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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

असली कोकशास्त्र २६१
भूगोल के सम्बन्ध में भी वही बात है; गोलमटोल पृथ्वी का
नक्शा जान लेना, बड़े-बड़े राज्य और उसकी राजधानी, पर्वत
समुद्र और नदियों का जान लेना ही स्त्रियों के लिए पर्याप्त है।
यदि वे इससे अधिक जानें तो और भी अच्छा, नहीं तो इतना तो
जरूर ही जानना चाहिए। इसी प्रकार अन्यान्य विषयों का भी
स्त्री को ज्ञान होना चाहिए।
―――*―――
प्रेम
स्त्री ओर पुरुष के सम्बन्ध की जड़ प्रेम है। प्रेम बड़ा ही
विचित्र पदार्थ है। क्योंकि इसमें स्वर्ग और नर्क दोनों ही छिपे हैं।
सच्चा प्रेम वही है, जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ न हो। सच्चा प्रेमी
अपने प्रेमिकों से प्रेम का बदला नहीं चाहता। वह तो यह जानता
ही नहीं कि उसे अपनी प्रेमिका से क्यों इतना प्रेम है। क्योंकि उसे
देखते ही उसके आनन्द की सीमा नहीं रहती। शिव-पार्वती में ऐसा
ही प्रेम था। एकबार पार्वती के पिता दक्ष प्रजापति ने उनके सामने
शिवजी की निन्दा की थी, इस लिए पार्वती ने अपना प्राण दे
दिया। जानकी जी ने सच्चे प्रेम के कारण ही अपने पति भगवान
रामचन्द्र के साथ बनों में फिरीं। महारानी दमयन्ती ने राजा नल
के लिए साधारण कष्ट नहीं सहा। पति-पत्नो का पवित्र प्रेम ही
प्रेममय परमेश्वर के प्रेम का विकाश है। इसीसे जगत को प्रेम

२६२ असली कोकशास्त्र
करने की शिक्षा मिलती है। पति-पत्नी का सच्चा प्रेम सामाजिक या
शारीरिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है। शरीर-सुख अथवा तुच्छ
भोग-विलास के लिए जो प्रेम होता है, वह प्रेम कोई चीज नहीं है
और न तो अधिक काल तक ठहरता ही है। पवित्र प्रेम नित्य
नये रस से पति-पत्नी के हृदय को सींचा करता है।
सच्चा प्रेम स्त्री-पुरुष के मन और हृदय को एक बना देता है।
प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है, अतः ऐसे स्वतन्त्र दो हृदयों को एक
बना देना आसान काम नहीं है। जब तक दोनों प्रेमियों के लक्ष्य,
भाव, धर्म, अवस्था एक न हों, तब तक वास्तविक मिलन होना
सम्भव नहीं। किन्तु दुःख की बात है कि आजकल आदर्श विवाह-
सम्बन्ध में लोग उक्त बातों पर तनिक भी ध्यान नहीं देते। इस
लापरवाही का फल यह हो रहा है कि कितने ही स्त्री-पुरुषों में ठीक
उतना ही भेद दिखलायी पड़ता है, जितना कि पशुओं में। न तो
स्त्री अपने पति पर अनुराग रखती है और न पुरुष अपनी स्त्री पर।
यही कारण है कि आजकल जो सन्तानोत्पत्ति हो रही है, वह मूर्ख,
प्रेम-हीन, माता-पिता पर अश्रद्धा रखनेवाली और अनेक प्रकार के
दुर्गुणों से भरी हुई। क्योंकि माता-पिता के ही रक्त, मांस, बल,
वीर्य और स्वभाव को लेकर ही तो बच्चे पैदा होते हैं; जिस बात
का माँ-बाप में ही अभाव है, वह बात उनमें कहाँ से आ जायगी?
यहाँ पर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि जब यही बात है तब फिर
मूर्ख और क्रूर माँ-बाप से विद्वान् और दयालु बच्चा कैसे पैदा होता

