रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र २८७
याद रहे कि सारे विषयों की शिक्षा केवल माता से ही
प्राप्त हो जाती है। शिशु के जीवन पर माता का ही प्रभाव सबकी
अपेक्षा अधिक पड़ता है। यदि माता पढ़ी-लिखी हो तो वह गर्भ से
लेकर पाठशाला या स्कूल में जाने के योग्य होने तक अपने बच्चे
को इतनी शिक्षा दे सकती है, कि उस बच्चे को देखकर लोगों को
दंग रह जाना पड़े। जिस प्रकार बालक थोड़ी ही उम्र में सुनते-सुनते
अपनी मातृभाषा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार वह बड़ी
बड़ी बातों को आसानी से माता के पास रहकर ही सीख सकता
है। बचपन में पड़े हुए संस्कार कितने पुष्ट होते हैं, यह किसी से
बतलाने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इस बात को सभी लोग
जानते हैं कि कोई भी वस्तु कोमल रहने पर ही अपनी इच्छा के
अनुकूल मुकायी या बनायी जा सकती है; पर कठोर हो जाने पर
उसके झुकाने का प्रयत्न करना व्यर्थ जाता है—बल्कि कभी-कभी
वह अधिक जोर दे देने के कारण टूट भी जाती है; ठीक यही हाल
मानव-शरीर का है। बचपन में तो चाहे जैसा उसे बनाया जा
सकता है, पर शुद्ध हृदय पर वाहियात के कुसंस्कारों की मैल बैठ
जाने पर कठिन हो जाता है। इस लिए माता का पूर्ण विदुषी होना
जरूरी है। केवल स्तन-पान कराकर बच्चे का पोषण करने और
लाड़-प्यार से उसकी तबियत खुश रखने से ही बच्चे की उन्नति
कभी नहीं हो सकती। बच्चे को योग्य बनाने के लिए माँ की
सहायता मिलना विशेष प्रयोजनीय है।