रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
४२ असली कोकशास्त्र
शुद्ध रज की परख
शशासृक्प्रतिभं यत्तु यद्वा लाक्षारसोपमम् ।
तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरंजयेत् ॥
जिससे कपड़ा रंग देने पर किसी प्रकार की बदरंगी पैदा न
हो, खरगोश के खून के समान लाल रंग या लाख की तरह रंगीन
आर्त्तव शुद्ध रज कहाता है।
सन्तान उत्पन्न करने के लिए शुद्ध वीर्य, शुद्ध गर्भाशय और
शुद्ध रज की नितान्त आवश्यकता है। यदि ये शुद्ध न हों—
विकार-युक्त हों, तो गर्भ रहना कठिन हो जाता है। यदि गर्भ रह
भी जाता है तो सन्तान रोगी, कमजोर और अल्पायु होती है।
पहले हम शुद्ध वीर्य की पहचान बतलाते हैं। जो वीर्य सफेद हो,
न बहुत पतला हो और न गाढ़ा, चिकना हो, जिसमें सहद के
समान गन्ध हो, जिसके स्खलित होने पर किसी प्रकार की
वेदना न हो और जो पानी में डालने पर डूब न जाय उसे शुद्ध वीर्य
समझना चाहिये। यदि इससे भिन्न प्रकार के लक्षण पाये जायें
तो समझना चाहिए कि वीर्य में विकार है, गर्भाधान करने के
योग्य नहीं है। फिर किसी अनुभवी मनुष्य से वीर्य की शुद्धि के
लिए उपचार कराना चाहिए।
यह वीर्य पित्त, कफ, बात और रक्त आदि के प्रकोप से
असली कोकशास्त्र ४३
दूषित होता है। दूषित वीर्य की सुश्रुतसंहिता में यह पहचान
लिखी है:—
पित्त-दूषित वीर्य—इसमें वीर्य का रंग नीला और जर्द होता है
तथा स्खलित होते समय जलन होती है ।
कफ-दूषित वीर्य—यदि वीर्य का रंग सफेद हो किन्तु कुछ
जर्दी लिए हुए हो तथा स्खलित होते समय हलकी सी वेदना
( पीड़ा ) हो तो उसे कफ दूषित समझना चाहिए ।
वात दूषित वीर्य—यदि कुछ सुर्खी और कालिमा हो तथा
रुक-रुक कर स्खलित हो तो वात दूषित समझना चाहिए ।
रक्त-दूषित वीर्य—यह मटमैला और सुर्खी लिए हुए होता है ।
और इसमें मुर्दे की सी गंध होती है । स्खलित होते समय जलन
होती है तथा एक बार में बहुत सा वीर्य निकल जाता है ।
कफ-बात-मिश्रित दोष—यह दोष हो जाने पर वीर्य में गांठें
पड़ जाती हैं । इसी प्रकार कफ और पित्त का दोष होने पर वीर्य
मवाद ( पीप ) के समान होकर दुर्गन्ध-युक्त हो जाता है । जब
वीर्य में त्रिदोष होता है, तब उसमें मल-मूत्र की सी बू आने
लगती है तथा इनका कुछ अंश भी उसमें आ जाता है ।
५४ असली कोकशास्त्र
रजोदर्शन
इसका दूसरा नाम है मासिक-धर्म । भारत की स्त्रियाँ
साधारणतया १२-१३ वर्ष की अवस्था में ऋतुमती होती हैं ।
गर्म प्रान्तों में इससे कुछ पहले और ठंडे प्रान्तों में इससे कुछ
अधिक समय में स्त्रियाँ ऋतुमती होती हैं । किन्तु दुर्भाग्य की बात
है कि जहाँ शास्त्रकारों ने १६ वर्ष के पहले गर्भाधान करना निषेध
किया है, वहाँ ८-१० वर्ष की अवस्था में ही कितनी स्त्रियों को
गर्भ रह जाता है । इसका मूल कारण सामाजिक बुराई है ।
स्त्रियों तथा पुरुषों की अज्ञता के कारण ही यह अनर्थ होता है ।
बात यह है कि छोटी-छोटी कन्याओं को नीच पुरुष ऐसी बातें
सिखलाने लगते हैं और बड़ी उम्र की स्त्रियाँ भी कन्याओं के
सामने इस तरह की गोप्य बातें करने लगती हैं, जिसका
फल यह होता है कि लड़कियाँ उचित अवस्था से पहले ही
रजस्वला होने लगती हैं और कुसंगति में पड़कर दुराचारिणी
हो जाती हैं ।
मासेनोपचितं काले धमनोभ्यां तदार्तवम् ।
ईषत्कृष्णं विदग्धं च वायुर्योनिमुखं नयेत् ॥
महीने में एक बार स्त्रियों के गुह्यस्थान से एक प्रकार का
कुछ काला और दुर्गन्धयुक्त रक्त निकलता है, उसी को आर्त्तव
या ऋतु कहते हैं । इस रक्त का निकलना ३ से ६ दिन तक
