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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 440 में से

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पृष्ठ 65

पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ।
समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात्कुशलो भिषक् ॥
ऊन षोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं गर्भस्थः स विपद्यते ॥
जातीवा न चिरं जीवेद् जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।
तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ॥
पच्चीस वर्ष का पुरुष और सोलह वर्ष की स्त्री परस्पर
सहवास कर सकते हैं। क्योंकि वे दोनों उस समय पूर्ण जवान
हो जाते हैं। उन दोनों का वीर्य परिपक्व और अङ्ग-प्रत्यङ्ग
परिपुष्ट एवं दृढ़ हो जाते हैं। इस अवस्था में दोनों का समान
बल, भावी सन्तान के लिये बड़ा लाभकारी होता है। सन्तान
बलिष्ठ और निरोग पैदा होती है। उपरोक्त अवस्था से कम आयु
वाले स्त्री-पुरुष में सम्बन्ध होने पर गर्भ नहीं ठहरता अर्थात
रह-रह कर गिर जाता है। रह भी गया तो बच्चा गर्भ में ही मर
जाता है। यदि किसी प्रकार पैदा भी हो गया तो दीर्घजीवी नहीं
होता। आजीवन रोगी दुर्बलेन्द्रिय ही रहता है। अवएव छोटी
अवस्था वाली स्त्री के साथ मैथुन न करना चाहिये। इसमें स्त्री-
पुरुष और सन्तान तीनों का ही कल्याण है।
किसान उस अन्न को खाता है जिसे धनीमानी छू नहीं
सकते, यहाँ तक कि अमीरों के घोड़े कुत्ते भी उससे कहीं
अच्छा खाना पाते हैं। इसी लिए नागरिक लोग किसान को