महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महाप्रस्थानिकपर्व
।। ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।।
श्रीमहाभारतम्
महाप्रस्थानिकपर्व
प्रथमोऽध्यायः
वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ।।
जनमेजय उवाच
एवं वृष्ण्यन्धककुले श्रुत्वा मौसलमाहवम् ।
पाण्डवाः किमकुर्वन्त तथा कृष्णे दिवं गते ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंशके वीरोंमें मूसलयुद्ध होनेका समाचार सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम पधारनेके पश्चात् पाण्डवोंने क्या किया? ।। १ ।।
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैवं कौरवो राजा वृष्णीनां कदनं महत् ।
प्रस्थाने मतिमाधाय वाक्यमर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! कुरुराज युधिष्ठिरने जब इस प्रकार वृष्णिवंशियोंके महान् संहारका समाचार सुना तब महाप्रस्थानका निश्चय करके अर्जुनसे कहा— ।। २ ।।
कालः पचति भूतानि सर्वाण्येव महामते ।
कालपाशमहं मन्ये त्वमपि द्रष्टुमर्हसि ॥ ३ ॥
‘महामते! काल ही सम्पूर्ण भूतोंको पका रहा है—विनाशकी ओर ले जा रहा है। अब मैं कालके बन्धनको स्वीकार करता हूँ। तुम भी इसकी ओर दृष्टिपात करो’। ।।
इत्युक्तः स तु कौन्तेयः कालः काल इति ब्रुवन् ।
अन्वपद्यत तद् वाक्यं भ्रातुर्ज्येष्ठस्य धीमतः ॥ ४ ॥
भाईके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनने ‘काल तो काल ही है, इसे टाला नहीं जा सकता’ ऐसा कहकर अपने बुद्धिमान् बड़े भाईके कथनका अनुमोदन किया ॥ ४ ॥
अर्जुनस्य मतं ज्ञात्वा भीमसेनो यमौ तथा ।
अन्वपद्यन्त तद् वाक्यं यदुक्तं सव्यसाचिना ॥ ५ ॥
अर्जुनका विचार जानकर भीमसेन और नकुल-सहदेवने भी उनकी कही हुई बातका अनुमोदन किया ॥
ततो युयुत्सुमानाय्य प्रव्रजन् धर्मकाम्यया ।
राज्यं परिददौ सर्वं वैश्यापुत्रे युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् धर्मकी इच्छासे राज्य छोड़कर जानेवाले युधिष्ठिरने वैश्यापुत्र युयुत्सुको बुलाकर उन्हींको सम्पूर्ण राज्यकी देख-भालका भार सौंप दिया ॥ ६ ॥
अभिषिच्य स्वराज्ये च राजानं च परीक्षितम् ।
दुःखार्तश्चाब्रवीद् राजा सुभद्रां पाण्डवाग्रजः ॥ ७ ॥
फिर अपने राज्यपर राजा परीक्षित्का अभिषेक करके पाण्डवोंके बड़े भाई महाराज युधिष्ठिरने दुःखसे आर्त होकर सुभद्रासे कहा— ॥ ७ ॥
एष पुत्रस्य पुत्रस्ते कुरुराजो भविष्यति ।
यदूंनां परिशेषश्च वज्रो राजा कृतश्च ह ॥ ८ ॥
‘बेटी! यह तुम्हारे पुत्रका पुत्र परीक्षित् कुरुदेश तथा कौरवोंका राजा होगा और यादवोंमें जो लोग बच गये हैं उनका राजा श्रीकृष्ण-पौत्र वज्रको बनाया गया है ॥ ८ ॥