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जारी रहता है। यदि इसके बाद भी रज का निकलना बन्द
न हो तो मासिक धर्म का दोष समझना चाहिए। यह क्यों
निकलता है, यह जानने के लिए पाठक-पाठिकाओं का उत्सुक
होना स्वाभाविक है; बात यह है कि स्वाभाविक नियमानुसार
१२-१३ वर्ष की अवस्था में बालिकाओं के गर्भाशय के
भीतर रक्त का संचार हेना शुरू होता है। इन दिनों गर्भाशय का
मुख कुछ-कुछ खुल जाता है और रक्त योनि मार्ग से होकर
बाहर निकलता है। इसको मासिक-धर्म कहते हैं, क्यों कि यह
हर महीने में होता है। यह लाल रंग का ओर तरल होता है।
इसका पहले-पहल निकलना रजोदर्शन कहलाता है और बाद
उसका नाम ऋतु, आर्त्तव, रजस्वला या मासिक-धर्म हो
जाता है। यहाँ पर यह जान लेना आवश्यक है कि गर्भाशय का
योनि से क्या सम्बन्ध है, क्योंकि यह जाने बिना इस बात का
समझना असम्भव हो जायगा कि गर्भाशय से वह आर्त्तव किस
प्रकार बाहर निकलता है।
जब गर्भ-स्थिति हो जाती है, तब मासिक-धर्म बन्द हो
जाता है। कितनी ही स्त्रियों को गर्भ-स्थिति में भी मासिक-धर्म
होता रहता है, पर ऐसा बहुत कम देखने में आता है।
तद्वर्षाद्द्वादशात्काले वर्तमानमसृक्पुनः ।
परिपक्वशरीराणां याति पंचाशतः क्षयम् ॥
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१२-१३ वर्ष से लेकर ४५-५० वर्ष की आयु तक स्त्रियों
का मासिक-धर्म प्रतिमास जारी रहता है, बाद बन्द हो जाता है ।
फिर स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर सकतीं। इसे रजो निवृत्ति कहते हैं ।
हम पहले ही कह आये हैं कि मासिक-धर्म में ऋतु-स्राव की
अवधि कम से कम १ दिन और अधिक से अधिक ६ दिन है ।
तथा इससे अधिक स्राव का होना रोग का लक्षण है । किन्तु बहुधा
३-४ दिन ही स्राव होता है। यह मासिक-धर्म रजो-दर्शन होने
के बाद २८-३० दिन पर बराबर होता रहता है। अधिक मैथुन
से अथवा रोगी शरीर होने से आर्त्तव आगे पीछे भी होता है
किन्तु यह बड़ा ही हानिकारक है। मासिक-धर्म ठीक महीने
भर बाद होना तन्दुरुस्ती का लक्षण है, यों तो एक दिन आगा-
पीछा हो जाय तो बात दूसरी है। मासिक-धर्म की गड़बड़ी से
गर्भाशय भी विकार-युक्त हो जाता है । अतः ऐसी अवस्था में
उपचार करना बहुत ही आवश्यक है । बहुत सी स्त्रियों को
मासिक धर्म के समय कुछ पीड़ा होती है। यह भी रोग का लक्षण
है । मासिक-धर्म में जरा भी वेदना नहीं होनी चाहिए। बहुधा
स्त्रियाँ मूर्खता के कारण इस बात को जानती ही नहीं कि मासिक-
धर्म का निश्चित समय पर होना तथा उस समय एक प्रकार
की वेदना का होना भी कोई रोग है । और जो जानती भी हैं, वे
इस बात को प्रकट करने में संकोच करती हैं । किन्तु यह बहुत
बुरी बात है । मासिक-धर्म में जरा भी गड़बड़ी होने पर उन्हें
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फ़ौरन प्रगट कर देना उचित है और फिर सावधानी के साथ किसी
अनुभवी व्यक्ति की दवा से उस गड़बड़ी को दूर कर देना उनका
कर्त्तव्य है। यदि इस दोष को बहुत जल्द नहीं हटाया जाता तो
स्त्री की तन्दुरुस्ती आजन्म के लिये नष्ट हो जाती है। फिर तो
दुनियाँ उनके मासिक-धर्म की खराबी को जान जाती है—जिसे
बतलाने में वे संकोच करती थीं, और रोग भी पुराना हो जाने पर
बड़ी कठिनाई से अच्छा होता है। इस लिए प्रत्येक स्त्री का
कर्त्तव्य है कि इस बात की शिकायत मालूम होने पर वह उपचार
करने में जरा भी विलम्ब न करे। इस बात को अनुचित लज्जा के
कारण छिपाना कदापि उचित नहीं। रोग में लज्जा किस बात की ?
