रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
३७८ असली कोकशास्त्र
गरम जल परम औषध है ।
२६—रहने का मकान हमेशा हवादार और स्वच्छ होना
चाहिए । नंगे शरीर शुद्ध वायु सेवन से अनेक रोग दूर होते हैं ।
२७—नियमित आहार-विहार करने वाला कभी रोगी नहीं
होता और हो भी जाय तो शीघ्र स्वस्थ हो जाता है ।
२८—रोग, अग्नि और ऋण ये शेष रहने पर बढ़ते ही जाते
हैं । इस लिए इनको कभी शेष न रहने दे ।
२९—"मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः" मनुष्यों का
अपवित्र मन बन्धन का हेतु है और पवित्र मन मोक्ष का कारण
है । कामदेव को मन से उत्पन्न होने के कारण ही मनोज या मन-
सिज कहते हैं । वह यदि अपवित्र मन में पैदा होता है तो तन मन
धन सभी को बरबाद कर देता है और स्वच्छ मन में पैदा होकर
वही धार्मिक सन्तान भी पैदा करता है । मन के पवित्र विचार
कामदेव को भस्म कर देते हैं । इस लिए कामदेव हमारा परम शत्रु
है । वह सम्पूर्ण व्याधियों का घर है । इस लिए सद्विचारों द्वारा
उसका विनाश कर व्याधियों से छुटकारा पाना चाहिए और स्वच्छ
मन को मोक्ष का साधन बनाना हमारा परम कर्त्तव्य है ।
असली कोकशास्त्र ३७६
भोजन का परिमाण
एक स्वस्थ साधारण मनुष्य के लिए ३२ ग्रास और कसरती
के लिए ४० ग्रास तक भोजन करना चाहिए । क्योंकि परमात्मा ने
बत्तीस दाँत दिये हैं इस लिये बत्तीस ही ग्रास उचित हैं यदि
अधिक बलवान कसरती है तो सवायी मात्रा ४० ग्रास रक्खी गयी
है । रोगी के लिये आधी अथवा यथोचित खुराक होनी चाहिए ।
एक ग्रास एक तोलाभर की होना उचित है इससे अधिक नहीं ।
चालीस तोले का आध सेर और बत्तीस का डेढ़ पाव तैयार अन्न
होता है । इतना एक व्यक्ति के लिए पर्याप्त है । एक मसल है
“आधपाव रोगी, पावभर भोगी, आधसेर मर्द, और सेर भर बघ”
आधसेर से ऊपर सिवाय पेटू के और कौन खा सकता है । किन्तु
जिनको दुग्धादि पदार्थ प्राप्त नहीं हो सकते उनकी खुराक अधिक
बढ़ जाती है, क्योंकि तर पदार्थ स्वभावतः अन्न का भाग कम कर
देते हैं । इसी लिये आजकल लोगों की खुराक अधिक बढ़ी हुई है
क्योंकि उन्हें घी दुग्ध आदि तर पदार्थ प्राप्त नहीं हो रहे अतः शुष्क
खुराक बढ़ रही है । इसका परिणाम सिवाय रोग के और क्या हो
सकता हैं । इसी लिये उदर विकारों के रोग का प्रकोप हर ओर
दिखायी दे रहा है । यह भी मिथ्याहार कहाता है । दुग्ध घी की
रक्षा के लिये गो-रक्षा की परम आवश्यकता है । इसमें वनस्पति आदि
का घी दुग्ध काम न कर सकेगा । प्रत्युत उससे हानि ही होगी ।
३८० असली कोकशास्त्र
ग्रास चर्वण
एकग्रास कितनी बार चबाना चाहिए। परमात्मा ने उसकी संख्या
स्वयमेव निर्माण कर दी है अर्थात् जितने दाँत हैं उतनी ही बार
यदि एक ग्रास को चबाया जाय तो वह पिसकर इतना बारीक हो
जायगा कि उसका रस बहुत शीघ्र रस-वाहिनी नाड़ियें खींच लेंगी
और किसी प्रकार का रोग भी उत्पन्न नहीं होगा। प्यास भी कम
लगेगी। क्योंकि अधिक चबाने से मुख में लवाब बन जाता है जो
कण्ठ में खुश्की पैदा नहीं होने देता जिससे प्यास नहीं लगती ओर
पानी कम पीने में आता है। किन्हीं का सिद्धन्त है कि भोजन में