परिक्षिद्धास्तिनपुरे शक्रप्रस्थे च यादवः ।
वज्रो राजा त्वया रक्ष्यो मा चाधर्मे मनः कृथाः ॥ ९ ॥
‘परीक्षित हस्तिनापुरमें राज्य करेंगे और यदुवंशी वज्र इन्द्रप्रस्थमें। तुम्हें राजा वज्रकी भी रक्षा करनी चाहिये और अपने मनको कभी अधर्मकी ओर नहीं जाने देना चाहिये’ ॥ ९ ॥
इत्युक्त्वा धर्मराजः स वासुदेवस्य धीमतः ।
मातुलस्य च वृद्धस्य रामादीनां तथैव च ॥ १० ॥
भ्रातृभिः सह धर्मात्मा कृतोदकममन्द्रितः ।
श्राद्धान्युद्दिश्य सर्वेषां चकार विधिवत् तदा ॥ ११ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरने भाइयों-सहित आलस्य छोड़कर बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण, बूढ़े मामा वसुदेव तथा बलराम आदिके लिये जलाञ्जलि दी और उन
सबके उद्देश्यसे विधिपूर्वक श्राद्ध किया ।।
द्वैपायनं नारदं च मार्कण्डेयं तपोधनम् ।
भारद्वाजं याज्ञवल्क्यं हरिमुद्दिश्य यत्नवान् ॥ १२ ॥
अभोजयत् स्वादु भोज्यं कीर्तयित्वा च शार्ङ्गिणम् ।
ददौ रत्नानि वासांसि ग्रामानश्वान् रथांस्तथा ॥ १३ ॥
स्त्रियश्च द्विजमुख्येभ्यस्तदा शतसहस्रशः ।
प्रयत्नशील युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, तपोधन मार्कण्डेय, भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनिको सुस्वादु भोजन कराया। भगवान्का नाम कीर्तन करके उन्होंने उत्तम ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र, ग्राम, घोड़े और रथ प्रदान किये। बहुत-से ब्राह्मणशिरोमणियोंको लाखों कुमारी कन्याएँ दीं ।।
कृपमभ्यर्च्य च गुरुमथ पौरपुरस्कृतम् ॥ १४ ॥
शिष्यं परिक्षितं तस्मै ददौ भरतसत्तमः ।
तत्पश्चात् गुरुवर कृपाचार्यकी पूजा करके पुरवासियों-सहित परीक्षित्को शिष्यभावसे उनकी सेवामें सौंप दिया ।।
ततस्तु प्रकृतीः सर्वाः समानाय्य युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥
सर्वमाचष्ट राजर्षिश्चिकीर्षितमथात्मनः ।
इसके बाद समस्त प्रकृतियों (प्रजा-मन्त्री आदि)-को बुलाकर राजर्षि युधिष्ठिरने, वे जो कुछ करना चाहते थे अपना वह सारा विचार उनसे कह सुनाया ।।
ते श्रुत्वैव वचस्तस्य पौरजानपदा जनाः ॥ १६ ॥
भृशमुद्विग्नमनसो नाभ्यनन्दन्त तद्वचः ।
नैवं कर्तव्यमिति ते तदोचुस्तं जनाधिपम् ॥ १७ ॥
उनकी वह बात सुनते ही नगर और जनपदके लोग मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। उन्होंने उस प्रस्तावका स्वागत नहीं किया। वे सब राजासे एक साथ बोले—‘आपको ऐसा नहीं करना चाहिये (आप हमें छोड़कर कहीं न जायँ)' ।। १६-१७ ।।
न च राजा तथाकार्षीत् कालपर्यायधर्मवित् ।
परंतु धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर कालके उलट-फेरके अनुसार जो धर्म या कर्तव्य प्राप्त था उसे जानते थे; अतः उन्होंने प्रजाके कथनानुसार कार्य नहीं किया ।।
