रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र १२७
चलितक चुम्बन
प्रमत्तस्य विवदमानस्य वाऽन्यतोऽभिमुखस्य
सुप्ताभिमुखस्य वा निद्राव्याघातार्थं चलितकम् ॥
उन्मत्त पुरुष स्त्री से विवाद कर रहा हो अथवा अन्य किसी
ओर मन लगाये हुए हो या तन्द्रा से झपकियाँ ले रहा हो । उस
समय उसे सावधान कर अपनी ओर आकृष्ट करने के लिये जो
स्त्री से चुम्बन किया जाता है उसे चलितक चुम्बन कहते हैं ।
उपरोक्त किसी प्रकार विक्षिप्त पति को काम चेष्टार्थ आह्वाहन करने
के लिये पत्नी को चाहिए कि वह ऊपर कहे साधारण चुम्बन का
अवलम्बन करे ।
प्रातिबोधित चुम्बन
चिरात्रादागतस्य शयनसुप्तायाः
स्वाभिप्रायचुम्बनं प्रातिबोधिकम् ।
रात्रि को देर करके घर आने पर, सोयी हुई स्त्री को जगाने
की इच्छा से जो चुम्बन किया जाता है उसे प्रातिबोधित चुम्बन
कहते हैं । इस प्रकार मृदु उपचार से जगाने पर स्त्री को किसी
प्रकार का कष्ट नहीं होता ओर वह पुरुष के अभिप्राय को समझ
जाती है । तथा स्त्री को इस बात का अभिमान होता है कि पति
उससे प्रेम करता है ।
१२८ असली कोकशास्त्र
समौष्ठ चुम्बन
पति के दोनों ओष्ठों को पत्नि अपने ओष्ठों में दबाकर जब
उस पर जिह्वा घर्षण करती है, उसको समौष्ठ चुम्बन कहते हैं।
यह पंचशायक का कथन है।
नखक्षत
यह प्रयोग भी कामाग्नि प्रज्ज्वलिका करने के लिए ही काम में
लाया जाता है। जिन स्त्री पुरुषों की स्पार्शन शक्ति कमजोर होती
है, और उनमें कामोद्वेग की उत्पत्ति नहीं हो पाती, उनमें नखच्छेद
से ही रति का आविर्भाव हो आता है अथवा जिस समय स्त्री पुरुष
अत्यन्त उन्मत्त होकर अपने आपको भूल से जाते हैं, उस समय
इसके प्रयोग से विषय-जनित आनन्द उत्पन्न किया जाता है।
इसका प्रयोग इस समय प्रायः लुप्त-सा हो गया है, इस कारण
रति के एक अंग की हानि ही समझनी चाहिए। इसके अभाव से
स्पार्शन शक्ति विहीन नर-नारियों की तृप्ति नहीं हो पाती। और
उन्मत्त नारि की भी वही दशा होती है, इस लिए इस कला का
जानना अत्यन्त उपयोगी है। जिसका दिग्दर्शन आचार्यों ने जिस
प्रकार किया है। नीचे दिया जाता है।
आच्छुरित नखच्छेद
प्रयोज्यायाश्च तस्याङ्गसंवाहने शिरसः कण्डूयने
पिटकभेदने व्याकुलीकरणे भीषणे च प्रयोगः ॥
६ असली कोकशास्त्र १२६
जिस समय नायक के अंगों को नायिका दबा रही हो, अथवा
तैल मर्दन कर रही हो, या मुहासे फोड़ रही हो, उस समय
नायिका आच्छुरित नखच्छेद का प्रयोग करती है । नायक भी
ऐसी ही किन्हीं दशाओं में इस कला का प्रयोग करता है ।
अर्धचन्द्र नखच्छेद
नायक नायिका के स्तनों पर अथवा गर्दन के किसी हिस्से पर
कामोद्वेग के समय नायिका में कामोद्वेग उत्पन्न करने के लिये इस
अर्धचन्द्र नखच्छेद का प्रयोग करता है ।
मण्डलक्षत नख च्छेद
यह गोल आकार वाला नखछत होता है । यह चिंगोटी करने
