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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 440 में से

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२७८ असली कोकशास्त्र
अपनी माँ के समान ही काम करता था और ठीक उसी तरह बातें
भी करता था
वही स्त्री जब दूसरी बार गर्भिणी हुई तो उसके पति का देहांत
हो गया। पति के मरते ही उस स्त्री में अपूर्व परिवर्त्तन हो गया।
दिन-रात रोया करती, न किसी से कुछ बोलना न चालना, अकेले
में बैठी रहती और रह-रह कर 'आह राम' कहा करती थी। अब
उसका झगड़ना बिलकुल ही बन्द हो गया। वास्तव में यदि विचार
पूर्वक देखा जाय तो कभी-कभी मानस पर आकस्मिक चोट लगने
के कारण मनुष्य के स्वभाव में विचित्र ही परिवर्त्तन हो जाता है।
अन्त में उसके गर्भ से कन्या उत्पन्न हुई। तीन वर्ष की अवस्था में
वह लड़की हमेशा और बच्चों से अलग चुपचाप बैठी रहा करती
थी और यदि कोई बालक उसे छेड़ता था; तो वह झट रोने लगती
थी। एकान्त में बैठना उसे बहुत प्रिय था। अब तो वह लड़की
सयानी हो गयी होगी, बिना देखे यह कहना कठिन है कि अब
उसका स्वभाव कैसा है; पर अनुमान से मालूम होता है कि अवश्य
ही वह उसी स्वभाव की होगी।
इस लिए गर्भिणी को उचित है कि वह अपने गर्भस्थ बालक
पर अच्छा संस्कार डाले। जिस विषय की शिक्षा देनी हो, उस
विषय को ध्यान से सोचे-समझे और अपने मन में यह धारणा
रक्खे कि इस विषय की शिक्षा मेरे गर्भस्थ सन्तान को मिल रही
है। यदि बालक को गणित शास्त्र की शिक्षा देनी हो, तो गणित