ततोऽनुमान्य धर्मात्मा पौरजानपदं जनम् ॥ १८ ॥
गमनाय मतिं चक्रे भ्रातरश्चास्य ते तदा ।
उन धर्मात्मा नरेशने नगर और जनपदके लोगोंको समझा-बुझाकर उनकी अनुमति प्राप्त कर ली। फिर उन्होंने और उनके भाइयोंनै सब कुछ त्यागकर महा-प्रस्थान करनेका ही निश्चय किया ।। १८ १/२ ।।
ततः स राजा कौरव्यो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १९ ॥
उत्सृज्याभरणान्यङ्गाज्जगृहे वल्कलान्युत ।
भीमार्जुनयमाश्चैव द्रौपदी च यशस्विनी ॥ २० ॥
तथैव जगृहुः सर्वे वल्कलानि नराधिप ।
इसके बाद कुरुकुलरत्न धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने अपने अंगोंसे आभूषण उतारकर वल्कलवस्त्र धारण कर लिया। नरेश्वर! फिर भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा यशस्विनी द्रौपदी देवी—न सबने भी उसी प्रकार वल्कल धारण किये ॥ १९-२० १/२ ॥
विधिवत् कारयित्वेष्टिं नैष्ठिकीं भरतर्षभ ॥ २१ ॥
समुत्सृज्याप्सु सर्वेऽग्नीन् प्रतस्थुर्नरपुङ्गवाः ।
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणोंसे विधिपूर्वक उत्सर्गकालिक इष्टि करवाकर उन सभी नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने अग्नियोंका जलमें विसर्जन कर दिया और स्वयं वे महायात्राके लिये प्रस्थित हुए ॥ २१ १/२ ॥
ततः प्ररुरुदुः सर्वाः स्त्रियो दृष्ट्वा नरोत्तमान् ॥ २२ ॥
प्रस्थितान् द्रौपदीषष्ठान् पुरा द्यूतजितान् यथा ।
हर्षोऽभवच्च सर्वेषां भ्रातॄणां गमनं प्रति ॥ २३ ॥
पहले जूएमें परास्त होकर पाण्डवलोग जिस प्रकार वनमें गये थे उसी प्रकार उस दिन द्रौपदीसहित उन नरोत्तम पाण्डवोंको इस प्रकार जाते देख नगरकी सभी स्त्रियाँ रोने लगीं। परन्तु उन सभी भाइयोंको इस यात्रासे महान् हर्ष हुआ ॥ २२-२३ ॥
युधिष्ठिरमतं ज्ञात्वा वृष्णिक्षयमवेक्ष्य च ।
भ्रातरः पञ्च कृष्णा च षष्ठी श्वा चैव सप्तमः ॥ २४ ॥
युधिष्ठिरका अभिप्राय जान और वृष्णिवंशियोंका संहार देखकर पाँचों भाई पाण्डव, द्रौपदी और एक कुत्ता—ये सब साथ-साथ चले ॥ २४ ॥
आत्मना सप्तमो राजा निर्ययौ गजसाह्वयात् ।
पौरैरनुगतो दूरं सर्वैरन्तःपुरैस्तथा ॥ २५ ॥
न चैनमशकत् कश्चिन्निवर्तस्वेति भाषितुम् ।
उन छहोंको साथ लेकर सातवें राजा युधिष्ठिर जब हस्तिनापुरसे बाहर निकले तब नगरनिवासी प्रजा और अन्तःपुरकी स्त्रियाँ उन्हें बहुत दूरतक पहुँचाने गयीं; किंतु कोई भी मनुष्य राजा युधिष्ठिरसे यह नहीं कह सका कि आप लौट चलिये ॥ २५ १/२ ॥
न्यवर्तन्त ततः सर्वे नरा नगरवासिनः ॥ २६ ॥
कृपप्रभृतयश्चैव युयुत्सुं पर्यवारयन् ।
धीरे-धीरे समस्त पुरवासी और कृपाचार्य आदि युयुत्सुको घेरकर उनके साथ ही लौट आये ॥ २६ १/२ ॥
