महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2307)
द्वादशोऽध्यायः
अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना
अर्जुन उवाच
भीम ज्येष्ठो गुरुर्मे त्वं नातोऽन्यद् वक्तुमुत्सहे ।
धृतराष्ट्रस्तु राजर्षिः सर्वथा मानमर्हति ॥ १ ॥
अर्जुन बोले— भैया भीमसेन! आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता और गुरुजन हैं; अतः आपके सामने मैं इसके सिवा और कुछ नहीं कह सकता कि राजर्षि धृतराष्ट्र सर्वथा समादरके योग्य हैं ॥ १ ॥
न स्मरन्त्यपराद्धानि स्मरन्ति सुकृतान्यपि ।
असम्भिन्नार्यमर्यादाः साधवः पुरुषोत्तमाः ॥ २ ॥
जिन्होंने आर्योंकी मर्यादा भंग नहीं की है, वे साधु-स्वभाववाले श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंके अपराधोंको नहीं, उपकारोंको ही याद रखते हैं ॥ २ ॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा फाल्गुनस्य महात्मनः ।
विदुरं प्राह धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
महात्मा अर्जुनकी यह बात सुनकर धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने विदुरजीसे कहा— ॥ ३ ॥
इदं मद्वचनात् क्षत्तः कौरवं ब्रूहि पार्थिवम् ।
यावदिच्छति पुत्राणां श्राद्धं तावद् ददाम्यहम् ॥ ४ ॥
‘चाचाजी! आप मेरी ओरसे कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे जाकर कह दीजिये कि वे अपने पुत्रोंका श्राद्ध करनेके लिये जितना धन चाहते हों, वह सब मैं दे दूँगा ॥ ४ ॥
भीष्मादीनां च सर्वेषां सुहृदामुपकारिणाम् ।
मम कोशादिति विभो मा भूद् भीमः सुदुर्मनाः ॥ ५ ॥
‘प्रभो! भीष्म आदि समस्त उपकारी सुहृदोंका श्राद्ध करनेके लिये केवल मेरे भण्डारसे धन मिल जायगा। इसके लिये भीमसेन अपने मनमें दुखी न हों’ ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तमर्जुनं प्रत्यपूजयत् ।
भीमसेनः कटाक्षेण वीक्षां चक्रे धनंजयम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मराजने अर्जुनकी बड़ी प्रशंसा की। उस समय भीमसेनने अर्जुनकी ओर कटाक्षपूर्वक देखा ॥ ६ ॥
ततः स विदुरं धीमान् वाक्यमाह युधिष्ठिरः ।
भीमसेने न कोपं स नृपतिः कर्तुमर्हति ॥ ७ ॥
तब बुद्धिमान् युधिष्ठिरने विदुरसे कहा—'चाचाजी! राजा धृतराष्ट्रको भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥
परिक्लिष्टो हि भीमोऽपि हिमवृष्ट्यातपादिभिः ।
दुःखैर्बहुविधैर्धीमानरण्ये विदितं तव ॥ ८ ॥
'आपको तो मालूम ही है कि वनमें हिम, वर्षा और धूप आदि नाना प्रकारके दुःखोंसे बुद्धिमान् भीमसेनको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा है ॥ ८ ॥
किं तु मद्वचनाद् ब्रूहि राजानं भरतर्षभ ।
यद् यदिच्छसि यावच्च गृह्यतां मद्गृहादिति ॥ ९ ॥
'आप मेरी ओरसे राजा धृतराष्ट्रसे कहिये कि भरतश्रेष्ठ! आप जो-जो वस्तु जितनी मात्रामें लेना चाहते हों, उसे मेरे घरसे ग्रहण कीजिये' ॥ ९ ॥
यन्मात्सर्यमयं भीमः करोति भृशदुःखितः ।
न तन्मनसि कर्तव्यमिति वाच्यः स पार्थिवः ॥ १० ॥
'भीमसेन अत्यन्त दुखी होनेके कारण जो कभी ईर्ष्या प्रकट करते हैं, उसे वे मनमें न लावें। यह बात आप महाराजसे अवश्य कह दीजियेगा' ॥ १० ॥
यन्ममास्ति धनं किंचिदर्जुनस्य च वेश्मनि ।
तस्य स्वामी महाराज इति वाच्यः स पार्थिवः ॥ ११ ॥
'मेरे और अर्जुनके घरमें जो कुछ भी धन है, उस सबके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र हैं; यह बात उन्हें बता दीजिये ॥ ११ ॥
ददातु राजा विप्रेभ्यो यथेष्टं क्रियतां व्ययः ।
पुत्राणां सुहृदां चैव गच्छत्वानृण्यमद्य सः ॥ १२ ॥
'वे ब्राह्मणोंको यथेष्ट धन दें। जितना खर्च करना चाहें, करें। आज वे अपने पुत्रों और सुहृदोंके ऋणसे मुक्त हो जायँ ॥ १२ ॥
इदं चापि शरीरं मे तवायत्तं जनाधिप ।
धनानि चेति विद्धि त्वं न मे तत्रास्ति संशयः ॥ १३ ॥
'उनसे कहिये, जनेश्वर! मेरा यह शरीर और सारा धन आपके ही अधीन है। इस बातको आप अच्छी तरह जान लें। इस विषयमें मेरे मनमें संशय नहीं है' ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि युधिष्ठिरानुमोदने
द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिरका
अनुमोदनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