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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

असली कोकशास्त्र २५६
एक बन्धन और लगा दे। बाद दोनों बन्धनों के बीच में तेज औजार
से काट दे। नाल काटने के पहले बन्धन लगाना इस लिए बहुत
जरूरी होता है कि जिसमें बच्चे के शरीर का खून न निकलने पावे।
क्योंकि खून निकलने से बच्चा मर जाता है। नाल में दूसरा बन्धन
इस लिए लगाया जाता है कि शायद प्रसूता के पेट में दूसरा बालक
हो। यदि वह बन्धन न लगाया जाय और पेट में दूसरा बच्चा हो
तो रक्त निकल जाने के कारण वह तुरन्त ही मर जायगा। फिर तो
प्रसूता का बचना भी कठिन हो जाता है। इसी से दूसरा बन्धन
लगा देना भो आवश्यक है। क्योंकि पेट में जितने बच्चे होते हैं,
सबका नाल एक ही होता है। यदि पेट में दूसरा बच्चा हो तो
प्रसूता स्त्री से इसका हाल कभी न कहे। नहीं तो घबड़ा जाने के
कारण प्रसूता की जान खतरे में पड़ जानेकी सम्भावना रहती है।
नाल काटने से पहले एक बात पर ध्यान अवश्य देना उचित
है। यह कि, बच्चा निर्जीव तो नहीं है। यदि वह निर्जीव यानी
कमजोर अधिक हो तो नाल काटने से पहले नाल को माँ की ओर
से दुहकर बालक की नाभि तक ले आवे। ऐसा करने से कुछ खून
बच्चे के शरीर में चला जाता है। इतना करने के बाद नाल को
काटना उचित है। कमजोर बालक के लिए कुछ दाइयाँ नाल के
खून की दस पाँच बूँदें चटा देती हैं; किन्तु यह क्रिया हमें अच्छी
नहीं जँचती—यद्यपि इससे भी बालक की कमजोरी दूर हो जाती
है, क्योंकि माँ का खून बच्चे के लिए बहुत ही लाभदायक है, चाहे

२६० असली कोकशास्त्र
वह किसी भी रूप में उसके शरीर में प्रवेश कराया जाय । सबसे
अच्छा तरीका वही ऊपर वाला नाल को दुहकर बच्चे के शरीर में
रक्त पहुँचाना है। नाल काटने से पहले उसे शहद, घी और सेंधा
नमक से शुद्ध कर लेना बहुत ही उत्तम है। या सोने अथवा चाँदी
के बुझे हुए जल से नाल को शुद्ध करके तब काटे ।
नालोच्छेदन करने के बाद पहले से पीसकर रक्खी हुई एक
माशे लकड़ी के कोयले में दो चावल कस्तूरी की बुकनी मिलाकर
उस पर लगा देनी चाहिए। ऐसा करने से बच्चे को मसान का रोग
नहीं होता । पश्चात् घी, शहद, अनन्तमूल और ब्राह्मी के रस में
थोड़ा सा सोने का चूर्ण मिलाकर चटा दे; यह बहुत ही गुणदायक
है । इससे एक तो बालक का मल गिर जाता है और दूसरे बच्चे
की तन्दुरुस्ती पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है, यदि ये चीजें न
मिल सकें, तो बच्चे को शहद और घी चटाना चाहिए ।
यदि बालक सतमासा या गर्भ पूरा होने के कुछ पहले ही पैदा
हो जाय और वह निर्बल अधिक हो तो उसके लिए एक यत्न और
करना चाहिए। यह कि धुनी हुई रुई कड़वे तेल में भिगोकर उस
में दो या चार दिन तक बच्चे को रक्खे। इससे बच्चे का उतना
ही पोषण होता है, जितना कि माता के पेट में । ऐसा करने से
सतमासे बच्चे भी बहुत से जी जाते हैं ।
जिस छुरी या कैंची से नालोच्छेदन करना हो, उसे पहले खूब
खौलते हुए पानी में डालकर गरम कर लेना चाहिए । बाद उसको