से आमने सामने दो अँगुलियों के नखच्छेद हो जाने से उत्पन्न हो
जाता है । इस लिए इसको मण्डलछत कहते हैं । इसका प्रयोग
प्रायः नाभि के नीचे भाग में लिया जाता है । नखच्छेद लम्बी रेखा
में न होना चाहिए । इसकी लम्बाई लगभग दो या तीन अँगुल के
हो सकती है, और योनि के उभरे स्थान पर भी इसका प्रयोग
किया जाता है ।
व्याघ्र नखच्छेद
इस रेखा का आकर कुछ खरोंच की भाँति टेढ़ा होने से इसे
व्याघ्र नखच्छेद कहते हैं ।
१३० असली कोकशास्त्र
मयूरपद नखच्छेद
अङ्गुष्ठजं नखमधो विनिवेश्य कृष्टैः,
सर्वाङ्गुलीकररुहैरुपरि स्तनस्य ।
तच्चुचुकाभिमुखमेत्य भवन्ति रेखाः,
तज्ज्ञाः मयूरपद तकंदुदाहरन्ति ॥
रमणी के स्तन-मुख पर जब पाँचो अँगुलियों के नखों के
निशान बन जाते हैं, तब उसे मयूरपद नखच्छेद कहते हैं। अंगूठा
स्तन के नीचे की ओर लगाकर ऊपर की ओर चारों अँगुलियों से
दबाकर स्तन के अग्रभाग को नखों की ओर जोर से दबाकर
उछालने से यह मयूरपद चिह्न बन जाता है।
उत्पलपत्रक नखच्छेद
सर्वैः शशप्लुतमिदं करजैः कुचाग्रे,
ह्यन्वर्थमुत्पलदलं स्तनगुह्यपृष्ठे ।
रेखा घनास्त्रिचतुरा जघने स्तने वा,
स्मर्तुँ प्रवासगमने विदधुर्विदग्धाः ॥
रमणी के कटि भाग तथा स्तनों पर कमल की पत्तियों की
भाँति नखक्षत चिन्ह बना देने से उत्पलपत्रक नखच्छेद कहलाता
है। मांसल भागों पर नखक्षत लाल-लाल रंग के बड़े सुन्दर चित्ता-
कर्षक चिन्ह बन जाते हैं, जिन्हें देखकर नर-नारी दोनों में कामोद्वेग
असली कोकशास्त्र १३१
जागृत हो जाता है। परदेश जाते समय पुरुष स्त्री के जंघा, स्तन
आदि पर नखक्षत स्मृति के लिए चिन्ह कर जाया करते हैं, और
पुरुष के भी अंगों पर रमणी चिन्ह बना देती हैं। जिन स्मारक
चिन्हों को प्रवास अवस्था में देखकर पति-पत्नि एक दूसरे का
स्मरण कर लेते हैं।
नखच्छेदों के भेदों की पूरी गणना कामशास्त्रज्ञ आचार्यों ने नहीं
की। हो भी नहीं सकती। उन लोगों का कथन है कि कामान्ध हो
जाने पर रति-क्रिया में प्रवृत्त पुरुष किन-किन विचित्र कौशलों का
अवलम्बन कर डालता है, उस अवस्था में उसे उनका स्वयं ज्ञान
नहीं होता। शास्त्र-मर्यादा केवल मार्गदर्शिका होती है। उसका
प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर फिर उसके क्रम की आवश्यकता नहीं
होती। क्योंकि पुरुष अपनी बुद्धि से अनेक क्रियाओं का आविष्कार
कर लेता है। जिनसे कामानुराग बढ़ जाता है। यही सफलता
का चिन्ह है।
—:०:—
१३२ असली कोकशास्त्र
दन्तक्षत
चुम्बन में ओष्ठों के कोमल स्पर्श से जब काम विशेष उद्दीप्त
हो जाता है, तब चुम्बन स्पर्श का आनन्द तिरोहित-सा हो जाता
है, और नर-नारी उस समय विशेष कठोर स्पर्श से काम लेने की
चेष्टा करते हैं। उस अवस्था में दन्तक्षत की आवश्यकता पड़ती
है। जिन स्थानों पर चुम्बन किया जाता है, उन्हीं मांसल स्थानों
