रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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का रोहिणी और दस वर्ष की का कन्या, उसके बाद् रजस्वला ।
माता पिता और बड़ा भाई यदि कन्या को रजस्वला देख लें तो वे
तीनों नरक को जाते हैं ।
“प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्” के न्याय से साफ मालूम हो रहा है कि
इन उपरोक्त श्लोकों के प्रचार ने तीनों को ही नहीं वरन आर्यसन्तान
मात्र को आज नरक में ढकेल दिया है । न इन श्लोकों का प्रचार
होता और न आज ऐसा रौरव-नरक देखना पड़ता ।
गर्म देशों में प्रायः तेरह-चौदह वर्ष की आयु में कन्यायें
रजस्वला होने लगती हैं । मनुस्मृति के आदेशा-नुसार छत्तीस
बार रजस्वला होने पर अर्थात् तीन वर्ष और जोड़ देने से
सोलहवें वर्ष के बाद सत्रहवें वर्ष को आयु विवाह योग्य सिद्ध
होती है और शीत प्रधान देशों में जहाँ जितनी न्यूनाधिक
शीत पड़ती है वहाँ उसी के अनुसार रजस्वला होती हैं ।
अर्थात् कहीं सत्रह और कहो बीस वर्ष की आयु से रजोधर्म
आरम्भ होकर तीन वर्ष के बाद् विवाह योग्य तैयार होती हैं ।
इसी लिये वेद, स्मृति आदि धर्मशास्त्रों ने आयु की कैद
वर्षों द्वारा न दिखाकर रजस्वला होने के तीन वर्ष बाद
दिखायी है ।
शरीर ज्ञान के विज्ञाताओं ने वेदानुकूल जो समय कम
से कम निश्चय किया है । वह बड़ा ही उत्तम और सुपरी-
क्षित है, जैसे सुश्रुताचार्य सुश्रुत संहिता में लिखते हैं—