असली कोकशास्त्र २६१
ठण्डा करके काम में लाना उचित है। ऐसा करने से लोहे के
औजार में कोई विकार नहीं रह जाता और नाल जल्द सूख जाता
है। नाल काटने के बाद बच्चे के शरीर में बेसन लगाकर उसे
किंचित गरम जल से नहला देना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे के
शरीर की मैल छूट जाती है। बालक के उत्पन्न होते ही चतुर दाई
को यह देख लेना चाहिए कि उसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब ठीक है या
कोई अङ्ग विकृत अथवा जुड़ा हुआ है। क्योंकि बहुत से बच्चों
की हाथ-पैर की अँगुलियाँ एक ही में जुड़ी हुई होती हैं। इसलिए
यदि ऐसा हो तो फौरन तेज छुरे से उसे अलग कर देना चाहिए।
ऐसा न करने से अँगुलियाँ जुड़ी हुई ही रह जाती हैं। इसी प्रकार
यदि आँखों की पलकें बन्द हों यानी जुड़ी हुई हों तो उन्हें भी
नश्तर देकर ठीक कर देना चाहिए। यदि गुदा का छिद्र बन्द हो तो
उसे भी खोल देना चाहिए। आजकल बहुत सी दाइयाँ काँच की
चूड़ी को तोड़कर उसकी नोक से चीर देती हैं; परन्तु यह बहुत
ही वाहियात काम है। इससे बहुत भय और हानि है यह काम
तेज छुरे से ही होना उचित है। इसी प्रकार यदि कोई अङ्ग बेडौल
हो तो उसे तुरन्त ठीक कर देना चाहिए। जैसे,यदि नाक चिपटी
हो तो उसे दुहकर ऊपर को उठा देनी चाहिए; यदि मस्तक टेढ़ा
हो तो उसे दोनों हाथों से दाब कर सुडौल कर देना चाहिए। इस
समय थोड़ी ही सावधानी और उपाय से बेडौल अङ्ग सुडौल हो
सकता है; क्योंकि शरीर की हड्डियाँ बहुत ही कोमल रहती हैं।

२६२ असली कोकशास्त्र
परन्तु बच्चे के शरीर में ज्यों-त्यों हवा लगती है, त्यों-त्यों उसकी
हड्डियाँ कड़ी होती जाती हैं।
कभी-कभी बच्चा उत्पन्न होने पर चुपचाप पड़ा रहता है, उस
का कोई भी अङ्ग नहीं हिलता-डोलता। ऐसी दशा में बच्चे को
होशियारी से उल्टा अर्थात् सिर नीचे और पैर ऊपर करके १०-
१५ सिकेंड तक रखना चाहिए और उसकी छाती को धीरे-धीरे
दबाकर फेफड़ों में चैतन्यता लानी चाहिए। इस समय बच्चे के
मुँह में अँगुली डालकर बलगम वगैरह निकाल लेना उचित है।
कारण यह कि उल्टा करने से बच्चे के गले का बलगम मुख में
आ जाता है।
नाल काटने के बाद बच्चे को करवट के बल लिटा देना चाहिए
और उसे स्नान कराने का प्रबन्ध करना चाहिए। इस समय
बालक के समूचे शरीर में यदि शहद पोत दी जाय तो बहुत ही
उत्तम हो। शहद लगाने से बच्चा सदा के लिए रोगमुक्त हो जाता
है। कुछ देर के बाद शहद को कोमल तथा साफ कपड़े से पोंछ-
कर बालक को नहला देना चाहिए। तीन अँगुली बचे हुए नाल को
भी पानी में उबाले हुए मलमल के टुकड़े से लपेट देना चाहिए।
बच्चे को नहलाते समय उसके नाल पर मैला पानी जरा भी न पड़ने
दे। क्योंकि उसके भींजने से पक जाने या सड़ जाने का भय रहता
है। नाल काटते समय यदि रुधिर को पीछे हटाकर १२ अनबिंधे
मोती उसमें भर दिये जायँ और ऊपर से बाँधकर नाल को काटा

जाय, पश्चात् एक मोती नित्य-प्रति बच्चे को खिलाया जाय तो
आमरणपर्यन्त उसे चेचक रोग नहीं हो सकता ।
बच्चे को स्नान कराने के लिए जो पानी गरम किया जाय,
उसमें यदि पीपल, गूलर या बटवृक्ष की छाल डाल दी जाय तो
बड़ा लाभ होता है। यदि उक्त वृक्षों की छाल समय पर न मिल
सकें तो तपाई हुई चाँदी या सोने को पानी में बुझाकर उसी जल
से बच्चे को नहलाना उचित है। बच्चे को प्रतिदिन कुनकुने पानी
में जरा सा नमक मिलाकर स्नान कराने से बड़ा फायदा पहुँचता है।
बालक को पैदा होने के बाद दस्त होता है। इस दस्त का
होना बहुत जरूरी है यह दस्त जितना शीघ्र हो जाय उतना ही
अच्छा। इसके होने से बच्चे का पेट साफ हो जाता है और भूख
खूब ठिकाने से लगती है। यह मल गर्भ में बहुत दिनों का जुटने के
कारण बड़ा हानिकारक होता है। यदि दस्त न हो तो शुद्ध किया
हुआ दस बूँद रेंडी का तेल शहद में मिलाकर या योंही पिला देना
उचित है। इससे अवश्य दस्त उतर आता है और बच्चे को
आराम मिलता है। जब तक यह पहला दस्त नहीं हो जाता, तब
तक बच्चा बड़ा ही बेचैन रहता है, इसके होते ही उसे फुरसत मिल
जाती है। यदि यह मल बच्चे के पेट में दो-चार दिन रह जाता
है अर्थात् दो-चार दिन तक बच्चे को दस्त नहीं होता, तो वह
बालक रोगी हो जाता है और पेट की बीमारियाँ तो उसे बहुधा
हुआ करती हैं। इस लिए इसमें जरा भी ढिलाई नहीं करनी