को ओठ और दाँतों में पकड़ कर जोर से दबाते हैं। यह क्रिया
दोनों की ओर से समान ही होती है। कभी-कभी दाँतों का निशान
बहुत गहरा हो जाता है। जो कई दिन तक बना रहता है। उसको
देखकर उन्हें रति-सुख का स्मरण हो आता है। यह क्रिया भी
रति उत्पन्न करने में परम सहायिका है।
गूढक दन्तक्षत
रागैःकलिङ्गमधरे किल गूढकं स्यादुच्छूनकं-
दशनवाससि वामगण्डे।
स्यात्पीडनात्तदधरोष्ठबिशेषयोगात्,
तत्र प्रवालामणिरभ्यसनेन साध्यः ॥
रमणी के अधर पर दाँत का चिन्ह मात्र कर देने को गूढ़क
दन्तक्षत कहते हैं। यह चिन्ह इतना स्वल्प होता है, कि जिसका
दर्शन ध्यान देने से ही हो सकता है। यथार्थतः ऐसा ही दन्तदशन
प्रशंसनीय समझा गया है।
असली कोकशास्त्र १३३
उच्छूनक दन्तक्षत
यह भी गूढ़क के समान ही होता है। किन्तु इसमें विशेषता
केवल इतनी ही होती है कि यह कुछ गूढ़क की अपेक्षा तीव्र होता
है। इसका प्रयोग विशेष काम वृद्धि पर अनायास हो जाता है।
प्रवालमणि दन्तक्षत
यह अधर तथा गालों पर दाँतों की पंक्ति की माला के समान
बन जाता है। इस लिए इसको प्रवालमणि दन्तक्षत कहते हैं।
विन्दु दन्तक्षत
अल्पदेशायाश्चत्वचो दशनद्वयसन्दंशजा विन्दुसिद्धिः
अधर, ओष्ठ के मध्यभाग में तिलमात्र दोनों दाँतों से काटने
पर जो विन्दु बन जाता है, उसको विन्दु दन्तक्षत कहते हैं।
विन्दुमाला दन्तक्षत
विन्दु दशन की भाँति अनेक दाँतों के क्षत विन्दुओं की पंक्ति
को विन्दुमाला दन्तक्षत कहते हैं। इस प्रकार विन्दुमाला, मणि-
माला नाम के दन्तक्षत, वक्षस्थल, कुक्षि और कपोल आदि स्थानों
पर निर्माण किये जाते हैं। प्रायः मांसल स्थान ही इसके लिए
उपयुक्त समझे जाते हैं।
१३४ असली कोकशास्त्र
खण्डाभ्रक दन्तक्षत
खण्डाभ्रकं स्तनतटे दशनाग्रलेख्यं,
स्यान्मण्डलाकृतियुतं विषमैश्च कूटैः ।
ताम्रान्तरा रदनराजिरखर्वसान्द्रा,
स्यात्कोलचर्वितमिदं स्तनपृष्ठभूषा ॥
स्तनों के नीचे ऊपर दाँतों से क्षत किया हुआ गोल आकार
वाला चिन्ह पड़ जाता है। जो मध्य में लाल, आभायुक्त होता है।
वह बिखरी हुई मणिमाला के समान स्थान-स्थान पर दृष्टिगोचर
होता है। उसको खण्डाभ्रक दन्तक्षत कहते हैं।
—:०:—
असली कोकशास्त्र १३५
देश भेद से नारी रमण
देशसात्म्याच्च योषित उपचरेत ।
प्रत्येक देश की प्रथानुसार स्त्रियों के साथ रमण करना चाहिए।
जो पुरुष तद्देशीय स्त्रियों के समान अपना स्वभाव बनाकर रमण
करता है, वह मनुष्य रति सुख का आनन्द प्राप्त कर लेता है ।
अन्यथा दोनों ही रति-सुख से वंचित रह जाते हैं, और प्रेम के
स्थान में द्वेषभाव उत्पन्न हो जाता है । देशानुसार स्त्रियों के स्वभाव
का आचार्यों ने जिस प्रकार वर्णन किया है, वह नीचे दिखाया
जाता है ।
मध्यदेश की स्त्रियाँ प्रायः आर्य स्वाभाव वाली होती है । जो
