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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

असली कोकशास्त्र २८१
उत्तम सन्तानोत्पत्ति के लिए स्त्री
शिक्षा का प्रयोजन
उत्तम सन्तान पैदा करने तथा बालकों को उत्तम शिक्षा देने
के लिए स्त्री-शिक्षा की बहुत बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि यह बात
पहले ही लिखी जा चुकी है कि शिशु के लिए माता ही आदि गुरु
है, और शिशु एक बार सबको होना पड़ता है, बाद लोग अन्यान्य
अवस्थाओं में प्रवेश करते हैं, इस लिए माता ही जगत् की आदि
गुरु है। यह कितने दुःख की बात है कि हमारे देश की माताएँ
बिलकुल अशिक्षिता हैं। जिस स्त्री-जाति के ऊपर इतनी बड़ी
जिम्मेदारी है, जो स्त्री-जाति अपने गुण और दोष से समूचे देश को
आनन-फानन समुन्नत और पवित्र बना सकती है, उसकी आज कैसी
शोचनीय दशा हो रही है कि सोचकर हृदय हिल जाता है। गुरु
के अनभिज्ञ होने पर शिष्य के पण्डित होने की आशा करना दुराशा
नहीं तो और क्या है ? यदि आज हमारे देश में स्त्री-शिक्षा का
काफी प्रचार होता, स्त्रियाँ शिक्षिता होतीं, अपने दायित्व को सम-
झती होतीं तो देश की इतनी पतित और घृणित दशा कदापि न
होने पाती। उन्हीं के मूर्खा होने के कारण आज चारों ओर स्कूलों
में, कालेजों में, घरों में, शहरों में, गाँवों में, खेतों में, कारखानों में,
राह में, तीर्थों में, धर्मशालाओं में सब जगह पापाचार हो रहा है।

२८२ असली कोकशास्त्र
सुधारक चिल्लाते चिल्लाते अपने जीवन की आहुति दे रहे हैं, लेखक-
गण लेखनी रगड़ते-रगड़ते आँखें फोड़ रहे हैं; किन्तु फल कुछ भी
नहीं होरहा है। कारण ? कारण यही कि स्त्री-शिक्षा का अभाव !
यदि आज हमारी मातायें शिक्षिता होतीं, तो यह अनर्थ कभी न
होता। क्योंकि वे बचपन से बच्चों को उचित शिक्षा देतीं जिससे
स्वाभाविक ही सब लोग सदाचारी और कर्त्तव्यपरायण होते । 'न
रहता बाँस और न बजती बाँसुरी ।' फिर न तो ऐसे नीचतापूर्ण
कार्य ही होते और न उनके सुधारने की आवश्यकता ही पड़ती ।
बच्चे अपनी माता की देख-रेख में ही अधिक रहते हैं। उनकी
देखभाल जितनी माता कर सकती है, उतनी और कोई नहीं कर
सकता। माताओं की अशिक्षा के कारण बच्चे अपनी तबीयत के
अनुसार खेलते-कूदते और कुसंगति में पड़कर बुरी आदतें डाल
लेते हैं। माताएँ उधर ध्यान नहीं देतीं। यदि उनमें शिक्षा की
कमी न होती और सन्तान-शिक्षा आदि की विधियाँ वे जानती
होतीं तो इस ओर उनका पूरा ध्यान रहता। हरवक्त बच्चों पर
कड़ी नजर रखतीं और अपने पास उन्हें बैठाकर अच्छी-अच्छी
बातों की शिक्षा देतीं। उस अवस्था में बचपन से ही प्रत्येक जीवन
आदर्श के साँचे में ढला हुआ निकलता और एक अपूर्व ही दृश्य
दिखलायी पड़ता। तब न तो देश में इतना दुराचार ही फैला हुआ
दिखलायी पड़ता और न इस प्रकार के शक्तिहीन और अल्पायु
मनुष्य ही होते। महाकवि कालिदास ने लिखा है—

असली कोकशास्त्र २ : ३
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।
स्माइल्स ने लिखा है कि,—“भावी सन्तान की स्वास्थ्यरक्षा
का भार ईश्वर की ओर से खियों को ही सौंपा गया है। शारीरिक
स्वास्थ्य में ही चरित्र-बल और मानसिक शक्ति की पवित्रता
निहित है ।
किन्तु आज ऐसी कितनी खियाँ हैं जो ईश्वर की ओर से सौंपे
गये इस भार को वहन करने में समर्थ हैं ? वे इस बात को जानतीं
ही नहीं कि किस प्रणाली से सन्तान का पालन तथा उनकी शिक्षा
का विधान होना चाहिए । इस लिए कभी-कभी अपनी सन्तान की
भलाई करती हुई भी वे अपनी अनभिज्ञता के कारण उसकी बुराई
कर डालती हैं। सभी माताएँ यह चाहती हैं कि हमारे बच्चे
सुन्दर हों, दस में गिने जाने के लायक हों, दीर्घजीवी हों । इसके
लिए अपनी-अपनी विद्या-बुद्धि के अनुसार वे कोई यत्न उठा भी
नहीं रखतीं; किन्तु जिस बात को वे स्वयं नहीं जानतीं, उसमें वे
बेचारी क्या कर सकती हैं ? अपनी इस अनभिज्ञता के कारण
आज वे भी महान दुःख भोग रही हैं। एक तो नासमझी के कारण