२६४ असली कोकशास्त्र
चाहिए, बालक का पेट साफ करने के लिए उसकी माता का दूध
सबसे अधिक गुणकारी है। अतः पहले माता का दूध ही पिलाना
चाहिए। यदि माता के स्तनों में दूध न उतरा हो तो रेंडी का तेल
और मधु मिलाकर चटाना चाहिए।
यदि नाल से रुधिर निकलता हो तो उसे रेशम से बाँध देना
चाहिए। नाल से रुधिर का निकलना बहुत ही हानिकर है। आठ
नौ दिन में नाल अपने से सूखकर गिर जाता है। यदि वह आप ही
न गिरे तो उसे भूलकर भी खींचना नहीं चाहिए। यदि बालक की
खाल कहीं सिकुड़ी हुई हो और उसके पास कुछ मैल या छिला
हुआ अथवा कटा हुआ दिखलायी पड़े तो उसको नरम कपड़े या
स्पञ्ज से धो दिया करे तथा चिकनी खड़िया और चावल का आटा
या मैदा मिलाकर उस पर लगा दिया करे।
कभी-कभी बच्चों का नाल पक भी जाता है। इस लिए चतुर
दाई का कर्त्तव्य है कि वह ऐसे ढंग से सब काम करे कि उसके
पकने की नौबत ही न आये। यदि किसी कारणवश पक ही जाय
तो उस पर सफेदा या कलई लगा देना चाहिए। यदि नाल सूज
आया तो तो अफीम को तेल में घिसकर लगाने से अच्छा हो जाता
है। नाल काटने के बाद तुरन्त ही यदि कठ का तेल लगा दे तो
उसके पकने या सूजने का भय नहीं रहता। कठ तेल इस प्रकार
बनता है कि तेल और पानी को बराबर बराबर लेकर उसमें काठ
का चूर्ण डाल आग पर पकावे। जब सब पानी जल जाय और सिर्फ

असली कोकशास्त्र २६५
तेल रह जाय, तब उसे उतार कर कपड़े से छान डाले और शीशा
में रख दे यही कठ-तेल कहलाता है। यदि कठ तेल न हो तो तिल
का तेल ही लगा देना चाहिए। इसके लगाने से भी पकने का भय
बहुत कम रहता है।
बालक के लिये गाय के दूध से बढ़कर गुणकारी दूसरा दूध
नहीं है। अगर है तो केवल माता का दूध। किन्तु माता का दूध
तो अमृत तुल्य है अतः उसे दूध की श्रेणी में रखना ठीक नहीं। गाय
का दूध हलका, पुष्ट, निरोग और फुर्तीला होता है, इस लिए बालक
को सदा गाय का दूध ही पिलाना चाहिए।
─:०:─
प्रसूता के लिए उपचार
बालक उत्पन्न होने के बाद स्त्री के पेट से एक मांस की सी
थैली निकलती है जिसको विभिन्न प्रान्तों में 'आँवल' 'औनार'
'खेढ़ी' आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। जैसे गाय-भैंस
के बच्चा पैदा होने के बाद खेढ़ी गिरती है उसी प्रकार स्त्री के भी।
इसका न निकलना बड़ा ही हानिकारक है। जब तक यह न गिरे,
तबतक स्त्री के पेट पर से हाथ नहीं हटाना चाहिए। यदि यह अपने
से न गिरे तो खींचकर कभी भी निकालने की चेष्टा नहीं करनी
चाहिये। क्योंकि खींचकर निकालने से गर्भाशय को बड़ी हानि
पहुँचती है। प्रसव होने के आधा घण्टा बाद यह थैली अपने-आप ही

२६४ असली कोकशास्त्र
बाहर निकल आती है। यदि प्रसव के बाद एक घण्टा बीत जाय
और वह थैली बाहर न निकले, तब उसे बाहर निकालने का यत्न
करना आवश्यक है ।
दाई को प्रसूता के पेट पर हाथ फेरते रहना चाहिए । ऐसा
करने से पेट में पीड़ा होने लगती है और वह थैली बाहर निकल
आती है। ऐसा करने पर भी यदि वह न गिरे तो नीचे लिखे
आयुर्वेदशास्त्र के यत्नों को करना चाहिए ।
१—भोजपत्र और गुग्गल को कूटकर प्रसूता की कमर में
उसका धुआँ देना चाहिए ।
२—लाँगली की जड़ को पानी में पीसकर प्रसूता के हाथ-पैर
में लेप करने से वह थैली शीघ्र गिर पड़ती है ।
यदि इस तरह भी वह बाहर न निकले तो खुद दाई को चाहिए
कि वह अपने हाथ में नारियल का तेल पोतकर खूब सावधानी से
उसे इकट्ठा करके निकाले और एक हाथ से प्रसूता के पेट को
दबाये रहे। यदि पेट दबाया नहीं जायगा तो खून बहुत निकलेगा
और प्रसूता बिलकुल कमजोर हो जायगी। इस लिए इस बात की
ओर पूरा ध्यान रखना चाहिए। इसका थोड़ा अंश भी पेट में रह
जाने से प्रसूता का स्वास्थ्य आजन्म के लिए नष्ट हो जाता है, उसे
विषैला ज्वर आने लगता है ।
जब यह बाहर निकल आवे तब एक दुपट्टा चौपर्त कर पेडू से
कलेजे तक कस कर लपेट देना चाहिए। इससे खून का गिरना बन्द

