महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
[कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद]
[कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद]
वैशम्पायन उवाच
दानपुण्यफलं श्रुत्वा तपःपुण्यफलानि च ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दान और तपस्याके पुण्य-फलको सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा— ॥
या चैषा कपिला देव पूर्वमुत्पादिता विभो ।
होमधेनुः सदा पुण्या चतुर्वक्त्रेण माधव ॥
सा कथं ब्राह्मणेभ्यो हि देया कस्मिन् दिनेऽपि वा ।
कीदृशाय च विप्राय दातव्या पुण्यलक्षणा ॥
'भगवन्! विभो! जिसे ब्रह्माजीने अग्निहोत्रकी सिद्धिके लिये पूर्वकालमें उत्पन्न किया था तथा जो सदा ही पवित्र मानी गयी है, उस कपिला गौका ब्राह्मणोंको किस प्रकार दान करना चाहिये? माधव! वह पवित्र लक्षणोंवाली गौ किस दिन और कैसे ब्राह्मणको देनी चाहिये? ॥
कति वा कपिला प्रोक्ता स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
कैर्वा देयाश्च ता देव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
'ब्रह्माजीने कपिला गौके कितने भेद बतलाये हैं तथा कपिला गौका दान करनेवाला मनुष्य कैसा होना चाहिये? इन सब बातोंको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ' ॥
एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण संसदि ।
अब्रवीत् कपिलासंख्यां तासां माहात्म्यमेव च ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके द्वारा सभामें इस प्रकार कहे जानेपर श्रीकृष्ण कपिला गौकी संख्या और उनकी महिमाका वर्णन करने लगे— ॥
शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पावनं परम् ।
यच्छ्रुत्वा पापकर्मापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥
'पाण्डुनन्दन! यह विषय बड़ा ही पवित्र और पावन है। इसका श्रवण करनेसे पापी पुरुष भी पापसे मुक्त हो जाता है, अतः ध्यान देकर सुनो ॥
कपिला ह्यग्निहोत्रार्थे विप्रार्थे वा स्वयम्भुवा ।
सर्वं तेजाः समुद्धृत्य निर्मिता ब्रह्मणा पुरा ॥
'पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने अग्निहोत्र तथा ब्राह्मणोंके लिये सम्पूर्ण तेजोंका संग्रह करके कपिला गौको उत्पन्न किया था ॥
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
पुण्यानां परमं पुण्यं कपिला पाण्डुनन्दन ॥
'पाण्डुनन्दन! कपिला गौ पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र, मंगलजनक पदार्थोंमें सबसे अधिक मंगलस्वरूपा तथा पुण्योंमें परमपुण्यस्वरूपा है ।।
तपसां तप एवाग्र्यं व्रतानामुत्तमं व्रतम् ।
दानानां परमं दानं निदानं ह्येतदक्षयम् ।।
'वह तपस्याओंमें श्रेष्ठ तपस्या, व्रतोंमें उत्तम व्रत, दानोंमें श्रेष्ठ दान और सबका अक्षय कारण है ।।
क्षीरेण कपिलायास्तु दध्ना वा सघृतेन वा ।
होतव्यान्यग्निहोत्राणि सायं प्रातर्द्विजातिभिः ।
