रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
पृष्ठ 44, कुल 440 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ४३
दूषित होता है। दूषित वीर्य की सुश्रुतसंहिता में यह पहचान
लिखी है:—
पित्त-दूषित वीर्य—इसमें वीर्य का रंग नीला और जर्द होता है
तथा स्खलित होते समय जलन होती है ।
कफ-दूषित वीर्य—यदि वीर्य का रंग सफेद हो किन्तु कुछ
जर्दी लिए हुए हो तथा स्खलित होते समय हलकी सी वेदना
( पीड़ा ) हो तो उसे कफ दूषित समझना चाहिए ।
वात दूषित वीर्य—यदि कुछ सुर्खी और कालिमा हो तथा
रुक-रुक कर स्खलित हो तो वात दूषित समझना चाहिए ।
रक्त-दूषित वीर्य—यह मटमैला और सुर्खी लिए हुए होता है ।
और इसमें मुर्दे की सी गंध होती है । स्खलित होते समय जलन
होती है तथा एक बार में बहुत सा वीर्य निकल जाता है ।
कफ-बात-मिश्रित दोष—यह दोष हो जाने पर वीर्य में गांठें
पड़ जाती हैं । इसी प्रकार कफ और पित्त का दोष होने पर वीर्य
मवाद ( पीप ) के समान होकर दुर्गन्ध-युक्त हो जाता है । जब
वीर्य में त्रिदोष होता है, तब उसमें मल-मूत्र की सी बू आने
लगती है तथा इनका कुछ अंश भी उसमें आ जाता है ।