जल नहीं पीना चाहिए और घण्टा भर ठहर कर पीना चाहिए तथा
कोई भोजन के मध्य में अमृत कहते हैं जैसे कहा है—
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम् ।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम् ॥
अर्थ—अपच के समय जलपान ओषध का काम करता है और
पच जाने पर जलपान बल-वृद्धि करता है। भोजन के बीच थोड़ा
सा जलपान अमृत के तुल्य होता है और भोजन के अन्त में पानी
पीना विष के समान है।
भोजन के आरम्भ में तीन आचमन अवश्य कर लेना चाहिए
उससे कण्ठ गीला हो जाता है और प्यास पैदा नहीं होने देता।
असली कोकशास्त्र ३८१
भोजन के मध्य में जल पीने से अन्न की मात्रा घट जाती है, अन्यथा
अन्न का भाग अधिक हो जाने से आलस्य उत्पन्न करता है और
जल आलस्य विनाश करने वाला है। अत्यन्त ग्रास चबाने से प्यास
स्वयं ही कम लगती है और जो लगती भी है वह उचित ही है।
उसके अनुसार जल पीना अमृत कहा गया है यदि अधिक लगती
हो तो कोई उदर-विकार समझना चाहिए। तब भोजन कम कर
देना उचित है। घण्टाभर के बाद जब प्यास लगे तब थोड़ा-थोड़ा
कर खूब जल पीना उत्तम है इससे उदर-विकार पच जायगा। भोजन
के अन्त में भी तीन आचमन मात्र करके उठ जाना चाहिए। जिन
लोगों का मत भोजन में जल का निषेध है वे भोजन के अध घण्टा
पूर्व जल का विधान करते हैं। उसके विधान का भी यही आशय
निकलता है कि अन्न की मात्रा घटायी जाय। क्योंकि जब पेट में
जल रहेगा तो सुतरां अन्न कम खाया जायगा।
—०—
भोजन करने का समय
प्रातःकाल १० बजे से १२ बजे तक, और सायंकाल को ८ बजे
तक अवश्य भोजन कर लेना चाहिए। इसके पश्चात् भोजन करना
रोगों को निमन्त्रण देना है क्योंकि सूर्य के तेज की वृद्धि के साथ-
साथ हमारी जठराग्नि की भी वृद्धि होती जो अन्नपाचन में बड़ी
सहायता देती है और सायंकाल का भोजन अत्यन्त हलका और
३८२ असली कोकशास्त्र
स्वल्प होना चाहिए जो केवल जठराग्नि की सहायता से ही हजम
हो जाय । जैसे थोड़ा गर्म दूध थोड़ी चीनी डालकर धीरे-धीरे घूँट
घूँट कर पीना चाहिए। दवाई को छोड़कर रात को अधिक गर्म
दूध न पीना चाहिए क्योंकि उत्तेजना पैदा कर वह स्वप्नदोष भी
पैदा कर देता है।
ताजा भोजन
भोजन सदैव ताजा करना उत्तम है। बासी अन्न तमोगुणी
होकर बल, बुद्धि और आयु का हरने वाला है तथा रोगकर भी
होता है। इस लिए सर्वथा त्याज्य है। ताजा भोजन अवश्य हो
किन्तु अत्यन्त गरम न होना चाहिए, कवोष्ण (थोड़ा गरम)
अर्थात् शरीर की गर्मी के समान गरम हो। लोग बहुत गरम
भोजन करते, और उस पर अत्यन्त शीतल जल, गरमी के दिन हों
तो बरफ़ डालकर पीते हैं। वे बहुत ही बुरा करते हैं। क्योंकि
गरम भोजन से दाँत गरम हो जाते हैं और उन पर ठण्डा पानी
लगने पर गरम, सर्द मसूड़े हो जाते हैं। जिसका परिणाम यह होता
है कि असमय ही दाँत हिलकर गिर जाते हैं। दूसरे पानी भी
अधिक पीने में आता है जिससे बहज़मी रोग उत्पन्न हो जाता है।
ठण्डा भोजन करने से अधिक ठण्डा पानी पीने की विशेष इच्छा
नहीं होती और न अधिक पीने में ही आता है। गरम रोटी ठीक
चबाने में भी नहीं आती जो देर-हजम और अजीर्णता उत्पन्न करती है।