भला जिस बात के ऊपर जीवन का सारा आनन्द, सुख और
शान्ति निर्भर है, उसको लज्जा के कारण छिपा कर जीवन को
चौपट करके जन्मभर कष्ट भोगना मूर्खता नहीं तो और क्या
है ? शरीर में व्याधि को पाल-पोस कर बढ़ाना ही मूर्खता है।
शत्रुको बढ़ाना उचित नहीं। जिस स्त्रीके मासिक-धर्म में अनिय-
मितता होती है यानी कभी दस-बीस दिन महीना भर अवधि के
आगे होता है और कभी दस पाँच दिन अवधि के पहले उस
स्त्री से पैदा होने वाली सन्तान कभी भी जीवित नहीं रहती—
अवश्य थोड़ी अवस्था में ही मर जाती है।
स्मरण रहे कि सन्तान पैदा करने में मासिक-धर्म की नियमता
प्रधान चीज है। मासिक-धर्म में स्त्रियों के शरीर का विकार
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निकल जाता है। ठीक समय पर रजस्वला होनेवाली स्त्रियों
का चित्त हमेशा प्रसन्न रहता है और महीने-महीने स्राव
बन्द होने के बाद तो उनका काया-कल्प सा हो जाता है। उस
समय उनके चेहरे पर स्वाभाविक ही रौनक आ जाती है, शरीर
हल्का हो जाता है, चित्त में प्रसन्नता का समावेश हो जाता है
और हृदय में अपूर्व शान्ति का स्रोत बहने लगता है। इसी से
रजो-धर्म होने पर स्त्रियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं
इस बात की महर्षियों ने पूरी ताकीद की है; जो कि आगे चलकर
बतलाया जायगा। यह कोई ऐसी-वैसी चीज नहीं है कि इस
पर ध्यान न दिया जाय।
यह आर्त्तव रक्तमय स्राव है और गर्भाशय से निकलता है।
यह रक्त की भाँति शीघ्र नहीं जम सकता। इसका रंग लाल
और कुछ कालिमा लिये होता है। आर्त्तव का परिमाण सब स्त्रियों
में समान नहीं होता। अधिकतर इसका परिमाण एक छटाँक से
चार छटाँक तक होता है। वैद्यक ग्रन्थों ने एक दिन में इस से
अधिक या कम स्राव का होना भी रोग का चिह्न बतलाया है।
ऋतुमती रहने तक प्रायः स्त्रियों की शारीरिक और मानसिक
दशा में परिवर्तन हुआ करता है; आलस्य और अरुचि की
अधिकता रहती है, कमर नितम्ब और पेडू में भारीपन रहता है।
४ असली कोकशास्त्र ४६
रजस्वला के कर्त्तव्य
ऋतुकाल में स्त्रियों को बड़ी ही सावधानी से रहने की
आवश्यकता है । क्योंकि सन्तानोत्पत्ति का कार्य यहीं से आरम्भ
हो जाता है । जिस प्रकार बीज डालने से पहले खेत को दुरुस्त
किया जाता है, उसी प्रकार गर्भ धारण करने के पहले स्त्री को
अपना मन शान्त करना पड़ता है । शास्त्रकारों का वचन है कि
ऋतुकाल में स्त्री कोई भी कार्य न करे और एकान्तवास करे ।
एकान्त में रहने से मन में शान्ति आती है । जिस प्रकार प्लेट
लगे हुए 'केमरा' ( चित्र खींचने का यंत्र ) के सामने जो दृश्य
आता है, उसी का चित्र प्लेट पर अंकित हो जाता है, उसी
प्रकार ऋतुकाल से लेकर प्रसव पर्यन्त स्त्री के मन पर पड़े हुए
प्रभावों का सन्तान पर असर पड़े बिना नहीं रहता । स्त्री को
चाहिए कि वह तीन या चार दिन तक गृहस्थी के सब कामों से
अलग रहे और शान्तिपूर्वक अच्छी-अच्छी बातों पर विचार
करे । ऋतुकाल से निवृत्त होने के बाद स्नान करे और सब से
पहले अपने स्वामी का दर्शन करे । इस के बीच में उसे ऐसे ढंग
