर्त्तन करना
बड़ा ही कठिन है।
इस समय जैसी बिना पढ़ी-लिखी मूर्खा नारियें गृहिणी
बनी हुई हैं वैसा ही दुर्दशा गृहस्थ की भी है। न घर का
हिसाब-किताब ठीक है न बच्चों की हालत। हो भी कहाँ से ?
न तो पढ़ी-लिखी हैं न शिक्षिता। वाममार्गियों ने तो स्त्रियों
को कामवासना पूरा करने का साधन मात्र समझ लिया और
ऐसी कपोल-कल्पित श्रुतियें बना कर स्त्री जाति का पढ़ाना ही
रोक दिया है। अर्थात्—
स्त्री शूद्रो नाधीयाताम् ।
स्त्री औत शूद्र को न पढ़ाना चाहिये। जब स्त्रियों का पढ़ाना
रुक गया तब पुरुष भी मूर्ख रहने लगे। क्योंकि जैसा साँचा
होगा वैसी ही चीज बनेगी। जिस समय स्त्रियों के पढ़ने का
अधिकार नहीं छिना था; उस समय वीर-विदुषी ब्रह्म-वादिनी
उपदेष्ट्री नारियाँ होती थीं। उस समय वैसी ही उनकी सन्तानें
भी होती थीं। उसी समय के चरित्र को देख कर ही महात्मा
मनु ने भरतेतर देशों को चेतावनी दी थी कि—
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरितं शिक्षेरन् पृथ्व्यां सर्वमानवः ॥
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डंके की चोट से सभी देश देशान्तरों को मनु भगवान ने
चैलेञ्ज दिया था कि अय पृथ्वी के सम्पूर्ण मनुष्यो ! तुम
अपने अपने चरित्रों को भारतवर्ष के उत्पन्न अग्रजन्मा (ब्राह्मणों)
से सीखो।
उपरोक्त सिंहनाद से स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस देश के
शिक्षक उपदेष्टा इतने प्रवल-विद्वान् शस्त्रास्त्रवेत्ता, तार्किक,
नीतिज्ञ तथा सर्वशास्त्र पारंगत थे कि जिनका मुकाबिला कोई
अन्यदेशीय मनुष्य नहीं कर सकता था। किन्तु आज ठीक
उसके विपरीत दिखायी देता है। उनकी विद्वत्ता उन्हीं को खा
रही है, उनकी नीति उन्हीं के नाश का हेतु बन रही है। जिन
आर्य्य सन्तानों पर भरोसा रखकर उपरोक्त दावा किया गया
था वे शिक्षा ग्रहण करने के लिये दूसरे देशों की ओर लालायित
दृष्टि से देख रहे हैं। ऐसा क्यों ? क्या महात्माओं के वचन मिथ्या
अभिमानपूर्वक होते हैं ? ऐसा होना सर्वथा असम्भव है। क्योंकि
उन्हीं महात्मा मनु का वचन है—
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेषः धर्मः सनातनः ॥
सत्य बोलो, प्रिय बोलो। अप्रिय सत्य मत बोलो। किन्तु
प्रिय-झूठ भी मत बोलो। यहीं सनातन धर्म है। ऐसे महा-
त्माओं की चेतावनी मिथ्या कैसे हो सकती है। जो मीठे झूठ
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तक का भी निषेध करते हैं और कड़वे सत्य को भी झूठ के
बराबर त्याज्य समझते हैं। फिर ऐसी उलटी व्यवस्था क्यों ?
