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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 440 में से

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असली कोकशास्त्र ३८१
भोजन के मध्य में जल पीने से अन्न की मात्रा घट जाती है, अन्यथा
अन्न का भाग अधिक हो जाने से आलस्य उत्पन्न करता है और
जल आलस्य विनाश करने वाला है। अत्यन्त ग्रास चबाने से प्यास
स्वयं ही कम लगती है और जो लगती भी है वह उचित ही है।
उसके अनुसार जल पीना अमृत कहा गया है यदि अधिक लगती
हो तो कोई उदर-विकार समझना चाहिए। तब भोजन कम कर
देना उचित है। घण्टाभर के बाद जब प्यास लगे तब थोड़ा-थोड़ा
कर खूब जल पीना उत्तम है इससे उदर-विकार पच जायगा। भोजन
के अन्त में भी तीन आचमन मात्र करके उठ जाना चाहिए। जिन
लोगों का मत भोजन में जल का निषेध है वे भोजन के अध घण्टा
पूर्व जल का विधान करते हैं। उसके विधान का भी यही आशय
निकलता है कि अन्न की मात्रा घटायी जाय। क्योंकि जब पेट में
जल रहेगा तो सुतरां अन्न कम खाया जायगा।
—०—
भोजन करने का समय
प्रातःकाल १० बजे से १२ बजे तक, और सायंकाल को ८ बजे
तक अवश्य भोजन कर लेना चाहिए। इसके पश्चात् भोजन करना
रोगों को निमन्त्रण देना है क्योंकि सूर्य के तेज की वृद्धि के साथ-
साथ हमारी जठराग्नि की भी वृद्धि होती जो अन्नपाचन में बड़ी
सहायता देती है और सायंकाल का भोजन अत्यन्त हलका और