२८४ असली कोकशास्त्र
शक्ति उठा न रक्खें। पुरुष सन्तान-पालन विधि को जानते हुए भी
लापरवाही कर सकता है, पर स्त्री ऐसा कभी भी नहीं कर सकती,
यह निश्चय है।
हाय ! सन्तान-पालन ही स्त्रियों का मुख्य कर्त्तव्य है और उसे
ही वे अबलायें नहीं जानतीं। एक वंगीय विद्वान ने लिखा है:—
“मातृत्व ही नारी-जीवन का प्रधान उद्देश्य और चरम लक्ष्य है।
उनके लिए सबसे बढ़कर गौरव की बात यही है कि वे मातायें हैं।
गर्भ-धारण तथा सन्तान-पालन से बढ़कर महत्त्वपूर्ण कार्य नारी-
जीवन के लिए दूसरा नहीं है; क्योंकि इन्हीं दो बातों से सृष्टि की
रक्षा होती है। इसीसे इनका महत्त्व और गौरव भी अधिक है।
किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि हिन्दू-जाति आज
अपनी कन्याओं को इस योग्य होने ही नहीं देती कि वे समय आने
पर सच्ची माताएँ बन सकें और माता की तरह जीवन यापन कर
सकें। क्या यह समाज के लिए अत्यन्त लज्जा की बात नहीं है ?
नाथ ! प्रभो !! भगवान !!! वह दिन कब आवेगा, जब हिन्दू जाति
को अपनी यह भद्दी भूल स्पष्ट रीति से दिखलायी पड़ेगी, और वह
इस त्रुटि को दूर करने के लिए स्त्री-शिक्षा प्रचार करने में जी-जान
से, कमर कसकर तैयार होगी ? क्या देश की दुर्दशा की आह भरी
पुकार तुम्हारे कानों तक अभी भी नहीं पहुँची ? कितना सतावोगे
जगदीश्वर ! तुम्हारे इस प्रकार सोते रहने से इस अनाथ देश की
रक्षा कौन करेगा दीनबन्धु ! क्या कलि के प्रभाव से तुम भी असमय

असली कोकशास्त्र २८५
में ही सोने लग गये ? तुम तो प्रलयकाल में सोया करते थे, फिर
यह क्या कह रहे हो ? क्या सृष्टि का काम करते-करते तुम्हें भी
थकायी आ गयी ? किन्तु वेद तो कहता है कि तुम सदा एक रस
रहते हो ? सब कुछ करते हुए भी अकर्त्ता हो ? जरा इधर भी
निगाहें फेरो लला ! देखो हिन्दू-समाज की दुर्दशा से, दुर्दशा की
भी दुर्दशा हो रही है— वह भी अब चिल्लाने लग गयी है ! यदि
तुम विश्राम ही करना चाहते हो तो करो विश्राम, मुझे कुछ नहीं
कहना है; पर एक बात इस अकिंचन की सुन लो ! यही कि यदि
तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो प्रलय करके चैन से विश्राम करो,
व्यर्थ ही अपने सिर पर पहपट क्यों कराते हो ! तेज-स्वरूप
होकर डरो न नाथ ! अन्धकार तो तुम्हारे दृष्टि-निक्षेप से ही भाग
जायगा । तनिक अपने वचन की ओर निगाहें फेरो:—
यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
—श्रीमद्भगवद्गीता
कहो, अब इससे बढ़कर उपयुक्त समय और कौन सा आवेगा ?
बता दो न ? भारतीय देवियाँ अज्ञता के कारण नाना प्रकार की
यन्त्रणायें भोग रही हैं, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह तथा बेमेल विवाह
का दमन-चक्र जोरों से चारों ओर चल रहा है, दुराचार का प्रचंड