जहाँ वीरविजेता धनुर्धर राम, कृष्ण, अर्जुन के समान हुए,
वहाँ आज भीरु, डरपोक, तन-बल क्षीण आर्य्य सन्तान क्यों
दिखायी दे रही है ? इसका कारण स्पष्ट यही दीखाता है कि
वे लोग उसी सजीवन-बूटी को पान किये थे जिसके बल को
देखकर ही महात्मा मनु ने उपरोक्त सिंह गर्जना की थी। मेरा
मतलब उस सजीवन-बूटी से नहीं जो यति लक्ष्मण की मूर्छा
दूर करने के लिये महाबली हनुमान द्वारा लायी गयी थी।
मेरा तात्पर्य वेदामृतमयी शिक्षा से है। जबतक उसका प्रचार
रहा तबतक भारतवर्ष सब देशों का गुरु बना रहा। जब से
वैदिक ज्ञान की अवहेलना होने लगी, तब से आर्य्य सन्तान की
दुर्गति होने में भी कमी नहीं रही। आर्य्य जाति के पतन का
मूल कारण वेदशास्त्रानुकूल आचार-विचार का परित्याग
मात्र है।
अँगरेजी सभ्यता में पले हुए मनुष्य वेद-शास्त्रों का नाम
सुनते ही नीम चढ़े करेले की भाँति मुँह बिगाड़ लेते हैं। उन्हें
धर्मशास्त्रों में श्राद्धा नहीं, विश्वास नहीं, यहाँ तक कि वेदादि
शास्त्रों के पढ़े-लिखे विद्वानों से भी बड़ी घृणा करते हैं। यथा-
र्थतः इसमें उनका कोई विशेष दोष नहीं। क्योंकि उन्हें उसका
महत्त्व ही मालूम नहीं। जबतक किसी वस्तु के गुण-दोष का
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पता नहीं लग जाता तबतक मनुष्य उसके ग्रहण व त्याग की
इच्छा नहीं कर सकता । अबतक वेदों के नाम पर जो-जो मन-
माने कानून बनाये गये, उनका भयंकर परिणाम देखकर ही
लोगों के मन में उनके प्रति घृणा पैदा हो गयी । अन्यथा यदि
शुद्ध वैदकी शिक्षा का परिज्ञान उन्हें हो जाय तो वे कभी भी
विमुख रहने को तैयार नहीं होंगे। अपितु ऐसा अपनायेंगे कि
अन्ध विश्वासी भी नाक रगड़ते रह जायेंगे । क्योंकि वे मान
लेना ही अपना उद्देश्य नहीं समझते प्रत्युत् उस पर अमल
करना भी अपना कर्त्तव्य समझते हैं। किसी कवि ने ठीक
कहा है —
शास्त्राण्यधित्यापि भवन्तिमूर्खाः,
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।
सुचिन्तितं चौषधमातुराणाम्,
न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ।
शास्त्रों को पढ़कर भी मनुष्य मूर्ख हैं, यदि वे पढ़े हुए के
अनुसार आचरण नहीं करते। जिस प्रकार रोग के लिये उत्तम
से उत्तम सोची हुई औषध नाम लेने मात्र से रोग को दूर
नहीं कर सकती, जब तक कि वह सेवन न की जाय । शास्त्रों
के वचन व्यर्थ हैं, जब तक उन पर आचरण न किया जाय ।
वेदों, को ठुकरा देने से ही आज भाई-भाई में विरोध पिता-
असली कोकशास्त्र ५६
पुत्र, माँ-बेटी, बहन-भाई चाचा-भतीजा स्त्री-पुरुष, जहाँ-तहाँ
सभी जगह ऐसा विरोध फैला हुआ है कि जिस किसी का
हक-बेहक छीन लेने के लिये प्राण की बाजी लगाये हुए हैं।
वेद का सच्चा उपदेश ग्रहण करने से भाई-भाई में भरत-राम,
पिता-पुत्र में दशरथ राम, स्त्री-पुरुष में सीता-राम, ऐसे-ऐसे अनेकों
दृष्टान्त वैदिक काल के इतिहास में पाये जाते हैं।
दाम्पत्य-जीवन में पदार्पण करने वाले स्त्री-पुरुषों की योग्यता
का वर्णन वेद में कैसा सुन्दर किया गया है।
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भान्तः ।
तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति
