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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 440 में से

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पृष्ठ 43

४२ असली कोकशास्त्र
शुद्ध रज की परख
शशासृक्प्रतिभं यत्तु यद्वा लाक्षारसोपमम् ।
तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरंजयेत् ॥
जिससे कपड़ा रंग देने पर किसी प्रकार की बदरंगी पैदा न
हो, खरगोश के खून के समान लाल रंग या लाख की तरह रंगीन
आर्त्तव शुद्ध रज कहाता है।
सन्तान उत्पन्न करने के लिए शुद्ध वीर्य, शुद्ध गर्भाशय और
शुद्ध रज की नितान्त आवश्यकता है। यदि ये शुद्ध न हों—
विकार-युक्त हों, तो गर्भ रहना कठिन हो जाता है। यदि गर्भ रह
भी जाता है तो सन्तान रोगी, कमजोर और अल्पायु होती है।
पहले हम शुद्ध वीर्य की पहचान बतलाते हैं। जो वीर्य सफेद हो,
न बहुत पतला हो और न गाढ़ा, चिकना हो, जिसमें सहद के
समान गन्ध हो, जिसके स्खलित होने पर किसी प्रकार की
वेदना न हो और जो पानी में डालने पर डूब न जाय उसे शुद्ध वीर्य
समझना चाहिये। यदि इससे भिन्न प्रकार के लक्षण पाये जायें
तो समझना चाहिए कि वीर्य में विकार है, गर्भाधान करने के
योग्य नहीं है। फिर किसी अनुभवी मनुष्य से वीर्य की शुद्धि के
लिए उपचार कराना चाहिए।
यह वीर्य पित्त, कफ, बात और रक्त आदि के प्रकोप से