पवित्रता के कारण चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत, आदि से घृणा करती
हैं । ऐसा व्यवहार करने वाले मनुष्य से भी घृणा करती हैं ।
वाह्णीक देश की स्त्रियाँ भी नख, दन्तक्षतादि को अच्छा
नहीं समझतीं ।
उज्जैन देशीया स्त्रियें भी उपरोक्त स्वभाव वाली होती हैं ।
इनका चित्रों में अधिक प्रेम होता है ।
मालव देश की स्त्रियां आलिंगन, चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत
अधरपान आदि में रुचि रखती हैं । किन्तु अधिक नहीं । प्रहणन
को बहुत चाहती हैं ।
सिन्धु देश की स्त्रियां मुख मैथुन को अधिक पसन्द करती हैं ।
१३६ असली कोकशास्त्र
काठियावाड़ और लाट देश की स्त्रियाँ प्रचण्ड-कामिनी होती
हैं। और मैथुन काल में सीत्कार भी बहुत करती हैं।
बंगाल देश की स्त्रियाँ प्रहरण को अधिक पसन्द करती हैं,
और धातुज लिंग का भी प्रयोग करती हैं।
अन्ध्र देश की स्त्रियाँ, कोमलांगी, सम्भोग प्रिया, अश्लील
विचार रखनेवाली दुराचारिणी होती हैं।
महाराष्ट्र देश की स्त्रियाँ अनेक प्रकार की कलाओं को चाहने
वाली तथा स्वयं उनका ज्ञान रखने वाली, कड़े और गन्दे बचन
पसन्द करने वाली अति काम-विह्वला होती हैं।
पाटलीपुत्र देश की स्त्रियाँ महाराष्ट्र के समान खुला व्यवहार
करने वाली नहीं होतीं। वे एकान्त में ही कलाओं का प्रयोग करने
वाली होती हैं।
द्रविड़ देश की स्त्रियों की योनि से भोग के पहले ही थोड़ा
सफेद रज निकल आता है।
गौड़ देश की स्त्रियाँ मीठा बोलने वाली, कोमलांगी, अधिक
सम्भोग में अनुरागवती होती हैं।
आभीर देश की स्त्रियाँ प्रसन्न चित्त से आलिंगन चाहने वाली,
छाती आदि पर धक्का चाहने वाली, और चुम्बन से विशेष प्रसन्न
होने वाली होती है। नाखून और दाँतों के क्षत को विशेष नहीं
चाहतीं।
मालव देश की स्त्रियों का भी ऐसा ही स्वभाव होता है।
असली कोकशास्त्र १३७
गुजरात देश की स्त्रियाँ फूले हुए केशों को धारण करने वाली,
पतले शरीर वाली, मोटे स्तनों वाली, सुन्दर आँखों वाली, मीठा
बोलने वाली, भीतरी बाहरी दोनों प्रकार के सम्मार्गों को चाहने
वाली होती हैं।
लाट देश की स्त्रियाँ मन्द ताड़न करने से, नखक्षत, दन्तक्षत
आदि से शीघ्र द्रवित होने वाली तथा विशेष आलिंगन चाहने वाली
प्रचण्ड वेगवती कोमल शरीर वाली, रति-काल में विशेष आनन्द
से विभोर होने वाली होती हैं।
अयोध्या की स्त्रियों की योनि में अत्यन्त खुजली होती है।
इस लिए वे बनावटी लिंग से खूब ताड़न किये जाने पर द्रवित होती
हैं। स्त्री राज्य की स्त्रियों के भी यही स्वभाव होते हैं।
कोंकण देश की स्त्रियाँ अपने दोष छिपाने वाली और परदोषों
पर हँसने वाली होती हैं। चुम्बन, नख, दन्त, आदि क्षतों को
सहने वाली, मध्य वेगवती योनि द्वार से वीर्य को चूसने वाली
और अनेक विध रमण करने वाली होती हैं।
