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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 440 में से

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१६० असली कोकशास्त्र
केवल छेदक से टुकड़े-टुकड़े करके पेट की एक थैली में पहुँचाते
जाते हैं और फिर जल पी बैठ अथवा खड़े रहकर ही, दोबारा
अन्दर से मुँह में निकाल कर पेषक दाँतों से पीसते हैं और फिर
जठराग्नि में पहुँचा देते हैं।
मांसाहारी जीव का जब बच्चा पैदा होता तब उसकी आँखें
बहुत दिनों तक बन्द रहती हैं। वे बच्चे अन्धे के समान पड़े रहते
हैं। किन्तु निरामिषियों के बच्चे पैदा होते ही थोड़ी देर में आँख
खोल देते हैं।
इस प्रकार बहुत सी भेद की बातें परमात्मा ने आमिषभोजी
और निरामिषियों में रक्खी हैं। मनुष्य यदि इतने पर भी न समझे
तो इसमें किसका दोष ? यदि उल्लू को दिन में न दिखलायी दे तो
इसमें सूर्य का क्या दोष ? सच कहा है—
नोलूकं विलोकते यदि दिवा,
सूर्यस्य किंदूषणम् ।
नाखून आदि औजारों का होना, रात्रि का आहार करना, रात
को आँखों का चमकना कृन्तन और छेदन दाँतों का होना, छेदन के
साथ पेषण का न होना, अर्थात् पीसकर न खाना, लपलपा कर
जबान से पानी पीना, जन्म होने पर अनेक दिन तक जन्मान्ध रहना
ठीक इसके विपरीत निरामिषभोजियों का वैसे तीखे कुण्ठित नाखूनों
का न होना, दिन में आहार करना, रात्रि को आँखों का न चमकना
छेदक और पेषक दाँतों का होना तथा कृन्तन का न होना, ओठ से