असली कोकशास्त्र २६३
जाता है ? प्रश्न बहुत ही ठीक है। वास्तव में ऐसा बहुधा देखने में
आता है कि विद्वानों के बच्चे मूर्ख औ मूर्खों के लड़के विद्वान
निकल जाते हैं। किन्तु यह बात भी ऊपर के कथन से विपरीत नहीं
है। गम्भीरता-पूर्वक विचार करने से मालूम होगा कि गर्भाधान
के समय माता-पिता में तथा उसके बाद् माता में वे बातें मौजूद
थीं जो बालक में पायी जाती हैं—चाहे माँ-बाप ने उनका पालन
जानकर किया हो अथवा बिना जाने; चाहे वे बातें किसी कारण-
वश उस समय उपस्थित हो गयी हों अथवा स्वाभाविक ही।
—:*:—
व्यायाम
जीवन को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को
व्यायाम अवश्य करना चाहिए। व्यायाम किये बिना शरीर स्वस्थ
नहीं रह सकता और शरीर अस्वस्थ रहने से पहले तो सन्तानो-
त्पत्ति होती ही नहीं और यदि होती भी है तो रुग्ण और अल्पायु।
उत्तम सन्तान पैदा करने की इच्छा रखनेवालों के लिये व्यायाम
एक बड़ी महत्त्वपूर्ण और प्रयोजनीय वस्तु है। दुःख की बात है
कि हमारे देश में स्त्रियों के व्यायाम की प्रथा बिलकुल ही लुप्त हो
गयी है। यही कारण है कि हमारी गृह-देवियाँ अपनी रक्षा स्वयं
न करके दूसरों के आश्रित रहती हैं। भारत का प्राचीन इतिहास
इस बात का साक्षी है कि पहले भारतवर्ष की देवियाँ कितनी

२६४ असली कोकशास्त्र
साहसी और निर्भीक थीं। महाराज दशरथ हार गये होते यदि
महारानी कैकेयी अर्धागिनी धर्म का पालन करते हुए उनके रथ का
सम्भार न कर सकी होतीं; झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के
वीरत्त्व से सारा संसार भली-भाँति परिचित है किन्तु क्या आज
एक भी स्त्री हमारे देश में ऐसी है जो आपत्तिकाल में कैकेयी की
भाँति अपने पति की सहायता कर सके ? क्या ऐसी भी कोई स्त्री
है जो देश की स्वतन्त्रता के लिए महारानी लक्ष्मीबाई की तरह
वीरतापूर्वक शत्रुओं का मुकाबला कर सके ? सम्भवतः यही उत्तर
मिलेगा कि, —नहीं।
यदि गम्भीरता के साथ विचार किया जाय कि हमारी गृह-
देवियाँ इस प्रकार पौरुषहीन क्यों हो गयीं, तो पता चलेगा कि
उनमें न तो विद्या है न शक्ति ही है। यही कारण है कि विधर्मी
उन पर दिन रात आक्रमण कर रहे हैं, उनके सब से प्यारे सतीत्व-
धर्म का अपहरण कर रहे हैं और वे बेचारी निस्सहाय होकर सब
कुछ सहन कर रही हैं। यदि उनमें अपनी रक्षा करने की बुद्धि
होती, यदि उनके शरीर में धर्म पर आक्रमण करनेवाले का सामना
करने के लिए बल होता तो किसकी हिम्मत पड़ती जो उनकी ओर
आँख उठाने का साहस करता ? किन्तु यह बात तबतक स्वप्नवत
ही रहेगी, जबतक स्त्रियाँ व्यायाम का महत्त्व न समझ जायँगी
और व्यायाम करके अपने आत्म-रक्षार्थ शरीर-बल न बढ़ावेंगी।
इसके लिए पुरुषों को चाहिए वे व्यायाम का महत्त्व अपने

असली कोकशास्त्र २६१
घर की स्त्रियों को समझावें और उस पर उन्हें आरूढ़ करें । पुरुष
प्रोत्साहन के बिना स्त्रियों का इधर ध्यान देना असम्भव है । कारण
यह कि इस प्रथा का लोप हो जाने के कारण उनमें संकोच की
मात्रा इतनी अधिक हो गयी है कि वे व्यायाम कर ही नहीं सकतीं ।
अधिकांश स्त्रियाँ तो व्यायाम का नाम सुनते ही दिल्लगी समझ
बैठेंगी, “भला स्त्रियाँ कसरत करेंगी, कैसा अन्धेर है ! अब घोर
कलियुग छा गया, इसी से ऐसी उल्टी बातें लोग कहने लगे हैं ।”
जिस बात की या काम की मनुष्य की आदत नहीं रहती, उसके
करने में उसे स्वाभाविक ही बड़ा अनुकुस और संकोच मालूम
होता है ।
स्त्रियों के व्यायाम की बात सुनकर कितने ही लोग हँसेंगे और
कहेंगे कि क्या दंड-बैठक करना स्त्रियों को शोभा देगा ? असल
में तो दंड-बैठक करने के लिए कहा ही नहीं जा रहा है और यदि
कहा भी जाय तथा वे इसे करने भी लगें तो इसमें कुशोभा की
कौन-सी बात है । इस पर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि जब
दंड-बैठक के लिये नहीं कहा जा रहा है, तब वे व्यायाम ही कौन-
सा करेंगी ? ऐसा कहनेवालों को यह मालूम ही नहीं है कि व्या-
याम किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार का होता है ।
व्यायाम का अर्थ है—“नाना प्रकार के अंग-संचालन द्वारा
प्रत्येक अंग पर जोर डालकर परिश्रम करना और उन्हें सुदृढ़
बनाना । यह व्यायाम दो तरह का होता है । एक नियमित व्यायाम