असली कोकशास्त्र [२६७]

हो जाता है, प्रसूता का पेट नहीं डोलता, गर्भाशय डिगने नहीं पाता
तथा जी को आराम मिलता है। इस कपड़े को दूसरे-तीसरे दिन
खोलकर बाँधते रहना चाहिए, ऐसा करने से नसें खिंचने नहीं पातीं।
बहुत सी दाइयाँ बच्चा पैदा होने के बाद प्रसूता को बिठा देती
हैं। उनका कहना है कि इससे खून बाहर निकल जाता है। किन्तु
ऐसा कभी न करना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार खून निकालने से
प्रसूता निर्जीव हो जाती है।
प्रसूता की जठराग्नि कमजोर रहती है। इस लिए उसके लिए
दूध सबसे अच्छा भोजन है। दुःख की बात है कि हमारे देश में
अनभिज्ञता के कारण प्रसूता को गरिष्ट चीजें अधिक खिलायी जाती
हैं; किन्तु उसे ऐसा भोजन देना चाहिए जो हल्का हो और साथ ही
पौष्टिक। यदि सोंठ को पीस-छानकर उसकी एक फँकी लगाकर
ऊपर से प्रसूता दूध पिये तो उसे बहुत ही लाभ पहुँचे। इस बात
को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि देर में पचने वाला भोजन
प्रसूता के लिए बहुत ही हानिकारक है। उसके खान-पान में विशेष
सावधानी रखने की जरूरत होती है। कारण यह कि बच्चा पैदा
होने के बाद प्रसूता अत्यन्त निर्बल हो जाती है। उसके शरीर के
रक्त में रोगों के कीटाणुओं का सामना करने की शक्ति नहीं रहती;
इस लिए वह सहज ही में रोगाक्रान्त हो जाती है। ज्यों-ज्यों प्रसूता
की पाचनशक्ति बढ़ती जाय, त्यों त्यों अधिक पुष्टिकारक भोजन
देना तो ठीक है; पर शुरू में ही गरिष्ट भोजन देना कदापि ठीक नहीं।

२६८ असली कोकशास्त्र
प्रसव होने के दो-तीन घण्टे बाद प्रसूता को कुछ खिलाकर
सुला देना उचित है। इस समय किसी प्रकार का हल्ला-गुल्ला करना
प्रसूता के लिए दुःखदायी होता है। हमारे यहाँ लड़का पैदा होने
पर बन्दूकों की आवाजें की जाती हैं, स्त्रियाँ गाना-बजाना करती हैं;
किन्तु उस समय यह सब करना अच्छा नहीं। इन कामों से प्रसूता
की बेचैनी बढ़ जाती है। इस समय ऐसी शान्ति रखनी चाहिए,
जिससे प्रसूता को फौरन नींद आ जाय। जब वह सोकर उठे, तब
उसे पेशाब कराना चाहिए; किन्तु उसे उठाकर पेशाब न करावे, लेटे
ही लेटे, क्योंकि हिलने-डोलने से प्रसूता को बड़ा ही कष्ट होता है।
उठने-बैठने या हिलने-डोलने से रक्त-स्राव होने लगता है। पारसियों
के घरों की स्त्रियाँ प्रसव होने के चालीस दिन बाद बाहर निकलती
हैं। इतना नहीं तो कम-से-कम १५-२० दिन तक तो अवश्य ही
नियम का पालन करना प्रत्येक प्रसूता का कर्त्तव्य होना चाहिए।
इस समय गर्भाशय सिकुड़ कर इतना छोटा नहीं होगया रहता कि
वह उदर-गह्वर में जा सके। वह कहीं १५-१६ दिन में उदर-गह्वर
में जाने के योग्य होता है। इस लिए इतने दिनों तक विशेष
सावधानी की जरूरत रहती है। यही कारण है कि लेटे ही लेटे
पेशाब करने का आदेश किया गया है।
यदि मूत्र न उतरे तो गरम पानी में साफ कपड़ा भिगोकर उसे
निचोड़ डाले और उसे पेडू पर रक्खे। थोड़ी देर तक ऐसा करने
से पेशाब हो जायगा। किन्तु यदि इससे भी पेशाब न हो तो किसी

