रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ३८७
मनुष्य का आहार मांस नहीं
माँस मनुष्य का आहार नहीं। क्योंकि इसको रचना मांस -
हारियों के साथ नहीं मिलती प्रत्युत निरामिष भोजियों के साथ
मिलती है। मनुष्य को तटस्थ मानकर दो प्रकार के जीवों का
विचार किया जाता है। एक मांसभोजी और दूसरे निरामिषभोजी।
इन दोनों में से जिसके आहार-विहार के साथ इसका मिलान हो
जायगा वह उसी श्रेणी का आहार भोगी समझा जायगा ।
जैसे शेर, बिल्ली, गिद्ध आदि मांसहारी पशु-पक्षियों के पंजों के
नाखून ऐसे पैने मजबूती और घूमे हुए होते हैं कि जो शिकार को
बड़ी मजबूती से पकड़ चोर फाड़ कर सकते हैं। परमात्मा ने उन्हें
उनको खुराक खाने के लिये वैसे ही औजार भी दिये हैं। जो कच्चे
मांस को चीर-फाड़ सकें। यदि मनुष्य भी मांसहारी होता तो उसे
भी वैसे ही साधन दिये जाते। उसे तक़ज़ो छुरों काँटे आदि औजारों
की आवश्यकता न पड़ती। किन्तु ऐसा नहीं, उसके नाखून के
सामने बहुत ही कमजोर और सीधे होते हैं। मांस को चारना-
फाड़ना तो दूर रहा, वे थोड़ा बढ़ जाने पर जरा सो ठोकर स्वयं
ही टूट जाते हैं। अधिक क्या, इससे दोनों की बनावट का अन्तर
स्पष्ट दिखलायी दे रहा है। हाँ, निरामिषभोजी जीव अर्थात् गाय
भैंस बकरी आदि के साथ अवश्य मनुष्य का मिलान होता है।
उनके पंजे भी सादे होते हैं।