देवाः ॥
आचार्य्य ब्रह्मचारी का उपनयन संस्कार कर गर्भ में रखता
है। तीन रात तक उसे उदर में रखकर उसका भरण-पोषण
करता है। उस ब्रह्मचारी को बड़े-बड़े विद्वान देखने के लिये
आते है।' 'गर्भ' 'उदर' और तीन रात्रि से तात्पर्य्य गुरुकुल के
नियमों में बँधकर उत्तम, मध्यम, निकृष्ट, अर्थात् विद्याव्रत-
स्नातक, व्रतस्नातक, विद्यास्नातक, तीनों प्रकार के ब्रह्मचर्यों
से है।
उत्तम ब्रह्मचारी—जो सम्पूर्ण वेदों को सांगोपांग ब्रह्मचर्य
व्रत का पालन करते हुए पूरा करे।
६० असली कोकशास्त्र
मध्यम ब्रह्मचारी—जो दो वेदों को सांगोपांग ब्रह्मचर्य्यपूर्वक
समाप्त करे।
निकृष्ट ब्रह्मचारी—जो एक वेद को सांगोपांग ब्रह्मचर्य्यपूर्वक
समाप्त करे।
ये तीनों प्रकार के क्रम से ४८, ३६, २४, वर्ष के ब्रह्मचारी
होते हैं। क्योंकि एक-एक वेद के पढ़ने में बारह-बारह वर्ष
व्यतीत होते हैं। इसी मन्त्र के भाव को लेकर महात्मा मनु ने
भी कहा है—
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं चापि यथाक्रमम् ।
अविप्लुत ब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् ॥
अर्थ—अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदों को
अथवा एक वेद को भी यथाक्रम पढ़कर गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करे ।
उत्तम ब्रह्मचारी विद्वानों में बैठा हुआ कैसा प्रतीत होता है ।
तानि कल्पद् ब्रह्मचारी सलिलस्य पृष्ठे तपोतिष्ठत्त-
प्यमानः समुद्रे ।
सस्नातो बभ्रुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते ॥ अथर्व ॥
ब्रह्मचारी समुद्र के समान गंभीर, बड़े उत्तम व्रत ब्रह्मचर्य
में निवास कर, महातप को करता हुआ वेद-पठन, वीर्य निग्रह
आचार्य के प्रियाचरणादि कर्मों को पूरा कर, यथाविधि
सम्पूर्ण विद्या में स्नान करके विद्यार्थों की सुन्दरता से सौन्दर्य
असली कोकशास्त्र ६१
युक्त होके, पृथिवी में अनेक शुभ गुण कर्म और स्वभाव से
प्रकाशमान होता है ।
ब्रह्मचारी तीन समिधा लेकर गुरु के पास जाता है ।
उस समित्पाणि ब्रह्मचारी की कितनी सुन्दर उत्कृष्टता वेद में
कही है—
इयं समित्पृथिवी द्यौर्द्वितीयातान्तरिक्षं समिधा पृणाति
ब्रह्मचारी समेधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा-
पिपर्त्ति ॥ अथर्व ॥
तीनों समिधा उपलक्षण मात्र हैं । यथार्थतः पहली समिधा
से तात्पर्य है पृथिवी—अर्थात् भूगर्भ सम्बन्धी ज्ञान और दूसरी
से सूर्यलोक की गति-विधि का ज्ञान तथा तीसरी से अन्तरिक्ष
सम्बन्धी ज्ञान अर्थात् नक्षत्रादि सभी लोक लोकान्तरों के सम्बन्ध
रखने वाले ज्ञान को प्राप्त करने के लिये वह गुरु से प्रार्थना
करता है । गुरु की कृपा से जब वह सम्पूर्ण ज्ञानों से परिपूर्ण
हो जाता है तब वह स्वयं आनन्द पाता हुआ दूसरों को भी
आनन्दित करता है ।
ब्रह्मचर्येति समिधा समिद्धा कार्ष्ण
६२ असली कोकशास्त्र
जब विद्या से प्रकाशित और मृगचर्मादि धारण कर,
दीक्षित होके (दीर्घश्मश्रुः) ४० वर्ष तक दाढ़ी मूँछ आदि
पंच केशों का धारण करने वाला ब्रह्मचारी होता है, तब वह
पूर्व समुद्ररूप ब्रह्मचर्यानुष्ठान को पूर्ण करके गुरुकुल से उत्तर