कामरू देश की स्त्रियाँ अत्यन्त कोमलांगी, बार-बार द्रवित
होने वाली, स्पर्श मात्र से सम्भोग के लिए तत्पर होने वाली, मधुर
भाषण करने वाली और सच्चरित्रा होती हैं।
उड़ीसा देश की स्त्रियाँ दन्त, नख आदि चिन्हों को चाहनेवाली
होती हैं।
अंग, बंग, कलिंग आदि देशों की स्त्रियाँ भग-भूषण (चमड़े
१३८ असली कोकशास्त्र
का लिंग ) को चाहने वाली नख, दन्त, आदि चिन्हों, मुष्टिकाघात
आदि में रुचि रखने वाली, निरन्तर सम्भोग चाहने वाली, निर्लज्ज
और अधिक अनुरागवती होती हैं।
आसन
आजकल जितने भी वैवाहिक सम्बन्ध होते हैं उनमें कोकशास्त्र
के अनुसार बताये हुए नर-नारियों के चिन्ह मिलान से मिलाकर
नहीं किये जाते। जिस कारण उच्च रत या नीच रत वाले स्त्री पुरुष
का योग नहीं मिल पाता। जिसका परिणाम यह होता है, कि योग्या-
योग्य जोड़ी मिल जाने से किसी की भी तृप्ति नहीं होती। गृहस्थ
सुख का अभाव हो जाने से गृहस्थ एक प्रकार का भार मालूम होने
लगता है। आसनों की व्यवस्था समझ लेने से कैसा भी अनमेल
विवाहित स्त्री-पुरुष क्यों न हो, वह रति-सुख से वंचित नहीं रह
सकता। और सुसन्तान प्राप्त कर वह गृहस्थ को स्वर्ग के समान
देख सकता है। आसन निर्माण का यथार्थ कारण यही है। किन्तु
इस समय लोग उन आसनों का दुरुपयोग कर लाभ के स्थान में
हानि भी उठा बैठते हैं। इसमें आसनों का कोई दोष नहीं। जैसे
वैद्यकशास्त्र में अनेक प्रकार के रोग नाश करने की अनेक विध
औषधियाँ बतलायी गयी हैं, यदि कोई अनाड़ी उनका अनुचित
प्रयोग कर दुःख उठावे तो उसमें आयुर्वेद रचयिता का कोई दोष
असली कोकशास्त्र १३६
नहीं। किस आसन से किस प्रकार का लाभ होता है, इसका
विचार आगे किया जायगा।
यद्यपि शीत का निवारण एक बड़े वस्त्र को शरीर पर लपेट
लेने मात्र से ही हो सकता है किन्तु वह एक वस्त्र अनेक विघ्न
उत्पन्न कर सकता है उसी वस्त्र को काट-छाँट कर कुर्ता, कोट,
पैजामा आदि बनाकर पहन लेने से शीत का निवारण भी हो जाता
है, सुन्दर भी लगता है, और किसी काम में किसी प्रकार की बाधा
भी उपस्थित नहीं होती। मनुष्य प्रत्येक वस्तु को किसी अच्छी
अवस्था में देखना चाहता है—एक ही वस्तु से अनेक उपकार लेना
चाहता है काम भी निकल जाय, और मनोविनोद भी हो, तथा
किसी प्रकार की हानि न हो, ऐसा विचार दूरदर्शी पुरुषों का होता
है। इसलिए विचारशील पुरुष शास्त्रानुसार बतलाये हुए मार्ग से
चलते हैं। क्योंकि वह अनेक प्रकार से अनुभव द्वारा निश्चित किया
हुआ होता है। यथार्थतः इस आसनकला के ज्ञान के बिना आज
सहस्रों स्त्री-पुरुष सन्तानहीन, नर-नारी से विमुख गृहस्थ को शम-
शान के समान किये हुए हैं। इन बातों की शिक्षा किसी भी रूपमें
स्त्री-पुरुषों को नहीं मिलती। इसकी शिक्षा ग्रहण करना एक प्रकार
से बड़ी गन्दी बात मानी जाती है। और इस प्रकार की जो पुस्तकें
