रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० असली कोकशास्त्र
ग्रास चर्वण
एकग्रास कितनी बार चबाना चाहिए। परमात्मा ने उसकी संख्या
स्वयमेव निर्माण कर दी है अर्थात् जितने दाँत हैं उतनी ही बार
यदि एक ग्रास को चबाया जाय तो वह पिसकर इतना बारीक हो
जायगा कि उसका रस बहुत शीघ्र रस-वाहिनी नाड़ियें खींच लेंगी
और किसी प्रकार का रोग भी उत्पन्न नहीं होगा। प्यास भी कम
लगेगी। क्योंकि अधिक चबाने से मुख में लवाब बन जाता है जो
कण्ठ में खुश्की पैदा नहीं होने देता जिससे प्यास नहीं लगती ओर
पानी कम पीने में आता है। किन्हीं का सिद्धन्त है कि भोजन में
जल नहीं पीना चाहिए और घण्टा भर ठहर कर पीना चाहिए तथा
कोई भोजन के मध्य में अमृत कहते हैं जैसे कहा है—
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम् ।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम् ॥
अर्थ—अपच के समय जलपान ओषध का काम करता है और
पच जाने पर जलपान बल-वृद्धि करता है। भोजन के बीच थोड़ा
सा जलपान अमृत के तुल्य होता है और भोजन के अन्त में पानी
पीना विष के समान है।
भोजन के आरम्भ में तीन आचमन अवश्य कर लेना चाहिए
उससे कण्ठ गीला हो जाता है और प्यास पैदा नहीं होने देता।