समुद्र अर्थात् गृहाश्रम को शीघ्र प्राप्त होता है। वह सब लोगों
को संग्रह करके बराबर पुरुषार्थ और जगत को सत्योपदेश से
आनन्दित कर देता है।
जिस प्रकार पुरुषों को ब्रह्मचर्य और सविद्याओं के धारण
करने का अधिकार वेद में है, उसी प्रकार स्त्रियों को भी वेद की
आज्ञा है कि—
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ॥ अथर्व ॥
ब्रह्मचर्यपूर्वक कन्या युवा-पति को प्राप्त करती है।
स्त्री और पुरुष दोनों जब समान बल-वीर्य और विद्यादि
शुभ गुण कर्मों से युक्त हों तब वे विवाह के योग्य होते हैं।
इस मन्त्र में कैसा उत्तम युवा-युवती का परिणय काल कहा
गया है।
तमस्मेरा युवतयो युवानं मर्मृज्यमानाः परियन्त्यापः।
स शुक्रेभिः शिक्वभी रेवदस्मे दीदायनिद्यमो घृतनि-
र्णिगप्सु ॥ ऋग्वेद ॥
अर्थ—जो (मर्मृज्यमानाः) उत्तम ब्रह्मचर्य व्रत और
सद्विद्याओं से अत्यन्त (प्रवतयः) बीसवें वर्ष से चौबीसवें
असली कोकशास्त्र ६३
' वर्ष वाली युवती है। वे कन्यायें जैसे ( आपः ) जल वा नदी
समुद्र को प्राप्त होती है वैसे ( अस्मेराः ) हमको प्राप्त होने
वाली अपने अपने प्रसन्न अपने से ड्योढ़े वा दूने आयु वाले
( तम् ) उस ब्रह्मचर्य और विद्या से परिपूर्ण शुभ लक्षण युक्त
( युवानम् ) जवान पति को ( परियन्ति ) अच्छे प्रकार प्राप्त
होती है ( सः ) वह ब्रह्मचारी ( शुक्रेभिः ) शुद्ध गुण और
( शिक्वभिः ) वीर्यादि से युक्त हो के ( अस्मै ) हमारे मध्य में
( रेवत् ) अत्यन्त श्रीयुक्त कर्म को और ( दीदाय ) अपने
तुल्य युवति स्त्री को प्राप्त होवे जैसे ( अप्सु ) अन्तरिक्ष
वा समुद्र में ( घृतनिर्णिङ् ) जल को शोधन करने हारा
( अनिध्मः ) आप प्रकाशित विद्युत् अग्नि है इसी प्रकार स्त्री
और पुरुष के हृदय में प्रेम, बाहर अप्रकाशमान और भीतर
सुप्रकाशित रहकर उत्तम सन्तान एवं अत्यन्त आनन्द को गृहाश्रम
में दोनों स्त्री पुरुष प्राप्त होवें। ठीक इसी वेदमंत्र का भाव लेकर
मनु भगवान् कहा है:—
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च ।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्विचक्षणः ॥
काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्त्तुमत्यपि ।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती ।
ऊर्ध्वन्तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥
६४ असली कोकशास्त्र
यदि माता पिता कन्या का विवाह करना चाहें तो अति
उत्कृष्ट शुभगुण-कर्म-स्वभाव वाले, कन्या के सदृश्य रूप
लावणयादि गुणयुक्त वर ही को चाहें। वह कन्या (वर)
माता की छः पीढ़ी के भीतर भी हो, तथापि उसी को कन्या
देना अन्य को कभी न देना कि जिस से दोनों अति प्रसन्न
होकर गृहाश्रम की उन्नति और उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति
करे ॥ १ ॥ चाहे मरण-पर्यन्त कन्या पिता के घर में बिना
विवाह के भी बैठी रहे। परन्तु गुणहीन असदृश अनमेल दुष्ट
पुरुष के साथ कन्या का विवाह कभी न करे और वर
कन्या भी अपने आप स्वसदृश के साथ ही विवाह करें ॥ २ ॥
जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे तब रजस्वला होने के