असली कोकशास्त्र ३८३
अहार विचार
फलाहार, दुग्धाहार, अन्नाहार, माँसाहार, रक्ताहार, मृतिका-
हार, काष्ठाहार, रसाहार, पवनाहार इस प्रकार मिलाकर नौ प्रकार
के आहार होते हैं। ये उपरोक्त आहार संसारी जीवों के हैं। जिनमें
से पहले के चार प्रसिद्ध और उत्तर के पाँच अप्रसिद्ध हैं। इस लिए
हम उलटी ओर से विचार करेंगे।
पवनाहार
सर्प का मुख्य आहार पवन है। वह मिट्टी और ओस भी
चाटता है। ऐसा अनुभवी लोगों का कहना है कि—
सर्पा पिवन्ति पवनं न च दुर्बलाःते,
कन्दैर्फलैर्मु निवराः क्षपयन्तिकालम् ।
इत्यादि वचनों से सर्प का पवनभक्षी होना स्पष्ट सिद्ध होता
है। इसी प्रकार गोजर, कानसलाई, बिच्छू आदि भी वायु-भक्षी
हैं। ये बड़े हितकारी जीव हैं क्योंकि वायु में रहने वाला विष ही
इनकी खुराक है, जो हम लोगों के शरीर से मल-मूत्र और श्वासादि
द्वारा निकला हुआ विष वायु में मिला होता है उसे ही ये खाते हैं
इसी लिए ये गन्दे स्थानों पर ही रहते हैं और साफ स्थानों पर नहीं।
यदि आप अपने घर साफ सुथरे रक्खेंगे तो वे वहाँ नहीं आयेंगे,
क्योंकि वहाँ उनकी खुराक नहीं मिलती। जब नये अन्न शाक-पात
३८४ असली कोकशास्त्र
घास आदि उत्पन्न होते हैं उस समय उनमें विष होता है उस
कभी विषैली घास को जो पशु खाता है, उसका पेट फूल जाता है
और वह मर जाता है। रात को जब ओस उन पर पड़ जाती है
तो उन घासादि का विष पत्तों पर पड़े ओस के विन्दुओं में आ
जाता है जिसे सर्प बड़े प्रेम से चाट लेता है। इसी लिए किसी
जीव को नहीं मारना चाहिए। क्योंकि परमात्मा ने इन्हें हमारे
हित के लिए रचा है।
रसाहार
जो जीव केवल रस पीकर ही जीते हैं उनको रसाहारी कहते
हैं। जैसे शहद की मक्खी, भ्रमर आदि ये सदैव फूल पत्तों आदि
के रसों को चूसते हैं और अपना जीवन निर्वाह करते हैं।
काष्ठाहार
काष्ठाहारी वे जीव हैं जो काष्ठ खाकर अपनी जीवन यात्रा
पूरी करते हैं। जैसे घुन या काष्ठ का कीड़ा जो काष्ठ में रहता और
काष्ठ ही खाता है। व्हाइल आट अर्थात् काठ में रहने वाले सफेद
कीड़े दोमक आदि।
मृत्तिकाहार
मृत्तिकाहारी वे ही जीव हैं जो मिट्टी खाते हैं। वे प्रायः बरसात
में पैदा होते हैं। जैसे,-केचुआ आदि, जब वे हगते हैं तो उनका
पाखाना रात को चमकता है। यह भगवान की अद्भुत महिमा है।
२५ असली कोकशास्त्र ३८५
रक्ताहार
रक्ताहारी वे जीव हैं जो केवल रक्तपान करके जीवन धारण
करते हैं। जैसे जूँ, खटमल आदि। इस प्रकार के जीव प्रायः
प्राणियों के शरीरों पर रहते हैं।
मांसाहार
मांसाहारी वे ही जीव हैं जो केवल अपना जीवन मांस से ही
यापन करते हैं। जैसे शेर, चीता आदि जो प्रायः जंगलों में रहते
हैं और जल में भी।
अन्नाहार
अन्न पर जिनका जीवन निर्भर है वे अन्नाहारी हैं। अर्थात्
मनुष्यादि अनेक जीव हैं।
दुग्धाहार
मनुष्य का दूसरा भोजन दुग्ध है। प्रायः अन्न के साथ इसे
दूध का आहार करना पड़ता है। क्योंकि इसके बिना रूक्ष भोजन
अधिक खाना पड़ता है। जो हानिप्रद होता है। दुध के बिना घी
भी नहीं मिल सकता जो परमावश्यक है। अस्तु-यह रहा मिलि-
ताहार। जब मनुष्य को योगाभ्यास की आवश्यकता पड़ती है तब