से रहना उचित है कि जिस में किसी की भी सुरत उसकी आँखों
के सामने न आवे । कुछ अनुभवी विद्वानों का कहना है कि
ऋतुस्नान के बाद स्त्री पहले-पहल जिसे देखती है, उसी के रूप
का बच्चा उसके गर्भ से उत्पन्न होता है । कई जगह ऐसा
५० असली कोकशास्त्र
देखने में भी आया है। जो भी हो, इतना तो अवश्य कहा जायगा
कि यह समय स्त्री के शान्तिलाभ करने का है और संसार
के दृश्यों से अपने चित्त को खींच कर अपने स्वामी के प्रेम में
एकाग्र करने का है। इसलिए ऋतु-स्नान के बाद पति का दर्शन
करना ही उचित है ।
एकान्तवास में बहुत से गुण हैं। सब से बड़ा लाभ इस से
यह होता है कि अनायास ही बहुत सी बुराइयों से छुटकारा मिल
जाता है। उत्तम सन्तान पैदा करने के लिए बुराइयों से दूर रहना
बहुत जरूरी है। लिखा है: -
आर्तवस्त्रावदिवसादहिंसा ब्रह्मचारिणी ।
शयीतदर्भशय्यायां पश्येदपि पतिं न च ॥
अश्रुपात नखच्छेद मभ्यंग मनु लेपनम् ।
नेत्रयारञ्जनं स्नानं दिवा स्वापं प्रधावनम् ॥
अत्युच्च शब्द श्रवणं हसनं बहुभाषणम् ।
व्यायासं भूमिखननं प्रवातं च विवर्जयेत् ॥
ऋतुकाल में हिंसा करने वाली स्त्री की सन्तान निर्दयी और
हिंसा करने वाली होती है। जो स्त्री इस समय ब्रह्मचर्य का पालन
नहीं करतो उस के गर्भ से पैदा होने वाला बालक मुर्ख, अल्पायु
और व्यभिचारी होता है। इस समय स्त्री को कुशा की शय्या पर
सोना चाहिए और अपने पति का मुख भी न देखना चाहिए ।
मिट्टी के बर्तन में अथवा पत्तल पर खटाई, मिर्च मसालों से
असली कोकशास्त्र ५३
मन को बुरे कामों की ओर कभी भी बहकने न दे, क्षणिक आनन्द
के लिये गर्भाधान के अतिरिक्त अधिक पति-समागम न करे, ईश्वर-
पर दृढ़ विश्वास रक्खे। इस प्रकार के व्यवहार से रहकर जो
स्त्री तीसरे या चौथे दिन रजो-निवृत्ति होने पर शुद्ध स्नान करके
स्वच्छ वस्त्र पहन श्रृंगार आदि से सुसज्जित हो सन्तान की
कामना से पीछे कही गयी बातों पर विचार करके पति समागम
करती और गर्भ धारण करती है तथा प्राचीन ऋषियों के कथना-
नुसार आचरण करके गर्भ की रक्षा करती है, उसकी सन्तान
सर्वगुणसम्पन्ना, माता-पिता पर श्रद्धा-भक्ति रखनेवाली, सुन्दर
और संसार में प्रशंसा प्राप्त करने वाली अवश्य होता है, इस में
किसी तरह का सन्देह नहीं है।
यदि पुत्र की कामना हो तो स्त्री को आन्तरिक प्रेम-पूर्वक
अपने पति के मुखका दर्शन करना चाहिये अथवा जैसी सुन्दर
सन्तान की मन में लालसा हो उसी प्रकार के अत्यन्त सुन्दर
चित्र का अवलोकन करना चाहिये और उसका स्वरूप गर्भाधान
होने के समय तक अपने हृदय पर अंकित कर लेना उचित है।
उसे इतना ध्यान-पूर्वक देखना चाहिये कि आंखें बन्द कर लेने पर
भी वह चित्र ठीक-ठीक ध्यान में आ जाय। यदि कन्या की इच्छा
हो तो स्नान करने के बाद दर्पण में अपना मुख देखना चाहिये
अथवा किसी सुन्दरी स्त्री या स्त्री-चित्र को देखकर अपने हृदय में
अंकित कर लेना चाहिये।
५४ असली कोकशास्त्र
पति-पत्नि की योग्यता
सच्ची गृहिणी वही होती है जो घर के करने योग्य कार्यों
को स्वयं करे और नौकरों से लेने योग्य कार्यों को नौकरों से
ले। खाद्य पदार्थों को स्वयं बनाये। आय-व्यय का हिसाब-