२६६ असली कोकशास्त्र
और दूसरा अनियमित व्यायाम। व्यायाम के नियमों को ध्यान में
रखकर जो व्यायाम किया जाता है उसे नियमित व्यायाम कहते
हैं और उसके विपरीत जो व्यायाम होता है उसे अनियमित व्यायाम
कहते हैं। लोहार हथौड़ा या घन लेकर लोहा पीटने में बहुत अधिक
परिश्रम करता है पर यह उसका अनियमित व्यायाम है। इस व्या-
याम से उसका शरीर स्वस्थ और बलवान नहीं होता। पहलवान
दंड-बैठक करके मुद्गर फेर कर तथा कुश्ती लड़कर परिश्रम करता
है, यह उसका नियमित व्यायाम है। इसमें शरीर सुडौल होता है
और अंग-प्रत्यंग बलवान होता है। इस विभिन्न परिश्रम के दो
कारण प्रधान हैं। एक तो यह कि अनियमित व्यायाम में प्रति
दिन का नियम नहीं रहता, कभी परिश्रम होता है और कभी नहीं
होता तथा कभी बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है और कभी
बिलकुल ही कम; किन्तु नियमित व्यायाम नियम-पूर्वक प्रति दिन
होता है और परिश्रम में बहुत अधिक अन्तर नहीं पड़ता। उसके
किंचित् न्यूनाधिक होने की बात दूसरी है। दूसरा कारण परिमाण
की विपरीतता का यह है कि अनियमित व्यायाम में परिश्रम करने
वाले का ध्यान बल संचय की ओर नहीं रहता, बल्कि काम पूरा
करने की ओर रहता है। "गले पड़ी ढोल बजाये सिद्ध।" इस
कहावत के अनुसार उसे तो मर-जीकर काम पूरा करने की धुन रहती
है; किन्तु नियमित व्यायाम करनेवाला मनोयोगपूर्वक बल संचयन
की ओर ही ध्यान रखता है; उसका परिश्रम करने का एक मात्र

असली कोकशास्त्र २६७
उद्देश्य हो होता है, बल-संचय करना। यही कारण है कि दोनों
प्रकार के व्यायाम का एक दूसरे से विपरीत परिणाम होता है।
क्योंकि मनोयोग ही तो प्रधान वस्तु है; इसी के द्वारा तो मनुष्य
शक्ति को खींचकर अपने शरीर में भरता और असाध्य से असाध्य
कामों को साध्य कर दिखलाता है। जिस काम में बल-संचय की
ओर लक्ष्य ही नहीं है, काम पूरा करने की ओर मन का झुकाव है,
उसके करने से बल का संचय क्योंकर हो सकता है; उससे तो बस
काम ही पूरा हो सकता है; क्योंकि उसी पर मन का झुकाव रहता
है। इस मनोयोग की कितनी बड़ी महिमा है तथा इसमें कितनी
शक्ति है, इसका उल्लेख पीछे विस्तारपूर्वक किया जा चुका है; अतः
अब यहाँ उसकी पुनरावृत्ति करने की आवश्यकता नहीं है।
व्यायाम करते समय इच्छा-शक्ति को अपने अंगों की ओर
लगाना चाहिए। ऐसी धारणा रखनी चाहिए कि हमारे शरीर में
बल का संचार हो रहा है। इच्छा-रहित व्यायाम लाभकारी नहीं
होता, यही कारण है कि बहुत से लोगों को व्यायाम के लाभों से
वंचित रह जाना पड़ता है। जिस अंग को जितना मजबूत बनाना
हो, व्यायाम करते समय उस अंग में उतनी ही अधिक इच्छाशक्ति
लगानी चाहिए।
दस वर्ष की अवस्था तक किसी प्रकार का व्यायाम करना
उचित नहीं है; इस अवस्था तक जो स्वाभाविक व्यायाम दौड़ने-
धूपने और खेलने-कूदने में हो जाता है, वही यथेष्ट है। ग्यारहवें