२८६ असली कोकशास्त्र
प्रवाह प्रलय करने के लिए विकराल स्वर में 'हू हू' कर रहा है,
फिर भी अभी तुम किसी अलक्षित समय की प्रतीक्षा कर रहे हो !
उतना ही गुदगुदाओ, जितना नीक लगे लला !
ओफ ! आदि गुरु की खराबी से ही आज हम दासत्व की
श्रृंखला में भी जकड़े हुए हैं। हम में शक्ति नहीं बल नहीं भ्रातृत्व
बन्धुत्व नहीं, देश-प्रेम नहीं, स्वाभिमान नहीं, एक स्वर में बोलने
का साहस नहीं—कुछ भी नहीं ! है एक वस्तु—कायरता ! यदि
हमारी माताओं में बुद्धि होती, जानकारी होती, तो पहले ही से
उनके द्वारा उक्त वस्तुएँ हमें प्राप्त रहतीं ओर अवसर पड़ने पर
सिंह की तरह दहाड़ कर भारतमाता की इकतीस कोटि सन्तान
रण-भूमि में शत्रु पर विजय प्राप्त कर जननी-जन्म-भूमि के नत-
मस्तक को ऊपर उठाने में समर्थ होते। फिर संसार हमारो बोरत
के गीत गाता और हम मस्त कानों से उन गीतों का आनन्द लेते !
पर अभी तो यह सब दुरासा मात्र ही है। जमोन पर रहकर बादल
चाटने की कोशिश करना निरी मूर्खता है। यदि ऐसी अभिलाषा
देशवासियों के मन में हो कि 'हम मरमिटेंगे पर दास बनकर
जोवित कभी न रहेंगे' तो सबसे पहले आवश्यकता इस बात
की है कि देश में स्त्री-शिक्षा का प्रचार किया जाय—ताकि देशमें
वीर, साहसी और स्वाभिमानी बच्चे पैदा हों। किन्तु यदि ऐसा
भाव देशवासियों का हो जाय तो फिर दासता टिक ही कैसे सकती
है। ऐसी अभिलाषा तो वार साहसो देश के लोग ही कर सकते हैं।

असली कोकशास्त्र २८७
याद रहे कि सारे विषयों की शिक्षा केवल माता से ही
प्राप्त हो जाती है। शिशु के जीवन पर माता का ही प्रभाव सबकी
अपेक्षा अधिक पड़ता है। यदि माता पढ़ी-लिखी हो तो वह गर्भ से
लेकर पाठशाला या स्कूल में जाने के योग्य होने तक अपने बच्चे
को इतनी शिक्षा दे सकती है, कि उस बच्चे को देखकर लोगों को
दंग रह जाना पड़े। जिस प्रकार बालक थोड़ी ही उम्र में सुनते-सुनते
अपनी मातृभाषा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार वह बड़ी
बड़ी बातों को आसानी से माता के पास रहकर ही सीख सकता
है। बचपन में पड़े हुए संस्कार कितने पुष्ट होते हैं, यह किसी से
बतलाने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इस बात को सभी लोग
जानते हैं कि कोई भी वस्तु कोमल रहने पर ही अपनी इच्छा के
अनुकूल मुकायी या बनायी जा सकती है; पर कठोर हो जाने पर
उसके झुकाने का प्रयत्न करना व्यर्थ जाता है—बल्कि कभी-कभी
वह अधिक जोर दे देने के कारण टूट भी जाती है; ठीक यही हाल
मानव-शरीर का है। बचपन में तो चाहे जैसा उसे बनाया जा
सकता है, पर शुद्ध हृदय पर वाहियात के कुसंस्कारों की मैल बैठ
जाने पर कठिन हो जाता है। इस लिए माता का पूर्ण विदुषी होना
जरूरी है। केवल स्तन-पान कराकर बच्चे का पोषण करने और
लाड़-प्यार से उसकी तबियत खुश रखने से ही बच्चे की उन्नति
कभी नहीं हो सकती। बच्चे को योग्य बनाने के लिए माँ की
सहायता मिलना विशेष प्रयोजनीय है।

२८८ असली कोकशास्त्र
रामायण और महाभारत के उपाख्यान हमारे देश की स्त्रियों
को अत्यन्त प्रिय हैं। इन दोनों को छोड़कर गार्हस्थ्य-धर्म की शिक्षा
देनेवाले ऐसे उत्कृष्ट ग्रन्थ इस देश में अन्य नहीं। सीता और
सावित्री के दुःख, दमयन्ती और चिन्ता का पातिव्रत्य एवं नाना
प्रकार के कष्टों के विवरण आँसुओं से लिखे गये हैं। इन कथाओं
को पढ़कर स्त्रियों का स्वाभाविक कोमल हृदय पिघले बिना नहीं
रहता। उपन्यासों के पढ़ने से भी कितनी ही बार कारुणिक घटनाओं
पर आँख से आँसु लुढ़क पड़ते हैं। किन्तु पौराणिक कथाओं और
वर्त्तमान उपन्यासों में अन्तर है। आधुनिक लेखक-मण्डली कहीं-
कहीं केवल पाठकों के मन में कष्ट को जागृत करने के लिए ही
किसी परिवार की घटना का वर्णन करते हैं, केवल दुःख-पूर्ण घट-
नाओं को पढ़कर मन में दुःख पैदा करने से क्या लाभ ? जिस
प्रकार छोटे लड़के उड़ने और फुदकने वाले जन्तुओं को पकड़ कर
उनके पंख और पैरों में खोदकर आमोद पाते हैं, आजकल के अधि-
कांश लेखक भी उसी प्रकार किसी सुन्दरी युवती या युवक के एक
दुःख से दूसरे दुःख में पड़ने के दास्तान को कारुणिक भाषा में
वर्णन कर सन्तुष्ट होते हैं। किन्तु इस प्रकार दुःखद घटनाओं से
क्या लाभ ? यदि धर्म के लिए अथवा किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के
लिए कोई आत्मोत्सर्ग करे और कष्ट भोगे, तब तो उस घटना से
पाठक-पाठिकाओं का मन समुन्नत होता है और हृदय में धर्मभाव
उत्पन्न हो जाता है, अन्यथा कुछ नहीं। स्वामी को प्राप्त करने के

