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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

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असली कोकशास्त्र ७१
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् ।
क्षय्यामर्याव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥
नोद्वहेत कपिलां कन्यां नाधिकांगीन रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥
नक्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥
अर्थ—१ पहला जिस कुल में उत्तम क्रिया न हो। २ दूसरा—
जिस कुल में कोई उत्तम पुरुष न हो। ३ तीसरा - जिस कुल
में कोई विद्वान न हो। ४ चौथा—जिस कुल में शरीर के
ऊपर बड़े बड़े लोम हों। ५ पाँचवाँ—जिस कुल में बवासीर
हो। ६ छठवाँ जिस कुल में क्षयी ( राजयक्ष्मा ) रोग हो,
७ सातवाँ—जिस कुल में अग्निमन्दता से आमाशय रोग हो।
८ आठवाँ—जिस कुल में मृगी रोग हो। ९ नोवाँ—जिस
कुल में श्वेत कुष्ठ और दशवाँ—जिस कुल में गलित कुष्ठ आदि
रोग हों, उन कुलों की कन्या अथवा उन कुलों के पुरुषों से
विवाह कभी न करें। पीले वर्ण वाली, अधिक अंग वाली जैसे
छंगुली आदि रोगवती, जिसके शरीर पर कुछ भी लोम न हों
और जिसके शरीर पर बड़े-बड़े लोम हों, व्यर्थ अधिक बोलने
वाली और जिसके पीले बिल्ली के सदृश्य नेत्र हों। तथा जिस
कन्या का ( ऋक्ष ) नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती रोहिणी
इत्यादि ( नदी ) जिसका गंगा, यमुना इत्यादि ( पर्वत )