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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन

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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

दानेन वर्ततेत्याह तपसा चैव भारत ।
तदेतन्मे मनोदुःखं व्यपोह त्वं पितामह ।
किंस्वित् पृथिव्यां ह्येतन्मे भवान् शंसितुमर्हति ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! पितामह! आप कहते हैं कि दान और तप दोनोंसे ही मनुष्य स्वर्गमें जाता है, परंतु मेरे मनमें संशयजनित दुःख हो रहा है। आप इसका निवारण कीजिये। इस पृथिवीपर दान और तपमेंसे कौन-सा साधन श्रेष्ठ है, यह बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

शृणु यैर्धर्मनिरतैस्तपसा भावितात्मभिः ।
लोका ह्यसंशयं प्राप्ता दानपुण्यरतैर्नृपैः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले जिन धर्मात्मा राजाओंने दान-पुण्यमें तत्पर रहकर निःसन्देह बहुत-से उत्तम लोक प्राप्त किये हैं, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो ॥ २ ॥

सत्कृतश्च तथाऽऽत्रेयः शिष्येभ्यो ब्रह्म निर्गुणम् ।
उपदिश्य तदा राजन् गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ३ ॥

राजन्! लोकसम्मानित महर्षि आत्रेय अपने शिष्योंको निर्गुण ब्रह्मका उपदेश देकर उत्तम लोकोंमें गये हैं ॥ ३ ॥

शिबिरौशीनरः प्राणान् प्रियस्य तनयस्य च ।
ब्राह्मणार्थमुपाकृत्य नाकपृष्ठमितो गतः ॥ ४ ॥

उशीनरकुमार शिवि अपने प्यारे पुत्रके प्राणोंको ब्राह्मणके लिये निछावर करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥

प्रतर्दनः काशिपतिः प्रदाय तनयं स्वकम् ।
ब्राह्मणायातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्नुते ॥ ५ ॥

काशीके राजा प्रतर्दनने अपने प्यारे पुत्रको ब्राह्मणकी सेवामें अर्पित कर दिया, जिसके कारण उन्हें इस लोकमें अनुपम कीर्ति मिली और परलोकमें भी वे अक्षय आनन्दका उपभोग कर रहे हैं ॥ ५ ॥

रन्तिदेवश्च सांकृत्यो वसिष्ठाय महात्मने ।

अर्घ्यं प्रदाय विधिवल्लेभे लोकाननुत्तमान् ॥ ६ ॥
संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवने महात्मा वसिष्ठ मुनिको विधिवत् अर्घ्यदान किया, जिससे उन्हें श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ ६ ॥

दिव्यं शतशलाकं च यज्ञार्थं काञ्चनं शुभम् ।
छत्रं देवावृधो दत्त्वा ब्राह्मणायास्थितो दिवम् ॥ ७ ॥
देवावृध नामक राजा यज्ञमें सोनेकी सौ तीलियोंवाले सुन्दर दिव्य छत्रका ब्राह्मणको दान करके स्वर्ग-लोकको प्राप्त हुए हैं ॥ ७ ॥

भगवानम्बरीषश्च ब्राह्मणायामितौजसे ।
प्रदाय सकलं राष्ट्रं सुरलोकमवाप्तवान् ॥ ८ ॥
ऐश्वर्यशाली राजा अम्बरीष अमित तेजस्वी ब्राह्मणको अपना सारा राज्य सौंपकर देवलोकको प्राप्त हुए ॥ ८ ॥

सावित्रः कुण्डलं दिव्यं यानं च जनमेजयः ।
ब्राह्मणाय च गा दत्त्वा गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ९ ॥
सूर्यपुत्र कर्ण अपना दिव्य कुण्डल देकर तथा महाराजा जनमेजय ब्राह्मणको सवारी और गौ दान करके उत्तम लोकोंमें गये हैं ॥ ९ ॥

वृषादर्भिश्च राजर्षी रत्नानि विविधानि च ।
रम्यांश्चावसथान् दत्त्वा द्विजेभ्यो दिवमागतः ॥ १० ॥
राजर्षि वृषादर्भिने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न तथा रमणीय गृह प्रदान करके स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त किया है ॥ १० ॥