१६ असली कोकशास्त्र २८६
लिए बेहुला अथवा सावित्री ने जिन कष्टों को स्वीकार किये थे,
उन्हें पढ़कर किस स्त्री का मन विस्मय और उच्च भावों से पूर्ण नहीं
हो उठेगा ? कोई तो पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए बन
गया है, कोई बाल्यावस्था में ही सर्वस्वत्यागी योगी होकर ईश्वरा-
राधन में प्रवृत्त हुआ है और किसी ने नाना प्रकार के ऐश्वर्य-प्रलो-
भनों को पैरों से ठुकरा कर पातिव्रत्य-धर्म का पालन करके जगत्
के सामने अपने को रख दिया है । किन्तु आजकल के उपन्यासों में
कहीं तो बहू ने अपनी सास को विष देकर निष्ठुरतापूर्वक मार डाला
है और कहीं सास ने ही बहू की हत्या की है । ऐसे वृत्तान्तों को
पढ़ने या सुनने से क्षणभर के लिए उत्तेजना या कष्ट हो सकता है,
किन्तु इनसे लाभ कुछ भी नहीं हो सकता । इस लिए स्त्री-समाज
को उत्तमोत्तम शिक्षाप्रद ग्रन्थों का अवलोकन करना चाहिए ओर
अच्छे-अच्छे उपाख्यानों को आपस में कहना-सुनना चाहिए ।
अब हम यहाँ पर थोड़ा-सा इस बात पर भी विचार करेंगे कि
स्त्री-शिक्षा किस ढंग की होनी चाहिए। वास्तव में यह विषय बड़ा
ही कठिन है। यहाँ की विद्वन्मण्डली अभी तक एक राय नहीं हो
सकी है। इस लिए अभी हम सिर्फ इतना ही कहेंगे कि स्त्रियों में
प्रत्येक विषय की साधारणतया जानकारी होनी चाहिए । जैसे,
गणित का साधारण ज्ञान भी होने से वे अपने बच्चों को हँसाते-
खेलाते, गिनती, पहाड़ा, सवैया, पौना, ड्योढ़ा, जोड़, बाकी आदि
जबानी पढ़ा सकती हैं, साथ ही छोटे-छोटे हिसाब भी बतला सकती

२६० असली कोकशास्त्र
हैं। उदाहरण लीजिये, एक पैसे का ३ आम तो ३० आम के
कितने पैसे आदि। इस प्रकार की शिक्षा से छोटी अवस्था में सौदा
वगैरह ला सकते हैं और बिना भूल किये सारी चीजें उचित मूल्य
में खरीद सकते हैं ।
सांसारिक कामों के लिए स्त्रियों को इतिहास की जानकारी
रखने की तो कोई विशेष आवश्यकता नहीं है, पर सन्तान-सुधार
की दृष्टि से थोड़ा इतिहास का ज्ञान रखना भी जरूरी है। तभी वह
सम्राट् अशोक, महाराणा प्रताप, महाराज शिवाजी प्रभृति बड़े-
बड़े राजाओं की कीर्त्ति कथा एवं शंकराचार्य, बुद्ध, चैतन्य, कबीर,
नानक आदि धर्म गुरुओं की जीवनी अपने बच्चों को बचपन में ही
कण्ठ कराने में समर्थ हो सकती हैं। इतिहास की तारीख और सन्
अथवा मामूली घटना जानने को स्त्री को विशेष आवश्यकता नहीं
है। साधारणतया भारतवर्ष का इतिहास धारावाहिक रूप से
जानना ही बहुत है। इसके लिए इतिहास की बड़ी-बड़ी जिल्दें
यदि स्त्रियाँ न भी पढ़ें तो कोई आपत्ति नहीं, जिस पुस्तक में गल्प
रूप में भारत का इतिहास थोड़े में लिखा हो, वही पढ़कर जान लें ।
इस ढङ्ग की पुस्तकें अंग्रेजी में तो बहुत सी हैं। बँगला में भी इधर
कुछ पुस्तकें निकली हैं; पर हिन्दी में अभी ऐसी पुस्तकों का एक
प्रकार से अभाव सा है। इस लिए हिन्दी-प्रेमियों का ध्यान इस
ओर अवश्य जाना चाहिए। यह काम जितने शीघ्र किया जाय
उतना ही अच्छा है ।