'द्विजातियोंको चाहिये कि वे सायंकाल और प्रातःकालमें कपिला गौके दूध, दही अथवा घीसे अग्निहोत्र करें ।।
कपिलाया घृतेनापि दध्ना क्षीरेण वा पुनः ।
जुह्वते येऽग्निहोत्राणि ब्राह्मणा विधिवत् प्रभो ।।
पूजयन्त्यतिथींश्चैव परां भक्तिमुपागताः ।
शूद्रान्नाद् विरता नित्यं दम्भानृतविवर्जिताः ।।
ते यान्त्यादित्यसंकाशैर्विमानैर्द्विजसत्तमाः ।
सूर्यमण्डलमध्येन ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ।।
'प्रभो! जो ब्राह्मण कपिला गौके घी, दही अथवा दूधसे विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, भक्तिपूर्वक अतिथियोंकी पूजा करते हैं, शूद्रके अन्नसे दूर रहते हैं तथा दम्भ और असत्यका सदा त्याग करते हैं, वे सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा सूर्यमण्डलके बीचसे होकर परम उत्तम ब्रह्मलोकमें जाते हैं ।।
शृङ्गाग्रे कपिलायास्तु सर्वतीर्थानि पाण्डव ।
ब्रह्मणो हि नियोगेन निवसन्ति दिने दिने ।।
प्रातरुत्थाय यो मर्त्यः कपिलाशृङ्गमस्तकात् ।
यश्च्युतामम्बुधारां वै शिरसा प्रयतः शुचिः ।।
स तेन पुण्यतीर्थेन सहसा हतकिल्बिषः ।
जन्मत्रयकृतं पापं प्रदहत्यग्निवत् तृणम् ।।
'युधिष्ठिर! ब्रह्माजीकी आज्ञासे कपिलाके सींगके अग्रभागमें सदा सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नियमपूर्वक प्रतिदिन सबेरे उठकर कपिला गौके सींग और मस्तकसे गिरती हुई जलधाराको अपने सिरपर धारण करता है, वह उस पुण्यके प्रभावसे सहसा पापरहित हो जाता है। जैसे आग तिनकेको जला डालती है, उसी प्रकार वह जल मनुष्यके तीन जन्मोंके पापोंको भस्म कर डालता है ।।
मूत्रेण कपिलायास्तु यश्च प्राणानुपस्पृशेत् ।
स्नानेन तेन पुण्येन नष्टपापः स मानवः ।
त्रिंशद् वर्षकृतात् पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥
'जो मनुष्य कपिलाका मूत्र लेकर अपनी नेत्र आदि इन्द्रियोंमें लगाता तथा उससे स्नान करता है, वह उस स्नानके पुण्यसे निष्पाप हो जाता है। उसके तीस जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
प्रातरुत्थाय यो भक्त्या प्रयच्छेत् तृणमुष्टिकम् ।
तस्य नश्यति तत् पापं त्रिंशद्रात्रकृतं नृप ॥
'नरपते! जो प्रातःकाल उठकर भक्तिके साथ कपिला गौको घासकी मुट्ठी अर्पण करता है, उसके एक महीनेके पापोंका नाश हो जाता है ।।
प्रातरुत्थाय यद्भक्त्या कुर्याद् यस्मात् प्रदक्षिणम् ।
प्रदक्षिणीकृता तेन पृथिवी नात्र संशयः ।।
'जो सबेरे शयनसे उठकर भक्तिपूर्वक कपिला गौकी परिक्रमा करता है, उसके द्वारा समूची पृथिवीकी परिक्रमा हो जाती है, इसमें संशय नहीं है' ।।
कपिलापञ्चगव्येन यः स्नायात् तु शुचिर्नरः ।
स गङ्गाद्येषु तीर्थेषु स्नातो भवति पाण्डव ॥
'पाण्डुनन्दन! जो पुरुष कपिला गौके पञ्चगव्यसे नहाकर शुद्ध होता है, वह मानो गंगा आदि समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लेता है ।।
दृष्ट्वा तु कपिलां भक्त्या श्रुत्वा हुंकारनिःस्वनम् ।