लिखी भी जाती हैं, उनको बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं। अनेक
लोगों ने तो आसनों को ही अनुपयुक्त और हेय ठहरा दिया है।
इस लिए उसके सम्बन्ध में वे विचार भी क्यों करने लगे ? वे स्वयं
१४० असली कोकशास्त्र
घृणा करते हैं और दूसरों को भी घृणा का उपदेश देते हैं, वस्तुतः
वे स्वयं ही नहीं समझ पाये, यही समझना चाहिए। इन आसनों
का निर्माण वात्स्यायन मुनि ने किया है। जिन्होंने न्याय-दर्शन पर
भाष्य किया है, जो एक बड़ा जबर्दस्त तार्किक ग्रंथ सुप्रसिद्ध है।
और भी अनेक आचार्यों ने इस विषय पर विचार किया, जिनका
आधार लेकर कोका पण्डित ने कोकशास्त्र का संकलन किया, ऐसे
दूरदर्शी लोकप्रसिद्ध अनुभवी महात्माओं के दिखलाये हुए मार्ग
नुकसान पहुँचाने वाले हों, ऐसा सम्भव नहीं समझा जा सकता।
यह दूसरी बात है कि उन आसनों के प्रयोग को हम भलीभाँति
समझ न सकने से इष्टार्थ लाभ न उठा सकें।
उपरोक्त आसन व्यवस्था जिन स्त्री-पुरुषों के लिये अत्यन्त
आवश्यक होती है, उनका वर्णन पहले किया जाता है।
आरोहपरिरोहाभ्यां षण्णवद्वादशाङ्गुलैः ।
गुह्यैः शशवृषोऽश्वाना हरिण्यश्वेभिकाः स्त्रियः ॥
शश पुरुष की मूत्रेन्द्रिय छः अंगुल लम्बी होती है। वृष संज्ञक
पुरुष की नौ अंगुल लम्बी, तथा अश्व पुरुष की बारह अंगुल लम्बी
इन्द्रिय होती है। इसी प्रकार छः अंगुल लम्बे चौड़े काम-मन्दिर
के परिमाण वाली हरिणी, नौ अंगुल परिमाण वाली अश्वा तथा
बारह अंगुल वाली हस्तिनी होती है।
जिन स्त्री पुरुषों के गुप्तांग परिमाण समान होते हैं, वे समरत
वाले कहलाते हैं। जैसे शश और हरिणी, वृष और अश्वा,
असली कोकशास्त्र १४१
अश्व और हस्तिनी सम-रत वाले समझे जाते हैं। क्योंकि शश छः
अंगुल गुप्तेन्द्रिय वाला और हरिणी छः अंगुल गहरी परिमाण वाली
होती है। इसी प्रकार वृष नौ अंगुल और अश्वा भी नौ अंगुल,
तथा अश्व बारह एवं हस्तिनी भी बारह अंगुल लम्बे परिमाण
वाली होती है।
किन्तु इन्हीं के विषम जोड़ों के योग से उच्चरत, और
नीचरत पैदा होता है। जैसे—हिरणी वृष, बड़वा अश्व, ये दोनों
उच्चरत वाले कहलाते हैं। क्योंकि इन दोनों पुरुषों की इन्द्रियें इन
दोनों स्त्रियों की अपेक्षा बड़ी होती हैं। इस लिए दोनों को रति-सुख
का आनन्द मिलता है। बड़वा शश, हस्तिनी और वृष ये दोनों
नीचरत कहाते हैं। क्योंकि पुरुषों की अपेक्षा इन दोनों स्त्रियों का
काम-मन्दिर गहरा होता है। इस लिए दोनों को किसी प्रकार का
रति-सुख नहीं मिलता। छः अंगुल वाली हरिणी और बारह अंगुल
वाले अश्व का संयोग अति उच्च-रत कहाता है। बारह अंगुल वाली
हस्तिनी और छः अंगुल वाले शश पुरुष का संयोग अति नीचरत
कहाता है इन दोनों को रति का कुछ भी सुख नहीं मिलता।
समान रतों को उत्तम, उच्चरतों को मध्यम और अत्युच्च तथा
अतिनीच रतों को अधम कहते हैं!
