रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ असली कोकशास्त्र
असर उस जानवर के माँस में प्रविष्ट हुआ । उस जीव को जो कोई
भी खायगा उसे बीमारी क्यों न होगी। लोग यह कहते हैं कि मुर्गी
को वह रोग क्यों नहीं हुआ ? सम्भव है मुर्गी उस रोग से पीड़ित
हो या न हो। किन्तु उसका असर उसके माँस में तो अवश्य रह
सकता है। इसका प्रतिवाद कोई नहीं कर सकता। जिसका अकाट्य
प्रमाण आगे दिया जाता है। जिस चील्ह ने मरा हुआ सर्प खाया
हो, उसकी बीठ कुत्ता खा लेने से पागल हो जाता है और वह
कुत्ता जिस-जिस को काटता है, यदि उसकी यथोचित औषध न की
जाय तो वह अवश्य मर जाता है।
इस उदाहरण में देखा जाता है कि खाये हुए सर्प के विष से
चील्ह और गीध नहीं मरते और न पगलाते ही हैं। किन्तु उसकी
बीठ खाने वाले कुत्ते स्यार आदि जीव पगलाते और मरते भी हैं।
क्या बीठ मात्र में उसके विष का असर खतम हो जाता है। उत्तर
स्पष्ट है नहीं, क्योंकि देखा जाता है, चील्ह का मांस कोई जीव
नहीं खाता और न गलाने से गलता ही है। इसका क्या कारण ?
इसका कारण है सर्प के विष का असर है, क्योंकि देखा जाता है
जिस मनुष्य को सर्प काट लेता है उसे भी कोई जीव या जल-जन्तु
नहीं खाते। इससे स्पष्ट हो गया कि सर्प का विष ही इसका कारण
है, जो मनुष्य और सर्पाहारी जीवों के शरीर में व्याप्त होता है।
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