२६८ असली कोकशास्त्र
साल से सोलह वर्ष की अवस्था तक स्वच्छ वायु सेवन और दौड़ने
की कसरत की ओर ध्यान देना चाहिए। इस अवस्था तक दण्ड-
बैठक करना अच्छा नहीं है। क्योंकि सोलह वर्ष तक शरीर की
नस नाड़ियाँ और हड्डियाँ बहुत कोमल रहती हैं; अन्य प्रकार के
व्यायाम (जैसे, दंड-बैठक आदि) से उन्हें रूढ़ नहीं बनाना
चाहिए। सोलह के बाद दंड-बैठक द्वारा कसरत करना उत्तम है।
यह व्यायाम-विधि पुरुषों के लिये है। स्त्रियों के लिए आगे चलकर
बतलाया जायगा। दंड बैठक ५० से १००-१२५ तक करना
चाहिए। यह संख्या पूर्ण युवक के लिए है। कुश्ती लड़ना सबसे
उत्तम व्यायाम है; क्योंकि इससे हड्डी-हड्डी पर यथेष्ट और उचित
जोर पड़ता है। वृद्धावस्था में दंड-बैठक का व्यायाम नहीं करना
चाहिए। इस अवस्था में अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं, अतः
व्यायाम से उनको हानि पहुँचती है। हाँ अपनी शक्ति के अनुसार
प्रातः-सन्ध्या टहल कर परिश्रम कर लेना वृद्धों की स्वस्थता के
लिए भी अत्यन्तावश्यक है।
प्रारम्भ करते ही अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए। इससे
ज्वर उत्पन्न हो जाने की बहुत बड़ी सम्भावना बनी रहती है।
व्यायाम थोड़े से शुरू करके धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। यह नियम
स्त्री-पुरुष दोनों को ध्यान में रखना चाहिए।
तेल की मालिश भी एक प्रकार का व्यायाम है। इससे खून में
गर्मी पैदा होती है। कड़वे तेल की मालिश सर्वोत्तम है। इसकी

असली कोकशास्त्र २६६
रगड़ से शरीर के छिद्रों का मल निकल जाता है और चमड़े पर
रहने वाले कीड़े मर जाते हैं।
व्यायाम करने का सबसे अच्छा समय प्रातःकाल है। शौचादि
से निवृत्त होकर व्यायाम करना चाहिए। कुछ लोग स्नान के
पहले व्यायाम करते हैं और कितने ही लोग स्नान के बाद। स्नान
करने के बाद व्यायाम करना अधिक उत्तम है। यदि व्यायाम के
बाद स्नान करना हो तो कम से कम एक घण्टा ठहर कर स्नान
करना उचित है। साधारण मनुष्य के लिए आधा घण्टा व्यायाम
करना जरूरी है। भोजन करने के बाद किसी प्रकार का व्यायाम
नहीं करना चाहिए।
इतना लिख चुकने के बाद अब हम स्त्रियों के व्यायाम पर
विचार करना चाहते हैं। स्त्रियों को किस प्रकार का व्यायाम करना
चाहिए। इस पर विचार करना आवश्यक है। स्त्रियों का स्वाभा-
विक व्यायाम है घर का काम-काज करना, जैसे चक्की चलाना,
कूटना आदि। इससे बहुत-कुछ कसरत स्त्रियों की हो जाती है।
इसी कसरत के कारण देहात की स्त्रियाँ हृष्ट-पुष्ट और निरोग
रहती हैं तथा शहर में रहनेवाली स्त्रियाँ यह कसरत न करने के
कारण निर्बल और रुग्णा रहती हैं।
किन्तु इतना ही व्यायाम स्त्रियों की स्वस्थता के लिए यथेष्ट
नहीं है। उन्हें उचित है कि वे धन्धे में होनेवाले व्यायाम के अति-

३०० असली कोकशास्त्र
रिक्त थोड़ी देर तक नियमित रूप से केवल शरीर स्वस्थ रहने के
उद्देश्य से व्यायाम किया करें ।
स्त्रियों का व्यायाम पुरुषों के व्यायाम से भिन्न होना चाहिए ।
भिन्न क्यों होना चाहिए, विस्तार-भय से इस पर यहाँ विचार नहीं
किया जायगा; पर इतना तो अवश्य कहा जायगा कि दोनों कार्यों
में विभिन्नता होने के कारण व्यायाम-प्रणाली में विभिन्नता रखना
आवश्यक है । हमारी राय है कि स्त्रियाँ पुरुषों की भाँति दंड-बैठक
न करके तथा मुद्गर न फेरकर यदि निम्नलिखित तरीके से व्यायाम
करें, तो उनकी तन्दुरुस्ती के लिए बड़ा ही लाभ हो सकता है:—
जिस प्रकार बालक को दस वर्ष की अवस्था तक व्यायाम
करने के लिए इस प्रकरण में बतलाया गया है, उसी प्रकार बालि-
काओं को भी इस अवस्था तक वही व्यायाम करना चाहिए । हाँ,
बालकों की अपेक्षा बालिकाओं का दौड़ना-धूपना कम अवश्य होना
चाहिए । कारण यह कि उन्हें और काम भी सीखना रहता है ।
बालकों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए जितना समय मिलता है
उतना बालिकाओं को नहीं; इस लिए उन्हें अधिक समय व्यायाम
की ओर लगाकर और कामों से अनभिज्ञ नहीं रहना चाहिए।
ग्यारह की अवस्था से नीचे के व्यायामों को शुरू करना चाहिए ।
१—सबेरे शौचादि से निवृत्त होकर स्त्रियों को किसी एकान्त
और हवादार कमरे में नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए ।
सीधी खड़ी होकर दोनों हाथ ऊपर उठाओ; इस प्रकार उठाओ,