असली कोकशास्त्र २१६
अच्छे वैद्य से उपाय पूछना चाहिए। क्योंकि इस समय मूत्र-त्याग
करना प्रसूता के लिए बहुत ही आवश्यक है। इस समय पेशाब न
उतरने से रोग उत्पन्न हो जाता है। प्रसूता को मल-त्याग भी कराना
चाहिए। यदि मल न गिरे तो रेंड़ी के तेल में या दूध में सनाय
या और कोई हल्के विरेचन की चीज औटाकर देना चाहिए।
सौर के घर में राई, सफेद सरसों, नीम के पत्ते या इसबन्द
की धूनी देनी चाहिए; किन्तु इतना धुआँ न करना चाहिए कि
बच्चे या प्रसूता की आँखें दुखने लगें। प्रसूता तथा उसके व्यव-
हार के कपड़ों में भी यह धुआँ देना आवश्यक है। बहुधा स्त्रियाँ
प्रसूता की चारपाई के नीचे धधकती हुई आग रख देती हैं—चाहे
गर्मी हो या बरसात। इससे प्रसूता को तो कम, पर नाजुक बच्चे
को बड़ा कष्ट होता है। इस लिए ऐसा कभी न करना चाहिए।
कहीं-कहीं बच्चा पैदा होने के पाँच छः दिन बाद ही स्नान
करा दिया जाता है। यद्यपि स्वास्थ्य के लिए स्नान बहुत ही लाभ-
दायक काम है; तथापि प्रसूता के लिए दस-बारह दिन से पहले
स्नान कराना लाभदायक है, यह नहीं कहा जा सकता। इतने शीघ्र
स्नान कराने से प्रसूता को ज्वर होने तथा सर्दी लगने की सम्भावना
रहती है—जोकि इस समय के लिए घातक है। यदि स्वच्छता
रखना हो तो और ढंग से रक्खे, स्नान न करावे। चालीस दिन
तक प्रसूता के शरीर में प्रतिदिन तैल-मर्दन करना चाहिए। यदि
लाक्षादि तेल मला जाय तो और भी उत्तम हो। क्योंकि इससे

२७० असली कोकशास्त्र
वायु नहीं बढ़ पाती और शरीर में बल खूब बढ़ता है । दस दिन
बीत जाने पर तेल मलकर सबेरे गरम जल से प्रसूता को स्नान
करा देना चाहिए । इससे किसी तरह की हानि नहीं होती पर
लाभ होता है ।
प्रसूता को दस दिन तक बत्तीसा काढ़ा डालकर औटाया हुआ
पानी पीना चाहिए । ये बत्तीसों चीजें पंसारियों के यहाँ मिलती
हैं—जोकि बहुत ही गुणकारी हैं। उन बत्तीस चीजों में से यदि
इन चीजों का ही पानी बनाकर दिया जाय तब भी कोई हर्ज नहीं—
१-अजवायन दो तोला, २-सोंठ एक तोला, ३-लौंग तीन माशा,
४-पीपल तीन माशा, ५-पीपलामूल तीन माशा, ६-जावित्री डेढ़
माशा, ७-जायफल डेढ़ माशा, ८-कमरकस छः माशा, ९-लोध
छः माशा, १०-हल्दी छः माशा, ११-अम्बाहल्दी छः माशा,
१२-सुपारी के फूल छः माशा, १३-असगन्ध छः माशा, १४-मेदा
लकड़ी छः माशा, १५-कत्था तीन माशा, १६-माजूफल तीन माशा
१७-केशर डेढ़ माशा, १८-चिकनी सुपारी एक, १९-सनाय डेढ़
माशा, २०-मँजीठ तीन माशा, २१-झाड़ी बेर की जड़ एक तोला,
इन सबको जौकुट करके एक पोटली में बाँध दे । मिट्टी के बड़े
बर्तन में १५-२० सेर पानी भरकर आग पर चढ़ा दे और उसमें
उक्त पोटली डालकर पकावे, बाद यही पानी प्रसूता को पिलावे ।
यदि ये चीजें भी न मिलें या मौके पर उपस्थित न हों तो—पीपल,
पीपलामूल, गजपीपल, मोचरस, चीता, सोंठ और गुड़ इन्हीं चीजों

असली कोकशास्त्र २७१
को पानी में औटाकर पीना चाहिए । ये चीजें भी वैसी ही गुण-
कारी हैं । अथवा यदि दशमूल का काढ़ा पान करे तो और भी
अच्छा हो । यह पूर्व प्रसूत तक के उत्पन्न हुए रोगों को नष्ट कर
देता है । दशमूल के काढ़े में ये चीजें हैं:—१-शालपर्णी, २-पृष्ठिपर्णी
३--दोनों कटेरी, ४-गोखरू, ५-बेल की गिरी, ६-अरणी, ७-अरलू
८-पाढ़, ९-खम्भारो ( कुमेर ), १०-पीपल । दशमूल में इन दसों
चीजों की समान मात्रा है। यदि पहले से ही इनका अर्क उतारा
हुआ हो तो और भी अच्छा है ।
बहुत जगह की यह प्रथा है कि प्रसूता को पानी नहीं दिया
जाता । पर वास्तव में ऐसा करना ठीक नहीं । प्यास लगना ही
पानी की इच्छा सूचित करता है। इस लिए इस स्वाभाविक माँग
को पूर्ण न करना हानि के सिवा लाभ नहीं पहुँचा सकता । यदि
प्रसूता को प्यास लगे तो दूध देना चाहिए; किन्तु यदि उससे
उसकी तृप्ति न हो तो थोड़ा सा पानी दे देने में कोई हानि नहीं ।
हाँ, बालक पैदा होने के २४-३० घण्टे के भीतर अवश्य ही पानी
नहीं देना चाहिए ।
दाइयों की असावधानी के कारण प्रसूता के प्रसवद्वार से
स्वाभाविकता से अधिक खून गिरने लगता है। ऐसी दशा में नीचे
लिखी दवा बनाकर खिलानी चाहिए:—
दोनों सुपारी, भाँवरी गोंद, कटीरा, गोंद बबूल, पठानी लोध,
कमरकस और गुलधावा इन चीजों को आठ-आठ तोला, माँजूफल,

