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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 440 में से

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२६६ असली कोकशास्त्र
और दूसरा अनियमित व्यायाम। व्यायाम के नियमों को ध्यान में
रखकर जो व्यायाम किया जाता है उसे नियमित व्यायाम कहते
हैं और उसके विपरीत जो व्यायाम होता है उसे अनियमित व्यायाम
कहते हैं। लोहार हथौड़ा या घन लेकर लोहा पीटने में बहुत अधिक
परिश्रम करता है पर यह उसका अनियमित व्यायाम है। इस व्या-
याम से उसका शरीर स्वस्थ और बलवान नहीं होता। पहलवान
दंड-बैठक करके मुद्गर फेर कर तथा कुश्ती लड़कर परिश्रम करता
है, यह उसका नियमित व्यायाम है। इसमें शरीर सुडौल होता है
और अंग-प्रत्यंग बलवान होता है। इस विभिन्न परिश्रम के दो
कारण प्रधान हैं। एक तो यह कि अनियमित व्यायाम में प्रति
दिन का नियम नहीं रहता, कभी परिश्रम होता है और कभी नहीं
होता तथा कभी बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है और कभी
बिलकुल ही कम; किन्तु नियमित व्यायाम नियम-पूर्वक प्रति दिन
होता है और परिश्रम में बहुत अधिक अन्तर नहीं पड़ता। उसके
किंचित् न्यूनाधिक होने की बात दूसरी है। दूसरा कारण परिमाण
की विपरीतता का यह है कि अनियमित व्यायाम में परिश्रम करने
वाले का ध्यान बल संचय की ओर नहीं रहता, बल्कि काम पूरा
करने की ओर रहता है। "गले पड़ी ढोल बजाये सिद्ध।" इस
कहावत के अनुसार उसे तो मर-जीकर काम पूरा करने की धुन रहती
है; किन्तु नियमित व्यायाम करनेवाला मनोयोगपूर्वक बल संचयन
की ओर ही ध्यान रखता है; उसका परिश्रम करने का एक मात्र