व्यपोहति नरः पापमहोरात्रकृतं नृप ।।
'राजन्! भक्तिपूर्वक कपिला गौका दर्शन करके तथा उसके रँभानेकी आवाज सुनकर मनुष्य एक दिन-रातके पापोंको नष्ट कर डालता है ।।
गोसहस्रं तु यो दद्यादेकां च कपिलां नरः ।
समं तस्य फलं प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।।
'एक मनुष्य एक हजार गौओंका दान करे और दूसरा एक ही कपिला गौको दानमें दे तो लोकपितामह ब्रह्माजीने उन दोनोंका फल बराबर बतलाया है ।।
यस्त्वेवं कपिलां हन्यान्नरः कश्चित् प्रमादतः ।
गोसहस्रं हतं तेन भवेन्नात्र विचारणा ।।
'इसी प्रकार कोई मनुष्य प्रमादवश यदि एक ही कपिला गौकी हत्या कर डाले तो उसे एक हजार गौओंके वधका पाप लगता है, इसमें संशय नहीं है ।।
दश वै कपिलाः प्रोक्ताः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
प्रथमा स्वर्णकपिला द्वितीया गौरपिङ्गला ।
तृतीया रक्तपिङ्गाक्षी चतुर्थी गलपिङ्गला ।।
पञ्चमी बभ्रुवर्णाभा षष्ठी च श्वेतपिङ्गला ।
सप्तमी रक्तपिङ्गाक्षी त्वष्टमी खुरपिङ्गला ।।
नवमी पाटला ज्ञेया दशमी पुच्छपिङ्गला ।
दशैताः कपिलाः प्रोक्तास्तारयन्ति नरान् सदा ॥
‘ब्रह्माजीने कपिला गौके दस भेद बतलाये हैं। पहली स्वर्णकपिला१, दूसरी गौरपिंगला२, तीसरी आरक्तपिंगाक्षी३, चौथी गलपिंगला४, पाँचवीं बभ्रुवर्णाभा५, छठी श्वेतपिंगला६, सातवीं रक्तपिंगाक्षी७, आठवीं खुरपिंगला८, नवीं पाटला९ और दसवीं पुच्छपिंगला१०—ये दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी गयी हैं, जो सदा मनुष्योंका उद्धार करती हैं ।।
मङ्गल्याश्च पवित्राश्च सर्वपापप्रणाशनाः ।
एवमेव ह्यनड्वाहो दश प्रोक्ता नरेश्वर ॥
‘नरेश्वर! वे मंगलमयी, पवित्र और सब पापोंको नष्ट करनेवाली हैं। गाड़ी खींचनेवाले बैलोंके भी ऐसे ही दस भेद बताये गये हैं ।।
ब्राह्मणो वाहयेत् तांस्तु नान्यो वर्णः कथंचन ।
न वाहयेच्च कपिलां क्षेत्रे वाध्वनि वा द्विजः ॥
‘उन बैलोंको ब्राह्मण ही अपनी सवारीमें जोते। दूसरे वर्णका मनुष्य उनसे सवारीका काम किसी प्रकार भी न ले। ब्राह्मण भी कपिला गौको खेतमें या रास्तेमें न जोते ।।
वाहयेद् हुङ्कृतेनैव शाखया वा सपत्नया ।
न दण्डेन न वा यष्ट्या न पाशेन न वा पुनः ॥
‘गाड़ीमें जुते रहनेपर उन बैलोंको हुंकारकी आवाज देकर अथवा पत्तेवाली टहनीसे हाँके। डंडेसे, छड़ीसे और रस्सीसे मारकर न हाँके ।।
न क्षुत्तृष्णाश्रमश्रान्तान् वाहयेद् विकलेन्द्रियान् ।
अतृप्तेषु न भुञ्जीयात् पिबेत् पीतेषु चोदकम् ॥
‘जब बैल भूख-प्यास और परिश्रमसे थके हुए हों तथा उनकी इन्द्रियाँ घबरायी हुई हों, तब उन्हें गाड़ीमें न जोते। जबतक बैलोंको खिलाकर तृप्त न कर ले तबतक स्वयं भी भोजन न करे। उन्हें पानी पिलाकर ही स्वयं जलपान करे ।।
शुश्रूषोर्मातरश्चैताः पितरस्ते प्रकीर्तिताः ।
अहं पूर्वत्र भागे च धुर्याणां वाहनं स्मृतम् ॥
‘सेवा करनेवाले पुरुषकी कपिला गौएँ माता और बैल पिता हैं। दिनके पहले भागमें ही भार ढोनेवाले बैलोंको सवारीमें जोतना उचित माना गया है ।। ’
