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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 440 में से

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३८४ असली कोकशास्त्र
घास आदि उत्पन्न होते हैं उस समय उनमें विष होता है उस
कभी विषैली घास को जो पशु खाता है, उसका पेट फूल जाता है
और वह मर जाता है। रात को जब ओस उन पर पड़ जाती है
तो उन घासादि का विष पत्तों पर पड़े ओस के विन्दुओं में आ
जाता है जिसे सर्प बड़े प्रेम से चाट लेता है। इसी लिए किसी
जीव को नहीं मारना चाहिए। क्योंकि परमात्मा ने इन्हें हमारे
हित के लिए रचा है।

रसाहार

जो जीव केवल रस पीकर ही जीते हैं उनको रसाहारी कहते
हैं। जैसे शहद की मक्खी, भ्रमर आदि ये सदैव फूल पत्तों आदि
के रसों को चूसते हैं और अपना जीवन निर्वाह करते हैं।

काष्ठाहार

काष्ठाहारी वे जीव हैं जो काष्ठ खाकर अपनी जीवन यात्रा
पूरी करते हैं। जैसे घुन या काष्ठ का कीड़ा जो काष्ठ में रहता और
काष्ठ ही खाता है। व्हाइल आट अर्थात् काठ में रहने वाले सफेद
कीड़े दोमक आदि।

मृत्तिकाहार

मृत्तिकाहारी वे ही जीव हैं जो मिट्टी खाते हैं। वे प्रायः बरसात
में पैदा होते हैं। जैसे,-केचुआ आदि, जब वे हगते हैं तो उनका
पाखाना रात को चमकता है। यह भगवान की अद्भुत महिमा है।