रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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नहीं। किस आसन से किस प्रकार का लाभ होता है, इसका
विचार आगे किया जायगा।
यद्यपि शीत का निवारण एक बड़े वस्त्र को शरीर पर लपेट
लेने मात्र से ही हो सकता है किन्तु वह एक वस्त्र अनेक विघ्न
उत्पन्न कर सकता है उसी वस्त्र को काट-छाँट कर कुर्ता, कोट,
पैजामा आदि बनाकर पहन लेने से शीत का निवारण भी हो जाता
है, सुन्दर भी लगता है, और किसी काम में किसी प्रकार की बाधा
भी उपस्थित नहीं होती। मनुष्य प्रत्येक वस्तु को किसी अच्छी
अवस्था में देखना चाहता है—एक ही वस्तु से अनेक उपकार लेना
चाहता है काम भी निकल जाय, और मनोविनोद भी हो, तथा
किसी प्रकार की हानि न हो, ऐसा विचार दूरदर्शी पुरुषों का होता
है। इसलिए विचारशील पुरुष शास्त्रानुसार बतलाये हुए मार्ग से
चलते हैं। क्योंकि वह अनेक प्रकार से अनुभव द्वारा निश्चित किया
हुआ होता है। यथार्थतः इस आसनकला के ज्ञान के बिना आज
सहस्रों स्त्री-पुरुष सन्तानहीन, नर-नारी से विमुख गृहस्थ को शम-
शान के समान किये हुए हैं। इन बातों की शिक्षा किसी भी रूपमें
स्त्री-पुरुषों को नहीं मिलती। इसकी शिक्षा ग्रहण करना एक प्रकार
से बड़ी गन्दी बात मानी जाती है। और इस प्रकार की जो पुस्तकें
लिखी भी जाती हैं, उनको बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं। अनेक
लोगों ने तो आसनों को ही अनुपयुक्त और हेय ठहरा दिया है।
इस लिए उसके सम्बन्ध में वे विचार भी क्यों करने लगे ? वे स्वयं