दिन से तीन वर्ष को छोड़ के चौथे वर्ष में विवाह करे अर्थात्
३६ बार रजस्वला होने के बाद विवाह में पदार्पण करना
चाहिए। वेद विरोधी वाममार्गियों ने निम्न कल्पित श्लोक
बनाकर उलटी ही गंगा बहा दी और आर्यजाति का मूल ही
तिरोहित कर दिया—
अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा च रोहिणी।
दशवर्षा भवेद् कन्या तत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥
माता तस्या पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च ।
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यांरजस्वलाम्॥
अर्थ—आठ वर्ष की पुत्री का नाम गौरी, नौ वर्ष की
५ असली कोकशास्त्र ६५
का रोहिणी और दस वर्ष की का कन्या, उसके बाद् रजस्वला ।
माता पिता और बड़ा भाई यदि कन्या को रजस्वला देख लें तो वे
तीनों नरक को जाते हैं ।
“प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्” के न्याय से साफ मालूम हो रहा है कि
इन उपरोक्त श्लोकों के प्रचार ने तीनों को ही नहीं वरन आर्यसन्तान
मात्र को आज नरक में ढकेल दिया है । न इन श्लोकों का प्रचार
होता और न आज ऐसा रौरव-नरक देखना पड़ता ।
गर्म देशों में प्रायः तेरह-चौदह वर्ष की आयु में कन्यायें
रजस्वला होने लगती हैं । मनुस्मृति के आदेशा-नुसार छत्तीस
बार रजस्वला होने पर अर्थात् तीन वर्ष और जोड़ देने से
सोलहवें वर्ष के बाद सत्रहवें वर्ष को आयु विवाह योग्य सिद्ध
होती है और शीत प्रधान देशों में जहाँ जितनी न्यूनाधिक
शीत पड़ती है वहाँ उसी के अनुसार रजस्वला होती हैं ।
अर्थात् कहीं सत्रह और कहो बीस वर्ष की आयु से रजोधर्म
आरम्भ होकर तीन वर्ष के बाद् विवाह योग्य तैयार होती हैं ।
इसी लिये वेद, स्मृति आदि धर्मशास्त्रों ने आयु की कैद
वर्षों द्वारा न दिखाकर रजस्वला होने के तीन वर्ष बाद
दिखायी है ।
शरीर ज्ञान के विज्ञाताओं ने वेदानुकूल जो समय कम
से कम निश्चय किया है । वह बड़ा ही उत्तम और सुपरी-
क्षित है, जैसे सुश्रुताचार्य सुश्रुत संहिता में लिखते हैं—
पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ।
समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक् ॥
ऊन षोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं गर्भस्थः स विपद्यते ॥
जातीवा न चिरं जीवेद् जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।
तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥
पच्चीस वर्ष का पुरुष और सोलह वर्ष की स्त्री परस्पर
सहवास कर सकते हैं। क्योंकि वे दोनों उस समय पूर्ण जवान
हो जाते हैं। उन दोनों का वीर्य परिपक्व और अङ्ग-प्रत्यङ्ग
परिपुष्ट एवं दृढ़ हो जाते हैं। इस अवस्था में दोनों का समान
बल, भावी सन्तान के लिये बड़ा लाभकारी होता है। सन्तान
बलिष्ठ और निरोग पैदा होती है। उपरोक्त अवस्था से कम आयु
वाले स्त्री-पुरुष में सम्बन्ध होने पर गर्भ नहीं ठहरता अर्थात
रह-रह कर गिर जाता है। रह भी गया तो बच्चा गर्भ में ही मर
जाता है। यदि किसी प्रकार पैदा भी हो गया तो दीर्घजीवी नहीं
होता। आजीवन रोगी दुर्बलेन्द्रिय ही रहता है। अवएव छोटी