अन्न भारी और मलाबद्ध होता है—उस समय दूध ही उत्तम आहार
होता है जो तर पुष्ट और हलका होता है। बचपन में तो अनेक
३८६ असली कोकशास्त्र
जीव दुग्धाहारी होते हैं। किन्तु फिर नहीं रहते। मनुष्य ही बुद्धि
बल से अपनी लाभदायक वस्तुओं का संग्रह कर लेता है यही इसमें
पशु आदि से विशेषता है। इसी लिए इसे मनुष्य कहते हैं।
फलाहार
यह सबसे उत्तम आहार है। क्योंकि प्रकृति इन्हें बनाती है।
जमीन से पानी खिंचकर स्वच्छ छना हुआ जिसमें किसी प्रकार
का विकार नहीं रहता वह फल में संचित होता है और सूर्य की
किरणों के ताप से पकता है। जिस वस्तु पर सूर्य का प्रकाश और
सूर्य की गरमी तथा चन्द्र की सुधावर्षिणी रश्मियों का संसर्ग हुआ
हो तथा जिसने वायु के पवित्र झोकों में कई महीने दिन रात अठ-
खेलियाँ की हों। वह अमृत रस भरा प्रकृति देवी का पैक किया हुआ
ताजा फल, जब हमें मिले तब भला उसकी बराबरी कौन कर
सकता है। सबसे अधिक स्वास्थ्यप्रद बल और तेज को देने वाला
है। बानर को देखो कितना छोटा होता है और बड़े से बड़े पेड़ को
हिला डालता है, छोटी-छोटी भुजाओं के बल कितना लम्बा कूदता
है। तथा कितनी फुरती रखता है। वह अधिक फलों का ही सेवन
करता है। अन्न की अपेक्षा इससे मल बहुत कम तैयार होता है।
अधिक से अधिक लाभ देने वाली वस्तु हमें फलों से मिलती है।
फलों से कन्द, मूल, शाकपात, आदि सभी का ग्रहण हो जाता है।
—०—
असली कोकशास्त्र ३८७
मनुष्य का आहार मांस नहीं
माँस मनुष्य का आहार नहीं। क्योंकि इसको रचना मांस -
हारियों के साथ नहीं मिलती प्रत्युत निरामिष भोजियों के साथ
मिलती है। मनुष्य को तटस्थ मानकर दो प्रकार के जीवों का
विचार किया जाता है। एक मांसभोजी और दूसरे निरामिषभोजी।
इन दोनों में से जिसके आहार-विहार के साथ इसका मिलान हो
जायगा वह उसी श्रेणी का आहार भोगी समझा जायगा ।
जैसे शेर, बिल्ली, गिद्ध आदि मांसहारी पशु-पक्षियों के पंजों के
नाखून ऐसे पैने मजबूती और घूमे हुए होते हैं कि जो शिकार को
बड़ी मजबूती से पकड़ चोर फाड़ कर सकते हैं। परमात्मा ने उन्हें
उनको खुराक खाने के लिये वैसे ही औजार भी दिये हैं। जो कच्चे
मांस को चीर-फाड़ सकें। यदि मनुष्य भी मांसहारी होता तो उसे
भी वैसे ही साधन दिये जाते। उसे तक़ज़ो छुरों काँटे आदि औजारों
की आवश्यकता न पड़ती। किन्तु ऐसा नहीं, उसके नाखून के
सामने बहुत ही कमजोर और सीधे होते हैं। मांस को चारना-
फाड़ना तो दूर रहा, वे थोड़ा बढ़ जाने पर जरा सो ठोकर स्वयं
ही टूट जाते हैं। अधिक क्या, इससे दोनों की बनावट का अन्तर
स्पष्ट दिखलायी दे रहा है। हाँ, निरामिषभोजी जीव अर्थात् गाय
भैंस बकरी आदि के साथ अवश्य मनुष्य का मिलान होता है।
उनके पंजे भी सादे होते हैं।
३८८ असली कोकशास्त्र
बिल्ली शेर आदि जितने मांसहारी जीव होंगे, वे सब रात को
अन्धकार में अपनी खुराक खोजेंगे और पेटभर, दिन में कहीं छिप-
कर सो रहेंगे इसी लिए इनको निशाचर भी कहते हैं। इनकी नेत्र-
ज्योति सूर्य का प्रकाश सहन नहीं कर सकती और दिन में सजग
जीव भी इनके हाथ में कब आयेंगे। रात में थके-माँदे बेखबर