विवेश गङ्गां कौरव्य उलूपी भुजगात्मजा ॥ २७ ॥
चित्राङ्गदा ययौ चापि मणिपूरपुरं प्रति ।
शिष्टाः परिक्षितं त्वन्या मातरः पर्यवारयन् ।। २८ ।।
जनमेजय! नागराजकी कन्या उलूपी उसी समय गंगाजीमें समा गयी। चित्रांगदा मणिपुर नगरमें चली गयी। तथा शेष माताएँ परीक्षित्को घेरे हुए पीछे लौट आयीं ।। २७-२८ ।।
पाण्डवाश्च महात्मानो द्रौपदी च यशस्विनी ।
कृतोपवासाः कौरव्य प्रययुः प्राङ्मुखास्ततः ।। २९ ।।
कुरुनन्दन! तदनन्तर महात्मा पाण्डव और यशस्विनी द्रौपदीदेवी सब-के-सब उपवासका व्रत लेकर पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके चल दिये ।। २९ ।।
योगयुक्ता महात्मानस्त्यागधर्ममुपेयुषः ।
अभिजग्मुर्बहून् देशान् सरितः सागरांस्तथा ।। ३० ।।
वे सब-के-सब योगयुक्त महात्मा तथा त्याग-धर्मका पालन करनेवाले थे। उन्होंने अनेक देशों, नदियों और समुद्रोंकी यात्रा की ।। ३० ।।
युधिष्ठिरो ययावग्रे भीमस्तु तदनन्तरम् ।
अर्जुनस्तस्य चान्वेव यमौ चापि यथाक्रमम् ।। ३१ ।।
आगे-आगे युधिष्ठिर चलते थे। उनके पीछे भीमसेन थे। भीमसेनके भी पीछे अर्जुन थे और उनके भी पीछे क्रमशः नकुल और सहदेव चल रहे थे ।। ३१ ।।
पृष्ठतस्तु वरारोहा श्यामा पद्मदलेक्षणा ।
द्रौपदी योषितां श्रेष्ठा ययौ भरतसत्तम ।। ३२ ।।
भरतश्रेष्ठ! इन सबके पीछे सुन्दर शरीरवाली, श्यामवर्णा, कमलदललोचना, युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदी चल रही थी ।। ३२ ।।
श्वा चैवानुययावेकः प्रस्थितान् पाण्डवान् वनम् ।
क्रमेण ते ययुर्वीरा लौहित्यं सलिलार्णवम् ।। ३३ ।।
वनको प्रस्थित हुए पाण्डवोंके पीछे एक कुत्ता भी चला जा रहा था। क्रमशः चलते हुए वे वीर पाण्डव लालसागरके तटपर जा पहुँचे ।। ३३ ।।
गाण्डीवं तु धनुर्दिव्यं न मुमोच धनंजयः ।
रत्नलोभान् महाराज ते चाक्षय्ये महेषुधी ।। ३४ ।।
महाराज! अर्जुनने दिव्यरत्नके लोभसे अभीतक अपने दिव्य गाण्डीव धनुष तथा दोनों अक्षय तूणीरोंका परित्याग नहीं किया था ।। ३४ ।।
अग्निं ते ददृशुस्तत्र स्थितं शैलमिवाग्रतः ।
मार्गमावृत्य तिष्ठन्तं साक्षात्पुरुषविग्रहम् ।। ३५ ।।
वहाँ पहुँचकर उन्होंने पर्वतकी भाँति मार्ग रोककर सामने खड़े हुए पुरुषरूपधारी साक्षात् अग्निदेवको देखा ।।
ततो देवः स सप्तार्चिः पाण्डवानिदमब्रवीत् ।
भो भोः पाण्डुसुता वीराः पावकं मां निबोधत ॥ ३६ ॥
तब सात प्रकारकी ज्वलारूप जिह्वाओंसे सुशोभित होनेवाले उन अग्निदेवने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा—'वीर पाण्डुकुमारो! मुझे अग्नि समझो ॥ ३६ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो भीमसेन परंतप ।
अर्जुनाश्विसुतौ वीरौ निबोधत वचो मम ॥ ३७ ॥