२७२ असली कोकशास्त्र
समुद्रसोख, कायफल, सालवमिश्री, हंसराज, शकाकुल और सफेद
मुसली ये सब चार-चार तोला बंसलोचन एक तोला, छोटी इलाइची
एक तोला, बादाम पावभर, गरी आधपाव, छुहाड़ा और दाख
आध-आध पाव, घी डेढ़ सेर, आटा डेढ़ सेर और देशी शकर दो
सेर। गोंद को घी में तल कर फुला लेना चाहिए। इन सबको
पंजीरी बनाकर उसमें सफेद मुसली और स्याह मुसली एक सेर,
दखिनी सुपारी, सिरयाली के बीज, गाजर के बीज, बीचबन्द,
मँजीठ, कौंच के बीज, धाय के फूल, पलास की गोंद, इन्द्र जौ,
तेजबल, पीपलामुल, माईं, समुद्रसोख, वायविडंग, देशी आजवायन
तालमखाना, सोंठ, गोखरू, माँजूफल, दालचीनी, मोचरस, कमर-
कस, बबूल की कली, बड़ी इलाइची, असगन्ध सब एक-एक तोला
और संगजराहत तीन तोला इन सबको कूट कपड़छान करके उसमें
डाल दे। बाद यही पंजीरी बलाबल के अनुसार खिलावे। इससे
शीघ्र रक्त-स्राव बन्द हो जाता है।
जब तक स्त्री बच्चा होने बाद पुनः पूर्ववत् रजस्वला होकर शुद्ध
नहीं हो जाती, तब तक उसे प्रसूता ही कहा जाता है। प्रसव के
बाद प्रायः महीने डेढ़ महीने में स्त्रियाँ ऋतुमती होती हैं। बहुत से
लोग सौर में बारह दिन तक रहने को ही प्रसूता मानते हैं; किन्तु
यह उनकी भूल है। आयुर्वेद में लिखा है:—
प्रसूतासार्धमासान्तेदृष्टेवापुनरार्त्तवे ।
अर्थात्—प्रसव के दिन से पैंतालिस दिन पर्यन्त अथवा पुनः

१८ असली कोकशास्त्र २१३
रजस्वला होने तक स्त्री की 'प्रसूत' संज्ञा है ।
इस लिए डेढ़ महीने तक अर्थात् जब तक किसी शास्त्रकारों के
कथनानुसार प्रसूता रहे, उसकी देख-रेख बड़ी ही सावधानी से
करनी चाहिए । सूतिका-गृह को शुद्ध और सुगन्धित रखना चाहिए
तथा प्रसूता के खान-पान की ओर पूरा ध्यान रखना चाहिए ।
पाठिकायें पूछ सकती हैं कि सौर घर को सुगन्धित किस प्रकार
रक्खा जाय ? क्या इत्र इत्यादि से ? नहीं, इच्छा हो तो इत्र से
भी सुगन्धित रक्खे नहीं तो केवल सुगन्धित चीजों की धूनी ही कर
दिया करे । इन चीजों की धूनी कर देने से घर सुगन्धित हो सकता
है:—कपूर कचरी पावभर, चन्दन का चूर्ण पावभर, नागरमोथा
आधापाव, अगर-तगर, लाल चन्दन, गिलोय ढाई-ढाई तोला,
गुग्गुल पाँच तोला, मँजीठ छः माशा, देवदारू एक तोला, मखाना
दो तोला, दालचीनी एक तोला, लौंग एक तोला, ओर बड़ी
इलायची एक तोला इन चीजों को कूट कर गाय का घी, देशी खाँड़
और शहद मिलाकर रख दे । और उसमें से थोड़ा आग में डालकर
धुआँ करके सूतिका-गृह को सुगन्धित कर दिया करे ।
हमारे यहाँ सूतिका-गृह में बहुधा हर समय भीड़ सी लगी
रहती है; स्त्रियाँ बारी-बारी से प्रसूता के पास बैठकर व्यर्थ की बातें
किया करती हैं । इन कामों से बड़ो ही हानि होती है । एक तो
अधिक आदमियों के रहने से सूतिका-गृह की वायु दूषित हो जाती
है, जिससे नाजुक बच्चे की तन्दुरुस्ती बिगड़ जाती है, दूसरे व्यर्थ