अवस्था वाली स्त्री के साथ मैथुन न करना चाहिये। इसमें स्त्री-
पुरुष और सन्तान तीनों का ही कल्याण है।
किसान उस अन्न को खाता है जिसे धनीमानी छू नहीं
सकते, यहाँ तक कि अमीरों के घोड़े कुत्ते भी उससे कहीं
अच्छा खाना पाते हैं। इसी लिए नागरिक लोग किसान को
असली कोकशास्त्र ६७
गँवार तथा मूर्ख बतलाते हैं। इसमें सन्देह नहीं जो अनाज
उसकी पैदा की हुई सफल में सब से घटिया प्रायः शहर में न
बिकने लायक होता है वह उसी को बड़े प्रेम से खाकर निर्वाह
करता है। गाय भैंस का दूध जो उसके घर में होता है, वह
उसे कभी नहीं पीता प्रत्युत बेंच कर दाम खड़े कर लेता है
और यदि न बिका तो उसको जमाकर उसका घी निकाल कर बेंच
देता है। मट्ठा (छाँछ) स्वयं बाल-बच्चों समेत पीता है।
चौबीस घण्टा लगातार महीनों परिश्रम करने के बाद जो वस्तु
पैदा की जाय, भोजन के समय उसका निष्कृष्टतम (खराब)
भाग काम में लाया जाय यह बुद्धिमान्य नहीं तो ओर क्या
है ? किन्तु वही मन्द-बुद्धि किसान जिस समय खेत बोने का
समय आता है, उस समय खेत की भूमि मुलायम बनाने के
लिये हल चलाता, पटरा फेरता और सब भूमि समान कर
डालता है। जब तक जमीन बोने योग्य नहीं हो जाती तब तक
उसमें बीज नहीं बोता। जब भूमि तैयार हो जाती है तब जो
बीज घर में से निकलता है। वह बीज उसकी फसल का
सब से अच्छा, पुष्ट मोटा भरा हुआ चमकीला गठा हुआ अनाज
होता है, जिसे वह प्राणों से भी बढ़कर सँभाल कर रखता है।
यहाँ तक कि कर्ज काढ़ कर खायेगा किन्तु उसे नहीं छुएगा
और उसको बड़ी रक्षा करेगा। यदि घर में न हो तो बाजार से
एक रुपये का एक डेढ़ दो सेर तक मँहगे से मँहगा खोज-खरीद
६८ असली कोकशास्त्र
कर बोयेगा, सस्ता नहीं। ऐसा क्यों ? उससे पूछिये । वह
साफ कह देगा कि भविष्य में होने वाली मेहनत-मसक्कत इसी
पर निर्भर है, यदि इस में किसी प्रकार की कोतायी की जायगी
तो आने वाले साल में भूखों मरना पड़ेगा। यदि बीया अच्छा
नहीं होगा तो फसल कहाँ से अच्छी होगी। इसी पर तो
फसल का दारोमदार है। जब गाय भैंस गाभिन कराने का
समय आयेगा तब भी अच्छे से अच्छा हृष्ट-पुष्ट मजबूत साँड़
ढूँढ़ा जायगा। इस विषय में अनाड़ी से अनाड़ी ग्रामीणी भी
एक मत हैं फिर बुद्धिमानों का तो कहना ही क्या ? किन्तु बड़े
खेद की बात है, जो मनुष्य इतना बुद्धिमान बनता है वह अपनी
सन्तान के लिए कुछ भी विचार नहीं करता। मनुष्य होकर
इसने क्या विशेषता की, इससे तो पशु भी अच्छे हैं, जो समय
आने पर ही सन्तानोत्पत्ति की चेष्टा करते हैं। उनकी सन्तान
कैसी हृष्ट-पुष्ट सुन्दर फुर्तीली और तन्दुरुस्त होती है। सुन्दर
निरोग और बलिष्ट सन्तान बनाने के लिये ही वेदशास्त्रों ने
विवाह का समय विभाग किया था। जिसका दिग्दर्शन ऊपर
किया जा चुका है।
असली कोकशास्त्र ६६
विवाह
विवाह का क्या अर्थ है यह जानना परम आवश्यक है।
“वि” पूर्वक “वह” प्रापणे धातु से विवाह शब्द बनता है।
जिसका अर्थ है—वर-कन्या दोनों का मिलकर विशेष रूप से
गृहस्थ धर्म का पलन करने के लिए, प्रेम तथा श्रद्धा पूर्वक एक
दूसरे को अन्तःकरण से स्वीकार करना—अर्थात् पति-पत्नि
परस्पर एक दूसरे के सुख दु ख को अपना सुख दुःख समझते
