रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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पीते हैं। मनुष्य भी ओंठों से खींचकर ही पीता है।
दाँत तीन प्रकार के होते हैं। कृन्तन, छेदन और पेषण इनमें
से कृन्तन दाँत मांसहारियों के होते हैं जो नोकिले गोल ओर टेढ़े
होते हैं। जिनका काम छेद करना और चीर डालना है। ये दाँत
आगे रहते हैं, इनके पीछे छेदन करने वाले होते हैं अर्थात् जो अलग
अलग मांस के टुकड़े कर देते हैं। ओर पेषण करने वाले दाँत
आमिषभोजियों के नहीं होते। क्योंकि उन्हें पीसने की आवश्यकता
नहीं पड़ती। वे केवल टुकड़े के टुकड़े निगल जाते हैं ओर उन्हें
हजम हो जाते हैं। क्योंकि परमात्मा ने उनके उदर की जठराग्नि
इतनी तीव्र रक्खी है कि वह कच्चे माँस के टुकड़े भी हजम कर
सके और उन्हें अजीर्ण भी न हो, निरामिष-भोजी जीवों के भी दो
प्रकार के दाँत होते हैं एक छेदक ओर दूसरे पेषक। इनके कृन्तन
दाँत नहीं होते क्योंकि इन्हें किसी वस्तु को दाँतों से चीरने की
आवश्यकता नहीं पड़ती। मांसाहारियों के आगे के कृन्तन ओर
पीछे के छेदक होते हैं। किन्तु निरामिषियों के आगे के छेदक और
पीछे के पेषक होते हैं। ये आगे के दाँतों से प्रत्येक वस्तु को दो
टुकड़ों में विभाजित कर देते हैं अर्थात् एक मुँह में ओर दूसरा
बाहर । आगे के दाँतों से कटे हुए टुकड़े को पिछले पेषक दाँतों से
पीस कर पेट में पहुँचा देते हैं। मनुष्य के भी यही दोनों दाँत होते
छेदक ओर पेषक। भेद इतना ही होता है कि मनुष्य छेदक ओर
पेषक से क्रमशः एक साथ काम लेता जाता है ओर पशु पहले