असली कोकशास्त्र ३०१
मानो तुम ऊपर की कोई चीज पकड़ने के लिए प्रयत्न कर रही हो
इस समय दोनों पैर जुड़े रहें। पूरे तनाव के साथ दो मिनट तक
हाथ ऊपर उठाये खड़ी रहो; बाद धीरे-धीरे कड़ाई के साथ दोनों
हाथ के पंजों को कन्धे पर लाओ फिर बल डालते हुए उन्हें छाती
की सीध में ले जाओ और समेट कर पंजों को छाती पर लाओ;
पश्चात् दोनों हाथ नीचे गिराओ और तनाव के साथ ही पीछे की
ओर ले जाकर सीध में लाओ। इस प्रकार चार-पाँच बार करने से
भुजाएँ सुडौल और बलयुक्त हो जाती हैं।
२—दोनों पैर सटाकर एड़ियों को ऊपर उठाओ और पैरों के
पंजों पर शरीर का सारा भार लाद दो। पैरों को खूब तना रक्खो।
फिर पंजों से ही पाँच सात कदम आगे जाकर पीछे लौट आओ।
लेकिन जाने और लौटने में पैरों का तनाव जरा भी कम न होने
पावे। दो तीन बार प्रतिदिन ऐसा करने से पैर मजबूत हो जाते हैं
और जंघाओं में चिकनाहट आ जाती है। दो-तीन बार का मतलब
यह न समझो कि दिनभर में दो-तीन बार ऐसा करने के लिए कहा
जा रहा है बल्कि व्यायाम के समय में बतलाये क्रमों से कई बार
करने के लिए कहने कहने का तात्पर्य है।
३—साँस खींचकर छाती जितनी फूल सके उतनी उसे फुलाओ।
बाद कुछ देर तक यानी जितनी देर तक सांस को रोक रखने में
कष्ट न हो, उतनी देर तक रोके रहो और छोड़ दो। इस प्रकार
तीन-चार बार करो। इससे छाती चौड़ी हो जाती है। प्रत्येक अंग

३०२ असली कोकशास्त्र
का ब्यायाम करते समय यह धारणा रक्खो कि मेरे अमुक अंग में
शक्ति आ रही है। जैसे, साँस खींचकर छाती की कसरत करते
समय यह सोचो कि सीना चौड़ा और पुष्ट होता जा रहा है; हाथ
की कसरत (नं० १) करते समय यह सोचो कि मेरे हाथों में खूब
ताकत भर रही है; इसी प्रकार अन्यान्य अंगों के लिए समझो ।
४—सीधी खड़ी हो जाओ और दाहिने हाथ की मुट्ठी बाँध-
कर दाहिनी ओर उसे जमीन तक झुकाओ; इसी प्रकार बायें हाथ
को भी बायीं ओर झुकाना चाहिए। दस-बारह बार करते जाने से
कमर पतली, पुष्ट और लचकदार हो जाती है तथा पेट में चर्बी
नहीं बढ़ने पाती ।
५—चौरस जमीन पर बैठकर दोनों पैर सामने की ओर फैला
दो। बाद झुक कर दोनों हाथ से पैर के दोनों अंगूठे पकड़े। थोड़ी
देर के बाद छोड़ दो। ऐसा करने से पेट में कोई बीमारी जल्द नहीं
पैदा होती। सम्भव है पहले-पहल तुम पैरों के अंगूठे न पकड़
सको; इस लिए इसे त्याग न दो । अभ्यास करने से १५-२०
दिन में ही तुम आसानी से अंगूठे पकड़ने लग जाओगी । पेट में
दर्द होता हो ओर यह क्रिया की जाय तो तुरन्त ही पेट की पीड़ा
शान्त हो जाती है ।
६—प्रतिदिन कम से कम दस-बारह बार गर्दन को चारो ओर
फेरना चाहिए। इससे कण्ठ में कोई रोग नहीं होता, आवाज
रसीली हो जाती है और गर्दन में अपने-आप ही सुन्दरता आ जाती है।

