रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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उद्देश्य हो होता है, बल-संचय करना। यही कारण है कि दोनों
प्रकार के व्यायाम का एक दूसरे से विपरीत परिणाम होता है।
क्योंकि मनोयोग ही तो प्रधान वस्तु है; इसी के द्वारा तो मनुष्य
शक्ति को खींचकर अपने शरीर में भरता और असाध्य से असाध्य
कामों को साध्य कर दिखलाता है। जिस काम में बल-संचय की
ओर लक्ष्य ही नहीं है, काम पूरा करने की ओर मन का झुकाव है,
उसके करने से बल का संचय क्योंकर हो सकता है; उससे तो बस
काम ही पूरा हो सकता है; क्योंकि उसी पर मन का झुकाव रहता
है। इस मनोयोग की कितनी बड़ी महिमा है तथा इसमें कितनी
शक्ति है, इसका उल्लेख पीछे विस्तारपूर्वक किया जा चुका है; अतः
अब यहाँ उसकी पुनरावृत्ति करने की आवश्यकता नहीं है।
व्यायाम करते समय इच्छा-शक्ति को अपने अंगों की ओर
लगाना चाहिए। ऐसी धारणा रखनी चाहिए कि हमारे शरीर में
बल का संचार हो रहा है। इच्छा-रहित व्यायाम लाभकारी नहीं
होता, यही कारण है कि बहुत से लोगों को व्यायाम के लाभों से
वंचित रह जाना पड़ता है। जिस अंग को जितना मजबूत बनाना
हो, व्यायाम करते समय उस अंग में उतनी ही अधिक इच्छाशक्ति
लगानी चाहिए।
दस वर्ष की अवस्था तक किसी प्रकार का व्यायाम करना
उचित नहीं है; इस अवस्था तक जो स्वाभाविक व्यायाम दौड़ने-
धूपने और खेलने-कूदने में हो जाता है, वही यथेष्ट है। ग्यारहवें