रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ असली कोकशास्त्र
यदि माता पिता कन्या का विवाह करना चाहें तो अति
उत्कृष्ट शुभगुण-कर्म-स्वभाव वाले, कन्या के सदृश्य रूप
लावणयादि गुणयुक्त वर ही को चाहें। वह कन्या (वर)
माता की छः पीढ़ी के भीतर भी हो, तथापि उसी को कन्या
देना अन्य को कभी न देना कि जिस से दोनों अति प्रसन्न
होकर गृहाश्रम की उन्नति और उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति
करे ॥ १ ॥ चाहे मरण-पर्यन्त कन्या पिता के घर में बिना
विवाह के भी बैठी रहे। परन्तु गुणहीन असदृश अनमेल दुष्ट
पुरुष के साथ कन्या का विवाह कभी न करे और वर
कन्या भी अपने आप स्वसदृश के साथ ही विवाह करें ॥ २ ॥
जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे तब रजस्वला होने के
दिन से तीन वर्ष को छोड़ के चौथे वर्ष में विवाह करे अर्थात्
३६ बार रजस्वला होने के बाद विवाह में पदार्पण करना
चाहिए। वेद विरोधी वाममार्गियों ने निम्न कल्पित श्लोक
बनाकर उलटी ही गंगा बहा दी और आर्यजाति का मूल ही
तिरोहित कर दिया—
अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा च रोहिणी।
दशवर्षा भवेद् कन्या तत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥
माता तस्या पिता चैव ज्येष्ठो भ्राता तथैव च ।
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यांरजस्वलाम्॥
अर्थ—आठ वर्ष की पुत्री का नाम गौरी, नौ वर्ष की