सोये जीवों पर इनकी बन आती है। मांसहारी को गरमी भी बर-
दास्त नहीं होती। वे थोड़े परिश्रम में थक कर हार जाते हैं। इनके
नेत्रों में इतनी शक्ति है कि उन्हें रात को भी दिन की भाँति दिखाई
देती है, किन्तु जो निरामिष-भोजी हैं वे दिन में खायेंगे और रात
को आराम से सोयेंगे। वे परिश्रम से थकते नहीं और उन्हें रात
को मनुष्य की भाँति दिखलायी देता है मांसहारी जीवों की आँखें
रात को दीपक के सामने अंगारे की भाँति चमकती है और निरा-
मिषियों की नहीं।
मनुष्य भी दिन में सब काम करता है, निरामिषियों की भाँति
रात को सो जाता है इसकी आँखें भी नहीं चमकतीं। चारों वेद
और छः शास्त्रों के ज्ञाता, दशानन अर्थात् पौलस्त्य मुनि के नाती
महाप्रतापी रावण को भी केवल निशाचरी माँस भोजन के कारण
ही निशाचर कहा गया। इस लिए इस निशाचरी भोजन का मनुष्य
मात्र को सर्वथा त्याग करना उत्तम है।
माँसहारी जीव जब पानी पीते हैं तब जबान से उठाकर अर्थात्
लपलपा कर पीते हैं। निरामिष-भोजी दोनों ओठ मिला खींचकर
असली कोकशास्त्र ३८६
पीते हैं। मनुष्य भी ओंठों से खींचकर ही पीता है।
दाँत तीन प्रकार के होते हैं। कृन्तन, छेदन और पेषण इनमें
से कृन्तन दाँत मांसहारियों के होते हैं जो नोकिले गोल ओर टेढ़े
होते हैं। जिनका काम छेद करना और चीर डालना है। ये दाँत
आगे रहते हैं, इनके पीछे छेदन करने वाले होते हैं अर्थात् जो अलग
अलग मांस के टुकड़े कर देते हैं। ओर पेषण करने वाले दाँत
आमिषभोजियों के नहीं होते। क्योंकि उन्हें पीसने की आवश्यकता
नहीं पड़ती। वे केवल टुकड़े के टुकड़े निगल जाते हैं ओर उन्हें
हजम हो जाते हैं। क्योंकि परमात्मा ने उनके उदर की जठराग्नि
इतनी तीव्र रक्खी है कि वह कच्चे माँस के टुकड़े भी हजम कर
सके और उन्हें अजीर्ण भी न हो, निरामिष-भोजी जीवों के भी दो
प्रकार के दाँत होते हैं एक छेदक ओर दूसरे पेषक। इनके कृन्तन
दाँत नहीं होते क्योंकि इन्हें किसी वस्तु को दाँतों से चीरने की
आवश्यकता नहीं पड़ती। मांसाहारियों के आगे के कृन्तन ओर
पीछे के छेदक होते हैं। किन्तु निरामिषियों के आगे के छेदक और
पीछे के पेषक होते हैं। ये आगे के दाँतों से प्रत्येक वस्तु को दो
टुकड़ों में विभाजित कर देते हैं अर्थात् एक मुँह में ओर दूसरा
बाहर । आगे के दाँतों से कटे हुए टुकड़े को पिछले पेषक दाँतों से
पीस कर पेट में पहुँचा देते हैं। मनुष्य के भी यही दोनों दाँत होते
छेदक ओर पेषक। भेद इतना ही होता है कि मनुष्य छेदक ओर
पेषक से क्रमशः एक साथ काम लेता जाता है ओर पशु पहले
१६० असली कोकशास्त्र
केवल छेदक से टुकड़े-टुकड़े करके पेट की एक थैली में पहुँचाते
जाते हैं और फिर जल पी बैठ अथवा खड़े रहकर ही, दोबारा
अन्दर से मुँह में निकाल कर पेषक दाँतों से पीसते हैं और फिर
जठराग्नि में पहुँचा देते हैं।
मांसाहारी जीव का जब बच्चा पैदा होता तब उसकी आँखें
बहुत दिनों तक बन्द रहती हैं। वे बच्चे अन्धे के समान पड़े रहते
हैं। किन्तु निरामिषियों के बच्चे पैदा होते ही थोड़ी देर में आँख
खोल देते हैं।