२७४ असली कोकशास्त्र
की बातें सुनने से प्रसूता शान्ति-लाभ नहीं कर सकती, जिससे
बहुत सी लक्षित तथा अलक्षित बुराइयाँ पैदा होती हैं। इस लिए
सूतिका घर में अधिक स्त्रियों को फालतू कभी न रहने देना चाहिए
और न तो किसी को व्यर्थ की गप्पें मारने के लिए ही स्वतन्त्रता
दे रखनी चाहिए। क्योंकि ये दोनों ही विशेष हानिकारक हैं। इस
समय प्रसूता का शान्त और सात्विक भाव रखना बहुत ही
आवश्यक है। इससे बच्चे पर बड़ा ही सुन्दर प्रभाव पड़ता है।
कोई यह न समझे कि बच्चे इस वक्त कुछ सीखते ही नहीं।
—:०:—
गर्भ में बालक को शिक्षा
यह बात पहले कही जा चुकी है कि माता जैसा आचरण
करती है, वैसा प्रभाव गर्भस्थ बच्चे पर पड़ता है। गर्भ में बालक
को माता जितनी शिक्षा दे सकती है और उस शिक्षा का जितना
असर पड़ सकता है, उतनी न तो और समय में शिक्षा ही मिल
सकती है ओर न उसका उतना असर ही पड़ सकता है। देखिये,
जब अभिमन्यु गर्भ में थे, तब अर्जुन ने उनकी माता से चक्रव्यूह
वर्णन किया था। पूरा वर्णन वह नहीं कर पाये थे कि वे गहरी नींद
में सो गयीं। परिणाम यह हुआ कि चक्रव्यूह के युद्ध में जहाँ बड़े
बड़े योद्धा हृदय में हार मानकर भययुक्त हो गये, वहाँ कुमार
अभिमन्यु बड़ी वीरता के साथ लड़े ओर फाटक पर फाटक जीतते

असली कोकशास्त्र २१५
चले गये । अन्त में उस स्थल पर मारे गये, जिस स्थल का वर्णन
उनके पिता अर्जुन से उनकी माता नहीं सुन पायी थीं । गर्भ के
बच्चों पर इतना प्रभाव शिक्षा का पड़ता है ।
प्राचीन समय में हमारे देश की देवियाँ जिस ढंग के बच्चे
पैदा करना चाहती थीं, उसी ढंग का बालक पैदा करती थीं । ऐसे
बहुत से उदाहरण हमारे प्राचीन ग्रन्थों में पाये जाते हैं कि एक ही
माता ने अपने एक बच्चे को सर्वस्वत्यागी बनाया, दूसरे को नीति-
कुशल बनाया और तीसरे को शिल्प-कला में दक्ष ! वे माताएँ
जिस गुण वाली सन्तान पैदा करना चाहती थीं, गर्भ धारण करने
पर मनोयोगपूर्वक उसी विषय की बातें सुन, समझ, पढ़ और
विचार कर गर्भ के बालक पर प्रभाव डालती थीं ; किन्तु दुःख है
कि आज हमारी माताओं में वे बातें नहीं रह गयीं ओर न उक्त
विषय की जानकारी ही रह गयी ।
नैपोलियन बोनापार्ट कितना बड़ा बहादुर था, यह सब लोग
जानते हैं । जब वह अपनी माता के उदर में था, तब उसकी माँ
प्लूटार्क की लिखी हुई जीवनियों और ओसियन वीर-साहित्य को
मन लगाकर बड़े चाव से पढ़ा करती थी । उसकी माँ तेज घोड़े
की सवारी करती, घोड़े तथा अपने पति के अधीन सैनिकों पर रानी
की तरह हुकूमत करती और उन्हें अधिकार में रखती थी । क्या
उसके इन कार्यों का प्रभाव उसके गर्भस्थ बच्चे पर न पड़ा होगा ?
जिस समय नैपोलियन गर्भ में था, उसकी माँ अपने पति के