असली कोकशास्त्र २६१
भूगोल के सम्बन्ध में भी वही बात है; गोलमटोल पृथ्वी का
नक्शा जान लेना, बड़े-बड़े राज्य और उसकी राजधानी, पर्वत
समुद्र और नदियों का जान लेना ही स्त्रियों के लिए पर्याप्त है।
यदि वे इससे अधिक जानें तो और भी अच्छा, नहीं तो इतना तो
जरूर ही जानना चाहिए। इसी प्रकार अन्यान्य विषयों का भी
स्त्री को ज्ञान होना चाहिए।
―――*―――
प्रेम
स्त्री ओर पुरुष के सम्बन्ध की जड़ प्रेम है। प्रेम बड़ा ही
विचित्र पदार्थ है। क्योंकि इसमें स्वर्ग और नर्क दोनों ही छिपे हैं।
सच्चा प्रेम वही है, जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ न हो। सच्चा प्रेमी
अपने प्रेमिकों से प्रेम का बदला नहीं चाहता। वह तो यह जानता
ही नहीं कि उसे अपनी प्रेमिका से क्यों इतना प्रेम है। क्योंकि उसे
देखते ही उसके आनन्द की सीमा नहीं रहती। शिव-पार्वती में ऐसा
ही प्रेम था। एकबार पार्वती के पिता दक्ष प्रजापति ने उनके सामने
शिवजी की निन्दा की थी, इस लिए पार्वती ने अपना प्राण दे
दिया। जानकी जी ने सच्चे प्रेम के कारण ही अपने पति भगवान
रामचन्द्र के साथ बनों में फिरीं। महारानी दमयन्ती ने राजा नल
के लिए साधारण कष्ट नहीं सहा। पति-पत्नो का पवित्र प्रेम ही
प्रेममय परमेश्वर के प्रेम का विकाश है। इसीसे जगत को प्रेम

२६२ असली कोकशास्त्र
करने की शिक्षा मिलती है। पति-पत्नी का सच्चा प्रेम सामाजिक या
शारीरिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है। शरीर-सुख अथवा तुच्छ
भोग-विलास के लिए जो प्रेम होता है, वह प्रेम कोई चीज नहीं है
और न तो अधिक काल तक ठहरता ही है। पवित्र प्रेम नित्य
नये रस से पति-पत्नी के हृदय को सींचा करता है।
सच्चा प्रेम स्त्री-पुरुष के मन और हृदय को एक बना देता है।
प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है, अतः ऐसे स्वतन्त्र दो हृदयों को एक
बना देना आसान काम नहीं है। जब तक दोनों प्रेमियों के लक्ष्य,
भाव, धर्म, अवस्था एक न हों, तब तक वास्तविक मिलन होना
सम्भव नहीं। किन्तु दुःख की बात है कि आजकल आदर्श विवाह-
सम्बन्ध में लोग उक्त बातों पर तनिक भी ध्यान नहीं देते। इस
लापरवाही का फल यह हो रहा है कि कितने ही स्त्री-पुरुषों में ठीक
उतना ही भेद दिखलायी पड़ता है, जितना कि पशुओं में। न तो
स्त्री अपने पति पर अनुराग रखती है और न पुरुष अपनी स्त्री पर।
यही कारण है कि आजकल जो सन्तानोत्पत्ति हो रही है, वह मूर्ख,
प्रेम-हीन, माता-पिता पर अश्रद्धा रखनेवाली और अनेक प्रकार के
दुर्गुणों से भरी हुई। क्योंकि माता-पिता के ही रक्त, मांस, बल,
वीर्य और स्वभाव को लेकर ही तो बच्चे पैदा होते हैं; जिस बात
का माँ-बाप में ही अभाव है, वह बात उनमें कहाँ से आ जायगी?
यहाँ पर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि जब यही बात है तब फिर
मूर्ख और क्रूर माँ-बाप से विद्वान् और दयालु बच्चा कैसे पैदा होता

