रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र १४३
अवहासयन्तीव हस्तिनी नीचरते ।
यदि हस्तिनी और वृष पुरुष का संयोग हो तो इस नीचरत
में स्त्री को चाहिए कि वह अपनी जंघा को सिकोड़ ले । इससे
स्मर मन्दिर का मुख छोटा हो जायगा और सम-रत के समान
दोनों को पूर्ण सुख प्राप्त होगा ।
न्याय्यो यत्र योगस्तत्र समपृष्ठम् ।
शश मृगी का, वृष बड़वा, और अश्व हस्तिनी का संयोग
समरत कहाता है । क्योंकि इनमें स्वाभाविक रति-सुख प्राप्त होता
है । दोनों की गुप्तेन्द्रिय समान होने के कारण किसी को इन्द्रिय
संकोच-विकाश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
प्रत्येक पुरुष को चाहिए कि आसन बाँधते समय स्त्री के
काम-मन्दिर में पुरुष अपनी कामेन्द्रिय का प्रवेश बहुत धीरे-धीरे
करे, जिससे योनि में रहनेवाला स्निग्ध द्रव्य कामेन्द्रिय पर लगकर
वह गीली हो जाय । अन्यथा एकाकि प्रवेश करने से स्त्री को बहुत
कष्ट होता है, ओर कभी-कभी जननेन्द्रिय का चर्म भी उलट जाता
है । जिससे बड़ी भारी हानि पैदा हो सकती है ।
सुख आसन
स्त्री की दोनों जंघाएँ पुरुष अपनी जंघाओं पर रखकर अंग-
प्रत्यंग का मृदु स्पर्श चुम्बनादि करता हुआ सुकर रीति से उत्तान
लेटी हुई रमणी से भोग करता है, इसलिए उसे सुख आसन कहते
हैं । इस सुखआसन का प्रयोग समरत स्त्री पुरुषों में किया जाता है ।