असली कोकशास्त्र ३०३
७—शान्ति के साथ बैठकर हवा की ओर मुख करके पाँच
मिनट तक साँस खींचो और छोड़ो। इसमें इतनी धीरता से काम
लो कि श्वास-प्रच्छ्वास की आवाज दूसरे को कौन कहे स्वयं तुम्हें
भी सुनायी न पड़े और न हृदय पर उसका धक्का लगने पावे। इस
क्रिया से फेफड़ा शुद्ध रहता है अतः शरीर के रक्त में कोई विकार
उत्पन्न नहीं हो पाता।
स्त्रियों को खूब तड़के उठकर शौच और व्यायाम से निवृत्त हो
जाना चाहिये। गर्भिणी स्त्रियों को अधिक व्यायाम नहीं करना
चाहिए किन्तु कुछ अवश्य करना चाहिए। इस पर पीछे काफी
प्रकाश डाला गया है। गर्भाधान होने के पन्द्रह दिन पहले से
व्यायाम घटा देना उचित है और गर्भ धारण कर चुकने पर एक
महीने तक बड़ी सावधानी से बहुत कम व्यायाम करना चाहिए।
बाद चार महीने तक बचाकर व्यायाम किया जा सकता है; पाँच
महीने का गर्भ हो जानेपर फिर व्यायाम कम कर देना उत्तम है।

३०४ असली कोकशास्त्र
व्यायाम से लाभ
ब्यायाम करने से स्त्रियों का स्वास्थ्य कभी बिगड़ने नहीं पाता
और किसी प्रकार का रोग होने की बहुत ही कम सम्भावना रहती
है। शरीर हल्का और सबल रहता है। भोजन अच्छी तरह हजम
होता है ।
मुख और शरीर की कान्ति हमेशा बनी रहती है । समय से
पहले बुढ़ापा पास नहीं फटकने पाता । कसरत न करने तथा संयम
न रखने के कारण आजकल युवावस्था में ही स्त्रियों के चेहरे पर
वृद्धावस्था झलकने लगता है, कपोल चिचुक जाते हैं, आँखें नीचे
धँस जाती हैं, मस्तक पर शिकन पड़ जाती है और अंग-प्रत्यंग में
शिथिलता आ जाती है। यदि स्त्रियाँ नियमित रूप से ब्यायाम
करें और संयम से रहें तो ऐसा कभी नहीं हो सकता ।
तन्दुरुस्ती ठीक रहने से प्रसव-वेदना बहुत ही कम होती है
तथा हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर सन्तान पैदा होती है । सुखी जीवन
बनाने के लिए तन्दुरुस्ती का ठीक रहना सबसे अधिक आवश्यक
है । तन्दुरुस्ती पर ही दुनियाँ का सुख-दुख निर्भर है। पहले तन्दु-
रुस्ती, पीछे और सब । अमित धन हो, सुन्दर और शिक्षित परि-
वार हो, घर में दास-दासियों की भरमार हो, पर एक तन्दुरुस्ती न
हो तो सारी वस्तुएँ फोकी पड़ जायें । धन का उपभोग कौन कर
सकता है ? तन्दुरुस्त या स्वस्थ मनुष्य । परिवार का आनन्द कध

असली कोकशास्त्र ३०९
मनुष्य हो गये। छः महीने तक तो उनकी स्त्री ने खूब सुश्रूषा
की। बाद उसकी ओर से कुछ लापरवाही होने लगी। घर के और
लोग पहले ही से हाथ खींच बैठे थे। लगातार ग्यारह महीने तक
वह बीमार रहे। कितनी यातना सहकर उनका प्राण निकला,
उसका कारुणिक वर्णन करके पाठक-पाठिकाओं का दिल दुखाना
नहीं चाहता। तन्दुरुस्ती नष्ट होने पर उनकी लाखों की सम्पत्ति
किसी काम न आयी, इस बात की शिक्षा उक्त घटना से अच्छी
तरह मिल सकती है।
व्यायाम से शरीर में बल बढ़ता है और भीरुता दूर होती है।
मौका पड़ने पर दुष्टों के नीच शब्दों का जवाब लात-घूंसे से देने
का साहस होता है। जल्द किसी नीच की बुरी निगाह डालने की
हिम्मत नहीं पड़ती। इससे भोग-विलास की ओर रुचि नहीं बढ़ती
और सदा तबियत मस्त रहती है।
कसरत के द्वारा स्त्रियाँ अपने रूप-यौवन को अधिक दिनों तक
कायम रखकर अपने पति को प्रसन्न रख सकती हैं और पति की
प्रसन्नता से स्वयं भी प्रसन्न रहती हैं।
—:०:—