किताब रखे। घर में कौन वस्तु है और कौन सी घट गयी
इस पर भी ध्यान रखे। बालकों की सफाई, खान-पान का
ख्याल तथा उनकी पढ़ाई, शिक्षा आदि का प्रबन्ध करे। समय
विभाग बनाकर उन्हें पढ़ाये और बुरी संगत में न जाने दे। शास्त्रीय
धार्मिक शिक्षा देती रहे। वेद मन्त्र तथा नीति के शिक्षाप्रद
श्लोक कण्ठ कराये। पाँच वर्ष की उमर तक बच्चे को मारे-
पीटे नहीं, बल्कि प्रेम प्रलोभन से काम ले। बच्चों के स्वास्थ्य
का विशेष ध्यान रक्खे। ऐसी कोई बात मुँह से न निकलने दे
जिसका प्रभाव उन पर बुरा पड़े। ये काम सुशिक्षित विदुषी गृहि-
णयों के हैं। वे जैसी चाहें वैसी सन्तान बना सकती हैं। अर्थात
त्यागी, धर्मात्मा, वीर, साहसी, योद्धा कर्मवीर बनावें या हिजड़ा,
डरपोक, झूठा, लवार, लम्पट, हिंसक दुराचारी बनावें। बच्चों
का यह नर-शरीर रूपी खिलौना उन्हीं की प्रतिकृति (तसवीर)
स्वरूप होता है। जैसा वे स्वयं बनती हैं, वैसा ही सन्तान को
बनाती हैं। पाँच वर्ष की आयु तक बालक का मन, बचन,
शरीर आइने की भाँति स्वच्छ होता है, वहाँ तक का काल
असली कोकशास्त्र ५५
स्त्रियों के ही साथ बीतता है। जैसा माता-पिता के संस्कार पुत्र
पर पड़ते हैं वैसा ही पुत्र बनता है। इस के बाद परिवर्त्तन करना
बड़ा ही कठिन है।
इस समय जैसी बिना पढ़ी-लिखी मूर्खा नारियें गृहिणी
बनी हुई हैं वैसा ही दुर्दशा गृहस्थ की भी है। न घर का
हिसाब-किताब ठीक है न बच्चों की हालत। हो भी कहाँ से ?
न तो पढ़ी-लिखी हैं न शिक्षिता। वाममार्गियों ने तो स्त्रियों
को कामवासना पूरा करने का साधन मात्र समझ लिया और
ऐसी कपोल-कल्पित श्रुतियें बना कर स्त्री जाति का पढ़ाना ही
रोक दिया है। अर्थात्—
स्त्री शूद्रो नाधीयाताम् ।
स्त्री औत शूद्र को न पढ़ाना चाहिये। जब स्त्रियों का पढ़ाना
रुक गया तब पुरुष भी मूर्ख रहने लगे। क्योंकि जैसा साँचा
होगा वैसी ही चीज बनेगी। जिस समय स्त्रियों के पढ़ने का
अधिकार नहीं छिना था; उस समय वीर-विदुषी ब्रह्म-वादिनी
उपदेष्ट्री नारियाँ होती थीं। उस समय वैसी ही उनकी सन्तानें
भी होती थीं। उसी समय के चरित्र को देख कर ही महात्मा
मनु ने भरतेतर देशों को चेतावनी दी थी कि—
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरितं शिक्षेरन् पृथ्व्यां सर्वमानवः ॥
५४ असली कोकशास्त्र
डंके की चोट से सभी देश देशान्तरों को मनु भगवान ने
चैलेञ्ज दिया था कि अय पृथ्वी के सम्पूर्ण मनुष्यो ! तुम
अपने अपने चरित्रों को भारतवर्ष के उत्पन्न अग्रजन्मा (ब्राह्मणों)
से सीखो।
उपरोक्त सिंहनाद से स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस देश के
शिक्षक उपदेष्टा इतने प्रवल-विद्वान् शस्त्रास्त्रवेत्ता, तार्किक,
नीतिज्ञ तथा सर्वशास्त्र पारंगत थे कि जिनका मुकाबिला कोई
अन्यदेशीय मनुष्य नहीं कर सकता था। किन्तु आज ठीक
उसके विपरीत दिखायी देता है। उनकी विद्वत्ता उन्हीं को खा
रही है, उनकी नीति उन्हीं के नाश का हेतु बन रही है। जिन
आर्य्य सन्तानों पर भरोसा रखकर उपरोक्त दावा किया गया
था वे शिक्षा ग्रहण करने के लिये दूसरे देशों की ओर लालायित