निमी राष्ट्रं च वैदर्भिः कन्यां दत्त्वा महात्मने ।
अगस्त्याय गतः स्वर्गं सपुत्रपशुबान्धवः ॥ ११ ॥
विदर्भके पुत्र राजा निमि अगस्त्य मुनिको अपनी कन्या और राज्यका दान करके पुत्र, पशु और बान्धवोंसहित स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ११ ॥

जामदग्न्यश्च विप्राय भूमिं दत्त्वा महायशाः ।
रामोऽक्षयांस्तथा लोकान् जगाम मनसोऽधिकान् ॥ १२ ॥
महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजीने ब्राह्मणको भूमिदान करके उन अक्षय लोकोंको प्राप्त किया है, जिन्हें पानेकी मनमें कल्पना भी नहीं हो सकती ॥ १२ ॥

अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि देवराट् ।
वसिष्ठो जीवयामास येन यातोऽक्षयां गतिम् ॥ १३ ॥
एक बार संसारमें वर्षा न होनेपर मुनिवर वसिष्ठजीने समस्त प्राणियोंको जीवन दान दिया था, जिससे उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ १३ ॥

रामो दाशरथिश्चैव हुत्वा यज्ञेषु वै वसु ।
स गतो ह्यक्षयाँल्लोकान् यस्य लोके महद् यशः ॥ १४ ॥

दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी यज्ञोंमें प्रचुर धनकी आहुति देकर संसारमें अपने महान् यशकी स्थापना करके अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ १४ ॥
कक्षसेनश्च राजर्षिर्वसिष्ठाय महात्मने ।
न्यासं यथावत् संन्यस्य जगाम सुमहायशाः ॥ १५ ॥
महायशस्वी राजर्षि कक्षसेन महात्मा वसिष्ठको अपना सर्वस्व समर्पण करके स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ १५ ॥
करन्धमस्य पौत्रस्तु मरुत्तोऽविक्षितः सुतः ।
कन्यामांगिरसे दत्त्वा दिवमाशु जगाम सः ॥ १६ ॥
करन्धमके पौत्र, अविक्षित्के पुत्र महाराज मरुत्तने अंगिराके पुत्र संवर्तको कन्यादान करके शीघ्र ही स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ॥ १६ ॥
ब्रह्मदत्तश्च पाञ्चाल्यो राजा धर्मभृतां वरः ।
निधिं शङ्खमनुज्ञाप्य जगाम परमां गतिम् ॥ १७ ॥
पाञ्चालदेशके राजा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मदत्तने ब्राह्मणको शंखनामक निधि प्रदान करके परम गति प्राप्त कर ली थी ॥ १७ ॥
राजा मित्रसहश्चैव वसिष्ठाय महात्मने ।
मदयन्तीं प्रियां भार्यां दत्त्वा च त्रिदिवं गतः ॥ १८ ॥
राजा मित्रसह महात्मा वसिष्ठ मुनिको अपनी प्यारी पत्नी मदयन्ती सेवाके लिये देकर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १८ ॥
मनोः पुत्रश्च सुद्युम्नो लिखिताय महात्मने ।
दण्डमुद्धृत्य धर्मेण गतो लोकाननुत्तमान् ॥ १९ ॥
मनुपुत्र राजा सुद्युम्न महात्मा लिखितको धर्मतः दण्ड देकर परम उत्तम लोकोंमें गये ॥ १९ ॥
सहस्रचित्योः राजर्षिः प्राणानिष्टान् महायशाः ।
ब्राह्मणार्थे परित्यज्य गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २० ॥
महान् यशस्वी राजर्षि सहस्रचित्य ब्राह्मणके लिये अपने प्यारे प्राणोंकी बलि देकर श्रेष्ठ लोकोंमें गये हैं ॥
सर्वकामैश्च सम्पूर्णं दत्त्वा वेश्म हिरण्मयम् ।
मौद्गल्याय गतः स्वर्गं शतद्युम्नो महीपतिः ॥ २१ ॥
महाराजा शतद्युम्नने मौद्गल्य नामक ब्राह्मणको समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण सुवर्णमय गृह दान देकर स्वर्ग प्राप्त किया है ॥ २१ ॥
भक्ष्यभोज्यस्य च कृतान् राशयः पर्वतोपमान् ।
शाण्डिल्याय पुरा दत्त्वा सुमन्युर्दिवमास्थितः ॥ २२ ॥

