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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 440 में से

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१३८ असली कोकशास्त्र
का लिंग ) को चाहने वाली नख, दन्त, आदि चिन्हों, मुष्टिकाघात
आदि में रुचि रखने वाली, निरन्तर सम्भोग चाहने वाली, निर्लज्ज
और अधिक अनुरागवती होती हैं।
आसन
आजकल जितने भी वैवाहिक सम्बन्ध होते हैं उनमें कोकशास्त्र
के अनुसार बताये हुए नर-नारियों के चिन्ह मिलान से मिलाकर
नहीं किये जाते। जिस कारण उच्च रत या नीच रत वाले स्त्री पुरुष
का योग नहीं मिल पाता। जिसका परिणाम यह होता है, कि योग्या-
योग्य जोड़ी मिल जाने से किसी की भी तृप्ति नहीं होती। गृहस्थ
सुख का अभाव हो जाने से गृहस्थ एक प्रकार का भार मालूम होने
लगता है। आसनों की व्यवस्था समझ लेने से कैसा भी अनमेल
विवाहित स्त्री-पुरुष क्यों न हो, वह रति-सुख से वंचित नहीं रह
सकता। और सुसन्तान प्राप्त कर वह गृहस्थ को स्वर्ग के समान
देख सकता है। आसन निर्माण का यथार्थ कारण यही है। किन्तु
इस समय लोग उन आसनों का दुरुपयोग कर लाभ के स्थान में
हानि भी उठा बैठते हैं। इसमें आसनों का कोई दोष नहीं। जैसे
वैद्यकशास्त्र में अनेक प्रकार के रोग नाश करने की अनेक विध
औषधियाँ बतलायी गयी हैं, यदि कोई अनाड़ी उनका अनुचित
प्रयोग कर दुःख उठावे तो उसमें आयुर्वेद रचयिता का कोई दोष