दृष्टि से देख रहे हैं। ऐसा क्यों ? क्या महात्माओं के वचन मिथ्या
अभिमानपूर्वक होते हैं ? ऐसा होना सर्वथा असम्भव है। क्योंकि
उन्हीं महात्मा मनु का वचन है—
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेषः धर्मः सनातनः ॥
सत्य बोलो, प्रिय बोलो। अप्रिय सत्य मत बोलो। किन्तु
प्रिय-झूठ भी मत बोलो। यहीं सनातन धर्म है। ऐसे महा-
त्माओं की चेतावनी मिथ्या कैसे हो सकती है। जो मीठे झूठ
असली कोकशास्त्र ५७
तक का भी निषेध करते हैं और कड़वे सत्य को भी झूठ के
बराबर त्याज्य समझते हैं। फिर ऐसी उलटी व्यवस्था क्यों ?
जहाँ वीरविजेता धनुर्धर राम, कृष्ण, अर्जुन के समान हुए,
वहाँ आज भीरु, डरपोक, तन-बल क्षीण आर्य्य सन्तान क्यों
दिखायी दे रही है ? इसका कारण स्पष्ट यही दीखाता है कि
वे लोग उसी सजीवन-बूटी को पान किये थे जिसके बल को
देखकर ही महात्मा मनु ने उपरोक्त सिंह गर्जना की थी। मेरा
मतलब उस सजीवन-बूटी से नहीं जो यति लक्ष्मण की मूर्छा
दूर करने के लिये महाबली हनुमान द्वारा लायी गयी थी।
मेरा तात्पर्य वेदामृतमयी शिक्षा से है। जबतक उसका प्रचार
रहा तबतक भारतवर्ष सब देशों का गुरु बना रहा। जब से
वैदिक ज्ञान की अवहेलना होने लगी, तब से आर्य्य सन्तान की
दुर्गति होने में भी कमी नहीं रही। आर्य्य जाति के पतन का
मूल कारण वेदशास्त्रानुकूल आचार-विचार का परित्याग
मात्र है।
अँगरेजी सभ्यता में पले हुए मनुष्य वेद-शास्त्रों का नाम
सुनते ही नीम चढ़े करेले की भाँति मुँह बिगाड़ लेते हैं। उन्हें
धर्मशास्त्रों में श्राद्धा नहीं, विश्वास नहीं, यहाँ तक कि वेदादि
शास्त्रों के पढ़े-लिखे विद्वानों से भी बड़ी घृणा करते हैं। यथा-
र्थतः इसमें उनका कोई विशेष दोष नहीं। क्योंकि उन्हें उसका
महत्त्व ही मालूम नहीं। जबतक किसी वस्तु के गुण-दोष का
५८ असली कोकशास्त्र
पता नहीं लग जाता तबतक मनुष्य उसके ग्रहण व त्याग की
इच्छा नहीं कर सकता । अबतक वेदों के नाम पर जो-जो मन-
माने कानून बनाये गये, उनका भयंकर परिणाम देखकर ही
लोगों के मन में उनके प्रति घृणा पैदा हो गयी । अन्यथा यदि
शुद्ध वैदकी शिक्षा का परिज्ञान उन्हें हो जाय तो वे कभी भी
विमुख रहने को तैयार नहीं होंगे। अपितु ऐसा अपनायेंगे कि
अन्ध विश्वासी भी नाक रगड़ते रह जायेंगे । क्योंकि वे मान
लेना ही अपना उद्देश्य नहीं समझते प्रत्युत् उस पर अमल
करना भी अपना कर्त्तव्य समझते हैं। किसी कवि ने ठीक
कहा है —
शास्त्राण्यधित्यापि भवन्तिमूर्खाः,
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ।
सुचिन्तितं चौषधमातुराणाम्,
न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ।
शास्त्रों को पढ़कर भी मनुष्य मूर्ख हैं, यदि वे पढ़े हुए के
अनुसार आचरण नहीं करते। जिस प्रकार रोग के लिये उत्तम
से उत्तम सोची हुई औषध नाम लेने मात्र से रोग को दूर
नहीं कर सकती, जब तक कि वह सेवन न की जाय । शास्त्रों
के वचन व्यर्थ हैं, जब तक उन पर आचरण न किया जाय ।
वेदों, को ठुकरा देने से ही आज भाई-भाई में विरोध पिता-
असली कोकशास्त्र ५६