राजा सुमन्युने भक्ष्य, भोज्य पदार्थोंके पर्वत-जैसे कितने ही ढेर लगाकर उन्हें शाण्डिल्यको दान दिया था। जिससे उन्होंने स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ।।
नाम्ना च द्युतिमान् नाम शाल्वराजो महाद्युतिः ।
दत्त्वा राज्यमृचीकाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २३ ॥
महातेजस्वी शाल्वराज द्युतिमान् महर्षि ऋचीकको राज्य देकर सर्वोत्तम लोकोंमें चले गये ।। २३ ।।
मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् ।
हिरण्यहस्ताय गतो लोकान् देवैरधिष्ठितान् ॥ २४ ॥
राजर्षि मदिराश्व अपनी सुन्दरी कन्या विप्रवर हिरण्यहस्तको देकर देवताओंके लोकमें चले गये ।।
लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः ।
ऋष्यशृङ्गाय विपुलैः सर्वैः कामैरयुज्यत ॥ २५ ॥
प्रभावशाली राजर्षि लोमपादने मुनिवर ऋष्यशृंगको अपनी शान्ता नामवाली कन्या दान की थी, इससे उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्णरूपसे सफल हुईं ।। २५ ।।
कौत्साय दत्त्वा कन्यां तु हंसीं नाम यशस्विनीम् ।
गतोऽक्षयानतो लोकान् राजर्षिश्च भगीरथः ॥ २६ ॥
राजर्षि भगीरथ अपनी यशस्विनी कन्या हंसीका कौत्स ऋषिको दान करके अक्षय लोकोंमें गये हैं ।। २६ ।।
दत्त्वा शतसहस्रं तु गवां राजा भगीरथः ।
सवत्सानां कोहलाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २७ ॥
राजा भगीरथने कोहल नामक ब्राह्मणको एक लाख सवत्सा गौएँ दान कीं, जिससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई ।। २७ ।।
एते चान्ये च बहवो दानेन तपसा च ह ।
युधिष्ठिर गताः स्वर्गं विवर्तन्ते पुनः पुनः ॥ २८ ॥
युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुत-से राजा दान और तपस्याके प्रभावसे बारंबार स्वर्गलोकको जाते और पुनः वहाँसे इस लोकमें लौट आते हैं ।। २८ ।।
तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तिर्यावत् स्थास्यति मेदिनी ।
गृहस्थैर्दानतपसा यैर्लोका वै विनिर्जिताः ॥ २९ ॥
जिन गृहस्थोंने दान और तपस्याके बलसे उत्तम लोकोंपर विजय पायी है, उनकी कीर्ति इस लोकमें तबतक प्रतिष्ठित रहेगी, जबतक कि यह पृथ्वी स्थिर रहेगी ।। २९ ।।
शिष्टानां चरितं ह्येतत् कीर्तितं मे युधिष्ठिर ।
दानयज्ञप्रजासङ्गैरैते हि दिवमास्थिताः ॥ ३० ॥

युधिष्ठिर! यह शिष्ट पुरुषोंका चरित्र बताया गया है। ये सब नरेश दान, यज्ञ और संतानोत्पादन करके स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ३० ॥
दत्त्वा तु सततं तेऽस्तु कौरवाणां धुरन्धर ।
दानयज्ञक्रियायुक्ता बुद्धिर्धर्मोपचायिनी ॥ ३१ ॥
कौरवधुरंधर! तुम भी सदा दान करते रहो। तुम्हारी बुद्धि दान और यज्ञकी क्रियामें संलग्न हो धर्मकी उन्नति करती रहे ॥ ३१ ॥
यत्र ते नृपशार्दूल संदेहो वै भविष्यति ।
श्वः प्रभाते हि वक्ष्यामि संध्या हि समुपस्थिता ॥ ३२ ॥
नृपश्रेष्ठ! अब तुम्हें जिस विषयमें संदेह होगा, उसे मैं कल सबेरे बताऊँगा; क्योंकि इस समय संध्याकाल उपस्थित है ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३७ ॥