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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 440 में से

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असली कोकशास्त्र ४१
फ़ौरन प्रगट कर देना उचित है और फिर सावधानी के साथ किसी
अनुभवी व्यक्ति की दवा से उस गड़बड़ी को दूर कर देना उनका
कर्त्तव्य है। यदि इस दोष को बहुत जल्द नहीं हटाया जाता तो
स्त्री की तन्दुरुस्ती आजन्म के लिये नष्ट हो जाती है। फिर तो
दुनियाँ उनके मासिक-धर्म की खराबी को जान जाती है—जिसे
बतलाने में वे संकोच करती थीं, और रोग भी पुराना हो जाने पर
बड़ी कठिनाई से अच्छा होता है। इस लिए प्रत्येक स्त्री का
कर्त्तव्य है कि इस बात की शिकायत मालूम होने पर वह उपचार
करने में जरा भी विलम्ब न करे। इस बात को अनुचित लज्जा के
कारण छिपाना कदापि उचित नहीं। रोग में लज्जा किस बात की ?
भला जिस बात के ऊपर जीवन का सारा आनन्द, सुख और
शान्ति निर्भर है, उसको लज्जा के कारण छिपा कर जीवन को
चौपट करके जन्मभर कष्ट भोगना मूर्खता नहीं तो और क्या
है ? शरीर में व्याधि को पाल-पोस कर बढ़ाना ही मूर्खता है।
शत्रुको बढ़ाना उचित नहीं। जिस स्त्रीके मासिक-धर्म में अनिय-
मितता होती है यानी कभी दस-बीस दिन महीना भर अवधि के
आगे होता है और कभी दस पाँच दिन अवधि के पहले उस
स्त्री से पैदा होने वाली सन्तान कभी भी जीवित नहीं रहती—
अवश्य थोड़ी अवस्था में ही मर जाती है।
स्मरण रहे कि सन्तान पैदा करने में मासिक-धर्म की नियमता
प्रधान चीज है। मासिक-धर्म में स्त्रियों के शरीर का विकार