विश्रामेन्मध्यमे भागे भागे चान्ते यथासुखम् ।
यत्र च त्वरया कृत्यं संशयो यत्र वाध्वनि ।
वाहयेत् तत्र धुर्यांस्तु न स पापेन लिप्यते ॥
'दिनके मध्य भागमें—दुपहरीके समय उन्हें विश्राम देना चाहिये; किंतु दिनके अन्तिम भागमें अपनी रुचिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये अर्थात् आवश्यकता हो तो उनसे काम ले और न हो तो न ले। जहाँ जल्दीका काम हो अथवा जहाँ मार्गमें किसी प्रकारका भय आनेवाला हो, वहाँ विश्रामके समय भी यदि बैलोंको सवारीमें जोते तो पाप नहीं लगता ।।
भ्रूणहत्यासमं पापं तस्य स्यात् पाण्डुनन्दन ।
अन्यथा वाहयन् राजन् निरयं याति रौरवम् ।।
'पाण्डुनन्दन! परंतु जो विशेष आवश्यकता न होनेपर भी ऐसे समयमें बैलोंको गाड़ीमें जोतता है, उसे भ्रूण-हत्याके समान पाप लगता है और वह रौरव नरकमें पड़ता है ।।
रुधिरं पातयेत् तेषां यस्तु मोहान्नराधिप ।
तेन पापेन पापात्मा नरकं यात्यसंशयम् ।।
'नराधिप! जो मोहवश बैलोंके शरीरसे रक्त निकाल देता है, वह पापात्मा उस पापके प्रभावसे निःसंदेह नरकमें गिरता है ।।
नरकेषु च सर्वेषु समाः स्थित्वा शतं शतम् ।
इह मानुष्यके लोके बलीवर्दो भविष्यति ।।
'वह सभी नरकोंमें सौ-सौ वर्ष रहकर इस मनुष्यलोकमें बैलका जन्म पाता है ।।
तस्मात् तु मुक्तिमन्विच्छन् दद्यात् तु कपिलां नरः ।।
'अतः जो मनुष्य संसारसे मुक्त होना चाहता हो, उसे कपिला गौका दान करना चाहिये ।।
कपिला सर्वयज्ञेषु दक्षिणार्थं विधीयते ।
तस्मात् तद्दक्षिणा देया यज्ञेष्वेव द्विजातिभिः ।।
'सब प्रकारके यज्ञोंमें दक्षिणा देनेके लिये कपिला गौकी सृष्टि हुई है, इसलिये द्विजातियोंको यज्ञमें उनकी दक्षिणा अवश्य देनी चाहिये ।।
होमार्थं चाग्निहोत्रस्य यां प्रयच्छेत् प्रयत्नतः ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय श्रान्तायामिततेजसे ।
तेन दानेन पूतात्मा मम लोके महीयते ।।
'जो मनुष्य अग्निहोत्रके होमके लिये अमिततेजस्वी एवं धनहीन श्रोत्रिय ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक कपिला गौ दानमें देता है, वह उस दानसे शुद्धचित्त होकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है ।।
सुवर्णखुरशृङ्गीं च कपिलां यः प्रयच्छति ।
विषुवे चायने चापि सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।
तेनाश्वमेधतुल्येन मम लोकं स गच्छति ।।
'जो मनुष्य कपिलाके सींग और खुरोंमें सोना मढ़ाकर उसे विषुवयोगमें अथवा उत्तरायण-दक्षिणायनके आरम्भमें दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है तथा
उस पुण्यके प्रभावसे वह मेरे लोकमें जाता है ।।
अग्निष्टोमसहस्रस्य वाजपेयं च तत्समम् ।
वाजपेयसहस्रस्य अश्वमेधं च तत्समम् ।
अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयं च तत्समम् ।।