इस प्रकार बहुत सी भेद की बातें परमात्मा ने आमिषभोजी
और निरामिषियों में रक्खी हैं। मनुष्य यदि इतने पर भी न समझे
तो इसमें किसका दोष ? यदि उल्लू को दिन में न दिखलायी दे तो
इसमें सूर्य का क्या दोष ? सच कहा है—
नोलूकं विलोकते यदि दिवा,
सूर्यस्य किंदूषणम् ।
नाखून आदि औजारों का होना, रात्रि का आहार करना, रात
को आँखों का चमकना कृन्तन और छेदन दाँतों का होना, छेदन के
साथ पेषण का न होना, अर्थात् पीसकर न खाना, लपलपा कर
जबान से पानी पीना, जन्म होने पर अनेक दिन तक जन्मान्ध रहना
ठीक इसके विपरीत निरामिषभोजियों का वैसे तीखे कुण्ठित नाखूनों
का न होना, दिन में आहार करना, रात्रि को आँखों का न चमकना
छेदक और पेषक दाँतों का होना तथा कृन्तन का न होना, ओठ से
असली कोकशास्त्र ३६१
खींच कर पानी पीना, लपलपा कर नहीं, जन्मते ही आँखों का
खुलना, बन्द रहना । इन दोनों पशुओं में कितना भारी अन्तर है ।
इस तुलना से देखे कि वह निरामिषभोजियों की समता रखता
है या आमिषभोजियों की । इस प्रकार मिलान करनेसे स्पष्ट मालूम
हो जायगा कि मनुष्य निरामिषियों का ही सहयोगी है आमिषियों
का नहीं । इस लिए उसे मांस अवश्य त्याग देना चाहिए ।
शास्त्रविधि से भी निषेध पाया गया और ईश्वरीय रचना से
भी यही सिद्ध हो रहा है कि मनुष्य की खुराक मांस नहीं । योरुप
आदि देशों के अनुभवी डाक्टर भी इसका निषेध कर रहे हैं और
स्पष्ट आदेश कर रहे हैं कि यह बहुत हानि पहुँचाने वाला है। अब
हम एक दूसरी विधि से भी प्रकाश डालना चाहते हैं जो हमारे इस
प्रकृत विषय से सम्बन्ध रखता है—
स्वास्थ्य और मांस
माँस स्वास्थ्य के लिये कैसा है ? विचार करने से यह मालूम
होता है कि माँस खाने से जितनी बड़ी और जल्दी बीमारी पैदा
होती है उतनी और किसी से नहीं। जिस प्रकार से मनुष्य को
संक्रामक रोग होते हैं उसी प्रकार पशु-पक्षियों को भी होते हैं।
मानिये किसी तपेदिक के रोगी ने कफ थूका या दमे के रोगी ने
थूका; उस कफ को मुर्गा-मुर्गी ने खाया जो प्रायः गली कूचों और
कतवारखानों में ढूँढ़-ढूँढ़ कर खाया करते हैं। और उसका विषैला
३६२ असली कोकशास्त्र
असर उस जानवर के माँस में प्रविष्ट हुआ । उस जीव को जो कोई
भी खायगा उसे बीमारी क्यों न होगी। लोग यह कहते हैं कि मुर्गी
को वह रोग क्यों नहीं हुआ ? सम्भव है मुर्गी उस रोग से पीड़ित
हो या न हो। किन्तु उसका असर उसके माँस में तो अवश्य रह
सकता है। इसका प्रतिवाद कोई नहीं कर सकता। जिसका अकाट्य
प्रमाण आगे दिया जाता है। जिस चील्ह ने मरा हुआ सर्प खाया
हो, उसकी बीठ कुत्ता खा लेने से पागल हो जाता है और वह
कुत्ता जिस-जिस को काटता है, यदि उसकी यथोचित औषध न की
जाय तो वह अवश्य मर जाता है।
इस उदाहरण में देखा जाता है कि खाये हुए सर्प के विष से
चील्ह और गीध नहीं मरते और न पगलाते ही हैं। किन्तु उसकी
बीठ खाने वाले कुत्ते स्यार आदि जीव पगलाते और मरते भी हैं।
क्या बीठ मात्र में उसके विष का असर खतम हो जाता है। उत्तर
स्पष्ट है नहीं, क्योंकि देखा जाता है, चील्ह का मांस कोई जीव
नहीं खाता और न गलाने से गलता ही है। इसका क्या कारण ?