'महाबाहु युधिष्ठिर! शत्रुसंतापी भीमसेन! अर्जुन! और वीर अश्विनीकुमारो! तुम सब लोग मेरी इस बातपर ध्यान दो ॥ ३७ ॥
अहमग्निः कुरुश्रेष्ठा मया दग्धं च खाण्डवम् ।
अर्जुनस्य प्रभावेण तथा नारायणस्य च ॥ ३८ ॥
'कुरुश्रेष्ठ वीरो! मैं अग्नि हूँ। मैंने ही अर्जुन तथा नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे खाण्डव-वनको जलाया था ॥ ३८ ॥
अयं वः फाल्गुनो भ्राता गाण्डीवं परमायुधम् ।
परित्यज्य वने यातु नानेनार्थोऽस्ति कश्चन ॥ ३९ ॥
'तुम्हारे भाई अर्जुनको चाहिये कि ये इस उत्तम आयुध गाण्डीव धनुषको त्यागकर वनमें जायँ। अब इन्हें इसकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ३९ ॥
चक्ररत्नं तु यत् कृष्णे स्थितमासीन्महात्मनि ।
गतं तच्च पुनर्हस्ते कालेनैष्यति तस्य ह ॥ ४० ॥
'पहले जो चक्ररत्न महात्मा श्रीकृष्णके हाथमें था वह चला गया। वह पुनः समय आनेपर उनके हाथमें जायगा ॥ ४० ॥
वरुणादाहृतं पूर्वं मयैतत् पार्थकारणात् ।
गाण्डीवं धनुषां श्रेष्ठं वरुणायैव दीयताम् ॥ ४१ ॥
'यह गाण्डीव धनुष सब प्रकारके धनुषोंमें श्रेष्ठ है। इसे पहले मैं अर्जुनके लिये ही वरुणसे माँगकर ले आया था। अब पुनः इसे वरुणको वापस कर देना चाहिये' ॥ ४१ ॥
ततस्ते भ्रातरः सर्वे धनंजयमचोदयन् ।
स जले प्राक्षिपच्चैतत्तथाक्षय्ये महेषुधी ॥ ४२ ॥
यह सुनकर उन सब भाइयोंने अर्जुनको वह धनुष त्याग देनेके लिये कहा। तब अर्जुनने वह धनुष और दोनों अक्षय तरकस पानीमें फेंक दिये ॥ ४२ ॥
ततोऽग्निर्भरतश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीयत ।
ययुश्च पाण्डवा वीरास्ततस्ते दक्षिणामुखाः ॥ ४३ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद अग्निदेव वहीं अन्तर्धान हो गये और पाण्डववीर वहाँसे दक्षिणाभिमुख होकर चल दिये ॥
ततस्ते तूत्तरेणैव तीरेण लवणाम्भसः ।
जग्मुर्भरतशार्दूल दिशं दक्षिणपश्चिमाम् ॥ ४४ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर वे लवणसमुद्रके उत्तर तटपर होते हुए दक्षिण-पश्चिमदिशाकी ओर अग्रसर होने लगे ॥
ततः पुनः समावृत्ताः पश्चिमां दिशमेव ते ।
ददृशुर्द्वारकां चापि सागरेण परिप्लुताम् ॥ ४५ ॥
उदीचीं पुनरावृत्य ययुर्भरतसत्तमाः ।
प्रादक्षिण्यं चिकीर्षन्तः पृथिव्या योगधर्मिणः ॥ ४६ ॥
इसके बाद वे केवल पश्चिम दिशाकी ओर मुड़ गये। आगे जाकर उन्होंने समुद्रमें डुबी हुई द्वारकापुरीको देखा। फिर योगधर्ममें स्थित हुए भरतभूषण पाण्डवोंने वहाँसे लौटकर पृथ्वीकी परिक्रमा पूरी करनेकी इच्छासे उत्तर दिशाकी ओर यात्रा की ॥ ४५-४६ ॥
इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत महाप्रस्थानिकपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