रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र १४१
अश्व और हस्तिनी सम-रत वाले समझे जाते हैं। क्योंकि शश छः
अंगुल गुप्तेन्द्रिय वाला और हरिणी छः अंगुल गहरी परिमाण वाली
होती है। इसी प्रकार वृष नौ अंगुल और अश्वा भी नौ अंगुल,
तथा अश्व बारह एवं हस्तिनी भी बारह अंगुल लम्बे परिमाण
वाली होती है।
किन्तु इन्हीं के विषम जोड़ों के योग से उच्चरत, और
नीचरत पैदा होता है। जैसे—हिरणी वृष, बड़वा अश्व, ये दोनों
उच्चरत वाले कहलाते हैं। क्योंकि इन दोनों पुरुषों की इन्द्रियें इन
दोनों स्त्रियों की अपेक्षा बड़ी होती हैं। इस लिए दोनों को रति-सुख
का आनन्द मिलता है। बड़वा शश, हस्तिनी और वृष ये दोनों
नीचरत कहाते हैं। क्योंकि पुरुषों की अपेक्षा इन दोनों स्त्रियों का
काम-मन्दिर गहरा होता है। इस लिए दोनों को किसी प्रकार का
रति-सुख नहीं मिलता। छः अंगुल वाली हरिणी और बारह अंगुल
वाले अश्व का संयोग अति उच्च-रत कहाता है। बारह अंगुल वाली
हस्तिनी और छः अंगुल वाले शश पुरुष का संयोग अति नीचरत
कहाता है इन दोनों को रति का कुछ भी सुख नहीं मिलता।
समान रतों को उत्तम, उच्चरतों को मध्यम और अत्युच्च तथा
अतिनीच रतों को अधम कहते हैं!
समान रत स्त्री-पुरुष दोनों को सुख देनेवाला और तृप्त करने
वाला होता है उसमें आनन्द ही आनन्द मिलता है, दुःख का लेश
भी नहीं। इस लिए उसको उत्तम रत कहा है। उच्च रत में स्त्रियों