रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ३६१
खींच कर पानी पीना, लपलपा कर नहीं, जन्मते ही आँखों का
खुलना, बन्द रहना । इन दोनों पशुओं में कितना भारी अन्तर है ।
इस तुलना से देखे कि वह निरामिषभोजियों की समता रखता
है या आमिषभोजियों की । इस प्रकार मिलान करनेसे स्पष्ट मालूम
हो जायगा कि मनुष्य निरामिषियों का ही सहयोगी है आमिषियों
का नहीं । इस लिए उसे मांस अवश्य त्याग देना चाहिए ।
शास्त्रविधि से भी निषेध पाया गया और ईश्वरीय रचना से
भी यही सिद्ध हो रहा है कि मनुष्य की खुराक मांस नहीं । योरुप
आदि देशों के अनुभवी डाक्टर भी इसका निषेध कर रहे हैं और
स्पष्ट आदेश कर रहे हैं कि यह बहुत हानि पहुँचाने वाला है। अब
हम एक दूसरी विधि से भी प्रकाश डालना चाहते हैं जो हमारे इस
प्रकृत विषय से सम्बन्ध रखता है—
स्वास्थ्य और मांस
माँस स्वास्थ्य के लिये कैसा है ? विचार करने से यह मालूम
होता है कि माँस खाने से जितनी बड़ी और जल्दी बीमारी पैदा
होती है उतनी और किसी से नहीं। जिस प्रकार से मनुष्य को
संक्रामक रोग होते हैं उसी प्रकार पशु-पक्षियों को भी होते हैं।
मानिये किसी तपेदिक के रोगी ने कफ थूका या दमे के रोगी ने
थूका; उस कफ को मुर्गा-मुर्गी ने खाया जो प्रायः गली कूचों और
कतवारखानों में ढूँढ़-ढूँढ़ कर खाया करते हैं। और उसका विषैला