हुए, प्रेम भाव से गृहस्थ-सम्बन्धी कार्याँ का सम्पादन करें।
यह तभी हो सकता है जब दोनों में सच्चा प्रेमभाव हो। सच्चे
प्रेम की उत्पत्ति एक दूसरे के गुण दोष जानने के बाद ही होती
है। इसी लिए विवाह के पूर्व जन्मपत्री अर्थात् जीवनचर्या
(विद्या, बल, बुद्धि, आयु और चरित्र) मिलायी जाती है। भूल
इतनी ही है कि जन्म-दिन के ही गृह-दोष मिलाये जाते हैं।
चाहिए जन्म से लेकर विवाह काल तक के गृह-दोष मिलाना।
लोग गृह-दोष के स्थान पर ग्रह-दोष मिलाते हैं, यथार्थ में
चाहिए गृह-दोष। जो मनु भगवान ने मनुस्मृति में दिखलाये हैं।
हम पहले गुण दिखाकर फिर दोष भी दिखायेंगे—
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधिः ।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्वितान् ।
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
७० असली कोकशास्त्र
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हँस वारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम् ॥
॥ मनु ॥
अर्थ—यथावत् उत्तम रीति से ब्रह्मचर्य और विद्या को
ग्रहण कर गुरु की आज्ञा से स्नान करके, ब्राह्मण क्षत्रिय और
वैश्य अपने वर्ण की उत्तम लक्षण युक्त स्त्री से विवाह करे ॥ १ ॥
जो स्त्री माता की छः पीढ़ी और पिता के गोत्र की न हो, वही
द्विजों के लिये विवाह करने में उत्तम है। जिसके सुन्दर अंग,
उत्तम नाम, हँस और हस्तिनी के सदृश चालवाली, जिसके
सूक्ष्म लोम, सूक्ष्म केश और सूक्ष्म दाँत हों, जिसके अंग कोमल
हों, उस स्त्री से विवाह करे। इस प्रकार विवाह योग्य वर-
कन्या के गुण, कर्म और स्वभाव मिला लेने चाहियें। इसके
अतिरिक्त जो त्याज्य दोष हैं वे भी आगे दिखाये जाते हैं।
जिन दोषों का त्यागना परम आवश्यक और रहना बड़ा
खतरनाक है।
चाहे वे घर या खानदान बड़े धन-धान्य से परिपूर्ण गौ भैंस
घोड़ा हाथियों से भरे हुए भी क्यों न हों, विवाह में ये दश कुल
त्याग ही देने चाहियें—
महान्त्यपि समृद्धानि गोजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥
असली कोकशास्त्र ७१
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् ।
क्षय्यामर्याव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥
नोद्वहेत कपिलां कन्यां नाधिकांगीन रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥
नक्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥
अर्थ—१ पहला जिस कुल में उत्तम क्रिया न हो। २ दूसरा—
जिस कुल में कोई उत्तम पुरुष न हो। ३ तीसरा - जिस कुल
में कोई विद्वान न हो। ४ चौथा—जिस कुल में शरीर के
ऊपर बड़े बड़े लोम हों। ५ पाँचवाँ—जिस कुल में बवासीर
हो। ६ छठवाँ जिस कुल में क्षयी ( राजयक्ष्मा ) रोग हो,
७ सातवाँ—जिस कुल में अग्निमन्दता से आमाशय रोग हो।
८ आठवाँ—जिस कुल में मृगी रोग हो। ९ नोवाँ—जिस
कुल में श्वेत कुष्ठ और दशवाँ—जिस कुल में गलित कुष्ठ आदि
रोग हों, उन कुलों की कन्या अथवा उन कुलों के पुरुषों से
विवाह कभी न करें। पीले वर्ण वाली, अधिक अंग वाली जैसे
छंगुली आदि रोगवती, जिसके शरीर पर कुछ भी लोम न हों
और जिसके शरीर पर बड़े-बड़े लोम हों, व्यर्थ अधिक बोलने