समान रत स्त्री-पुरुष दोनों को सुख देनेवाला और तृप्त करने
वाला होता है उसमें आनन्द ही आनन्द मिलता है, दुःख का लेश
भी नहीं। इस लिए उसको उत्तम रत कहा है। उच्च रत में स्त्रियों
१४२ असली कोकशास्त्र
की योनि छोटी होने और पुरुष का लिंग बड़ा होने से स्त्री को दुःख
होता है। उसके मन में हर्ष के स्थान पर क्लेश पैदा होता है।
उनकी मानसिक प्रसन्नता नष्ट हो जाती है और तृप्ति नहीं होती,
केवल पुरुष की दुःख-सुख के साथ अर्ध-तृप्ति होती है इसलिए
उसको मध्यम कहा गया है। अति उच्च और अति नीच रतों में
स्त्री-पुरुषों की इन्द्रियें एक दूसरे की अपेक्षा अत्यन्त छोटी बड़ा
होने से किसी को भी आनन्द प्राप्त नहीं होता। और न किसी की
तृप्ति ही होती है। इस लिए इसको अधम कहा गया है।
इन उत्तम, मध्यम और अधम रतों को समान बनाने के लिये
आसनों के प्रयोग से कुछ उपाय बतलाये गये हैं। जैसे—
रागकाले विशालयन्त्येव जघनं मृगी समविशेदूच्चरते ।
सम्भोग काल में उच्चरत में स्थित स्त्री को उचित है कि वे अपनी
जंघाओं को फैला दे। ऐसा करने से पुरुषेन्द्रिय का प्रवेश बहुत
सरल हो जायगा। मृगी और वृष संज्ञक पुरुष का उच्चरत कहाता
है। यदि मृगी अपनी जंघाओं को फैला दे तो उसके स्मर-मन्दिर
का द्वार इतना फैल जायगा कि वृष पुरुष की गुप्तेन्द्रिय सरलता
पूर्वक प्रविष्ट होकर दोनों को रति-सुख का आनन्द उत्पन्न कर देगी।
वह मृगी जाति की स्त्री यदि अश्व पुरुष के साथ सम्बन्ध करती
हुई अपने जघनस्थल को पूर्ण विस्तृत कर दे तो उसे भी सम-रत के
समान उत्तम सुख प्राप्त हो सकता है। आप पूर्ण तृप्त होती हुई
पुरुष को भी तृप्त कर सकती है।
असली कोकशास्त्र १४३
अवहासयन्तीव हस्तिनी नीचरते ।
यदि हस्तिनी और वृष पुरुष का संयोग हो तो इस नीचरत
में स्त्री को चाहिए कि वह अपनी जंघा को सिकोड़ ले । इससे
स्मर मन्दिर का मुख छोटा हो जायगा और सम-रत के समान
दोनों को पूर्ण सुख प्राप्त होगा ।
न्याय्यो यत्र योगस्तत्र समपृष्ठम् ।
शश मृगी का, वृष बड़वा, और अश्व हस्तिनी का संयोग
समरत कहाता है । क्योंकि इनमें स्वाभाविक रति-सुख प्राप्त होता
है । दोनों की गुप्तेन्द्रिय समान होने के कारण किसी को इन्द्रिय
संकोच-विकाश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
प्रत्येक पुरुष को चाहिए कि आसन बाँधते समय स्त्री के
काम-मन्दिर में पुरुष अपनी कामेन्द्रिय का प्रवेश बहुत धीरे-धीरे
करे, जिससे योनि में रहनेवाला स्निग्ध द्रव्य कामेन्द्रिय पर लगकर
वह गीली हो जाय । अन्यथा एकाकि प्रवेश करने से स्त्री को बहुत
कष्ट होता है, ओर कभी-कभी जननेन्द्रिय का चर्म भी उलट जाता
है । जिससे बड़ी भारी हानि पैदा हो सकती है ।
सुख आसन
स्त्री की दोनों जंघाएँ पुरुष अपनी जंघाओं पर रखकर अंग-