इसका कारण है सर्प के विष का असर है, क्योंकि देखा जाता है
जिस मनुष्य को सर्प काट लेता है उसे भी कोई जीव या जल-जन्तु
नहीं खाते। इससे स्पष्ट हो गया कि सर्प का विष ही इसका कारण
है, जो मनुष्य और सर्पाहारी जीवों के शरीर में व्याप्त होता है।
—o—
असली कोकशास्त्र ३६३
प्राणायाम का फल
वायु में बड़ी शक्ति है। जब वह मोटर के टायर में भर दी
जाती है तब वह कितने वजन को कितनी आसानी से हवा की तरह
उड़ा ले जाती है, यह बात किसी से छिपी नहीं। प्रो० राममूर्त्ति
इसी के बल पर अस्सी मन का पत्थर छाती पर रखते थे और हाथी
को पीठ पर चढ़ाते थे। वायु का शरीर में संग्रह प्राणायाम से ही
होता है। प्राणायाम कहते हैं, प्राण के आयाम अर्थात् प्राण की
लम्बाई को। प्राण के लम्बा बढ़ा लेने से योगियों की आयु बढ़
जाती है। इस लिए जो भी प्राणायाम करेगा वह अवश्य स्वस्थ
ताक़तवर होगा और उसकी जीवन-शक्ति बढ़ेगी।
प्राणायाम में तोन क्रियायें करनी पड़ती हैं। पहली क्रिया पूरक
अर्थात् प्राणवायु को अत्यन्त धीरे-धीरे नासिका द्वारा अन्दर
खींचने का नाम पूरक है। दूसरी क्रिया कुम्भक अर्थात् भीतर
खींची हुई वायु को, खींचने के दुगुने तिगुने काल तक अन्दर रोक
रखने का नाम कुम्भक है। तीसरी क्रिया रेचक अर्थात् भीतर ली
हुई वायु को अत्यन्त धीरे-धीरे बाहर निकालने का नाम रेचक है।
पहली ओर तोसरी क्रिया करने में वायु के जाने का शब्द अपने को
भी सुनायी नहीं देना चाहिए।
धीरे-धीरे प्राणायाम का काल बढ़ाना चाहिए, एक साथ
बढ़ाने से लाभ के स्थान में हानि होने की सम्भावना है।
३६४ असली कोकशास्त्र
जल
जल हमारे बहुत काम में आता है। इसके बिना हमारा एक
भी काम नहीं चलता, आटा सानने दाल, भात, तरकारी आदि
सभी खाद्य वस्तुओं के बनाने तथा पीने के काम में आता है। हमारे
शरीर तथा भोजन में सत्तर फीसदी जल का अंश माना गया है।
इस लिए जल के दूषित होने से भी हमारा स्वास्थ्य बहुत शीघ्र
खराब हो सकता है। हलका जल मधुर तथा स्वादिष्ट है और
वह हमारे लिए स्वास्थ्यप्रद् भी है। भारी पानी नहीं। वह पीने में
खारी होता है। उसे यदि पीना पड़े तो औटाकर पीना चाहिए, तब
कोई हानि नहीं पहुँचायगा। जल हमेशा मोटे कपड़े से छानकर
पीना चाहिए। मनुष्य को प्रतिदिन दिनभर में अन्न से अठगुना
जल पीना चाहिए। ऋतु अनुसार कमोवेश भी किया जा सकता है।
जब नगर में रोग फैल जाता है अथवा फैलने की सम्भावना
होती है तब प्रायः बराबर देखने में आता है कि म्युनिसिपैलिटी की
ओर से नगर के सभी कुओं में लाल बुकनी डाली जाती है। इसका
प्रयोजन केवल रोगकारक कीटाणु मारकर जल साफ करना होता
है। अनेक स्थानों पर बिना बुझा चूना भी डालते हैं, उससे भी
यही लाभ होता है।
—०—
असली कोकशास्त्र ३६५
सिगरेट और बीड़ी
यह दोनों चीजें बहुत ही विषधर हैं, बीड़ी की अपेक्षा सिगरेट
में दुने नशे का प्रयोग किया जाता है। एक तमाखू दूसरा अफीम,
तमाखू के पत्तों पर अफीम का पानी छिड़का जाता है यदि नशा
अधिक तेज करना हो तो अफीम के पानी में पत्ते भिगो दिये जाते
हैं जो नशा बहुत लाते हैं। “नीम चढ़े करेले” की तरह इनका
असर होता है। इनका पीनेवाला यदि इन्हें छोड़ना चाहे तो कठि-
से छोड़ पाता है। बीड़ी, तमाखू, सिगरेट, भाँग, चाय, काफी,
कोको, आदि नशीली चीजों पर अब हम विशेष और कुछ अधिक
न लिखकर सर्व देश प्रसिद्ध महात्मा गाँधी के लिखे आनुभविक
भोजन विषयक लेख का कुछ अंश यहाँ नीचे उद्धृत कर देते हैं ।
