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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 440 में से

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पृष्ठ 145

१४२ असली कोकशास्त्र
की योनि छोटी होने और पुरुष का लिंग बड़ा होने से स्त्री को दुःख
होता है। उसके मन में हर्ष के स्थान पर क्लेश पैदा होता है।
उनकी मानसिक प्रसन्नता नष्ट हो जाती है और तृप्ति नहीं होती,
केवल पुरुष की दुःख-सुख के साथ अर्ध-तृप्ति होती है इसलिए
उसको मध्यम कहा गया है। अति उच्च और अति नीच रतों में
स्त्री-पुरुषों की इन्द्रियें एक दूसरे की अपेक्षा अत्यन्त छोटी बड़ा
होने से किसी को भी आनन्द प्राप्त नहीं होता। और न किसी की
तृप्ति ही होती है। इस लिए इसको अधम कहा गया है।
इन उत्तम, मध्यम और अधम रतों को समान बनाने के लिये
आसनों के प्रयोग से कुछ उपाय बतलाये गये हैं। जैसे—
रागकाले विशालयन्त्येव जघनं मृगी समविशेदूच्चरते ।
सम्भोग काल में उच्चरत में स्थित स्त्री को उचित है कि वे अपनी
जंघाओं को फैला दे। ऐसा करने से पुरुषेन्द्रिय का प्रवेश बहुत
सरल हो जायगा। मृगी और वृष संज्ञक पुरुष का उच्चरत कहाता
है। यदि मृगी अपनी जंघाओं को फैला दे तो उसके स्मर-मन्दिर
का द्वार इतना फैल जायगा कि वृष पुरुष की गुप्तेन्द्रिय सरलता
पूर्वक प्रविष्ट होकर दोनों को रति-सुख का आनन्द उत्पन्न कर देगी।
वह मृगी जाति की स्त्री यदि अश्व पुरुष के साथ सम्बन्ध करती
हुई अपने जघनस्थल को पूर्ण विस्तृत कर दे तो उसे भी सम-रत के
समान उत्तम सुख प्राप्त हो सकता है। आप पूर्ण तृप्त होती हुई
पुरुष को भी तृप्त कर सकती है।