३०८ असली कोकशास्त्र
स्वस्थ रहने के सरल उपाय
स्वस्थ रहने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है—प्रसन्न रहने
की। मनुष्य के मनोविकार, वृत्तियाँ, इच्छाएँ, बुरे-भले विचार
जिस तरह बदलते रहते हैं, उसी तरह शरीर के अवयवों में भी
परिवर्त्तन होता रहता है। प्रोफेसर एल० मर्गेंट ने वैज्ञानिक प्रयोगों
द्वारा यह सिद्ध करके बतलाया है कि भय, चिन्ता, क्रोध, ईर्ष्या,
द्वेष और उदासीनता से पसीने में, थूक में, श्वास में, तथा खून में
जहरीले पदार्थ पैदा होते हैं और इसके विपरीत प्रेम, दया, आनंद,
सन्तोष, आरोग्य तथा प्रसन्नतापूर्ण विचारों से बलवान बनाने वाले
तत्त्व उत्पन्न होते हैं।
इसीसे इस पुस्तक में स्थल-स्थल पर उत्तम सन्तान पैदा करने
के लिए माता-पिता को उक्त बात पर सदा ध्यान रखने के लिए
चेतावनी दी गयी है। बच्चों की माँ के क्रोधित होने पर उसका दूध
जहरीला हो जाता है और उस समय दूध पीने से कितने ही बालकों
को मूर्छा आ जाती है। शास्त्रकारों ने आदेश किया है कि भोजन
करते समय खूब प्रसन्नचित्त रहना चाहिए । उनके कथन का
असली रहस्य यहाँ है कि भोजन के समय क्रोध, चिन्ता, दुःख
आदि करने से उत्तम से उत्तम बलकारक भोजन भी विष हो
जाता है।
यदि प्रारम्भ से ही स्वास्थ्य-रक्षा के खास-खास नियमों का

असली कोकशास्त्र ३०८
पालन किया जाय और बालकों में आरम्भ से ही इन नियमों पर
चलने की आदत डाली जाय, तो जीवन विशेष सुख और शान्ति से
व्यतीत हो सकता है। बचपन में जिस बात की आदत पड़ जाती
है, वह कभी नहीं छूटती। स्वास्थ्य-रक्षा के साधारण नियम ऐसे
नहीं हैं, जिनका सरलतापूर्वक पालन न किया जा सके, किन्तु जब
मनुष्य की आदत कुछ और ही ढंग की हो जाती है, तब वे ही
सरल नियम पहाड़ से मालूम होने लगते हैं।
अब हम स्वास्थ्य-रक्षा के कुछ उपायों का उल्लेख यहाँ करेंगे,
जिनका पालन करना आलसी मनुष्य के लिए तो अवश्य ही दुरूह
है, पर और किसी भी मनुष्य के लिए कठिन नहीं है —
१—रहने का स्थान खूब हवादार होना चाहिए; किन्तु दूषित
और गन्दी हवा जरा भी न आने पावे। गन्दी हवा और गन्दा
पानी ही नाना प्रकार के रोगों का घर है।
२—अपना प्रत्येक कार्य नियमित समय पर करना चाहिए।
स्वास्थ्य के लिए अनियमित समय पर काम करना पूरा घातक
है। ऐसे आदमी कभी स्वस्थ नहीं कहे जा सकते जो एक दिन तो
तड़के मल-मूत्र त्याग कर निवृत्त हो जाते हैं और दूसरे दिन दोपहर
को टट्टी जाते हैं। इसी प्रकार उनका प्रत्येक कार्य होता रहता है।
ऐसे मनुष्य सम्भव है कि ऊपर से देखने में हृष्ट-पुष्ट और पूर्ण
दिखायी पड़ें, पर वास्तव में वे कदापि स्वस्थ नहीं हैं।
३—शुद्ध, सादा और थोड़ा भोजन करना चाहिए। ठूँस-ठूँस