“हमें कौन सी चीज खानी चाहिए, इसके पहले यह देख लेना
आवश्यक है कि हमें कौन सी चीज न खानी चाहिए । मुख की
राह से शरीर के अन्दर जाने वाली चीजों की गिनती यदि हम
अनाज शब्द में करें तो शराब, बीड़ी, तम्बाकू, भाँग, चाय, काफी
कोको और मसाला इत्यादि भी अनाज ही है ।
मुझे अनुभव से मालूम हुआ है । यह सब चीजें छोड़ने के
लायक हैं, इनमें से कुछ चीजों का अनुभव तो खुद ही किया है,
और कुछ के सम्बन्ध में दूसरों के अनुभव से लाभ उठाया है ।
शराब और भाँग को हर धर्म दूषित ठहराया गया है। फिर
३६६ असली कोकशास्त्र
भी शायद ही कोई इनके पीने से परहेज करता हो । शराब से
हजारों घर धूल में मिल गये । लाखों आदमियों का सत्यानाश हो
चुका । शराबी को किसी बात का ज्ञान नहीं रहता । प्रायः वह
माता, स्त्री और लड़की का भेद तक भूल जाता है । शराब से मनुष्य
का मेदा जल जाता है अन्त में वह पृथिवी का भार हो जाता है ।
शराबी मोरियों में पड़े नजर आते हैं अच्छा मनुष्य भी शराब से
कौड़ी का तीन हो जाता है । इस व्यसन से घिरे मनुष्य, होश-
हवास ठीक होते भी निकम्मे देख पड़ते हैं । मन पर उनका अधि-
कार नहीं होता, सदा शेखचिल्लियों के से मनसूबे बाँधा करते हैं ।
इस लिए शराब और इसी की सगी बहन भाँग दोनों चीजें बिलकुल
त्यागने योग्य हैं; इसमें दो मत नहीं हो सकते । कुछ लोग कहते हैं,
दवा की भाँति शराब पीने में कोई हर्ज नहीं । परन्तु असल में इतनी
की भी जरूरत नहीं । यूरोप—जो शराब का घर है—उन डॉक्टरों
की भी यही राय है । पहले अनेक बीमारियों में शराब काम में
आती थी, परन्तु वहाँ अब बिलकुल बन्द हो गई है । असल में तो
दवा की दलील ही निराधार है । शराब के पक्षपाती दिखाना चाहते
हैं कि जब शराब दवा के काम में आ सकती है, तब उसे पीने के
काम में लाना क्या बुरा है । परन्तु विष भी तो दवा की भाँति काम
आता है तो भी कोई उसे खुराक की भाँति बरतने का विचार
तक नहीं करता । हो सकता है, कुछ बीमारियों में शराब से लाभ
पहुँचे, पर हानि इतनी हो चुकी है कि विचारवान मनुष्य को चाहिए
असली कोकशास्त्र ३६७
कि जान जाने दें, पर शराब दवा की भी न ले। शराब से इस
शरीर की भलाई होने में जहाँ सैकड़ों मनुष्यों को बुरा होता है वहाँ
ऐसे शरीर की रक्षा न कर उसे नष्ट ही हो जाने देना चाहिए।
हिन्दुस्तान में लाखों मनुष्य ऐसे हैं जो वैद्य के कहने पर भी शराब
न पीवेंगे। वे शराब पीकर वा अपनी समझ में बुरी चीजों का
प्रयोग कर जीना नहीं पसन्द करते। अफीम का विचार भी शराब
के साथ ही करना चाहिए। अफीम का नशा शराब से भिन्न है;
फिर भी उससे शराब से कम बुराई नहीं होती। अफीम के फेर में
पड़कर चीन जैसे बड़े राष्ट्र की प्रजा पायी हुई स्वतन्त्रता खो बैठी।
हमारे जागीरदार भी अफीम के चंगुल में पड़कर अपनी-अपनी
जागीरों से हाथ धो बैठे।
शराब भाँग और अफीम की बुराइयाँ तो साधारण पाठकों
की समझ में तुरन्त आ जाती हैं, और बीड़ी तम्बाकू की नहीं
आतीं। बीड़ी और तम्बाकू ने मनुष्य जाति पर अपना ऐसा असर
जमा रखा है कि उसके मिटने में एक जमाना लगेगा। छोटे-बड़े
सभी इसके फेर में पड़े हैं। अच्छे भलेमानस भी बीड़ी सिगरेट का
व्यवहार करते हैं। इनके पीने में कोई शरम नहीं समझी जाती।
मित्रों की खातिर का यह एक महान् साधन बन गई है। दिन-दिन
इनका प्रचार बढ़ता जाता है सर्वसाधारण को इस बात की खबर
नहीं कि सिगरेट का व्यसन बढ़ाने के लिए सिगरेट के व्यापारी
लोग उसकी बनावट में हजारों तरकीबें लड़ाते हैं। जर्दे तम्बाकू में