पुत्र, माँ-बेटी, बहन-भाई चाचा-भतीजा स्त्री-पुरुष, जहाँ-तहाँ
सभी जगह ऐसा विरोध फैला हुआ है कि जिस किसी का
हक-बेहक छीन लेने के लिये प्राण की बाजी लगाये हुए हैं।
वेद का सच्चा उपदेश ग्रहण करने से भाई-भाई में भरत-राम,
पिता-पुत्र में दशरथ राम, स्त्री-पुरुष में सीता-राम, ऐसे-ऐसे अनेकों
दृष्टान्त वैदिक काल के इतिहास में पाये जाते हैं।
दाम्पत्य-जीवन में पदार्पण करने वाले स्त्री-पुरुषों की योग्यता
का वर्णन वेद में कैसा सुन्दर किया गया है।
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भान्तः ।
तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति
देवाः ॥
आचार्य्य ब्रह्मचारी का उपनयन संस्कार कर गर्भ में रखता
है। तीन रात तक उसे उदर में रखकर उसका भरण-पोषण
करता है। उस ब्रह्मचारी को बड़े-बड़े विद्वान देखने के लिये
आते है।' 'गर्भ' 'उदर' और तीन रात्रि से तात्पर्य्य गुरुकुल के
नियमों में बँधकर उत्तम, मध्यम, निकृष्ट, अर्थात् विद्याव्रत-
स्नातक, व्रतस्नातक, विद्यास्नातक, तीनों प्रकार के ब्रह्मचर्यों
से है।
उत्तम ब्रह्मचारी—जो सम्पूर्ण वेदों को सांगोपांग ब्रह्मचर्य
व्रत का पालन करते हुए पूरा करे।
६० असली कोकशास्त्र
मध्यम ब्रह्मचारी—जो दो वेदों को सांगोपांग ब्रह्मचर्य्यपूर्वक
समाप्त करे।
निकृष्ट ब्रह्मचारी—जो एक वेद को सांगोपांग ब्रह्मचर्य्यपूर्वक
समाप्त करे।
ये तीनों प्रकार के क्रम से ४८, ३६, २४, वर्ष के ब्रह्मचारी
होते हैं। क्योंकि एक-एक वेद के पढ़ने में बारह-बारह वर्ष
व्यतीत होते हैं। इसी मन्त्र के भाव को लेकर महात्मा मनु ने
भी कहा है—
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं चापि यथाक्रमम् ।
अविप्लुत ब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् ॥
अर्थ—अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदों को
अथवा एक वेद को भी यथाक्रम पढ़कर गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करे ।
उत्तम ब्रह्मचारी विद्वानों में बैठा हुआ कैसा प्रतीत होता है ।
तानि कल्पद् ब्रह्मचारी सलिलस्य पृष्ठे तपोतिष्ठत्त-
प्यमानः समुद्रे ।
सस्नातो बभ्रुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते ॥ अथर्व ॥
ब्रह्मचारी समुद्र के समान गंभीर, बड़े उत्तम व्रत ब्रह्मचर्य
में निवास कर, महातप को करता हुआ वेद-पठन, वीर्य निग्रह
आचार्य के प्रियाचरणादि कर्मों को पूरा कर, यथाविधि
सम्पूर्ण विद्या में स्नान करके विद्यार्थों की सुन्दरता से सौन्दर्य
असली कोकशास्त्र ६१
युक्त होके, पृथिवी में अनेक शुभ गुण कर्म और स्वभाव से
प्रकाशमान होता है ।
ब्रह्मचारी तीन समिधा लेकर गुरु के पास जाता है ।
उस समित्पाणि ब्रह्मचारी की कितनी सुन्दर उत्कृष्टता वेद में
कही है—
इयं समित्पृथिवी द्यौर्द्वितीयातान्तरिक्षं समिधा पृणाति
ब्रह्मचारी समेधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा-
पिपर्त्ति ॥ अथर्व ॥
तीनों समिधा उपलक्षण मात्र हैं । यथार्थतः पहली समिधा
से तात्पर्य है पृथिवी—अर्थात् भूगर्भ सम्बन्धी ज्ञान और दूसरी