असली कोकशास्त्र २६३
जाता है ? प्रश्न बहुत ही ठीक है। वास्तव में ऐसा बहुधा देखने में
आता है कि विद्वानों के बच्चे मूर्ख औ मूर्खों के लड़के विद्वान
निकल जाते हैं। किन्तु यह बात भी ऊपर के कथन से विपरीत नहीं
है। गम्भीरता-पूर्वक विचार करने से मालूम होगा कि गर्भाधान
के समय माता-पिता में तथा उसके बाद् माता में वे बातें मौजूद
थीं जो बालक में पायी जाती हैं—चाहे माँ-बाप ने उनका पालन
जानकर किया हो अथवा बिना जाने; चाहे वे बातें किसी कारण-
वश उस समय उपस्थित हो गयी हों अथवा स्वाभाविक ही।
—:*:—
व्यायाम
जीवन को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को
व्यायाम अवश्य करना चाहिए। व्यायाम किये बिना शरीर स्वस्थ
नहीं रह सकता और शरीर अस्वस्थ रहने से पहले तो सन्तानो-
त्पत्ति होती ही नहीं और यदि होती भी है तो रुग्ण और अल्पायु।
उत्तम सन्तान पैदा करने की इच्छा रखनेवालों के लिये व्यायाम
एक बड़ी महत्त्वपूर्ण और प्रयोजनीय वस्तु है। दुःख की बात है
कि हमारे देश में स्त्रियों के व्यायाम की प्रथा बिलकुल ही लुप्त हो
गयी है। यही कारण है कि हमारी गृह-देवियाँ अपनी रक्षा स्वयं
न करके दूसरों के आश्रित रहती हैं। भारत का प्राचीन इतिहास
इस बात का साक्षी है कि पहले भारतवर्ष की देवियाँ कितनी

२६४ असली कोकशास्त्र
साहसी और निर्भीक थीं। महाराज दशरथ हार गये होते यदि
महारानी कैकेयी अर्धागिनी धर्म का पालन करते हुए उनके रथ का
सम्भार न कर सकी होतीं; झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के
वीरत्त्व से सारा संसार भली-भाँति परिचित है किन्तु क्या आज
एक भी स्त्री हमारे देश में ऐसी है जो आपत्तिकाल में कैकेयी की
भाँति अपने पति की सहायता कर सके ? क्या ऐसी भी कोई स्त्री
है जो देश की स्वतन्त्रता के लिए महारानी लक्ष्मीबाई की तरह
वीरतापूर्वक शत्रुओं का मुकाबला कर सके ? सम्भवतः यही उत्तर
मिलेगा कि, —नहीं।
यदि गम्भीरता के साथ विचार किया जाय कि हमारी गृह-
देवियाँ इस प्रकार पौरुषहीन क्यों हो गयीं, तो पता चलेगा कि
उनमें न तो विद्या है न शक्ति ही है। यही कारण है कि विधर्मी
उन पर दिन रात आक्रमण कर रहे हैं, उनके सब से प्यारे सतीत्व-
धर्म का अपहरण कर रहे हैं और वे बेचारी निस्सहाय होकर सब
कुछ सहन कर रही हैं। यदि उनमें अपनी रक्षा करने की बुद्धि
होती, यदि उनके शरीर में धर्म पर आक्रमण करनेवाले का सामना
करने के लिए बल होता तो किसकी हिम्मत पड़ती जो उनकी ओर
आँख उठाने का साहस करता ? किन्तु यह बात तबतक स्वप्नवत
ही रहेगी, जबतक स्त्रियाँ व्यायाम का महत्त्व न समझ जायँगी
और व्यायाम करके अपने आत्म-रक्षार्थ शरीर-बल न बढ़ावेंगी।
इसके लिए पुरुषों को चाहिए वे व्यायाम का महत्त्व अपने

असली कोकशास्त्र २६१
घर की स्त्रियों को समझावें और उस पर उन्हें आरूढ़ करें । पुरुष
प्रोत्साहन के बिना स्त्रियों का इधर ध्यान देना असम्भव है । कारण
यह कि इस प्रथा का लोप हो जाने के कारण उनमें संकोच की
मात्रा इतनी अधिक हो गयी है कि वे व्यायाम कर ही नहीं सकतीं ।
अधिकांश स्त्रियाँ तो व्यायाम का नाम सुनते ही दिल्लगी समझ
बैठेंगी, “भला स्त्रियाँ कसरत करेंगी, कैसा अन्धेर है ! अब घोर
कलियुग छा गया, इसी से ऐसी उल्टी बातें लोग कहने लगे हैं ।”
जिस बात की या काम की मनुष्य की आदत नहीं रहती, उसके
करने में उसे स्वाभाविक ही बड़ा अनुकुस और संकोच मालूम
होता है ।
स्त्रियों के व्यायाम की बात सुनकर कितने ही लोग हँसेंगे और
कहेंगे कि क्या दंड-बैठक करना स्त्रियों को शोभा देगा ? असल
में तो दंड-बैठक करने के लिए कहा ही नहीं जा रहा है और यदि
कहा भी जाय तथा वे इसे करने भी लगें तो इसमें कुशोभा की
कौन-सी बात है । इस पर कुछ लोग यह कह सकते हैं कि जब
दंड-बैठक के लिये नहीं कहा जा रहा है, तब वे व्यायाम ही कौन-
सा करेंगी ? ऐसा कहनेवालों को यह मालूम ही नहीं है कि व्या-
याम किसे कहते हैं और वह कितने प्रकार का होता है ।
व्यायाम का अर्थ है—“नाना प्रकार के अंग-संचालन द्वारा
प्रत्येक अंग पर जोर डालकर परिश्रम करना और उन्हें सुदृढ़
बनाना । यह व्यायाम दो तरह का होता है । एक नियमित व्यायाम

