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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

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३८८ असली कोकशास्त्र
बिल्ली शेर आदि जितने मांसहारी जीव होंगे, वे सब रात को
अन्धकार में अपनी खुराक खोजेंगे और पेटभर, दिन में कहीं छिप-
कर सो रहेंगे इसी लिए इनको निशाचर भी कहते हैं। इनकी नेत्र-
ज्योति सूर्य का प्रकाश सहन नहीं कर सकती और दिन में सजग
जीव भी इनके हाथ में कब आयेंगे। रात में थके-माँदे बेखबर
सोये जीवों पर इनकी बन आती है। मांसहारी को गरमी भी बर-
दास्त नहीं होती। वे थोड़े परिश्रम में थक कर हार जाते हैं। इनके
नेत्रों में इतनी शक्ति है कि उन्हें रात को भी दिन की भाँति दिखाई
देती है, किन्तु जो निरामिष-भोजी हैं वे दिन में खायेंगे और रात
को आराम से सोयेंगे। वे परिश्रम से थकते नहीं और उन्हें रात
को मनुष्य की भाँति दिखलायी देता है मांसहारी जीवों की आँखें
रात को दीपक के सामने अंगारे की भाँति चमकती है और निरा-
मिषियों की नहीं।
मनुष्य भी दिन में सब काम करता है, निरामिषियों की भाँति
रात को सो जाता है इसकी आँखें भी नहीं चमकतीं। चारों वेद
और छः शास्त्रों के ज्ञाता, दशानन अर्थात् पौलस्त्य मुनि के नाती
महाप्रतापी रावण को भी केवल निशाचरी माँस भोजन के कारण
ही निशाचर कहा गया। इस लिए इस निशाचरी भोजन का मनुष्य
मात्र को सर्वथा त्याग करना उत्तम है।
माँसहारी जीव जब पानी पीते हैं तब जबान से उठाकर अर्थात्
लपलपा कर पीते हैं। निरामिष-भोजी दोनों ओठ मिला खींचकर