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साथ लड़ाई पर गयी थी। दिनभर युद्ध करने के बाद जब उसके
पति आते थे, तब वह लड़ाई का सारा हाल पूछा करती थी।
इस प्रकार वह अपने पति के मुख से युद्ध-क्षेत्र की वीरता-पूर्ण
घटनाओं को बड़े प्रेम से सुना करती थी। इन बातों को देखते हुए
कौन कह सकता है कि माता के कार्यों का प्रभाव गर्भस्थ बालक
पर नहीं पड़ता ?
सन्तान के लिए माता का उदर महाविद्यालय के समान है।
अथर्व वेद में लिखा है:—
ब्रह्मचारी जनयन्ब्रह्मागोलोकप्रजापतिं परमेष्ठिनं
विराजम् । गर्भो भूत्वामृतस्ययोना विन्द्रोहंभूत्त्वास-
सुरांस्ततर्ह ॥
जो ज्ञानामूल के केन्द्र-स्थान में गर्भरूप रहकर ब्रह्मचारी हुआ,
वही ज्ञान, कर्म, जानता, प्रजापालक राजा और विशेष तेजस्वी
परमात्मा को प्रकट करता हुआ इन्द्र बनकर अवश्यमेव राक्षसों
का नाश करता है।
अस्तु ; इस विषय पर एक नहीं सैकड़ों-हजारों उदाहरण दिये
जा सकते हैं कि गर्भस्थ बालक पर कैसा-कैसा प्रभाव पड़ा है और
पड़ता है ; किन्तु अधिक प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं। यहाँ पर
एक बात का और ध्यान रखना चाहिए। वह यह कि जिस प्रकार
उत्तम शिक्षाओं का प्रभाव गर्भस्थ बालक पर पड़ता है, उसी प्रकार

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कुशिक्षाओं का भी। जो माता इस बात पर ध्यान नहीं रखती और
टेढ़ा-मेढ़ा कार्य किया करती है, उसकी सन्तान किसी भी दशा में
दुर्गुणों से खाली नहीं रह सकती। अब यदि इसके विषय में भी
दो-एक उदाहरण दे दिया जाय तो अनुमानतः लाभदायक ही होगा।
आँखों देखी बात है कि एक जगह स्त्री-पुरुष में बराबर लड़ाई
हुआ करती थी। स्त्री बड़ी फूहड़ थी। कोई भी काम सफाई से
करना तो मानो उसके स्वभाव-विरुद्ध था। यदि कोई पास-पड़ोस
की स्त्री उससे कभी यह कहती कि तुम काम सफाई से क्यों नहीं
करतीं ? तो वह फौरन ही जल-भुन कर खाक हो जाती और दिन-
भर उस स्त्री के प्रति कुछ-न-कुछ बड़बड़ाया करती थी। कहती, —
“चली हैं मुझे सहूर सिखलाने। यह न जानें कहाँ की सहूरदार
हैं।” संयोग से उस स्त्री के लड़का पैदा हुआ। बचपन में बहुत
रोता और छैलाता था। जब पाँच वर्ष का हुआ, तब तो ठीक उसमें
उन सारी बातों का प्रत्यक्ष दर्शन ही मिलने लगा जो उसकी मां में
थीं। वह लड़का बड़ी म्लेच्छता से रहता था। कभी-कभी तो वह
यहाँ तक किया करता था कि कि अपने ही अंगरखे या गमछे पर टट्टी
फिर देता और उसे गठरी की तरह बनाकर दिनभर अपने पास
लिये रहता था। यदि कोई लड़का उसे टोंकता तो वह फौरन ही
बिगड़ खड़ा होता और कहता, —‘ई साला आमको कैता है ओर
आप गू काता है ( खाता ) है।” इतना ही नहीं, वह अपने माँ-बाप
को भी गालियाँ दिया करता था। इस प्रकार हूबहू वह लड़का

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अपनी माँ के समान ही काम करता था और ठीक उसी तरह बातें
भी करता था
वही स्त्री जब दूसरी बार गर्भिणी हुई तो उसके पति का देहांत
हो गया। पति के मरते ही उस स्त्री में अपूर्व परिवर्त्तन हो गया।
दिन-रात रोया करती, न किसी से कुछ बोलना न चालना, अकेले
में बैठी रहती और रह-रह कर 'आह राम' कहा करती थी। अब
उसका झगड़ना बिलकुल ही बन्द हो गया। वास्तव में यदि विचार
पूर्वक देखा जाय तो कभी-कभी मानस पर आकस्मिक चोट लगने
के कारण मनुष्य के स्वभाव में विचित्र ही परिवर्त्तन हो जाता है।
अन्त में उसके गर्भ से कन्या उत्पन्न हुई। तीन वर्ष की अवस्था में
वह लड़की हमेशा और बच्चों से अलग चुपचाप बैठी रहा करती
थी और यदि कोई बालक उसे छेड़ता था; तो वह झट रोने लगती
थी। एकान्त में बैठना उसे बहुत प्रिय था। अब तो वह लड़की
सयानी हो गयी होगी, बिना देखे यह कहना कठिन है कि अब
उसका स्वभाव कैसा है; पर अनुमान से मालूम होता है कि अवश्य
ही वह उसी स्वभाव की होगी।
इस लिए गर्भिणी को उचित है कि वह अपने गर्भस्थ बालक
पर अच्छा संस्कार डाले। जिस विषय की शिक्षा देनी हो, उस
विषय को ध्यान से सोचे-समझे और अपने मन में यह धारणा
रक्खे कि इस विषय की शिक्षा मेरे गर्भस्थ सन्तान को मिल रही
है। यदि बालक को गणित शास्त्र की शिक्षा देनी हो, तो गणित