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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 440 में से

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पृष्ठ 68

असली कोकशास्त्र ६६
विवाह
विवाह का क्या अर्थ है यह जानना परम आवश्यक है।
“वि” पूर्वक “वह” प्रापणे धातु से विवाह शब्द बनता है।
जिसका अर्थ है—वर-कन्या दोनों का मिलकर विशेष रूप से
गृहस्थ धर्म का पलन करने के लिए, प्रेम तथा श्रद्धा पूर्वक एक
दूसरे को अन्तःकरण से स्वीकार करना—अर्थात् पति-पत्नि
परस्पर एक दूसरे के सुख दु ख को अपना सुख दुःख समझते
हुए, प्रेम भाव से गृहस्थ-सम्बन्धी कार्याँ का सम्पादन करें।
यह तभी हो सकता है जब दोनों में सच्चा प्रेमभाव हो। सच्चे
प्रेम की उत्पत्ति एक दूसरे के गुण दोष जानने के बाद ही होती
है। इसी लिए विवाह के पूर्व जन्मपत्री अर्थात् जीवनचर्या
(विद्या, बल, बुद्धि, आयु और चरित्र) मिलायी जाती है। भूल
इतनी ही है कि जन्म-दिन के ही गृह-दोष मिलाये जाते हैं।
चाहिए जन्म से लेकर विवाह काल तक के गृह-दोष मिलाना।
लोग गृह-दोष के स्थान पर ग्रह-दोष मिलाते हैं, यथार्थ में
चाहिए गृह-दोष। जो मनु भगवान ने मनुस्मृति में दिखलाये हैं।
हम पहले गुण दिखाकर फिर दोष भी दिखायेंगे—
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधिः ।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्वितान् ।
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।