रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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प्रवाह प्रलय करने के लिए विकराल स्वर में 'हू हू' कर रहा है,
फिर भी अभी तुम किसी अलक्षित समय की प्रतीक्षा कर रहे हो !
उतना ही गुदगुदाओ, जितना नीक लगे लला !
ओफ ! आदि गुरु की खराबी से ही आज हम दासत्व की
श्रृंखला में भी जकड़े हुए हैं। हम में शक्ति नहीं बल नहीं भ्रातृत्व
बन्धुत्व नहीं, देश-प्रेम नहीं, स्वाभिमान नहीं, एक स्वर में बोलने
का साहस नहीं—कुछ भी नहीं ! है एक वस्तु—कायरता ! यदि
हमारी माताओं में बुद्धि होती, जानकारी होती, तो पहले ही से
उनके द्वारा उक्त वस्तुएँ हमें प्राप्त रहतीं ओर अवसर पड़ने पर
सिंह की तरह दहाड़ कर भारतमाता की इकतीस कोटि सन्तान
रण-भूमि में शत्रु पर विजय प्राप्त कर जननी-जन्म-भूमि के नत-
मस्तक को ऊपर उठाने में समर्थ होते। फिर संसार हमारो बोरत
के गीत गाता और हम मस्त कानों से उन गीतों का आनन्द लेते !
पर अभी तो यह सब दुरासा मात्र ही है। जमोन पर रहकर बादल
चाटने की कोशिश करना निरी मूर्खता है। यदि ऐसी अभिलाषा
देशवासियों के मन में हो कि 'हम मरमिटेंगे पर दास बनकर
जोवित कभी न रहेंगे' तो सबसे पहले आवश्यकता इस बात
की है कि देश में स्त्री-शिक्षा का प्रचार किया जाय—ताकि देशमें
वीर, साहसी और स्वाभिमानी बच्चे पैदा हों। किन्तु यदि ऐसा
भाव देशवासियों का हो जाय तो फिर दासता टिक ही कैसे सकती
है। ऐसी अभिलाषा तो वार साहसो देश के लोग ही कर सकते हैं।