प्रत्यंग का मृदु स्पर्श चुम्बनादि करता हुआ सुकर रीति से उत्तान
लेटी हुई रमणी से भोग करता है, इसलिए उसे सुख आसन कहते
हैं । इस सुखआसन का प्रयोग समरत स्त्री पुरुषों में किया जाता है ।
१४४ असली कोकशास्त्र
उत्फुल्लक आसन
करयुग्मधृतत्रिकमूर्ध्वलसज्जघनं
पतिहस्तनिविष्टकुचम् ।
स्फिग्विम्बबहिर्धृ तपाष्णियुगं,
द्यु त्फुल्लकयुक्तमिदं करणम् ॥
स्त्री अपने नितम्ब के ऊपरी भाग को तकिये के सहारे ऊपर
उठाकर पति के नितम्बों को अपने हाथ की हथेलियों के सहारे
ऊपर उठाये रहे, और पुरुष दोनों हाथ से स्त्री के स्तनों का मर्दन
करे इसको उत्फुल्लक आसन कहते हैं ।
विजृम्भितक आसन
यदि तिर्यगुदञ्चितमूरुयुग,
दधती रमते रमणी रमणम् ।
विहिता पसृति र्विवृतोरु भगा,
भुवि जृम्भितमुक्तमिदं करणम् ॥
पुरुष के समान स्त्री अपनी जंघाओं को ऊपर उठाकर पति के
साथ तिरछे होकर भोग करती हुई स्वयं भी आगे-पीछे हिलती है,
उसकी योनि तथा जंघाएँ खुली रहती हैं, उसे विजृम्भितक आसन
कहते हैं ।
१० असली कोकशास्त्र १४५
इन्द्राणिक आसन
निजमूरुयुगं सममादधती,
प्रियजानुनि योजयति प्रमदा ।
यदि पार्श्वत एव चिराभ्यसना-
दिन्द्राणिकमुक्तमिदं करणम् ॥
जब स्त्री दोनों जंघाओं को मिलाकर पति की एक जंघा पर
रखकर भोग करती है, उसको इन्द्राणिक आसन कहते हैं।
तथाच्चतरतस्यापि पारेग्रह ।
उपरोक्त तीनों आसनों में चाहे कैसा भी उच्चरत क्यों न हो,
अत्यन्त सुख के साथ सम्भोग होता है, ओर सभी उच्चरत वालों
को पूर्ण आनन्द मिलता है ।
सम्पुट आसन
सम्पुटेन प्रतिग्रहो नीचरते ।
नीच रत वाले जोड़ों को सम्पुट से आनन्द मिलता है, अर्थात्
बड़वा, हस्तिनी आदि शश के साथ संभोग करते समय अपनी
जंघाओं को सिकोड़ लें । इस प्रकार सम्पुट करने से नीचरत भी
समरत के समान सुख पहुँचाता है ।
एतेन नोचतररतेपि सम्पुटकम् पीडितकम्
वेष्टितकम बाडवकमिति हस्तिन्याः ।
१४६ असली कोकशास्त्र
हस्तिनी के साथ जब शश पुरुष सम्भोग करे तब हस्तिनी को
सम्पुट पीडितक, वेष्टितक, वाडवक संज्ञक योनि संकोचक आसनों
से काम लेना चाहिये ।
सम्पुटक आसन
सरलीकृतजंघमुरौ मिलितौ,
यदि सम्पुटको भवति द्विविधः ।
उत्तानकपार्श्वेशाच्यु वतेः.
स च पीडितमूरुनिपीडनतः ॥
भोग करते समय स्त्री पहले अपने पैरों को फैलाकर तत्पश्चात्
जंघा को ढीला कर दोनों पैरों को मिला दे । इसको सम्पुटक आसन
कहते हैं । इसके दो भेद हैं, यदि स्त्री सीधी लेटी रहे तब उत्तान्
सम्पुट, और यदि तिरछी करवट लेटी रहे तो पार्श्व सम्पुट भेद
हो जाता है । पार्श्व सम्पुट आसन करते हुए पुरुष को स्त्री के
दाहिने तरफ रहना चाहिए । इसमें सब आचार्य एकमत हैं ।
पीडितक आसन
सम्पुट की भाँति सम्भोग करते हुए यदि स्त्री अपनी जंघाओं
को खूब संकुचित करे तो उसे पीडितक आसन कहते हैं ।
वेष्टितक आसन
उत्तान सम्पुट की भाँति भोग करते हुए योनि को अत्यन्त