वाली और जिसके पीले बिल्ली के सदृश्य नेत्र हों। तथा जिस
कन्या का ( ऋक्ष ) नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती रोहिणी
इत्यादि ( नदी ) जिसका गंगा, यमुना इत्यादि ( पर्वत )
७२ असली कोकशास्त्र
जिसका विन्ध्याचला इत्यादि (पक्षी) पक्षी पर अर्थात् कोकिला
हंसा इत्यादि (अहि) अर्थात् उरगा भोगिनी इत्यादि (प्रेष्य)
दासी इत्यादि और जिस कन्या का (भीषण) कालिका चण्डिका
इत्यादि नाम हों उससे भी विवाह न करे। इन त्याज दोषणियों का
सर्वथा त्याग कर देना ही उत्तम है।
इस उपरोक्त विधि से परीक्षित स्त्री पुरुषों के परस्पर
विवाह होने पर ही सच्चा दाम्पत्य सुख मिल सकता है, अन्यथा
नहीं।
---:०:---
पुरुष भेद
चत्वारः पुरुषा ब्रह्मन्नामानि च यथाक्रमम् ।
शशो मृगो वृषश्चैव चतुर्थेस्तु )गस्तथा ॥
शशक, मृग, वृषभ और अश्व ये चार प्रकार के पुरुष माने
गये हैं।
---:०:---
शशक पुरुष
अल्पाहारल्पदर्पा लघुसुरतरताः शौचभाजो
धनाढ्याः । मानोदीर्णाः शशाःस्युः सुरभिरतजलाः
कान्तिमन्तःसह
असली कोकशास्त्र ७३
अल्पाहारी, अहंकार रहित, सम्भोग में जल्दी तृप्त होनेवाला,
धनवान, कान्तिवान, हमेशा प्रसन्न रहने वाला, शशक पुरुष
कहलाता है।
आताम्रस्फारनेत्रा लघु समदशना वस्तुर्लास्याः
सुवेषाः । मृद्वारक्तं वहन्तः करमतिललितं श्लिष्ट
शाखं सुवाच ॥ वृत्तव्यालोललीलाः सुमृदुशिरसिजा
नातिदीर्घा वहन्तो । ग्रीवां जानूरुहस्ते जघन चरणयो-
र्बिभ्रतः कार्श्य॑मुच्चैः ॥
बड़ी और सुर्ख आँख वाला, छोटे किन्तु समान दाँत वाला,
तिल मुख और सुन्दर प्रकृति वाला विच्छिन्न उगुलियों वाला सुन्दर
मुलायम और लाल हाथ वाला निरन्तर भोग की इच्छा रखनेवाला,
और जिसके सिर के बाल मुलायम हों, तथा जिसकी गर्दन चौड़ी
और नाटी हो, जिसके हाथ, पाँव तथा जंघायें लम्बी हों, उसे
शशक पुरुष जानो ।
मृदुवचनसुशीलः कोमलाङ्गः सुकेशः ।
सकलगुणनिधानः सत्यवादी शशोऽयम् ॥
मीठा बोलने वाला, सुशील, कोमलाङ्गी, सुन्दर केश वाला, सर्व
गुण सम्पन्न सत्यवादी शशक पुरुष कहलाता है ।
न खर्वो नातिदीर्घश्च गुरुद्विजपरायणः ।
विमुखः परदारेषु सदा परहिते रतः ॥
७४ असली कोकशास्त्र
न बहुत छोटा, और न लम्बा सामान्य कद वाला, ब्राह्मण
और गुरु-भक्त, परायी औरत को न चाहने वाला, परोपकारी,
स्वभाव वाला शशक पुरुष कहलाता है ।
साधू-i सङ्गमे चैव अनुगामी समुत्सुकः ।
लक्षणैर्लक्षितः श्रीमान् शशोऽयं देवपूजकः ॥
सत्पुरुषों की संगति करने वाला, सदाचारयुक्त, धनवान
देवताओं का पूजक शशक पुरुष कहाता है ।
गम्भीर वचनः शा तः न पापे विद्यते मनः ।
इतितॆ कथितं ब्रह्मन् शशकस्य च लक्षणम् ॥
गम्भीर वचन बोलने वाला, शान्ति-प्रिय, हमेशा पाप से दूर
रहने वाला शशक पुरुष कहाता है ।
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मृग पुरुष
वदति मधुरवाणीं दीर्घनेत्रोऽतिभीरु-
श्चपलमतिसुदेहः शीघ्रवेगो मृगोऽयम् ॥
विशाल नेत्र, मधुर भाषी, अत्यन्त डरपोक, बुद्धि-चपल,
सुन्दर शरीर वाला, तथा शीघ्र दौड़ने वाला पुरुष मृग संज्ञक
कहाता है ।
स्मितास्यः स्निग्धगात्रश्च बहाशी बलवान्सदा ।
नृत्यगीतप्रियो ब्रह्मन् मृगोऽयं पुरुषः स्मृतः ।