से सूर्यलोक की गति-विधि का ज्ञान तथा तीसरी से अन्तरिक्ष
सम्बन्धी ज्ञान अर्थात् नक्षत्रादि सभी लोक लोकान्तरों के सम्बन्ध
रखने वाले ज्ञान को प्राप्त करने के लिये वह गुरु से प्रार्थना
करता है । गुरु की कृपा से जब वह सम्पूर्ण ज्ञानों से परिपूर्ण
हो जाता है तब वह स्वयं आनन्द पाता हुआ दूसरों को भी
आनन्दित करता है ।
ब्रह्मचर्येति समिधा समिद्धा कार्ष्ण
६२ असली कोकशास्त्र
जब विद्या से प्रकाशित और मृगचर्मादि धारण कर,
दीक्षित होके (दीर्घश्मश्रुः) ४० वर्ष तक दाढ़ी मूँछ आदि
पंच केशों का धारण करने वाला ब्रह्मचारी होता है, तब वह
पूर्व समुद्ररूप ब्रह्मचर्यानुष्ठान को पूर्ण करके गुरुकुल से उत्तर
समुद्र अर्थात् गृहाश्रम को शीघ्र प्राप्त होता है। वह सब लोगों
को संग्रह करके बराबर पुरुषार्थ और जगत को सत्योपदेश से
आनन्दित कर देता है।
जिस प्रकार पुरुषों को ब्रह्मचर्य और सविद्याओं के धारण
करने का अधिकार वेद में है, उसी प्रकार स्त्रियों को भी वेद की
आज्ञा है कि—
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ॥ अथर्व ॥
ब्रह्मचर्यपूर्वक कन्या युवा-पति को प्राप्त करती है।
स्त्री और पुरुष दोनों जब समान बल-वीर्य और विद्यादि
शुभ गुण कर्मों से युक्त हों तब वे विवाह के योग्य होते हैं।
इस मन्त्र में कैसा उत्तम युवा-युवती का परिणय काल कहा
गया है।
तमस्मेरा युवतयो युवानं मर्मृज्यमानाः परियन्त्यापः।
स शुक्रेभिः शिक्वभी रेवदस्मे दीदायनिद्यमो घृतनि-
र्णिगप्सु ॥ ऋग्वेद ॥
अर्थ—जो (मर्मृज्यमानाः) उत्तम ब्रह्मचर्य व्रत और
सद्विद्याओं से अत्यन्त (प्रवतयः) बीसवें वर्ष से चौबीसवें
असली कोकशास्त्र ६३
' वर्ष वाली युवती है। वे कन्यायें जैसे ( आपः ) जल वा नदी
समुद्र को प्राप्त होती है वैसे ( अस्मेराः ) हमको प्राप्त होने
वाली अपने अपने प्रसन्न अपने से ड्योढ़े वा दूने आयु वाले
( तम् ) उस ब्रह्मचर्य और विद्या से परिपूर्ण शुभ लक्षण युक्त
( युवानम् ) जवान पति को ( परियन्ति ) अच्छे प्रकार प्राप्त
होती है ( सः ) वह ब्रह्मचारी ( शुक्रेभिः ) शुद्ध गुण और
( शिक्वभिः ) वीर्यादि से युक्त हो के ( अस्मै ) हमारे मध्य में
( रेवत् ) अत्यन्त श्रीयुक्त कर्म को और ( दीदाय ) अपने
तुल्य युवति स्त्री को प्राप्त होवे जैसे ( अप्सु ) अन्तरिक्ष
वा समुद्र में ( घृतनिर्णिङ् ) जल को शोधन करने हारा
( अनिध्मः ) आप प्रकाशित विद्युत् अग्नि है इसी प्रकार स्त्री
और पुरुष के हृदय में प्रेम, बाहर अप्रकाशमान और भीतर
सुप्रकाशित रहकर उत्तम सन्तान एवं अत्यन्त आनन्द को गृहाश्रम
में दोनों स्त्री पुरुष प्राप्त होवें। ठीक इसी वेदमंत्र का भाव लेकर
मनु भगवान् कहा है:—
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च ।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्विचक्षणः ॥
काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्त्तुमत्यपि ।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती ।
ऊर्ध्वन्तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