२६६ असली कोकशास्त्र
और दूसरा अनियमित व्यायाम। व्यायाम के नियमों को ध्यान में
रखकर जो व्यायाम किया जाता है उसे नियमित व्यायाम कहते
हैं और उसके विपरीत जो व्यायाम होता है उसे अनियमित व्यायाम
कहते हैं। लोहार हथौड़ा या घन लेकर लोहा पीटने में बहुत अधिक
परिश्रम करता है पर यह उसका अनियमित व्यायाम है। इस व्या-
याम से उसका शरीर स्वस्थ और बलवान नहीं होता। पहलवान
दंड-बैठक करके मुद्गर फेर कर तथा कुश्ती लड़कर परिश्रम करता
है, यह उसका नियमित व्यायाम है। इसमें शरीर सुडौल होता है
और अंग-प्रत्यंग बलवान होता है। इस विभिन्न परिश्रम के दो
कारण प्रधान हैं। एक तो यह कि अनियमित व्यायाम में प्रति
दिन का नियम नहीं रहता, कभी परिश्रम होता है और कभी नहीं
होता तथा कभी बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है और कभी
बिलकुल ही कम; किन्तु नियमित व्यायाम नियम-पूर्वक प्रति दिन
होता है और परिश्रम में बहुत अधिक अन्तर नहीं पड़ता। उसके
किंचित् न्यूनाधिक होने की बात दूसरी है। दूसरा कारण परिमाण
की विपरीतता का यह है कि अनियमित व्यायाम में परिश्रम करने
वाले का ध्यान बल संचय की ओर नहीं रहता, बल्कि काम पूरा
करने की ओर रहता है। "गले पड़ी ढोल बजाये सिद्ध।" इस
कहावत के अनुसार उसे तो मर-जीकर काम पूरा करने की धुन रहती
है; किन्तु नियमित व्यायाम करनेवाला मनोयोगपूर्वक बल संचयन
की ओर ही ध्यान रखता है; उसका परिश्रम करने का एक मात्र

असली कोकशास्त्र २६७
उद्देश्य हो होता है, बल-संचय करना। यही कारण है कि दोनों
प्रकार के व्यायाम का एक दूसरे से विपरीत परिणाम होता है।
क्योंकि मनोयोग ही तो प्रधान वस्तु है; इसी के द्वारा तो मनुष्य
शक्ति को खींचकर अपने शरीर में भरता और असाध्य से असाध्य
कामों को साध्य कर दिखलाता है। जिस काम में बल-संचय की
ओर लक्ष्य ही नहीं है, काम पूरा करने की ओर मन का झुकाव है,
उसके करने से बल का संचय क्योंकर हो सकता है; उससे तो बस
काम ही पूरा हो सकता है; क्योंकि उसी पर मन का झुकाव रहता
है। इस मनोयोग की कितनी बड़ी महिमा है तथा इसमें कितनी
शक्ति है, इसका उल्लेख पीछे विस्तारपूर्वक किया जा चुका है; अतः
अब यहाँ उसकी पुनरावृत्ति करने की आवश्यकता नहीं है।
व्यायाम करते समय इच्छा-शक्ति को अपने अंगों की ओर
लगाना चाहिए। ऐसी धारणा रखनी चाहिए कि हमारे शरीर में
बल का संचार हो रहा है। इच्छा-रहित व्यायाम लाभकारी नहीं
होता, यही कारण है कि बहुत से लोगों को व्यायाम के लाभों से
वंचित रह जाना पड़ता है। जिस अंग को जितना मजबूत बनाना
हो, व्यायाम करते समय उस अंग में उतनी ही अधिक इच्छाशक्ति
लगानी चाहिए।
दस वर्ष की अवस्था तक किसी प्रकार का व्यायाम करना
उचित नहीं है; इस अवस्था तक जो स्वाभाविक व्यायाम दौड़ने-
धूपने और खेलने-कूदने में हो जाता है, वही यथेष्ट है। ग्यारहवें