‘एक हजार अग्निष्टोमके समान एक वाजपेय-यज्ञ होता है। एक हजार वाजपेयके समान एक अश्वमेध होता है और एक हजार अश्वमेधके समान एक राजसूय-यज्ञ होता है ।।
कपिलानां सहस्रेण विधिदत्तेन पाण्डव ।
राजसूयफलं प्राप्य मम लोके महीयते ।
न तस्य पुनरावृत्तिर्विद्यते कुरुपुङ्गव ।।
‘कुरुश्रेष्ठ पाण्डव! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे एक हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है; उसे पुनः इस लोकमें नहीं लौटना पड़ता ।।
तैस्तैर्गुणैः कामदुधा च भूत्वा
नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ।
स्वकर्मभिश्चाप्यनुबध्यमानं
तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् ।
महार्णवे नौरिव वायुनीता
दत्ता हि गौस्तारयते मनुष्यम् ।।
‘दानमें दी हुई गौ अपने विभिन्न गुणोंद्वारा कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँचती है। वह अपने कर्मोंसे बँधकर घोर अन्धकारपूर्ण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका उसी प्रकार उद्धार कर देती है, जैसे वायुके सहारेसे चलती हुई नाव मनुष्यको महासागरमें डूबनेसे बचाती है ।।
यथौषधं मन्त्रकृतं नरस्य
प्रयुक्तमात्रं विनिहन्ति रोगान् ।
तथैव दत्ता कपिला सुपात्रे
पापं नरस्याशु निहन्ति सर्वम् ।।
‘जैसे मन्त्रके साथ दी हुई ओषधि प्रयोग करते ही मनुष्यके रोगोंका नाश कर देती है, उसी प्रकार सुपात्रको दी हुई कपिला गौ मनुष्यके सब पापोंको तत्काल नष्ट कर डालती है ।।
यथा त्वचं वै भुजगो विहाय
पुनर्नवं रूपमुपैति पुण्यम् ।
तथैव मुक्तः पुरुषः स्वपापै-
र्विरज्यते वै कपिलाप्रदानात् ।।
‘जैसे साँप केंचुल छोड़कर नये स्वरूपको धारण करता है, वैसे ही पुरुष कपिला गौके दानसे पाप-मुक्त होकर अत्यन्त शोभाको प्राप्त होता है ।।
यथान्धकारं भवने विलग्नं
दीप्तो हि निर्यातयति प्रदीपः ।
तथा नरः पापमपि प्रलीनं
निष्क्रामयेद् वै कपिलाप्रदानात् ।।
‘जैसे प्रज्वलित दीपक घरमें फैले हुए अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार मनुष्य कपिला गौका दान करके अपने भीतर छिपे हुए पापको भी निकाल देता है ।।
यस्याहिताग्नेरतिथिप्रियस्य
शूद्रान्नदूरस्य जितेन्द्रियस्य ।
सत्यव्रतस्याध्ययनान्वितस्य
दत्ता हि गौस्तारयते परत्र ।।
‘जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाला, अतिथिका प्रेमी, शूद्रके अन्नसे दूर रहनेवाला, जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा स्वाध्यायपरायण हो, उसे दी हुई गौ परलोकमें दाताका अवश्य उद्धार करती है' ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
१. सुवर्णके समान पीले रंगवाली। २. गौर तथा पीले रंगवाली। ३. कुछ लालिमा लिये हुए पीले नेत्रोंवाली। ४. जिसके गरदनके बाल कुछ पीले हों। ५. जिसका सारा शरीर पीले रंगका हो। ६. कुछ सफेदी लिये हुए पीले रोमवाली। ७. सुर्ख और पीली आँखोंवाली। ८. जिसके खुर पीले रंगके हों। ९. जिसका हलका लाल रंग हो। १०. जिसकी पूँछके बाल पीले रंगके हों।