३१० असली कोकशास्त्र
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कर खाने से स्वस्थता कभी नहीं रह सकती । भोजन धीरे-धीरे
और खूब चबा-चबा कर करना चाहिए । एक ग्रास को चालीस
बार कुचल कर निगलना, पेट में अमृत डालने के समान गुण करता
है । इससे कई लाभ होते हैं । एक तो यह कि थोड़े आहार से
अधिक रक्त तैयार होता है और उस रक्त में किसी प्रकार का दोष
नहीं रहता और दूसरा लाभ यह होता है कि दाँत मजबूत होते
हैं । इस प्रकार चबाकर भोजन करने से पाचन क्रिया बहुत ठीक
काम करती है; मल की रुकावट कभी नहीं होती, चित्त प्रसन्न रहता
है, अच्छी भूख लगती है, पेट में कभी शिकायत नहीं पैदा होती ।
४—भोजन करने के पहले और पीछे हाथ, पैर तथा मुख का
धोना बड़ा ही हितप्रद है ।
५—मल-मूत्र के वेग को कभी न रोको । हमेशा पेट साफ
रक्खो । कबज कभी मत होने दो । यदि कभी इसकी शिकायत
जान पड़े तो फौरन यत्न करो ।
६—दाँत, मसूड़े और जीभ की हमेशा सफाई रक्खो । तथा
कोई ऐसी चीज न खाओ जिससे मुख में जलन पैदा हो । हाँ काली
मिर्च आदि खाने की बात दूसरी है; पर लाल मिर्च को भूलकर
भी मुख में नहीं डालना चाहिए ।
७—प्रति दिन सबेरे उठते ही मल-मूत्र त्याग करके मुख की
सफाई कर डालनी चाहिए । स्नान हमेशा ठण्डे पानी से तड़के कर
लेना बहुत ही लाभदायक है । शरीर की त्वचा को मैल-मिट्टी

और पसीने से बिलकुल साफ रक्खो। नदी के स्वच्छ जल में
स्नान करना सबसे उत्तम है।
८—अपने काम और मौसम के अनुसार हमेशा साफ और
ढीले कपड़े पहनो तथा हर मौसम में खुली हवा में मुख खोलकर
सोने के अभ्यासी बनो।
९—प्रतिदिन नियमित रूप से थोड़ा समय धूप में बिताओ।
और सूर्य से शक्ति लिया करो।
१०—सदा प्रसन्नचित्त रहो और चिन्ता आदि से दूर रहो।
किसी की बुराई मत करो और सृष्टि की प्रत्येक वस्तु से कुछ न
कुछ शिक्षा लेने की चेष्टा करो।
११—ब्रह्मचर्य से रहा करो। वेश्यागामी और पर-स्त्री-गामी
न बनो। इसी प्रकार से जो स्त्रियाँ स्वस्थ रहना चाहें वे पराये
पुरुष को बुरी निगाह से न देखें।
१२—नशे की चीजों से सदा दूर रहो। नशीली चीजों के
सेवन से फेफड़े खराब हो जाते हैं।
१३—भोजन करते समय जितना कम जल पी सको; उतना
ही अच्छा। भोजन करने के घण्टा आध घण्टा बाद इच्छा के
अनुसार जल पिया करो।
१४—प्रतिदिन शुद्ध गोदुग्ध का सेवन किया करो। एक
मनुष्य के लिए २४ घण्टे में सेर भर दूध पीना अत्यन्त
आवश्यक है।

३१२ असली कोकशास्त्र
१५—थोड़ा-सा छाछ (मट्ठा) का सेवन करना बड़ा ही
लाभदायक है। वैद्यक ग्रन्थों में इसकी बड़ी प्रशंसा लिखी है।
स्वास्थ्य के लिए यह बड़ी ही उपयोगी वस्तु है।
१६—अपनी सुविधा के अनुसार ताजे और आरोग्य फलों
का सेवन किया करो।
१७—सबेरे कुछ रात शेष रहते ही उठने की आदत डालो।
शय्या से उठते ही परमात्मा का ध्यान किया करो। बाद शौचादि
से निवृत्त होकर व्यायाम करो। व्यायाम उतना ही करो, जितने से
थकावट न मालूम हो।
१८—चटपटी, मसालेदार और बाजार की बनी हुई चीजें
(मिठाई पूड़ी आदि) कभी मत खाओ।
१९—मुँह से कभी साँस मत लो। यदि इसकी आदत पड़
गयी हो तो शीघ्र इस दोष से अपना पिण्ड छुड़ाओ। मुँह से साँस
लेना बड़ा ही हानिकारक है। कारण यह कि मुँह के रास्ते से जो
हवा भीतर जाती है, वह छनकर नहीं जाती। अतः वायु में उड़ने
वाले अनेक सूक्ष्म तथा विषैले जीवाणु एवं समन्वित धूलि-कण या
ऐसा ही कोई दूसरा मल शरीर के भीतर चला जाता है जो कि
नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करने का कारण होता है; किन्तु नासिका
द्वारा साँस लेने से उक्त चीजें नासिका-द्वार में ही अटक जाती हैं।
मुख द्वारा श्वासन-क्रिया करनेवालों के फेफड़े में रोगों को उत्पन्न
करनेवाले नाना प्रकार के परमाणु एकत्र हो जाते हैं। नासिका के