२६८ असली कोकशास्त्र
साल से सोलह वर्ष की अवस्था तक स्वच्छ वायु सेवन और दौड़ने
की कसरत की ओर ध्यान देना चाहिए। इस अवस्था तक दण्ड-
बैठक करना अच्छा नहीं है। क्योंकि सोलह वर्ष तक शरीर की
नस नाड़ियाँ और हड्डियाँ बहुत कोमल रहती हैं; अन्य प्रकार के
व्यायाम (जैसे, दंड-बैठक आदि) से उन्हें रूढ़ नहीं बनाना
चाहिए। सोलह के बाद दंड-बैठक द्वारा कसरत करना उत्तम है।
यह व्यायाम-विधि पुरुषों के लिये है। स्त्रियों के लिए आगे चलकर
बतलाया जायगा। दंड बैठक ५० से १००-१२५ तक करना
चाहिए। यह संख्या पूर्ण युवक के लिए है। कुश्ती लड़ना सबसे
उत्तम व्यायाम है; क्योंकि इससे हड्डी-हड्डी पर यथेष्ट और उचित
जोर पड़ता है। वृद्धावस्था में दंड-बैठक का व्यायाम नहीं करना
चाहिए। इस अवस्था में अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाते हैं, अतः
व्यायाम से उनको हानि पहुँचती है। हाँ अपनी शक्ति के अनुसार
प्रातः-सन्ध्या टहल कर परिश्रम कर लेना वृद्धों की स्वस्थता के
लिए भी अत्यन्तावश्यक है।
प्रारम्भ करते ही अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए। इससे
ज्वर उत्पन्न हो जाने की बहुत बड़ी सम्भावना बनी रहती है।
व्यायाम थोड़े से शुरू करके धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। यह नियम
स्त्री-पुरुष दोनों को ध्यान में रखना चाहिए।
तेल की मालिश भी एक प्रकार का व्यायाम है। इससे खून में
गर्मी पैदा होती है। कड़वे तेल की मालिश सर्वोत्तम है। इसकी

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रगड़ से शरीर के छिद्रों का मल निकल जाता है और चमड़े पर
रहने वाले कीड़े मर जाते हैं।
व्यायाम करने का सबसे अच्छा समय प्रातःकाल है। शौचादि
से निवृत्त होकर व्यायाम करना चाहिए। कुछ लोग स्नान के
पहले व्यायाम करते हैं और कितने ही लोग स्नान के बाद। स्नान
करने के बाद व्यायाम करना अधिक उत्तम है। यदि व्यायाम के
बाद स्नान करना हो तो कम से कम एक घण्टा ठहर कर स्नान
करना उचित है। साधारण मनुष्य के लिए आधा घण्टा व्यायाम
करना जरूरी है। भोजन करने के बाद किसी प्रकार का व्यायाम
नहीं करना चाहिए।
इतना लिख चुकने के बाद अब हम स्त्रियों के व्यायाम पर
विचार करना चाहते हैं। स्त्रियों को किस प्रकार का व्यायाम करना
चाहिए। इस पर विचार करना आवश्यक है। स्त्रियों का स्वाभा-
विक व्यायाम है घर का काम-काज करना, जैसे चक्की चलाना,
कूटना आदि। इससे बहुत-कुछ कसरत स्त्रियों की हो जाती है।
इसी कसरत के कारण देहात की स्त्रियाँ हृष्ट-पुष्ट और निरोग
रहती हैं तथा शहर में रहनेवाली स्त्रियाँ यह कसरत न करने के
कारण निर्बल और रुग्णा रहती हैं।
किन्तु इतना ही व्यायाम स्त्रियों की स्वस्थता के लिए यथेष्ट
नहीं है। उन्हें उचित है कि वे धन्धे में होनेवाले व्यायाम के अति-

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रिक्त थोड़ी देर तक नियमित रूप से केवल शरीर स्वस्थ रहने के
उद्देश्य से व्यायाम किया करें ।
स्त्रियों का व्यायाम पुरुषों के व्यायाम से भिन्न होना चाहिए ।
भिन्न क्यों होना चाहिए, विस्तार-भय से इस पर यहाँ विचार नहीं
किया जायगा; पर इतना तो अवश्य कहा जायगा कि दोनों कार्यों
में विभिन्नता होने के कारण व्यायाम-प्रणाली में विभिन्नता रखना
आवश्यक है । हमारी राय है कि स्त्रियाँ पुरुषों की भाँति दंड-बैठक
न करके तथा मुद्गर न फेरकर यदि निम्नलिखित तरीके से व्यायाम
करें, तो उनकी तन्दुरुस्ती के लिए बड़ा ही लाभ हो सकता है:—
जिस प्रकार बालक को दस वर्ष की अवस्था तक व्यायाम
करने के लिए इस प्रकरण में बतलाया गया है, उसी प्रकार बालि-
काओं को भी इस अवस्था तक वही व्यायाम करना चाहिए । हाँ,
बालकों की अपेक्षा बालिकाओं का दौड़ना-धूपना कम अवश्य होना
चाहिए । कारण यह कि उन्हें और काम भी सीखना रहता है ।
बालकों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए जितना समय मिलता है
उतना बालिकाओं को नहीं; इस लिए उन्हें अधिक समय व्यायाम
की ओर लगाकर और कामों से अनभिज्ञ नहीं रहना चाहिए।
ग्यारह की अवस्था से नीचे के व्यायामों को शुरू करना चाहिए ।
१—सबेरे शौचादि से निवृत्त होकर स्त्रियों को किसी एकान्त
और हवादार कमरे में नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए ।
सीधी खड़ी होकर दोनों हाथ ऊपर उठाओ; इस प्रकार उठाओ,