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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 440 में से

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असली कोकशास्त्र २७७
कुशिक्षाओं का भी। जो माता इस बात पर ध्यान नहीं रखती और
टेढ़ा-मेढ़ा कार्य किया करती है, उसकी सन्तान किसी भी दशा में
दुर्गुणों से खाली नहीं रह सकती। अब यदि इसके विषय में भी
दो-एक उदाहरण दे दिया जाय तो अनुमानतः लाभदायक ही होगा।
आँखों देखी बात है कि एक जगह स्त्री-पुरुष में बराबर लड़ाई
हुआ करती थी। स्त्री बड़ी फूहड़ थी। कोई भी काम सफाई से
करना तो मानो उसके स्वभाव-विरुद्ध था। यदि कोई पास-पड़ोस
की स्त्री उससे कभी यह कहती कि तुम काम सफाई से क्यों नहीं
करतीं ? तो वह फौरन ही जल-भुन कर खाक हो जाती और दिन-
भर उस स्त्री के प्रति कुछ-न-कुछ बड़बड़ाया करती थी। कहती, —
“चली हैं मुझे सहूर सिखलाने। यह न जानें कहाँ की सहूरदार
हैं।” संयोग से उस स्त्री के लड़का पैदा हुआ। बचपन में बहुत
रोता और छैलाता था। जब पाँच वर्ष का हुआ, तब तो ठीक उसमें
उन सारी बातों का प्रत्यक्ष दर्शन ही मिलने लगा जो उसकी मां में
थीं। वह लड़का बड़ी म्लेच्छता से रहता था। कभी-कभी तो वह
यहाँ तक किया करता था कि कि अपने ही अंगरखे या गमछे पर टट्टी
फिर देता और उसे गठरी की तरह बनाकर दिनभर अपने पास
लिये रहता था। यदि कोई लड़का उसे टोंकता तो वह फौरन ही
बिगड़ खड़ा होता और कहता, —‘ई साला आमको कैता है ओर
आप गू काता है ( खाता ) है।” इतना ही नहीं, वह अपने माँ-बाप
को भी गालियाँ दिया करता था। इस प्रकार हूबहू वह लड़का