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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 440 में से

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पृष्ठ 69

७० असली कोकशास्त्र
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हँस वारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम् ॥
॥ मनु ॥
अर्थ—यथावत् उत्तम रीति से ब्रह्मचर्य और विद्या को
ग्रहण कर गुरु की आज्ञा से स्नान करके, ब्राह्मण क्षत्रिय और
वैश्य अपने वर्ण की उत्तम लक्षण युक्त स्त्री से विवाह करे ॥ १ ॥
जो स्त्री माता की छः पीढ़ी और पिता के गोत्र की न हो, वही
द्विजों के लिये विवाह करने में उत्तम है। जिसके सुन्दर अंग,
उत्तम नाम, हँस और हस्तिनी के सदृश चालवाली, जिसके
सूक्ष्म लोम, सूक्ष्म केश और सूक्ष्म दाँत हों, जिसके अंग कोमल
हों, उस स्त्री से विवाह करे। इस प्रकार विवाह योग्य वर-
कन्या के गुण, कर्म और स्वभाव मिला लेने चाहियें। इसके
अतिरिक्त जो त्याज्य दोष हैं वे भी आगे दिखाये जाते हैं।
जिन दोषों का त्यागना परम आवश्यक और रहना बड़ा
खतरनाक है।
चाहे वे घर या खानदान बड़े धन-धान्य से परिपूर्ण गौ भैंस
घोड़ा हाथियों से भरे हुए भी क्यों न हों, विवाह में ये दश कुल
त्याग ही देने चाहियें—
महान्त्यपि समृद्धानि गोजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